Saturday, January 19, 2019

पुस्तक प्रकाशन: लेखक और प्रकाशक का द्वंद्व

Neeraj Musafir Book Ghumakkadi Jindabad
पोस्ट लंबी है... आगे बढ़ने से पहले थोड़ा अपने बारे में बता दूँ... मेरी आज तक 4 किताबें प्रकाशित हुई हैं... एक किताब का संपादन भी किया है... वह भी मेरे ही नाम पर है... तो कुल 5 किताबें प्रकाशित हुई हैं... नवंबर 2017 में एक साथ 3 किताबें प्रकाशित हुईं... एक किताब हिंदयुग्म से और दो किताबें रेडग्रैब से... दोनों ने ही किताब प्रकाशन के लिए मुझसे एक भी पैसा नहीं लिया... यानी मैं उन खुशनसीब गिने-चुने लेखकों में से हूँ, जिनकी पहली किताब बिना खर्चे के प्रकाशित हुई है... यानी सारा खर्चा प्रकाशक ने किया है... ये जितनी भी किताबें बिकेंगी, उनकी MRP की 10% मुझे रॉयल्टी मिलेगी... एक प्रकाशक ने 31 मार्च 2018 तक बिकी किताबों की कुल रॉयल्टी मुझे दी भी है... उम्मीद है कि 31 मार्च 2019 के आसपास इस बार भी कुछ हजार रुपये मेरे खाते में आएँगे... दूसरा प्रकाशक रॉयल्टी तब देगा, जब नवंबर 2017 में छपी सारी प्रतियाँ समाप्त हो जाएँगी... किन-किन किताबों की कितनी-कितनी प्रतियाँ छपी थीं, ये बातें इस तरह पब्लिक में बताना ठीक नहीं माना जाता... और मुझे खुद भी ये किताबें प्रकाशकों से मार्केट रेट पर या थोड़े-बहुत कम रेट पर खरीदनी होती हैं... और मैं हाथों-हाथ उन्हें पूरे पैसे देता हूँ... रॉयल्टी में से काटने को नहीं कहता... उम्मीद है एक दिन सारी रॉयल्टी एक-साथ आएगी और मैं करोड़पति बन जाऊँगा...

Friday, January 18, 2019

गोवा में दो दिन - पलोलम बीच



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25 सितंबर 2018

सुबह जब चले थे, तो परिचित ने पूछा - “आज कहाँ जाओगे?”
“देखते हैं। कल नॉर्थ गोवा घूम लिया, आज शायद साउथ गोवा जाएँगे।”
“अरे कुछ नहीं है साउथ गोवा में। वहाँ कुछ भी नहीं है। सबकुछ नॉर्थ गोवा में ही है। तुम भी अजीब लोग हो। साउथ गोवा जा रहे हो? जो बात नॉर्थ में है, वो साउथ में थोड़े ही है?”

“इसका मतलब हमें साउथ गोवा ही जाना चाहिए।” मैंने दीप्ति से कहा और उसने एकदम हाँ कर दी।

