Skip to main content

Posts

Showing posts with the label 3000-4000

एक यात्रा स्कूली बच्चों के साथ

जब से हम Travel King India Private Limited कंपनी बनाकर आधिकारिक रूप से व्यावसायिक क्षेत्र में आए हैं, तब से हमारे ऊपर जिम्मेदारी भी बढ़ गई है और लोगों की निगाहें भी। कंपनी आगे कहाँ तक जाएगी, यह तो हमारी मेहनत पर निर्भर करता है, लेकिन एक बात समझ में आ गई है कि यात्राओं का क्षेत्र असीमित है और इसके बावजूद भी प्रत्येक यात्री हमारा ग्राहक नहीं है। अपनी सरकारी नौकरी को किनारे रखकर एक साल पहले जब मैं इस क्षेत्र में उतरा था, तो यही सोचकर उतरा था कि प्रत्येक यात्री हमारा ग्राहक हो सकता है, लेकिन अब समझ में आ चुका है कि ऐसा नहीं है। मैं अपनी रुचि का काम करने जा रहा हूँ, तो यात्राओं में भी मेरी एक विशेष रुचि है, खासकर साहसिक और दूरस्थ यात्राएँ; तो मुझे ग्राहक भी उसी तरह के बनाने होंगे। जो ग्राहक मीनमेख निकालने के लिए ही यात्राएँ करते हैं, वे हमारे किसी काम के नहीं। खैर, मैं बहुत दिनों से चाहता था कि दस साल से ऊपर के छात्रों को अपनी पसंद की किसी जगह की यात्रा कराऊँ। छात्रों को इसलिए क्योंकि इनमें सीखने और दुनिया को देखने-समझने की प्रबल उत्सुकता होती है। इनके माँ-बाप अत्यधिक डरे हुए लोग ...

रघुपुर किले की फटाफट यात्रा

19 जुलाई 2019, शुक्रवार... दोपहर बाद दिल्ली से करण चौधरी का फोन आया - "नीरज, मैं तीर्थन वैली आ रहा हूँ।” "आ जाओ।” फिर दोपहर बाद के बाद फोन आया - "नीरज, मैं नहीं आ रहा हूँ।” "ठीक है। मत आओ।” शाम को फोन आया - " हाँ नीरज, कैसे हो?... क्या कर रहे हो?... मैं आ रहा हूँ।” "आ जाओ।” रात नौ बजे फोन आया - "अरे नीरज, खाना खा लिया क्या?... सोने की तैयारी कर रहे होंगे?... बस, ये बताने को फोन किया था कि मैं नहीं आ रहा हूँ।” "ठीक है। मत आओ।” रात दस बजे फोन आया - "अरे बड़ी जल्दी सो जाते हो तुम।... इतनी जल्दी कौन सोता है भाई!... मैं आ रहा हूँ... बस में बैठ गया हूँ... ये देखो फोटो... सबसे पीछे की सीट मिली है।” "खर्र.र्र.र्र..." रात ग्यारह बजे फोन आया - "अरे सुनो, एक पंगा हो गया। बस वाले ने मुझे बाइपास पर उतार दिया है। उस बस में पहले से ही किसी और की बुकिंग थी और बस वाले ने मुझे भी बैठा लिया था। अब उतार दिया है। तो अब मैं नहीं आ रहा हूँ।" "खर्र.र्र.र्र... खर्र.र्र.र्र..." रात साढ़े ग्यारह बजे फोन आया...

