Wednesday, July 24, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार

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9 जून 2013
गेमूर मनाली से 133 किलोमीटर दूर है। सात बजे आंख खुली। गांव के बीचोंबीच एक नाला है, बडा तेज बहाव है। कुछ नीचे इसी के किनारे सार्वजनिक शौचालय है। नाले के पानी का कुछ हिस्सा शौचालय में भी जाता है। बडी सावधानी से गया, फिर भी बर्फीले ठण्डे पानी में पैर भीग गये।
साइकिल धूल धूसरित हो गई थी। पुनः नाले का लाभ उठाया, दस मिनट में चकाचक।
यहीं नाश्ता किया। नौ बजे निकल पडा। आज का लक्ष्य 36 किलोमीटर दूर जिंगजिंगबार है। सचिन रात पता नहीं कहां रुका था, लेकिन आज वो जिंगजिंगबार में मिलेगा।
गेमूर से जिस्पा 5 किलोमीटर दूर है। सडक अच्छी बनी है, ढलान भी है। पौन घण्टा लगा। जिस्पा में होटलों की कोई कमी नहीं है। अगर कल गेमूर में रुकने का इंतजाम न मिलता तो मैं जिस्पा ही रुकता।
जिस्पा से छह किलोमीटर आगे दारचा है। रास्ता चढाई उतराई दोनों का है। साढे दस बजे पहुंच गया। दारचा में कई नदियों का मिलन होता है। इसी तरह की एक नदी के पुल के पास चेकपोस्ट है। हर गाडी व यात्री का विवरण यहां दर्ज होता है। मैंने सोचा साइकिल को छूट मिलेगी, लेकिन जब बैरियर पार करके आगे बढ चला तो आवाज आई- हेलो सर, एण्ट्री प्लीज। मैं साइकिल खडी करके उसके पास गया तो जाते ही बोला- सर, पासपोर्ट प्लीज। वो मुझे विदेशी समझे बैठा था। मैंने ठेठ लहजे में कहा- भाई, देसी हूं। हम पासपोर्ट ना दिखाया करते। खैर, उसने एक रजिस्टर में नाम पता दर्ज कर लिया।
यहां भरपेट खाना खाया। ग्यारह बजकर बीस मिनट पर चल पडा। बडी तेज धूप थी।
दारचा से निकलते ही बारालाचा-ला की चढाई शुरू हो जाती है। दारचा 3460 मीटर की ऊंचाई पर है जबकि बारालाचा-ला 4900 मीटर पर। दूरी है 45 किलोमीटर। दारचा से 23 किलोमीटर आगे 4100 मीटर की ऊंचाई पर जिंगजिंगबार है जहां मुझे रात रुकना है।
सडक बिल्कुल खराब है। दो किलोमीटर आगे एक तिराहा है जहां से तीसरी सडक छिया तक जाती है। नाम भूल सा गया हूं, या तो छिया है या जिया। यह वही सडक है जो मैंने जनवरी में देखी थी निम्मू से चिलिंग वाली। यह निम्मू-पदुम-दारचा सडक परियोजना का हिस्सा है। निम्मू से पचास साठ किलोमीटर तक यह बन चुकी है। पदुम के दोनों तरफ भी कुछ दूर तक बनी है और इधर दारचा में भी कुछ बन गई है।
किलोमीटर के पत्थर एक नये स्थान के बारे में बता रहे हैं- पतसेव, दारचा से 16 किलोमीटर।
कुछ दूर चलकर अच्छी सडक आ गई लेकिन चढाई बारालाचा-ला पर ही खत्म होगी। एक नाला मिला। इस पर पुल नहीं था, बहाव बहुत तेज था। सीधे बर्फ पिघलकर आ रही है, तो इसकी ठण्डक का वर्णन करने की आवश्यकता नहीं। किसी तरह इसे पार किया। तभी पीछे से एक मोटरसाइकिल आई। पार करते समय उसके दोनों जूतों में पानी भर गया। हाल-चाल पूछा, जान पहचान हुई। वे इन्दौर से पंकज जैन थे। पर्वतारोही हैं और अब मोटरसाइकिल से लद्दाख जा रहे हैं।
यहां से एक किलोमीटर भी आगे नहीं गया कि एक और जबरदस्त नाला मिला। इसके दोनों तरफ वाहनों की कतारें थीं। एक बुलडोजर नाले के रास्ते में आने वाले पत्थरों को हटा रहा था व पथरीली सडक को समतल बनाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। छोटी गाडियां अल्प समय के लिये इसमें फंसी भी। मजदूरों ने बीडी पिलाने की शर्त पर मेरी साइकिल को पार पहुंचाने की जिम्मेदारी ली लेकिन मैं कैसे उन्हें बिल्कुल नई चीज पकडा सकता था? इतने दिनों में मुझे इसका अच्छा अभ्यास हो गया है और यह भी जानता हूं कि इसके किस हिस्से में वजन ज्यादा है, कहां कम? तेज बहाव में सन्तुलन बडे काम का है और मुझे पता है कि मेरी साइकिल का सन्तुलन केन्द्र कहां है। मजदूरों को साइकिल पकडा दूं, अगर कुछ उल्टा सीधा हो गया तो कौन जिम्मेदारी लेगा? आखिरकार मैंने खुद ही साइकिल पार की। बडी देर तक पैर सुन्न रहे।
पौने चार बजे पतसेव पहुंचा। भूख लगी थी, परांठा खाया। यहां तक मेरी हालत बहुत खराब हो गई थी थकान व ऊंचाई की वजह से। एक और वजह थी कि जो पैंट मैंने पहन रखी थी, वह काफी टाइट थी। दो दिनों तक इसे पहने ही साइकिल चलाता रहा। अब साइकिल पर बैठना भी बहुत मुश्किल होने लगा था।
पतसेव से जिंगजिंगबार नौ किलोमीटर है। इनमें से तीन किलोमीटर ही साइकिल पर बैठकर चला, बाकी छह किलोमीटर पैदल। यहां भी एक नाला पार करना पडा। बुलडोजर सडक साफ कर रहा था, दोनों तरफ लाइनें लगी थीं। लेकिन साइकिल को कौन रोक सकता है?
साढे छह बजे जब जिंगजिंगबार एक किलोमीटर रह गया, सामने कुछ दिखने भी लगा तो चलने की गति कम कर ली। और जब जिंगजिंगबार पहुंचा तो बडा जोर का झटका लगा- रहने व खाने का इंतजाम यहां से छह किलोमीटर और आगे है। अच्छा था कि बीआरओ का एक ट्रक यहां से ऊपर जा रहा था। मजदूरों ने दरियादिली दिखाई व साइकिल छह किलोमीटर के लिये ट्रक पर लद गई।
इस समय तक मेरी हालत बेहद खराब हो चुकी थी। सुबह 3300 मीटर पर था, अब 4300 मीटर पर। ऊपर से जिंगजिंगबार से छह किलोमीटर आगे खाने रहने का इंतजाम है, यह धोखा है।
यहां 60-70 के करीब मजदूर भी रहते हैं। चार-पांच तम्बू थे जहां घुमक्कडों के रहने खाने व ठहरने का अच्छा इंतजाम है। इसी तरह के एक तम्बू में मैं चला गया व रजाई ओढकर सो गया। बेहद थका था। अच्छी नींद आई। नौ बजे बच्चों का शोर सुनकर आंख खुली। एक बडा कुनबा भी यहां डेरा डाल चुका था। बाद में पता चला कि ये मेरठ के थे- अपने पडोस के गांव के। बाद में नहीं बल्कि साथ ही पता चल गया था मेरठी बोली सुनकर।
सचिन को ढूंढा, नहीं मिला। दूसरे तम्बू वालों से भी पूछा, सबने मना कर दिया। शायद वो आज ही बारालाचा पार कर गया हो। वो मुझसे ज्यादा अनुभवी और मजबूत है। मैं आलसी आराम से चला तो यहां तक आ गया, वो पक्का आगे निकल गया होगा।