Thursday, January 17, 2019

गोवा में दो दिन - जंगल और पहाड़ों वाला गोवा

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25 सितंबर 2018
अक्सर हम सोचते हैं कि गोवा में केवल बीच ही हैं, केवल समुद्री एक्टिविटी ही हैं। ये बीच, वो बीच, ये एक्टिविटी, वो एक्टिविटी और गोवा खत्म। जबकि ऐसा नहीं है। यहाँ पश्चिमी घाट के बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं और ऊँचाई से गिरते जलप्रपात भी हैं। और इनसे भी ज्यादा... घने जंगल भी हैं।
तो आज हम दूधसागर जलप्रपात की ओर चल दिए। कई साल पहले जब मैं दूधसागर गया था, तो रेलवे लाइन के साथ-साथ चला गया था। तब इतनी सख्ताई नहीं थी। जबकि अब बहुत सख्ताई है। दूधसागर का सबसे शानदार नजारा केवल रेलवे लाइन से ही दिखता है। इस कारण रेलवे लाइन पर इतनी भीड़ जमा हो जाया करती थी कि रेल यातायात बाधित होता था। कई बार दुर्घटनाएँ भी हो जाया करती थीं। तो रेलवे ने अब रेलवे ट्रैक के साथ-साथ पैदल जाने पर रोक लगा दी है।
लेकिन यहाँ एक चक्कर और भी है। दूधसागर जलप्रपात भगवान महावीर वाइल्डलाइफ सेंचुरी के अंदर है। यहाँ जाने के लिए वन कानून लागू होता है। और शायद आपको पता हो कि ज्यादातर नेशनल पार्क और वाइल्डलाइफ सेंचुरी मानसून में पर्यटकों के लिए बंद रहते हैं।
फिर भी हम दूधसागर की ओर चल दिए। इसके लिए हमें सबसे पहले पहुँचना था कुलेम। एयरपोर्ट से दूरी लगभग 50 किलोमीटर। शुरू में तो आबादी है, लेकिन जैसे-जैसे कुलेम की ओर बढ़ते जाते हैं, जंगल घना होता जाता है। एक समय ऐसा भी आता है, जब लगने लगता है कि पता नहीं किस मोड पर कौन-सा जानवर आपको खड़ा मिल जाए।

Wednesday, January 16, 2019

गोवा में दो दिन - ओल्ड गोवा और कलंगूट, बागा बीच



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24 सितंबर 2018

आज हमारा गोवा में पहला दिन था और हम अपने एक परिचित के यहाँ थे। परिचित वैसे तो मूलरूप से यूपी में मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं, लेकिन कई सालों से गोवा में रहते-रहते अब गोवा निवासी ही हो गए हैं। हम इस यात्रा की कुछ भी तैयारी करके नहीं आए थे, तो उन्होंने हमारा कार्यक्रम इस प्रकार बनाया...
“सबसे पहले ऐसे-ऐसे जाओ, ऐसे-ऐसे जाओ और सबसे पहले पहुँचो बोम जीसस। वह ओल्ड गोवा में है और ओल्ड गोवा का अलग ही चार्म है। फिर उधर से कलंगूट बीच जाओ। गोवा में जो भी कुछ है, सब कलंगूट पर ही है। बार, क्लब, कैसीनो सभी वहीं हैं। फलां कैसीनो बड़ा जोरदार है और पूरे गोवा में तो छोड़िए, पूरी दुनिया में उसकी टक्कर का कैसीनो मिलना मुश्किल है।”

बाहर झाँककर देखा, तो घनी बसी कालोनी में नारियल के ही झुरमुट नजर आए। किसी शहर में कितनी हरियाली हो सकती है, आज हम देख रहे थे।

Tuesday, January 15, 2019

सतारा से गोवा का सफर वाया रत्‍नागिरी


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22 सितंबर 2018
वैसे तो सतारा से कोल्हापुर और बेलगाम होते हुए गोवा लाभग 350 किलोमीटर दूर है, लेकिन हम यहाँ नए-नए रास्तों पर घूमने आए थे। समय की हमारे पास कोई पाबंदी नहीं थी। अभी भी कई दिनों की छुट्टियाँ बाकी थीं और हमारे सामने जो भी कुछ था, वह सब नया ही था। हम कभी भी इस क्षेत्र में नहीं आए थे। इसलिए चार-लेन की सड़क से कोल्हापुर होते हुए जाना रद्द करके रत्‍नागिरी और सिंधुदुर्ग होते हुए जाना तय किया।
हम इतने दिनों से दो-लेन और सिंगल लेन की सड़कों पर घूम रहे थे। आज बड़े दिनों बाद चार-लेन की सड़क मिली। यह एन.एच. 48 था जो मुंबई-चेन्नई हाइवे भी कहा जाता है। यह भारत के सबसे शानदार हाइवे में से एक है। सतारा से कराड़ तक ही हमें इस पर चलना था और फिर रत्नागिरी की ओर मुड़ जाना था।

Monday, January 14, 2019

कास पठार... महाराष्ट्र में ‘फूलों की घाटी’