जलोड़ी जोत से लांभरी हिल का ट्रैक

अभी हाल ही में तरुण गोयल साहब ने बशलेव पास का ट्रैक किया। यह ट्रैक तीर्थन वैली में स्थित गुशैनी से शुरू होता है। कुछ दूर बठाहड़ गाँव तक सड़क बनी है और कुल्लू से सीधी बसें भी चलती हैं। बशलेव पास लगभग 3300 मीटर की ऊँचाई पर है और ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के एकदम बाहर है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस नेशनल पार्क के अंदर जितना घना जंगल है, उससे भी ज्यादा घना जंगल नेशनल पार्क के बाहर है। काले भालू और तेंदुए तो इतने हैं कि दिन में भी देखे जा सकते हैं। मैं भी आजकल इसी ‘आउटर’ जंगल में स्थित एक गाँव घियागी में रहता हूँ। हालाँकि मुझे कोई भी जानवर अभी तक दिखाई नहीं दिया है। एक बार रात को टहलते समय नदी के पार भालू के चीखने की आवाज सुनी थी, तो उसी समय से रात में टहलना बंद कर दिया था। और अभी दो-तीन दिन पहले ग्रामीणों ने बताया कि शाम के समय जीभी और घियागी के बीच में एक तेंदुआ सड़क पर आ गया था, जिसे बस की सभी सवारियों ने देखा। तो मैं बता रहा था कि गोयल साहब सपरिवार बशलेव पास का ट्रैक करके आए। और जिस दिन वे बशलेव पास पर थे, उस दिन मैं भी ट्रैक कर रहा था और उनसे 8 किलोमीटर ही दूर था। उन्होंने अपन...

चादर ट्रैक की चुनौतियाँ

अब एक महीने तक चादर ट्रैक के अपडेट आते रहेंगे... इस ट्रैक का सीजन अच्छी तरह अभी शुरू भी नहीं हुआ है कि कैजुअल्टी की खबरें आने लगी हैं... बहुत सारे लोग इस ट्रैक का विरोध करते हैं और बहुत सारे लोग समर्थन करते हैं... लेकिन इस बात में कोई दो-राय नहीं कि आज के समय में यह भारत का सबसे ग्लैमरस ट्रैक है... चादर है क्या?... सर्दियों में अत्यधिक ठंड में हिमालय में नदियाँ जम जाती हैं... असल में बहता पानी कभी पूरी तरह नहीं जमता, लेकिन इसकी ऊपरी परत जम जाती है... इसी परत को चादर कहा जाता है... यानी बर्फ की चादर... आइस की चादर... यह इतनी कठोर होती है कि इस पर चला भी जा सकता है... और यहाँ तक कि गाड़ियाँ तक चलाई जा सकती हैं... पेंगोंग झील पर गाड़ी चलाने के बहुत सारे फोटो और वीडियो मैंने देखे हैं... लद्दाख में जांस्कर नदी ऐसी ही चादर के लिए विख्यात है... इसी पर 40-50 किलोमीटर का ट्रैक किया जाता है... यह कहीं पर पूरी तरह जमी होती है, इसे पैदल चलकर पार किया जा सकता है... और कई स्थानों पर केवल किनारों पर ही जमी होती है... और कई स्थानों पर बिल्कुल भी जमी नहीं होती... इसके दोनों तरफ सीधे खड़े पहाड़ हैं... जहाँ...

शिकारी देवी यात्रा

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें । 30 मार्च 2018 शिवालिक होमस्टे के मालिक का नाम तो नहीं पता और न ही यह पता कि पराँठे उसने बनाए या उसकी घरवाली ने; लेकिन आज सुबह-सुबह हम सभी अपनी जिंदगी के सर्वश्रेष्ठ आलू-पराँठे खा रहे थे। एक सुर में सभी ने एक-साथ नारा लगाया - “एक-एक पराँठा और।” फिर थोड़ी देर बाद किसी ने “एक-एक और” तो किसी ने “आधा-आधा और” के नारे लगाए। सामान्यतः हिमाचल वालों से न तो जोरदार तड़क-भड़क वाली सब्जी बनती है, न ही जोरदार पराँठे। लेकिन यहाँ सब्जी भी शानदार थी और पराँठे भी। “भाई जी, आपने कोई ट्रेनिंग ली है क्या?” “किस चीज की?” “खाना बनाने की।” “नहीं।” तब तक टैक्सी ड्राइवर भी आ गया। वह हमें आज शिकारी देवी छोड़कर आ जाएगा और 1200 रुपये लेगा। दूरी 16 किलोमीटर है। वैसे तो हम चार जने दो मोटरसाइकिलों पर भी शिकारी देवी तक जा सकते थे, लेकिन चूँकि हमें कल वहाँ से पैदल दूसरे रास्ते से आना है, तो मोटरसाइकिल से जाने का इरादा त्याग दिया।