गेमूर गांव

जिस्पा

दारचा की ओर


दारचा

दारचा से आगे

तिराहा जहां से एक सडक पदुम जाती है।

बारालाचा-ला की ओर


दारचा से तीन किलोमीटर आगे



एक तेज बहाव वाला ठण्डा नाला

एक और नाला। यह पहले वाले से खतरनाक था और दोनों तरफ गाडियों की लाइन लगी थी। पानी बिल्कुल मटमैला।


मोटरसाइकिल सवार अति तीव्र बहाव में संभल नहीं सका।

पतसेव के पास छोटी सी झील

पतसेव- मनाली से 160 किलोमीटर आगे।


जिंगजिंगबार से चार किलोमीटर पहले भी एक नाला मिला। ये नाले अपने साथ पत्थर भी ले आते हैं जिससे सडक गायब हो जाती है और पत्थर ही पत्थर रह जाते हैं जिससे इन्हें पार करने में और समस्या आती है।



बारालाचा-ला से आती भागा नदी


जिंगजिंगबार जाकर पता चला कि रहने खाने की जगह और छह किलोमीटर आगे है तो साइकिल ट्रक पर रख दी। हिम्मत बिल्कुल खत्म हो गई थी। ट्रक न होता तो मैं यहीं टैण्ट लगा लेता।



अगला भाग: लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकीला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

22 comments:

  1. Happy birth day , Neeraj ,ma gayatri se yahi prathna he ki tum jahan jao tumhari raksha kare or hamari mannat puri kare .

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  2. हर अनुच्छेद में रोमांच आ रहा है।

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  3. आप की यात्रा से रोंगटे खडे़ हो गये। वो भी बर्फिले पानी से।

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  4. भाई, देसी हूं। हम पासपोर्ट ना दिखाया करते।

    waah

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  5. नीरज जी जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई हो.......

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  6. beautiful pics .............the mountains are beautiful .....breathtaking.......

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  7. अब बुढापे में साईकिल तो चलेगी नहीं ....पर इतना तय है .....अगले साल अपन भी ......bike से ........जालंधर श्रीनगर लेह मनाली जालंधर करेंगे ...........decided .....

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  8. ' हम पासपोर्ट ना दिखाया करते'
    लद्दाख में हरियाणवी के ठाठ !
    दृष्यावली बहुत मोहक,
    जन्मदिन की बधाई !

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  9. कठिन सफ़र .... अदम्य साहस।
    जन्म-दिवस की (belated) हार्दिक शुभकामनाएँ
    - Anilkv

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  10. यार नीरज, ये तो तय है कि रास्ते में जहाँ भी रुकते होगे, छोटी -छोटी डिटेल डायरी में नोट करते होगे, वर्ना इतनी तफसील से नहीं बता पाते ...है ना ?

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  11. bhai maza aa gaya .... agla filing station 365 km ho ya 3650 km ... mannu ki

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  12. साईकिल को भला कौन रोक पाया है..

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  13. दाढी में भी अच्छे लगते हो
    जै राम जी की

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  14. agle ank ka intjar

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  15. पहाड़ी इलाक़ों में खाने की समरूया बनी ही रहती है, ढाबे/दुकानें कम मि‍लती हैं, जहां मौक़ा मि‍ले खा लेना ही अपना भी उसूल है वर्ना हो सकता है अगली दुकान 2-4 घंटे बाद मि‍ले

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  16. Posts are coming very slow

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  17. बहुत खतरनाक और रोमांचिक यात्रा ...

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