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22 सितंबर 2018
जो भी स्थान किसी न किसी प्रकार फूलों के खिलने से संबंधित होते हैं, वहाँ आपको उसी समय जाना चाहिए, जब फूल खिले हों। अगर आप अप्रैल के अलावा किसी अन्य महीने में हिमालय में जाकर बुराँश खिलते देखना चाहते हैं या अगस्त के अलावा फूलों की घाटी जाना चाहते हैं या मार्च के अलावा ट्यूलिप गार्डन देखना चाहते हैं, तो आपको निराशा ही हाथ लगेगी। फूल आपकी प्रतीक्षा नहीं करते कि आप आएँगे, तो वे खिलेंगे।
तो जिस दिन हमें पता चला कि महाराष्ट्र में भी एक फूलों की घाटी है, तो मैंने सबसे पहले यही पता लगाया था कि वे फूल कब खिलते हैं। आराम से पता चल गया कि सितंबर में खिलते हैं। बस, तभी योजना बन गई थी।

Sunday, January 13, 2019

चादर ट्रैक की चुनौतियाँ

अब एक महीने तक चादर ट्रैक के अपडेट आते रहेंगे... इस ट्रैक का सीजन अच्छी तरह अभी शुरू भी नहीं हुआ है कि कैजुअल्टी की खबरें आने लगी हैं... बहुत सारे लोग इस ट्रैक का विरोध करते हैं और बहुत सारे लोग समर्थन करते हैं... लेकिन इस बात में कोई दो-राय नहीं कि आज के समय में यह भारत का सबसे ग्लैमरस ट्रैक है...

चादर है क्या?... सर्दियों में अत्यधिक ठंड में हिमालय में नदियाँ जम जाती हैं... असल में बहता पानी कभी पूरी तरह नहीं जमता, लेकिन इसकी ऊपरी परत जम जाती है... इसी परत को चादर कहा जाता है... यानी बर्फ की चादर... आइस की चादर... यह इतनी कठोर होती है कि इस पर चला भी जा सकता है... और यहाँ तक कि गाड़ियाँ तक चलाई जा सकती हैं... पेंगोंग झील पर गाड़ी चलाने के बहुत सारे फोटो और वीडियो मैंने देखे हैं...
लद्दाख में जांस्कर नदी ऐसी ही चादर के लिए विख्यात है... इसी पर 40-50 किलोमीटर का ट्रैक किया जाता है... यह कहीं पर पूरी तरह जमी होती है, इसे पैदल चलकर पार किया जा सकता है... और कई स्थानों पर केवल किनारों पर ही जमी होती है... और कई स्थानों पर बिल्कुल भी जमी नहीं होती... इसके दोनों तरफ सीधे खड़े पहाड़ हैं... जहाँ नदी जमी नहीं होती, वहाँ चट्टानों पर चढ़कर दूरी तय की जाती है... कई बार पानी में घुसकर भी... तो ऐसे स्थानों पर शून्य से 25-30 डिग्री नीचे के तापमान में चलना अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है...

Friday, January 11, 2019

महाबलेश्वर यात्रा

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20 सितंबर 2018
मुंबई-गोवा राजमार्ग पर स्थित पोलादपुर से महाबलेश्वर का रास्ता अलग होता है। पोलादपुर में लंच करके और होटलवाले को हिदायत देकर हम आगे बढ़ चले। असल में उसने कोल्डड्रिंक पर 5 रुपये अतिरिक्त लिए थे और प्रिंटेड बिल में उसे दिखाया भी था।
“अबे, फँस जाओगे किसी दिन। 30 रुपये एम.आर.पी. की कोल्डड्रिंक को तुम लोग 35 की बेच रहे हो और 35 रुपये का ही प्रिंटेड बिल भी दे रहे हो!”
“नहीं, इसमें हमारा कोई रोल नहीं है। यह तो सब कम्प्यूटराइज्ड है। कम्प्यूटर से जो निकलता है, वही हम चार्ज करते हैं।”
“मालिक हो ना तुम यहाँ के?”
“हाँ जी।”
“फिर भी ऐसी बात करते हो? कम्प्यूटर अपने-आप कुछ नहीं निकालता। इसमें पहले सारा डाटा डालना पड़ता है। तुमने कोल्डड्रिंक के 35 रुपये डाल रखे हैं, जबकि एम.आर.पी. 30 है। फँस जाओगे। लाखों रुपये जुर्माना लग जाएगा।”
अब उसने हमसे 5 रुपये कम लिए और अपने सिस्टम को ठीक करने का वादा भी किया।