फूलों की घाटी

16 जुलाई 2017 आज का दिन तो बड़ा ही शानदार रहा। कैसे शानदार रहा? बताऊंगा धीरे-धीरे। बताता-बताता ही बताऊंगा। रात 2 बजे आँख खुली। बाहर बूंदों की आवाज़ आ रही थी। बारिश हो रही थी। सोचा कि सुबह तक मौसम अच्छा हो जाएगा। सो गया। फिर 6 बजे आँख खुली। बारिश अभी भी हो रही थी। उठकर दरवाजा खोलकर देखा। बादल और रिमझिम बारिश। इसके बावजूद भी यात्रियों का आना-जाना। कुछ यात्री नीचे गोविंदघाट भी जा रहे थे और कुछ ऊपर हेमकुंड भी जाने वाले थे। हमें किसी भी तरह की जल्दी नही थी। कल ही सोच लिया था कि बारिश में कहीं भी नही जाएंगे। न फूलों की घाटी और न गोविंदघाट। वापस दरवाजा लगाया और सो गया। आठ बजे आँख खुली। उतनी ही बारिश थी, जितनी दो घंटे पहले थी। लेकिन इस बार मैं नीचे चला गया और एक बाल्टी गर्म पानी को कह आया। साथ ही यह भी कह दिया कि आज भी हम यहीं रुकेंगे। होटल मालिक बड़ी ही विचित्र प्रकृति का है। आप कुछ भी कहें, वह आपका उत्साह ही बढ़ाएगा। मसलन आप बारिश में हेमकुंड जाना चाह रहे हैं, वह आपको जाने को कहेगा। और बारिश की वजह से नहीं जाना चाह रहे हैं, तो आपसे रुक जाने को कह देगा। तो मुझसे भी उसने कह दिया कि बारिश में नहीं ...

पंचचूली बेस कैंप ट्रैक

11 जून 2017 आप कभी कुमाऊँ गये होंगे मतलब नैनीताल, रानीखेत, मुक्तेश्वर, कौसानी, चौकोड़ी, मुन्स्यारी... तो आपने हिमालय की बर्फीली चोटियों के भी दर्शन किये होंगे। आपको इन चोटियों के नाम तो नहीं पता होंगे, तो इनके नाम जानने की उत्सुकता भी ज़रूर रही होगी। आप किसी स्थानीय से इनके नाम पूछते होंगे तो मुझे यकीन है कि वो नंदादेवी से भी पहले आपको पंचचूली चोटियों के बारे में बताता होगा - “वे पाँच चोटियाँ, जो एकदम पास-पास हैं, पंचचूली हैं।” आप इनके फोटो खींचते होंगे और सोने से पहले भूल भी जाते होंगे। लेकिन अब नहीं भूलेंगे। क्योंकि आप पढ़ रहे हैं इन्हीं पंचचूली के बेस कैंप जाने का यात्रा-वृत्तांत सचित्र। जहाँ से भी आपने पंचचूली देखी हैं, कल्पना कीजिये आप वहीं खड़े हैं और इन चोटियों को निहार रहे हैं। उधर त्रिशूल है, फिर नंदादेवी है और इनके दाहिने पंचचूली की पाँच चोटियाँ हैं। कर ली कल्पना? तो अब आपको बता दूँ कि हम पंचचूली के भी उस पार खड़े हैं। आपको बताया जाता होगा कि हिमालय के पार तिब्बत है, लेकिन ऐसा नहीं है। हिमालय के पार भी बड़ी दूर तक भारतीय इलाका है। हम भी उसी इलाके में खड़े हैं। आपके और हमारे बीच में ...

