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किन्नर कैलाश की डिजीटल यात्रा

अभी कल्पा में हूँ और सामने किन्नर कैलाश चोटी भी दिख रही है और शिवलिंग भी। चोटी लगभग 6000 मीटर की ऊँचाई पर है और शिवलिंग लगभग 4800 मीटर पर। यात्रा शिवलिंग की होती है और लोग बताते हैं कि वे चोटी तक की यात्रा करके आए हैं। कुछ समय पहले तक मैं चोटी और शिवलिंग को एक ही मानता था और इसी चिंता में डूबा रहता था कि 6000 मीटर तक जाऊँगा कैसे? दूसरी चिंता ये बनी रहती थी कि वे कौन लोग होते हैं जो 6000 मीटर तक पहुँच जाते हैं? 6000 मीटर की ऊँचाई और ट्रैकिंग बहुत ज्यादा होती है... बहुत ही ज्यादा...। मेरी अपर लिमिट 5000 मीटर की है, हद से हद 5200 मीटर तक... बस। जिस दिन इससे ज्यादा ऊँचाई का ट्रैक कर लूँगा, उस दिन एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के बराबर मान लूँगा खुद को।  पिछले साल गोयल साहब किन्नर कैलाश का ट्रैक करके आए... और आते ही सबसे पहले तो उन लोगों को खरी-खोटी सुनाई, जो बताते हैं कि यात्रा 6000 मीटर तक होती है। और फिर बताया कि यात्रा केवल 4800 मीटर तक ही होती है। यह सुनते ही मुझे बड़ा सुकून मिला। अभी तक जो किन्नर कैलाश मेरी अपर लिमिट से बहुत ऊपर था, अब अचानक अपर लिमिट के अंदर आ गया।...

फोटो-यात्रा-14: गोक्यो और गोक्यो-री

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 24 मई 2016 “आज हमारा इरादा गोक्यो-री जाने का था। ‘री’ का अर्थ होता है चोटी। गोक्यो के पास 5300 मीटर से ऊँची एक चोटी है, इसे ही गोक्यो-री कहा जाता है। इस पर चढ़ना आसान है, हालाँकि अत्यधिक ऊँचाई का असर तो पड़ता ही है। दीप्ति ने पहले तो ना-नुकूर की, लेकिन बाद में चलने को राज़ी हो गयी। हम लगभग 4700 मीटर पर थे। ऐसे इलाके में 600 मीटर चढ़ना भी बेहद मायने रखता है। मुझे दीप्ति पर लगातार निगाह रखनी पड़ेगी। वह अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। और ऊपर जाने पर उसकी तबियत और ज्यादा ख़राब हो सकती है।” “ख़ूब आवाजाही होते रहने के कारण स्पष्ट पगडंड़ी बनी थी और भटकने का कोई डर नहीं था। हमारे पीछे-पीछे दो विदेशी और आ रहे थे। लेकिन वे भी उच्च पर्वतीय बीमारी से पीड़ित प्रतीत हो रहे थे। दीप्ति को भी बार-बार बैठना पड़ रहा था। वह थोड़ी देर बैठती, फिर दो कदम चलती और फिर बैठ जाती। आख़िरकार जब हम लगभग 5100 मीटर पर थे, उसने हिम्मत छोड़ दी - “अब और आगे नहीं जा सकती।”

यात्रा श्री हेमकुंड साहिब की

15 जुलाई 2017 सुबह उठे तो मौसम ख़राब मिला। निश्चय करते देर नहीं लगी कि आज फूलों की घाटी जाना स्थगित। क्या पता कल सुबह ठीक मौसम हो जाये। तो कल फूलों की घाटी जाएंगे। आज हेमकुंड साहिब चलते हैं। कल भी मौसम ख़राब रहा तो परसों जायेंगे। यह यात्रा मुख्यतः फूलों की घाटी की यात्रा है, जल्दी कुछ भी नहीं है। तो हम केवल साफ मौसम में ही घाटी देखेंगे। वैसे जुलाई तक मानसून पूरे देश में कब्जा जमा चुका होता है, तो साफ मौसम की उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही था, लेकिन हिमालय में अक्सर मौसम साफ ही रहता है। दोपहर बाद बरस जाये तो उसे खराब मौसम नहीं कहते। सुबह ही बरसता मिले तो खराब कहा जायेगा। अभी खराब मौसम था। इंतज़ार करते रहे। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि हमने बालकनी में कुर्सियाँ डाल लीं और चाय की चुस्कियों के साथ बारिश देखते रहे। इंतज़ार करने का अर्थ होता है रजाईयों में घुसे रहना और जगे-जगे सोना व सोते-सोते जगना। नींद आ गयी तो आँख कुछ मिनटों में भी खुल सकती है और कुछ घंटों में भी। हाँ, एक बार बाहर झाँककर अवश्य देख लिया था। सिख यात्री नीचे गोविंदघाट से आने शुरू हो गये थे। सुबह कब चले होंगे वे? और हो सकता है कि इनमे...