पोलादपुर से महाबलेश्वर की सड़क बहुत खूबसूरत है। घुमावदार सड़क और लगातार चढ़ाई। महाबलेश्वर घाट के ऊपर स्थित है और समुद्र तल से लगभग 1400 मीटर ऊपर है।
रास्ते में प्रतापगढ़ किले का बोर्ड लगा दिखा, तो उधर भी मुड़ गए। लेकिन वहाँ भयंकर धुंध थी और न किला अच्छी तरह देख पाए और न ही वहाँ से दिखने वाले नजारे। लौटने लगे तो बारिश होने लगी। साथ ही रात भी। यह बारिश बहुत देर तक नहीं रहेगी, लेकिन अगर आज बहुत देर तक हो ही गई, तो...? इसलिए अंधेरे में यहाँ ठहरकर इसके बंद होने की प्रतीक्षा करना ठीक नहीं। मोबाइल, कैमरे और पैसे वाटरप्रूफ पैकिंग में रखकर खुद रेनकोट पहनकर बारिश में ही चल दिए।

Thursday, January 10, 2019

श्रीवर्धन बीच और हरिहरेश्वर बीच

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20 सितंबर 2018
हमें नहीं पता था कि श्रीवर्धन इतना बड़ा है। कल हम जब यहाँ आए थे तो अंधेरा हो चुका था और गूगल मैप बता रहा था कि बस, इससे आगे कोई सड़क नहीं है। एक चौराहे पर खड़े होकर चारों ओर देखा, कोई नहीं दिखाई दिया। क्या यही है श्रीवर्धन? प्रतीक ने बताया था कि यहाँ होटल मिल जाएँगे। कहाँ हैं होटल? चलो, एक बार समुद्र की ओर चलकर देखते हैं।
तो 600 रुपये का यह कमरा मिल गया। कमरा भी तब मिला, जब हमारे आवाज लगाने पर मालिक अपने घर से बाहर निकला - “आधा घंटा रुकिए, मैं सफाई कर देता हूँ।”
“और इन मच्छरों का क्या करें? क्या ये भी आधा घंटा रुक जाएँगे? आप एक काम कीजिए, कमरा जैसा भी है, वैसा ही दे दीजिए। हमें कोई दिक्कत नहीं होगी।”
“नहीं जी, ऐसा कैसे हो सकता है? बस, थोड़ा-सा टाइम दो मुझे।’’
“सामान तो रख लेने दो। आप सफाई करते रहना।”
इसी दौरान मुझे समय मिल गया कमरे के अंदर घुसने का। ऐसा लगता था जैसे कोई अभी-अभी कमरा खाली करके गया हो। बिस्तर पर सिलवटें पड़ी हुई थीं, बस।
लेकिन आधे घंटे बाद ऐसा लग रहा था जैसे कमरा अभी-अभी बनाकर रेडी किया है और हम पहले ही कस्टमर हैं। एकदम नई-नकोर चादरें और सेंट की खुशबू से कमरा मालामाल था। कुछ अगरबत्तियाँ भी थीं और एक माचिस भी। बाहर मच्छर थे, कमरे में एक भी मच्छर नहीं था।

Saturday, January 5, 2019

2018 की यात्राओं का लेखा-जोखा

यह साल बेहद मजेदार बीता। इस बार हमने कसम खाई थी कि अपने मित्रों को कुछ यात्राओं पर ले जाएँगे और इस तरह के सभी आयोजन सफल रहे। तो चलिए, ज्यादा बोर न करते हुए पिछले साल की यात्राओं को याद करते हैं...

