जिम कार्बेट की हिंदी किताबें

May 01, 2018
इन पुस्तकों का परिचय यह है कि इन्हें जिम कार्बेट ने लिखा है। और जिम कार्बेट का परिचय देने की अक्ल मुझमें नहीं। उनकी तारीफ करने में मैं असमर्थ हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि उनकी तारीफ करने में कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए। जो भी शब्द उनके लिये प्रयुक्त करूंगा, वे अपर्याप्त होंगे। बस, यह समझ लीजिए कि लिखते समय वे आपके सामने अपना कलेजा निकालकर रख देते हैं। आप उनका लेखन नहीं, सीधे हृदय पढ़ते हैं। लेखन में तो भूल-चूक हो जाती है, हृदय में कोई भूल-चूक नहीं हो सकती।
आप उनकी किताबें पढ़िए। कोई भी किताब। वे बचपन से ही जंगलों में रहे हैं। आदमी से ज्यादा जानवरों को जानते थे। उनकी भाषा-बोली समझते थे। कोई जानवर या पक्षी बोल रहा है तो क्या कह रहा है, चल रहा है तो क्या कह रहा है; वे सब समझते थे। वे नरभक्षी तेंदुए से आतंकित जंगल में खुले में एक पेड़ के नीचे सो जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इस पेड़ पर लंगूर हैं और जब तक लंगूर चुप रहेंगे, इसका अर्थ होगा कि तेंदुआ आसपास कहीं नहीं है। कभी वे जंगल में भैंसों के एक खुले बाड़े में भैंसों के बीच में ही सो जाते, कि अगर नरभक्षी आएगा तो भैंसे अपने-आप जगा देंगी।


1. दैवी शेर तथा कुमाऊँ के अन्य नरभक्षी

इस किताब की पहली कहानी ‘दैवी शेर’ में वे एक ऐसे बाघ का शिकार करने जाते हैं, जो नरभक्षी नहीं था। देवीधुरा के मंदिर के पुजारी ने उनसे कहा था कि साहब, आप उस शेर को मारने का प्रयत्न करो या न करो, आपकी मर्जी; लेकिन आप उसे कभी नहीं मार सकोगे, क्योंकि वह देवी का शेर है। कार्बेट ने उसे पाँच बार मारने का प्रयत्न किया, बाघ भी उनके सामने रोज ही आता। आँखों में आँखें डालकर मानो सीधे कहता कि मार सको, तो मारो; लेकिन जिम उसे नहीं मार सके। आपने कभी जिम का साहित्य नहीं पढ़ा है, तो आपको यह सामान्य घटना लगेगी। लेकिन अगर आपने जिम का साहित्य पढ़ लिया तो आप इसे सामान्य घटना नहीं कह सकोगे।
जिम ने नरभक्षी तेंदुओं व नरभक्षी बाघों का शिकार किया। अनुवाद में तेंदुए को बाघ और बाघ को शेर लिखा गया है। अनुवादक नरेश चंद्र मधवाल इस बात को स्वीकार भी करते हैं। कहते हैं कि स्थानीय लोग इन्हें इन्हीं नामों से पुकारते हैं। और मधवाल साहब की भी तारीफ बनती है, इतना उत्कृष्ट अनुवाद करने के लिये। अन्यथा ज्यादातर बार अनुवाद करते समय केवल शब्द ही हाथ आते हैं, हृदय नहीं।
इसमें पाँच कथाएँ हैं:
1. दैवी शेर
2. मुक्तेसर की नरभक्षी
3. पनार का नरभक्षी
4. चूका का नरभक्षी
5. तल्लादेश की नरभक्षी
जाहिर है कि पूर्वी कुमाऊँ की ये शिकार-कथाएँ हैं। इनमें चूका और तल्लादेश तो नेपाल सीमा के एकदम नजदीक हैं और पनार भी बहुत दूर नहीं।

अनुवादक: नरेश चंद्र मधवाल
प्रकाशक: नटराज पब्लिशर्स, देहरादून
आई.एस.बी.एन.: 978-81-8158-143-3
पृष्ठ: 240
अधिकतम मूल्य: 295 रुपये (हार्डकवर)

2. मेरा हिंदुस्तान


     1. गाँव की मलिका
“इन गाँवों में मैंने अपनी जिदगी का सबसे खूबसूरत वक्त बिताया है और जब भी आप या मैं यहाँ लौटकर आएंगे तो हम ऐसे ही प्यार भरे सत्कार की उम्मीद हमेशा कर सकते हैं। हर बार हमको जल्दी लौट के आने का न्यौता मिलेगा - और ये कोई महज तकल्लुफ वाली बात नहीं है। जो लोग मेरे हिंदुस्तान के लोगों को जानते-समझते हैं, वे यह भी जानते हैं कि यह मेरे हिंदुस्तान के लोगों के दिली जज्बात से भरा न्यौता है।”