रूपकुण्ड यात्रा की शुरूआत

रूपकुण्ड उत्तराखण्ड में 4800 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटी सी झील है। वैसे तो हिमालय की ऊंचाईयों पर इस तरह की झीलों की भरमार है लेकिन रूपकुण्ड एक मामले में अद्वितीय है। इसमें मानव कंकाल बिखरे पडे हैं। वैज्ञानिकों ने इनकी जांच की तो पाया कि ये कई सौ साल पुराने हैं। इतने सारे मानव कंकाल मिलने का एक ही कारण हो सकता है कि कोई बडा दल वहां था और उनके ऊपर जानलेवा विपत्ति आ पडी। वहां इतनी ऊंचाई पर इतने लोग क्या कर रहे थे, क्यों थे; यह भी एक सवाल है। इसके भी दो जवाब बनते हैं- एक तो यह कि जिस तरह आज हर बारह साल में यहां नन्दा देवी राजजात यात्रा होती है, उसी तरह तब भी होती होगी और यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालु थे वे। दूसरा जवाब है कि वे व्यापारी थे जो शायद तिब्बत जा रहे थे। लेकिन व्यापारियों वाली बात हजम नहीं होती क्योंकि इधर से तिब्बत जाने का मतलब है कि वे नीति पास के रास्ते जायेंगे। वान या लोहाजंग या देवाल के लोग अगर नीति पास जायेंगे तो अलकनन्दा घाटी के सुगम रास्ते का इस्तेमाल करेंगे, रूपकुण्ड और उससे आगे के दर्रे का इस्तेमाल करना गले नहीं उतरता। इसलिये तीर्थयात्रा वाली कहानी ज्यादा वास्तव...

गंगोत्री-गोमुख-तपोवन यात्रा- दिल्ली से उत्तरकाशी

अक्सर ऐसा होता है कि जब भी मैं कहीं जाने की योजना बनाता हूं तो पेट में मरोडे उठने लगते हैं। जी खुश हो जाता है कि इतने दिन और बचे हैं, मैं फलां तारीख को इतने बजे वहां पर रहूंगा। और उन मरोडों की वजह से पेट खराब हो जाता है, दस्त भी लग जाते हैं। उसी खराबी की वजह से मेरी कई यात्राएं कैंसिल हुई हैं। मई में ग्वालियर वाली नैरो गेज ट्रेन की सवारी करनी थी, पेट खराब और यात्रा कैंसिल। उसका सारा रिजर्वेशन करा लिया था, पक्की योजना बन गई थी, लेकिन ऐन टाइम पर पेट में मरोडे उठे। सोचा गया कि भयंकर गर्मी की वजह से ऐसा हो रहा है, तुरन्त रिजर्वेशन कैंसिल और यात्रा भी कैंसिल। अपने एक और घुमक्कड दोस्त हैं- सन्दीप पंवार । उन्हें बीस मई के आसपास सारपास की ट्रेकिंग पर जाना था यूथ हॉस्टल की तरफ से। उनकी देखा-देखी मैंने भी अपने खुद के आधार पर सारपास पार करने की योजना बनाई। और कब बीस मई आई और कब चली गई, पता ही नहीं चला। ये भी ध्यान नहीं रहा कि सन्दीप भाई ने वो यात्रा की या नहीं। ... एक मिनट, पूछ लेता हूं उनसे....

अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा वृत्तान्त शुरू करने से पहले कुछ आवश्यक जानकारी जरूरी है। मित्रों का आग्रह था कि मैं ये जानकारियां यहां जोड दूं। रास्ता वैसे तो आप आगे पढेंगे तो सारी जानकारी विस्तार से मिलती जायेगी, लेकिन फिर भी संक्षिप्त में: यात्रा पहलगाम से शुरू होती है। पहलगाम जम्मू और श्रीनगर से सडक मार्ग से अच्छी तरह जुडा है। पहलगाम (2100) से चन्दनवाडी (2800)= 16 किलोमीटर सडक मार्ग चन्दनवाडी (2800) से शेषनाग झील (3700)=16 किलोमीटर पैदल शेषनाग झील (3700) से महागुनस दर्रा (4200)=4 किलोमीटर पैदल महागुनस दर्रे (4200) से पंचतरणी (3600)=6 किलोमीटर पैदल पंचतरणी (3600) से अमरनाथ गुफा (3900)=6 किलोमीटर पैदल अमरनाथ गुफा (3900) से बालटाल (2800)=16 किलोमीटर पैदल