छब्बीस जनवरी की छुट्टियों में यह यात्रा आयोजित की गई थी। संयोग से कुछ ही दिन पहले बर्फबारी हो गई थी और हमें रैथल में बर्फ देखने और खेलने को मिल गई।

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Tuesday, January 1, 2019

रेलयात्रा सूची: 2019

2005-2007 | 2008 | 2009 | 2010 | 2011 | 2012 | 2013 | 2014 | 2015 | 2016 | 2017 | 2018 | 2019

दिनांककहां से/कहां तकट्रेन नं/नामदूरी (कुल दूरी)श्रेणी (गेज)
09-01रंगापाड़ा नॉर्थ - साहिबाबाद22411 अरुणाचल एक्स1946 (174986)फर्स्ट एसी (ब्रॉड)
10-01साहिबाबाद - दिल्ली शाहदरा64052 ईएमयू7 (174993)साधारण (ब्रॉड)

नोट: दूरी दो-चार किलोमीटर ऊपर-नीचे हो सकती है।
भूल चूक लेनी देनी

कुछ और तथ्य:
कुल यात्राएं: 890 बार
कुल दूरी: 1774993 किलोमीटर

पैसेंजर ट्रेनों में: 48071 किलोमीटर (497 बार)
मेल/एक्सप्रेस में: 50618 किलोमीटर (255 बार)
सुपरफास्ट में: 76304 किलोमीटर (138 बार)

ब्रॉड गेज से: 168507 किलोमीटर (825 बार)
मीटर गेज से: 4027 किलोमीटर (31 बार)
नैरो गेज से: 2459 किलोमीटर (34 बार)

बिना आरक्षण के: 73293 किलोमीटर (733 बार)
शयनयान (SL) में: 79612 किलोमीटर (124 बार)
सेकंड सीटिंग (2S) में: 2592 किलोमीटर (9 बार)
थर्ड एसी (3A) में: 13307 किलोमीटर (16 बार)
एसी चेयरकार (CC) में: 1361 किलोमीटर (5 बार)
सेकंड एसी (2A) में: 2882 किलोमीटर (2 बार)
फर्स्ट एसी (1A) में: 1946 किलोमीटर (1 बार)



4000 किलोमीटर से ज्यादा: 1 बार
1000 से 3999 किलोमीटर तक: 27 बार
500 से 999 किलोमीटर तक:  47 बार
100 से 499 किलोमीटर तक: 329 बार
50 से 99 किलोमीटर तक (अर्द्धशतक): 283 बार

किस महीने में कितनी यात्रा
महीनापैसेंजरमेल/एक्ससुपरफास्टकुल योग
जनवरी17762069787911724
फरवरी47904697490514392
मार्च700539301054221477
अप्रैल2002295444919447
मई3053142446829159
जून1393162545337551
जुलाई42124669481313694
अगस्त8061137741801139846
सितम्बर47393072683514646
अक्टूबर60684784575816610
नवम्बर3098247518127385
दिसम्बर1874514520439062

Friday, December 21, 2018

कोंकण में एक गुमनाम बीच पर अलौकिक सूर्यास्त

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19 सितंबर 2018
मुंबई से गोवा जाने के यूँ तो बहुत सारे रास्ते हैं। सबसे तेज रास्ता है पुणे होकर, जिसमें लगभग सारा रास्ता छह लेन, फोर लेन है। दूसरा रास्ता है मुंबई-गोवा हाइवे, जो कोंकण के बीचोंबीच से होकर गुजरता है, खासकर रेलवे लाइन के साथ-साथ। और तीसरा रास्ता यह हो सकता है, जो एकदम समुद्र तट के साथ-साथ चलता है। यह तीसरा रास्ता कोई हाइवे नहीं है, केवल मान-भर रखा है कि अगर समुद्र के साथ-साथ चलते रहें तो गोवा पहुँच ही जाएँगे। यह आइडिया भी हमें उस दिन प्रतीक ने ही दिया था। उसी ने बताया था कि इस रास्ते पर मुंबई से गोवा के बीच पाँच स्थानों पर नाव से क्रीक पार करनी पड़ेगी। अन्यथा लंबा चक्कर काटकर आओ। उसी ने बताया था दिवेआगर बीच के बारे में और शेखाड़ी होते हुए श्रीवर्धन जाने के बारे में भी।