तुंगनाथ और चंद्रशिला की यात्रा

2 नवंबर, 2016 पता नहीं क्या बात थी कि हमें चोपता से तुंगनाथ जाने में बहुत दिक्कत हो रही थी। चलने में मन भी नहीं लग रहा था। हालाँकि चोपता से तुंगनाथ साढ़े तीन किलोमीटर दूर ही है, लेकिन हमें तीन घंटे लग गये। तेज धूप निकली थी, लेकिन उत्तर के बर्फ़ीले पहाड़ बादलों के पीछे छुपे थे। धूप और हाई एल्टीट्यूड़ के कारण बिलकुल भी मन नहीं था चलने का। यही हाल निशा का था। थोड़ा-सा चलते और बैठ जाते और दस-पंद्रह मिनट से पहले नहीं उठते। दूसरे यात्रियों को देखा, तो उनकी भी हालत हमसे अच्छी नहीं थी। तुंगनाथ के पास एक कृषि शोध संस्थान है। मैं सोचने लगा कि जो भी कृषि-वैज्ञानिक इसमें रहते होंगे, वे खुश रहते होंगे या इसे काला पानी की सज़ा मानते होंगे। हालाँकि सरकारी होने के कारण उन्हें हर तरह की सुविधाएँ हासिल होंगी, पैसे भी अच्छे मिलते होंगे, इनसेंटिव भी ठीक मिलता होगा, लेकिन फिर भी उन्हें अकेलापन तो खलता ही होगा। 

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा से अनुसुईया

27 सितम्बर 2015    सवा ग्यारह बजे पंचगंगा से चल दिये। यहीं से मण्डल का रास्ता अलग हो जाता है। पहले नेवला पास (30.494732°, 79.325688°) तक की थोडी सी चढाई है। यह पास बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा था। हमें आधा घण्टा लगा यहां तक पहुंचने में। पंचगंगा 3660 मीटर की ऊंचाई पर है और नेवला पास 3780 मीटर पर। कल हमने पितरधार पार किया था। इसी धार के कुछ आगे नेवला पास है। यानी पितरधार और नेवला पास एक ही रिज पर स्थित हैं। यह एक पतली सी रिज है। पंचगंगा की तरफ ढाल कम है जबकि दूसरी तरफ भयानक ढाल है। रोंगटे खडे हो जाते हैं। बादल आने लगे थे इसलिये अनुसुईया की तरफ कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे सभी बंगाली भी यहीं आ गये।    बडा ही तेज ढलान है, कई बार तो डर भी लगता है। हालांकि पगडण्डी अच्छी बनी है लेकिन आसपास अगर नजर दौडाएं तो पाताललोक नजर आता है। फिर अगर बादल आ जायें तो ऐसा लगता है जैसे हम शून्य में टंगे हुए हैं। वास्तव में बडा ही रोमांचक अनुभव था।

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा-रुद्रनाथ-पंचगंगा

27 सितम्बर 2015    सुबह छह बजे उठे और चाय-बिस्कुट खाकर रुद्रनाथ की ओर चल दिये। रुद्रनाथ यहां से तीन किलोमीटर दूर है। पंचगंगा समुद्र तल से 3660 मीटर पर है जबकि रुद्रनाथ 3510 मीटर पर। जाहिर है कि ढलान है। पंचगंगा ही वो स्थान है जहां मण्डल से आने वाला रास्ता भी मिल जाता है। हमें चूंकि अनुसुईया और मण्डल के रास्ते वापस जाना था, इसलिये रुद्रनाथ जाकर पंचगंगा आना ही पडता, इसलिये अपना सारा सामान यहीं रख दिया। पानी की एक बोतल, ट्रेकिंग पोल लेकर ही चले। अच्छी धूप निकली थी, रेनकोट की कोई आवश्यकता नहीं थी।    करीब एक किलोमीटर बाद लोहे के सरिये को ऐसे ही मोडकर एक द्वार बना रखा है। यहां से रुद्रनाथ के प्रथम दर्शन होते हैं। बडा ही मनोहारी इलाका है यह। दूर दूर तक फैले बुग्याल, कोई जंगल नहीं। हम वृक्ष-रेखा से ऊपर जो थे। रुद्रनाथ के पीछे के पहाडों पर बादल थे, अन्यथा पता नहीं कौन-कौन सी चोटियां दिखतीं।