     2. कुँवर सिंह
इस किस्से को केवल जिम कार्बेट ही लिख सकते हैं। यह एक कालजयी किस्सा है। इसे तो अनिवार्यतः स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए। कार्बेट का एक दोस्त कुँवर सिंह, जो एक दिन तकरीबन-तकरीबन मर चुका था और घर में स्यापा भी शुरू हो चुका था। लेकिन कार्बेट ने जाकर उसे किस तरह बचाया, यह वाकई दिल को छूने वाली बात है।

     3. मोती
“हिटलर की जंग से बिगड़ी अपनी सेहत को वापस हासिल करने के लिए हम कहीं और जाना चाहते थे। जाने से पहले मैंने अपने गाँव के सब किसानों को उनके परिवार के साथ बुलाया। ऐसा मैं पहले भी दो बार कर चुका था - उन्हें बुलाकर उनकी जुताई की जमीन पर उन्हें ही मालिकाना कह देने की पेशकश मैंने की। अपना गाँव खुद चलाने की पेशकश। इस बार जब सब लोग आ गए और मुझे जो कहना था, वह मैं कह चुका तो पुनवा की माँ गाँव के सब लोगों की तरफ से उठ खड़ी हुई और उसने अपने बेलाग तरीके से जो कहा, वह इस तरह है - “आपने बिना किसी मकसद के हमें बुला लिया और हमें अपना काम छोड़कर आना पड़ा। हम आपको पहले भी बता चुके हैं और अब एक बार फिर बता रहे हैं कि हमें आपकी जमीन की मल्कियत नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसा करने का सीधा मतलब यही होगा कि हम आपके लोग नहीं कहलाएंगे। आपके और हमारे बीच जो रिश्ता है, उसे हम खत्म नहीं होने देंगे। खैर, ये सब तो छोड़ो और ये बताओ साहब कि उस सूवर का क्या बना? वो शैतान की औलाद आपकी बनवाई दीवार पर चढ़कर आया और मेरे आलू खा गया।” ”
“लड़ाई के दिनों में कालाढुंगी वाली हमारी कॉटेज में मैगी को सर्दियाँ अकेले बितानी पड़ीं - उसके पास आने-जाने का कोई इंतजाम नहीं था और सबसे नजदीकी बस्ती चौदह मील दूर थी। उसकी हिफाजत को लेकर मैं कभी फिक्रमंद नहीं हुआ, क्योंकि मुझे मालूम है कि वह पूरी हिफाजत से है मेरे दोस्तों के बीच - हिंदुस्तान के गरीबों के बीच।”

     4. लालफीताशाही के पहले का जमाना
एक अंग्रेज अफसर एंडरसन का जिक्र है, जो दौरा करते हुए बहुत सारे विवाद निपटा दिया करता था।

     5. जंगल का कानून
एक गरीब आदमी के दो बच्चे अचानक खो जाते हैं और तीन दिनों बाद वे कहाँ, किस हालत में मिलते हैं; यह पढ़ना बेहद रोमांचक है। साथ ही इस दौरान उस गरीब पर क्या बीतती है, इसे भी कार्बेट महसूस कराते हैं।
“यदि ईश्वर ने वही कानून इंसानों के लिए बनाया होता, जो उसने जंगली जानवरों के लिए बनाया है तो कोई जंग होती ही नहीं क्योंकि तब इंसानों में जो ताकतवर होते, उनके दिल में अपने से कमजोर लोगों के लिए वही जज्बा होता जो कि जंगल के कानून में अभी हम देख चुके हैं।”

     6. दो भाई
दो ऐसे भाइयों की कहानी है, जो सगे तो नहीं थे, लेकिन एक-दूसरे को सगा भाई ही मानते थे। जंगल में शेर एक भाई पर आक्रमण कर देता है तो दूसरा क्या करता है, इसे तो किताब में ही पढ़ना पड़ेगा।