शेखाड़ी बड़ी ही शानदार लोकेशन पर स्थित है। लेकिन इस शानदार गाँव के बारे में एक नकारात्मक खबर भी है। मुंबई ब्लास्ट में प्रयुक्त हुए हथियार और विस्फोटक समुद्री मार्ग से यहीं पर लाए गए थे और उन्हें ट्रकों में भरकर मुंबई पहुँचाया गया था। खबर यह रही

लेकिन जैसे ही शेखाड़ी पार किया, हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए कि रुकें या न रुकें। क्योंकि हम सूर्यास्त से पहले श्रीवर्धन पहुँचना चाहते थे और वहीं से सूर्यास्त देखना चाहते थे। लेकिन यहाँ हमें रुकना पड़ा। समुद्र के अंदर से पहाड़ियाँ निकलती हैं - एकदम नहाई-धोई-सी। नीला समुद्र और हरी-भरी पहाड़ियाँ। और इन दोनों के ठीक बीच से निकलती सड़क। दाहिनी तरफ समुद्र और बाईं तरफ पहाड़ियाँ।
हम रुके; दो-चार फोटो खींचे; सड़क के किनारे ट्राइपॉड लगाए एक फोटोग्राफर को देखा; बरगद का अकेला पेड़ देखा; श्रीवर्धन को याद किया और आगे बढ़ चले।

Wednesday, December 19, 2018

दिवेआगर बीच: खूबसूरत, लेकिन गुमनाम

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19 सितंबर 2018
हमें दिवेआगर बीच बहुत अच्छा लगा। चार किलोमीटर लंबा और काली रेत का यह बीच है। यहाँ ठहरने के लिए होमस्टे और होटल भी बहुत सारे हैं। यानी गुमनाम-सा होने के बावजूद भी यह उतना गुमनाम नहीं है। मुंबई से इसकी दूरी लगभग 150 किलोमीटर है और यहाँ होटलों की संख्या देखकर मुझे लगता है कि वीकेंड पर बहुत सारे यात्री आते होंगे। हम उत्तर भारतीयों ने तो गोवा के अलावा किसी अन्य स्थान का नाम ही नहीं सुना है, तो मेरी यह पोस्ट उत्तर भारतीयों के लिए है।

घूमना सीखिए...

चार किलोमीटर लंबे इस बीच पर आज अभी हमारे अलावा कोई भी नहीं था। साफ सुथरा, काली रेत का बीच और ढलान न के बराबर होने के कारण बड़ी दूर तक समुद्र का पानी उस तरह फैला था कि न तो उसमें पैर भीगते थे और न ही वह सूखा दिखता था। ऐसा लगता था जैसे काँच पर खड़े हों।
हर तरफ समुद्री जीवों के अवशेष थे और पक्षी उन्हें खाने के लिए मंडरा रहे थे। केवल पक्षी ही नहीं, केकड़े भी खूब दावत उड़ा रहे थे। इसी रेत में ये बिल बनाकर रहते हैं और किसी खतरे का आभास होते ही टेढ़ी चाल से दौड़ते हुए बिल में जा दुबकते हैं। इन्हें टेढ़े-टेढ़े दौड़ते देखना भी खासा मजेदार होता है। दीप्ति ने बताया कि केकड़े घोंघे को खाकर उसका खोल ओढ़ लेते हैं और खोल समेत ही समुद्र में विचरण करते हैं। इन्हें देखकर दूसरे घोंघे इन्हें अपना भाई समझ बैठते हैं और इस तरह केकड़े की दावत चलती रहती है। फिलहाल बीच पर बहुत सारी मछलियाँ मरी पड़ी थीं। गौरतलब है कि समुद्र कुछ भी अपने अंदर नहीं रखता है। जो मर जाता है, उसे समुद्र बाहर फेंक देता है। हर एक बीच पर आपको मरी हुई मछलियाँ, सीपियाँ आदि मिल जाएँगे।