रुद्रनाथ यात्रा- पुंग बुग्याल से पंचगंगा

26 सितम्बर 2015 आंख सात बजे से पहले ही खुल गई थी। बाहर निकले तो कोहरा था। चटाई बिछ गई और हम वहां जा भी बैठे। आलू के परांठे बनाने को कह दिया। परांठे खाये तो नीचे से एक ग्रुप आ गया। ये लोग खच्चर पर सवार थे। मुम्बई की कुछ महिलाएं थीं। सबसे पहले एक आईं, इनका नाम नीता था। 35 के आसपास उम्र रही होगी। भारी-भरकम कद-काठी। निशा ने धीरे से मुझसे कहा कि बेचारे खच्चर पर कैसी बीत रही होगी। खैर, अगले तीन दिनों तक हम मिलते रहे। उन्होंने पूर्वोत्तर समेत भारत के ज्यादातर इलाकों में भ्रमण कर रखा है। अच्छा लगता है जब कोई महिला इस तरह यात्रा करती हुई मिलती है। आठ बजे पुंग बुग्याल से चल दिये। घना जंगल तो है ही। आज कुछ चहल-पहल दिखी। कई बार तो ऊपर से लोग आते मिले और मुम्बई वाला ग्रुप हमारे पीछे था ही। खूब चौडी पगडण्डी है। जंगल होने के बावजूद भी कोई डर नहीं लगा। जितना ऊपर चढते जाते, नीचे पुंग बुग्याल उतना ही शानदार दिखता जाता। चारों ओर घना जंगल और बीच में घास का छोटा सा मैदान। हम आश्चर्य भी करते कि रात हम वहां रुके थे और अब इतना ऊपर आ गये।

रुद्रनाथ यात्रा: गोपेश्वर से पुंग बुग्याल

25 सितम्बर 2015 पांचों केदारों में केवल रुद्रनाथ ही अनदेखा बचा हुआ था, बाकी चारों केदार मैंने देख रखे हैं। सभी के लिये कुछ न कुछ पैदल अवश्य चलना पडता है। लेकिन रुद्रनाथ की यात्रा को कठिनतम माना जाता है। मैंने इसके कई यात्रा-वृत्तान्त पढ रखे हैं लेकिन एक बात का हमेशा सन्देह रहा। गोपेश्वर से रुद्रनाथ जाने के दो रास्ते हैं- एक तो मण्डल, अनुसुईया होते हुए और दूसरा सग्गर होते हुए। मुझे मण्डल का तो पता चल गया कि यह चोपता रोड पर गोपेश्वर से पन्द्रह किलोमीटर दूर है। लेकिन कभी यह पता नहीं चला कि सग्गर कहां है। चोपता रोड पर ही है या किसी और सडक पर है। सग्गर से आगे भी कोई सडक जाती है या सग्गर में ही सडक समाप्त हो जाती है- इस बात को जानने की मैंने खूब कोशिश कर ली लेकिन मैं यात्रा पर जाने तक नहीं जान पाया था कि सग्गर कहां है। गूगल मैप पर भी सग्गर की कोई स्थिति नहीं है। जब आपको यह आधारभूत जानकारी ही नहीं होगी तो आपको आगे का कार्यक्रम बनाने में भी परेशानी आयेगी।

