Skip to main content

लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें
24 जून 2013
कल जब मैं साइकिल से तेजी से लालचौक की तरफ बढ रहा था, तो इधर उधर होटलों पर भी निगाह मारता चल रहा था। शेख लॉज दिखा। मैं यहां रुककर मोलभाव करना चाहता था लेकिन तभी होटल के सामने खडे एक कर्मचारी ने मुझे देख लिया। उसने मुझसे रुकने को कहा, शायद इसीलिये मैं रुका नहीं। चलता रहा। आधा किलोमीटर आगे ही गया था कि वही कर्मचारी मोटरसाइकिल पर आया और होटल चलने को कहने लगा। जाना पडा।
मैंने पहले ही उससे कह दिया था कि मुझे सबसे सस्ता कमरा चाहिये। फिर भी उसने आठ सौ वाला कमरा दिखाया। मैंने दाम पूछते ही मना कर दिया। फिर दिखाया सात सौ वाला। इसमें अटैच बाथरूम नहीं था। मैं पांच सौ तक के लिये तैयार था लेकिन वह कमरा छह सौ का मिल गया।
जब खाना खाने नीचे रेस्टॉरेण्ट में बैठा था, तो खाने में विलम्ब होता देख मैंने कहा कि ऊपर कमरे में पहुंचा देना। उसी कर्मचारी ने मुझे ऐसे देखा जैसे अजनबी को देख रहा हो। पूछने लगा कि कौन से कमरे में। मैंने बता दिया तो उसकी आंखें आश्चर्यचकित लग रही थीं। बोला कि आप वही हो ना, जो साइकिल से लद्दाख से आये हैं। आप तो नहाने के बाद बिल्कुल ही बदल गये। पहचान में ही नहीं आ रहे।
सुबह कश्मीर रेलवे में यात्रा करने की इच्छा है। श्रीनगर से बारामूला और फिर वापस श्रीनगर, फिर काजीगुण्ड, पुनः श्रीनगर। इस काम में दोपहर बाद हो जाती। एक बार सोचा कि सारा सामान लेकर चलता हूं, काजीगुण्ड उतर जाऊंगा। वहां से किसी बस में या अमरनाथ वाले किसी ट्रक में साइकिल को लाद दूंगा। फिर सोचा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो बुरी फजीहत हो जायेगी। श्रीनगर आना पडेगा।
...
इस यात्रा के अनुभवों पर आधारित मेरी एक किताब प्रकाशित हुई है - ‘पैडल पैडल’। आपको इस यात्रा का संपूर्ण और रोचक वृत्तांत इस किताब में ही पढ़ने को मिलेगा।
आप अमेजन से इसे खरीद सकते हैं।



लद गई अपनी साइकिल

चौबीस घण्टे अति व्यस्त रहने वाला लोहे का पुल



अगला भाग: लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू




Comments

Popular posts from this blog

आसमानी बिजली के कुछ फोटो

बरसात में जब बिजली चमकती है तो सेकंड के सौवें हिस्से में सबकुछ हो जाता है। पता नहीं लोगबाग इतनी फुर्ती से इनके फोटो कैसे खींच लेते हैं? मैंने भी कोशिश की लेकिन जब तक क्लिक करता, तब तक दो सेकंड बीत जाते। कडकती बिजली के लिये तो दो सेकंड बहुत ज्यादा होते हैं। मुझे हमेशा अन्धेरी रात ही दिखाई देती। इलाज निकला। कैमरे को ट्राइपॉड पर वीडियो मोड में लगाकर छोड दिया और अन्दर जाकर डिनर करने लगा। वापस आया तो करीब बीस मिनट की वीडियो हाथ लग चुकी थी। इसमें बहुत बढिया बिजली कडकती व गिरती भी कैद हो गई। दो-तीन बार ऐसा किया। आखिरकार उन वीडियो से कुछ फोटो हाथ लगे हैं, क्वालिटी बेशक उतनी अच्छी नहीं है लेकिन बिजली अच्छी लग रही है।

भंगायणी माता मन्दिर, हरिपुरधार

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 10 मई 2014 हरिपुरधार के बारे में सबसे पहले दैनिक जागरण के यात्रा पृष्ठ पर पढा था। तभी से यहां जाने की प्रबल इच्छा थी। आज जब मैं तराहां में था और मुझे नोहराधार व कहीं भी जाने के लिये हरिपुरधार होकर ही जाना पडेगा तो वो इच्छा फिर जाग उठी। सोच लिया कि कुछ समय के लिये यहां जरूर उतरूंगा। तराहां से हरिपुरधार की दूरी 21 किलोमीटर है। यहां देखने के लिये मुख्य एक ही स्थान है- भंगायणी माता का मन्दिर जो हरिपुरधार से दो किलोमीटर पहले है। बस ने ठीक मन्दिर के सामने उतार दिया। कुछ और यात्री भी यहां उतरे। कंडक्टर ने मुझे एक रुपया दिया कि ये लो, मेरी तरफ से मन्दिर में चढा देना। इससे पता चलता है कि माता का यहां कितना प्रभाव है।

डायरी के पन्ने- 5

1 अप्रैल 2013, सोमवार 1. महीने की शुरूआत में ही उंगली कटने से बच गई। पडोसियों के यहां एसी लगना था। सहायता के लिये मुझे बुला लिया। मैं सहायता करने के साथ साथ वहीं जम गया और मिस्त्री के साथ लग गया। इसी दौरान प्लाई काटने के दौरान आरी हाथ की उंगली को छूकर निकल गई। ज्यादा गहरा घाव नहीं हुआ। 2 अप्रैल 2013, मंगलवार 1. सुबह चार बजे ही नटवर दिल्ली आ गया। हम हिमाचल की ओर कूच कर गये। शाम होने तक धर्मशाला पहुंच गये।