Monday, December 17, 2018

जंजीरा किले के आसपास की खूबसूरती

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19 सितंबर 2018
उस दिन मुंबई में अगर प्रतीक हमें न बताता, तो हम पता नहीं आज कहाँ होते। कम से कम जंजीरा तो नहीं जाते और दिवेआगर तो कतई नहीं जाते। और न ही श्रीवर्धन जाते। आज की हमारी जो भी यात्रा होने जा रही है, वह सब प्रतीक के कहने पर ही होने जा रही है।
सबसे पहले चलते हैं जंजीरा। इंदापुर से जंजीरा की सड़क एक ग्रामीण सड़क है। कहीं अच्छी, कहीं खराब। लेकिन आसपास की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ खराब सड़क का पता नहीं चलने दे रही थीं। हरा रंग कितने प्रकार का हो सकता है, यह आज पता चल रहा था।
रास्ते में एक नदी मिली। इस पर पुल बना था और पानी लगभग ठहरा हुआ था। यहाँ से समुद्र ज्यादा दूर नहीं था और ऊँचाई भी ज्यादा नहीं थी, इसलिए पानी लगभग ठहर गया था। ऐसी जगहों को ‘क्रीक’ भी कहते हैं। दोनों तरफ वही छोटी-छोटी पहाड़ियाँ थीं और नजारा भी वही मंत्रमुग्ध कर देने वाला था।

जंजीरा गाँव एक गुमसुम-सा गाँव है। गूगल मैप के अनुसार सड़क समाप्त हो गई थी और यहीं कहीं जंजीरा किले तक जाने के लिए जेट्टी होनी चाहिए थी, लेकिन हमें मिल नहीं रही थी। अपने घर के बाहर बैठे एक बुजुर्ग ने हमारे रुकते ही हमारी मनोदशा समझ ली और बिना कुछ बोले एक तरफ इशारा कर दिया। कुछ घरों के बीच से निकलने के बाद हम जेट्टी पर थे।
लेकिन न कोई नाव और न ही कोई यात्री। शिकंजी बेचने वाला एक ठेला था और पार्किंग का ठेकेदार भी आ गया।

Saturday, December 15, 2018

भीमाशंकर से माणगाँव

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18 सितंबर 2018
पिछली पोस्ट हमने इन शब्दों के साथ समाप्त की थी कि भीमाशंकर मंदिर और यहाँ की व्यवस्थाओं ने हमें बिल्कुल भी प्रभावित नहीं किया। यह एक ज्योतिर्लिंग है और पूरे देश से श्रद्धालुओं का यहाँ आना लगा रहता है। वैसे तो यह भीड़भाड़ वाली जगह है, लेकिन आज भीड़ नहीं थी। ठीक इसी स्थान से भीमा नदी निकलती है, जो महाराष्ट्र के साथ-साथ कर्नाटक की भी एक मुख्य नदी है और जो आंध्र प्रदेश की सीमा के पास रायचूर में कृष्णा नदी में मिल जाती है। नदियों के उद्‍गम देखना हमेशा ही अच्छा अनुभव रहता है। यहाँ वडापाव खाते हुए भीमा को निकलते देखना वाकई अच्छा अनुभव था।
और रही बात भगवान शिव के दर्शनों की, तो खाली मंदिर में यूँ ही चहलकदमी करते-करते दर्शन हो गए। हाँ, बाहर निकाले जूतों की चिंता अवश्य सताती रही। एक नजर भगवान शिव पर, तो दूसरी नजर जूतों पर थी।

वडापाव समाप्त भी नहीं हुआ कि बहुत सारे श्रद्धालु आ गए। इनमें उम्रदराज महिलाएँ ज्यादा थीं और हम दोनों इस बात पर बहस कर रहे थे कि ये राजस्थान की हैं या मध्य प्रदेश की। सभी महिलाओं ने सहज भाव से भीमा उद्‍गम कुंड में स्नान किया और एक-दूसरी को एक-दूसरी की धोतियों से परदा देते हुए कपड़े भी बदल लिए। कुछ ने हमारी मोटरसाइकिल का परदा बना लिया और जब तक वे मोटरसाइकिल के पीछे से कपड़े बदलकर न निकल गईं, तब तक हमें प्रतीक्षा करनी पड़ी और एक-एक बड़ा कप चाय और एक-एक वडापाव और लेने पड़े।