डोडीताल यात्रा- दिल्ली से उत्तरकाशी

डोडीताल का तो आपने नाम सुना ही होगा। नहीं सुना होगा तो कोई बात नहीं। आप स्वयं ही गूगल पर सर्च करेंगे कि डोडीताल क्या है। इस बार मैं नहीं बताऊंगा कि यह क्या है, कहां है, कैसे जाया जाता है। बस, चलता जाऊंगा और लौट आऊंगा। आपको अन्दाजा हो जायेगा। दिल्ली से दोनों मियां-बीवी निकल पडे सुबह छह बजे। बाइक पर सामान बांधा और चल दिये। सामान भी बहुत ज्यादा हो गया। आखिर ट्रेकिंग थी और अभी ट्रेकिंग का मौसम शुरू नहीं हुआ था इसलिये टैंट भी ले लिया, स्लीपिंग बैग भी ले लिया, ढेर सारे गर्म कपडे ले लिये और कुछ नमकीन बिस्कुट भी। दो रकसैक थे- एक मेरे लिये, एक निशा के लिये।

चन्द्रखनी दर्रे की ओर- दिल्ली से नग्गर

इस यात्रा पर चलने से पहले इसका परिचय दे दूं। यह दर्रा हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में है। जैसा कि हर दर्रे के साथ होता है कि ये किन्हीं दो नदी घाटियों को जोडने का काम करते हैं, तो चन्द्रखनी भी अपवाद नहीं है। यह ब्यास घाटी और मलाणा घाटी को जोडता है। मलाणा नाला या चाहें तो इसे मलाणा नदी भी कह सकते हैं, आगे चलकर जरी के पास पार्वती नदी में मिल जाता है और पार्वती भी आगे भून्तर में ब्यास में मिल जाती है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 3640 मीटर है। बहुत दिन से बल्कि कई सालों से मेरी यहां जाने की इच्छा थी। काफी समय पहले जब बिजली महादेव और मणिकर्ण गया था तब भी एक बार इस दर्रे को लांघने का इरादा बन चुका था। अच्छा किया कि तब इसकी तरफ कदम नहीं बढाये। बाद में दुनियादारी की, ट्रेकिंग की ज्यादा जानकारी होने लगी तो पता चला कि चन्द्रखनी के लिये एक रात कहीं रास्ते में बितानी पडती है। उस जगह रुकने को छत मिल जायेगी या नहीं, इसी दुविधा में रहा। खाने पीने की मुझे कोई ज्यादा परेशानी नहीं थी, बस छत चाहिये थी। तभी एक दिन पता चला कि रास्ते में कहीं एक गुफा है, जहां स्लीपिंग बैग के सहारे रात गुजारी जा सकती है। लेकि...

चूडधार यात्रा-1

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 7 मई 2014, बुधवार चण्डीगढ स्टेशन के प्रतीक्षालय में जब नहा रहा था तभी बाडमेर-कालका एक्सप्रेस आ गई। मैंने कालका तक का टिकट ले रखा था। फटाफट नहाया और ट्रेन में जा बैठा। ट्रेन यहां काफी देर तक रुकी रही थी। हालांकि आज हिमाचल में लोकसभा के चुनाव थे, फिर भी मैंने सोच रखा था कि चूडधार तो जाना ही है। अगर उत्तराखण्ड की तरह यहां भी बसों का टोटा रहा तो सोलन तक जाने के लिये ट्रेन थी ही। हिमाचल में यात्रा करने का एक लाभ ये भी है कि यहां के पहाडों में बहुत दूर दूर तक दूसरे राज्यों की सरकारी बसें भी जाती हैं। उत्तराखण्ड में ऐसा नहीं है। अगर हिमाचल परिवहन की बसें बन्द मिली तो हरियाणा, पंजाब और चण्डीगढ परिवहन की बसें भी नियमित रूप से शिमला और आगे तक जाती हैं।