     7. हिंदुस्तान का रॉबिनहुड - सुल्ताना
समूचे कार्बेट साहित्य में मेरी पसंदीदा कहानी है यह। नजीबाबाद के इस कुख्यात डाकू को पकड़ने में सरकार ने जिम कार्बेट की सहायता ली और जिम ने किस तरह इनका साथ दिया, किस तरह जंगलों में सुल्ताना के ठिकानों पर छापे मारे और किस तरह भूख-प्यास से बेहाल भी रहे; सब पढ़ना रोमांचक है। इस लंबी कहानी का यह हिस्सा मुझे सर्वाधिक पसंद है और कई बार तो मैं केवल इस किस्से को पढ़ने के लिए ही इस किताब का पेज-150 खोल लेता हूँ:
“लेटे-लेटे मैंने किसी तेंदुए के हाथों चीतल के मारे जाने की आवाज सुनी। ये आवाज मेरे कानों को बहुत भली लगी। आवाज से ही मुझे अंदाजा हो गया था कि हमारे बड़ के पेड़ से कुछ ही दूर तेंदुए ने अपने खाने का इंतजाम कर लिया था। मुझे इस शिकार में अपने लिए भरपेट खाना मिलने की उम्मीद हो रही थी। चपातियों का जो हिस्सा मेरे हाथ लगा था, उसने मेरी भूख मिटाने के बजाय बढ़ा दी थी। मैं एकदम लपककर उठ बैठा और फ्रेडी (पुलिस अफसर) से उसकी खुखरी मांगी। फ्रेडी ने पूछा, “खुदा के वास्ते मुझे बताओ, आखिर काहे के लिए तुम्हें खुखरी चाहिए?” मैंने उसे बताया कि अभी जिस चीतल को तेंदुए ने मारा है, उसकी पिछली रानें काटने के लिए मुझे खुखरी चाहिए थी। “कौन-सा तेंदुआ! और कौन-सा चीतल?” फ्रेडी ने पूछा, “आखिर तुम बात क्या कर रहे हो?” हाँ, चीतल की आवाज फ्रेडी को भी सुनाई दे रही थी, लेकिन भला उसे कैसे मालूम होता कि चीतल की चेतावनी भरी आवाज तेंदुए की वजह से थी, ना कि हमारी जासूसी पर निकले सुल्ताना के आदमियों को देखने की वजह से। और हाँ, यदि मैं ठीक भी सोच रहा था कि तेंदुए ने चीतल मार गिराया है तो मैं तेंदुए से उसका खाना अपने लिए कैसे ला सकता था - वह भी बगैर बंदूक। मैं जानबूझकर अपनी रायफल नहीं लाया था - यह सोचकर कि पता नहीं उसका क्या इस्तेमाल करना पड़े। “नहीं, पूरा आइडिया एकदम बकवास है” कहकर फ्रेडी ने बात खत्म कर दी। मैं चुपचाप दुखी होकर वापस लेट गया।
“जो लोग जंगल के जानवरों की भाषा नहीं समझते, उन्हें आखिर मैं कैसे समझाता कि मुझे मालूम था कि हिरणों की चेतावनी किन्हीं इंसानों को देखने की वजह से नहीं थी। मैं उन्हें क्या बताता कि वे अपने एक साथी को तेंदुओं का शिकार बनते देखकर ये आवाज कर रहे थे। यह भी मैं उन्हें कैसे समझाता कि मारे गये चीतल का मनचाहा हिस्सा मैं ला सकता था - वह भी तेंदुए की तरफ से बगैर किसी ऐतराज के।”

इनके अलावा भी कुछ और चैप्टर्स हैं:
8. वफादारी
9. बुद्धू
10. लालाजी
11. चमारी
12. जिदगी मोकामाघाट की

अनुवादक: संजीवदत्त
प्रकाशक: नटराज पब्लिशर्स, देहरादून
आई.एस.बी.एन.: 978-81-8158-164-8
पृष्ठ: 216
अधिकतम मूल्य: 195 रुपये (हार्डकवर)