हर की दून यात्रा- दिल्ली से गंगाड

3 अक्टूबर का झारखण्ड यात्रा का आरक्षण था। एक दिन पहले यानी दो अक्टूबर को मन बदल गया। सोचा कि अभी अगस्त में रेल यात्रा तो की ही थी, इस बार हिमालय यात्रा हो जाये। जून में जब लद्दाख गया था, तब से हिमालय नहीं देखा। अक्टूबर की शुरूआत और मौसम खराब होना इस बात का सूचक था कि उच्च हिमालय में छह महीनों के लिये जाना रद्द। मणिमहेश में बर्फबारी की खबरें मिल चुकी थीं। पूरा एक सप्ताह हाथ में था। इस साल ट्रेकिंग नहीं की थी सिवाय हिमानी चामुण्डा व बशल चोटी के छोटे ट्रेकों के। ट्रेकिंग का मन था लेकिन खराब मौसम मना भी कर रहा था। अगर ट्रेकिंग करूं तो कहां जाना चाहिये? अविलम्ब मन में आया- हर की दून। यह अपेक्षाकृत आसान ट्रेक है और रुकने खाने का कोई झंझट नहीं। ठीक पिण्डारी ट्रेक की तरह। फिर भी बर्फबारी की आशंका तो थी ही। दूसरा विचार आया किन्नौर यात्रा का। इसमें नाको से लेकर छितकुल तक घूमना तय हुआ। वैसे भी यह साल हिमालय पार की यात्राओं पर केन्द्रित था। किन्नौर भी हिमालय पार की धरती है।

सराहन से बशल चोटी तथा बाबाजी

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 25 अप्रैल 2013 हमेशा की तरह उठने की वही बात- सिर पर सूरज आ गया जब मैं उठा। कल तो नहाया नहीं था। कमरे में गीजर भी लगा था, इरादा था नहाने का लेकिन देखा कि बिजली नहीं है तो इरादा बदलते कितनी देर लगती है? बस अड्डे के पास एक ढाबा है जहां सुबह से शाम तक खाने पीने को मिलता रहता है। कल वहां जाकर चावल खाये थे। अब सुबह का समय, आलू के परांठे की तैयारी थी। एक परांठा मैंने भी बनवा लिया। साथ में चाय और आमलेट भी। पहले तो सोचा कि इतना बडा तीर्थ- भीमाकाली- यहां कहां अण्डे आमलेट मिलेंगे? फिर दिमाग में आया कि यह देवी भेड बकरे तक नहीं छोडती, अण्डा कहां ठहरता है? आमलेट को कहा तो तुरन्त हाजिर हो गया। खा-पीकर डकार लेकर पैसे देकर जब बाहर निकला तो दुकान वाले से पूछा कि यहां से बशल चोटी दिखती है क्या? उसने एक ऐसी चोटी की तरफ इशारा कर दिया जो उस बूढे के सिर की तरह दिख रही थी जिस पर दो चार सफेद बाल ही रह गये हों। दो-चार जगह बर्फ थी वहां।

चादर ट्रेक- गुफा में एक रात

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 19 जनवरी 2013 आज शनिवार है। लेह वाली बस कल आयेगी। सुबह के दस बजे हैं, अभी अभी सोकर उठा हूं। हालांकि आंख तो दो घण्टे पहले ही खुल गई थी, लेकिन बस पडा रहा। घरवाले भी थोडी थोडी देर बाद दरवाजा खोलकर झांककर चले जाते हैं कि महाराज उठेगा तो चाय-नाश्ता परोसेंगे। उन्हें झांकते देखते ही तुरन्त अपनी आंख मीच लेता हूं। भारी भरकम पश्मीना कम्बल और उस पर रजाई; दोनों के नीचे दबे होने में एक अलग ही आनन्द मिल रहा है। साढे दस बजे उठ गया। तुरन्त चाय और रोटी आ गई। आज एक अलग तरह की रोटी बनी है। राजस्थान में जैसी बाटी होती है, उससे भी मोटी। लकडी की आग और अंगारों की कमी तो है नहीं, अच्छी तरह सिकी हुई है। इसे मक्खन और जैम के साथ खाया। आज का लक्ष्य है कि ग्रामीण जनजीवन को देखूंगा, कुछ फोटो खींचूंगा। अचानक अन्तरात्मा ने आदेश दिया- नेरक चलो। यह आदेश इतना तीव्र और तीक्ष्ण था कि शरीर के किसी भी अंग को संभलने और बचाव करने का मौका भी नहीं मिला। सभी ने चुपचाप इस आदेश को मान लिया। हालांकि पैरों ने कहा भी कि दर्द हो रहा है लेकिन आत्मा ने फौरन कहा-...