3. रुद्रप्रयाग का आदमखोर बाघ

जिम कार्बेट की प्रत्येक किताब एक मील का पत्थर है। हालाँकि उनका शिकार-क्षेत्र मुख्यतः कुमाऊँ रहा है, लेकिन उन्होंने रुद्रप्रयाग के आसपास भी कुछ आदमखोरों का शिकार किया है। उनकी रोमांचक गाथाएँ इस किताब में पढ़ने को मिलेंगी।
फिलहाल हम ज्यादा विस्तार में न जाकर इस किताब के चैप्टर्स के नाम ही दे रहे हैं:
1. यात्रा-मार्ग
2. आदमखोर
3. आतंक
4. आगमन
5. पड़ताल
6. पहला शिकार
7. बाघ की खोज
8. दूसरा शिकार
9. तैयारी
10. जादू
11. बाल-बाल बचे
12. फाँस
13. शिकारी के पीछे पड़ा शिकार
14. वापसी
15. मध्यांतर: मछली पकड़ते हुए
16. बकरे की मौत
17. सायनाइड जहर
18. आया और गया
19. सावधानी का एक पाठ
20. जंगली सुअर का शिकार
21. चीड़ के पेड़ पर
22. वह खौफनाक रात
23. बाघ का बाघ से युद्ध
24. अंधेरे में निशाना
25. उपसंहार
इस किताब में जहाँ-जहाँ भी बाघ लिखा हुआ है, तो समझिए कि वह असल में तेंदुआ था। लेकिन पहाड़ में लोग तेंदुए को बाघ ही कहते हैं, इसलिए अनुवादक ने यहाँ भी बाघ ही लिखा है।

अनुवादक: प्रकाश थपलियाल
प्रकाशक: नटराज पब्लिशर्स, देहरादून
आई.एस.बी.एन.: 978-81-85019-95-9
पृष्ठ: 180
अधिकतम मूल्य: 150 रुपये (हार्डकवर)


4. जीती जागती कहानी जंगल की

“जिम के ज्यादातर बचपन के तजुर्बे - पहले गुलेल और फिर तीर-कमान के साथ, उनकी पहली बंदूक और पहले कारनामें - सब यहाँ इस किताब में मौजूद हैं। लेकिन जिम ने उन्हें सनसनीखेज किस्सों के तौर पर पेश नहीं किया, बल्कि जंगल के स्कूल में सीखे गये सबकों के तौर पर सामने रखा है।”
“‘जंगल लोर’ (जीती जागती कहानी जंगल की) में दिल को छूने वाला एक बेहद जरूरी संदेश है। यह किताब हमसे हाथ जोड़कर विनती करती है कि अब तो हम कुदरत के साथ जबरदस्ती करना बंद करें। यह किताब कुदरती दुनिया के साथ अपना रिश्ता दुबारा कायम करने का न्यौता देती है और हमें यह जानने-समझने का मौका देती है कि हम जंगल को इस तरह से जानें कि दोनों फायदे में रहें - कुदरत भी और हम भी।”
-इस किताब के बारे में मार्टिन बूथ की कलम से

अनुवादक: संजीव दत्त
प्रकाशक: नटराज पब्लिशर्स, देहरादून
आई.एस.बी.एन.: 978-81-8158-021-4
पृष्ठ: 198
अधिकतम मूल्य: 185 रुपये (हार्डकवर)


5. कुमाऊँ के नरभक्षी

नाम से ही ज़ाहिर है कि इसमें जिम ने कुमाऊँ क्षेत्र में किये गये शिकारों का वर्णन किया है।
1. चंपावत का नरभक्षी
2. रॉबिन
3. चौऊगढ़ के शेर
4. पौवलगढ़ का कँवारा शेर
5. मोहन का नरभक्षी
6. मेरे सपनों की मछली
7. कांडा का नरभक्षी
8. पीपलपानी का शेर
9. थाक का नरभक्षी शेर
10. भले-मानुस शेर

अनुवादक: बाबूराम वर्मा
प्रकाशक: नटराज पब्लिशर्स, देहरादून
आई.एस.बी.एन.: 81-85019-3
पृष्ठ: 244
अधिकतम मूल्य: 185 रुपये (हार्डकवर)


आपने अगर जिम कार्बेट की किताबें नहीं पढ़ीं, तो आप अच्छे पाठक नहीं।


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5 Comments

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May 1, 2018 at 6:20 AM delete

नीरज जी इनमें से देवी शेर मैंने पढ़ी है जो बहुत ही सुंदर किताब है लेकिन इसमें लोकल भाषा का कई जगह इस्तेमाल किया गया है जो कि कम समझ में आता है बाकि आजतक जिम कॉर्बेट जैसा कोई नहीं हुआ जो उनकी बराबरी कर सके।

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May 1, 2018 at 12:04 PM delete

आप एक अच्‍छे यात्रा लेखक होने के साथ-साथ नायाब समीक्षाकार भी है। बहुत ही अच्‍छी तरह आपने इस पोस्‍ट को लिखा है।

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May 1, 2018 at 12:46 PM delete

Bhai ji aage blog kya naya aane wala hai

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May 1, 2018 at 8:22 PM delete

भाई बहुत ही उम्दा समीक्षा और जानकारी

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January 14, 2019 at 9:42 PM delete

Jim karbet jaisa koi nahi aur na hi hoga

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