औली और गोरसों बुग्याल

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 4 अप्रैल 2012 की दोपहर थी, मैं और विधान औली में थे। वो औली जो भारत में शीतकालीन खेलों के लिये प्रसिद्ध है। भारत में क्या, पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यह सर्दियों में मनाली और गुलमर्ग से टक्कर लेता है। इसे कुछ लोग भारत का स्विट्जरलैण्ड भी कह देते हैं। हो सकता है कि जो लोग स्विट्जरलैण्ड गये हों, उन्हें औली सर्दियों में बिल्कुल वैसा ही दिखता हो। लेकिन आज जो औली हम देख रहे थे, वो स्विट्जरलैण्ड के आसपास तो क्या, दूर दूर भी नहीं दिख रहा था। बरफ कहीं नहीं थी और धूल उड रही थी। इस सीजन में जमकर बर्फबारी हुई। दिसम्बर के शुरू से ही बर्फ पडनी शुरू हो गई थी और पूरे जाडों भर पडती रही। इस बार खूब शोर मचा कि इतनी बरफ कभी नहीं देखी। हमें भी पूरी उम्मीद थी कि औली में खूब बर्फ मिलेगी। बल्कि हम तो सोच रहे थे कि अगर स्कीइंग हमारे बजट के अनुकूल हुई तो उस पर भी हाथ आजमायेंगे। सब धरा का धरा रह गया। लेकिन कहीं बर्फ नहीं दिखी। सब उजाड।

कफनी ग्लेशियर यात्रा

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 5 अक्टूबर 2011 का दिन था वो। मैं और अतुल द्वाली में थे जबकि हमारे एक और साथी नीरज सिंह यानी हल्दीराम हमसे बारह किलोमीटर दूर पिण्डारी ग्लेशियर के पास थे। समुद्र तल से 3700 मीटर की ऊंचाई पर बिना स्लीपिंग बैग के उन्होंने पता नहीं कैसे रात काटी होगी। दिल्ली से चलते समय हमने जो कार्यक्रम बनाया था, उसके अनुसार आज हमें कफनी ग्लेशियर देखना था जबकि हकीकत यह है कि पिछले तीन दिनों से हम लगातार पैदल चल रहे थे, वापस जाने के लिये एक दिन पूरा पैदल और चलना पडेगा तो अपनी हिम्मत कुछ खत्म सी होने लगी थी। जाट महाराज और अतुल महाराज दोनों एक से ही थे। इस हफ्ते भर की यात्रा में एक खास बात यह रही कि मैं हमेशा सबसे पहले उठा तो आज भी जब उठा तो सब सोये पडे थे। मेरे बाद ‘होटल’ वाला उठा, फिर अतुल। रात सोते समय तय हुआ था कि कफनी कैंसिल कर देते हैं और वापस चलते हैं। लेकिन उठते ही घुमक्कडी जिन्दाबाद हो गई। घोषणा हुई कि कफनी चलेंगे। हालांकि अतुल को इस घोषणा से कुछ निराशा भी हुई। खाने के लिये बिस्कुट-नमकीन के कई पैकेट भी साथ ले लिये। अगर कफनी ना जाते ...