Wednesday, August 21, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला

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19 जून 2013
चूंकि नौ बजे ससपोल से चल पडा तो इसका अर्थ है कि साढे सात बजे उठ भी गया होऊंगा। कल लेह में नहाया था, आज तो सवाल ही नहीं। गेस्ट हाउस चूंकि घर ही होते हैं। और यह भी काफी बडा था। खूब ताक-झांक कर ली, कोई नहीं दिखा। आन्तरिक हिस्से में मैं झांका नहीं करता। कुछ देर बाद जब लडकी दिखाई पडी तो पता चला कि उसकी मम्मी लामायुरू गई हैं, वहां कोई पूजा है। घर में लडकी अकेली ही थी। उसने नाश्ते के बारे में पूछा, मैंने तुरन्त हां कर दी। पूछने लगी कि यहीं आपके कमरे में लाऊं या आप अन्दर चलोगे रसोई में। मेरी इच्छा तो थी कि लद्दाखी घर में अन्दर जाऊं लेकिन पापी मन अकेली लडकी की वजह से मना भी कर रहा था। कह दिया कि यहीं ले आओ। वह जैसा तुम चाहो कहकर चली गई। अचानक पुनः प्रकट हुई। बोली नहीं भैया, आप अन्दर ही चलो, कोई परेशानी नहीं है। मुझे काफी सारा सामान उठाकर लाना पडेगा। मैं झट पीछे पीछे हो लिया।
मैं जनवरी में चिलिंग में दो दिनों तक होमस्टे के तौर पर एक लद्दाखी घर में ठहर चुका था। यह भी लगभग उसी की तरह था- मोटे मोटे नरम गद्दे, बैठने को लम्बे चौडे पीढे, चाहो तो उन पर सो जाओ। और सामने बुद्ध भगवान। दीवारों पर रैक बनाकर बर्तन सजाकर रखे थे। और जबरदस्त साफ सफाई।
लडकी का नाम ध्यान नहीं है। बारहवीं में पढ रही है। लद्दाखी रोटियां ले आई। ये बहुत मोटी होती हैं और अंगारे पर सिंकती हैं। इन्हें जैम और चाय से खाया जाता है। कई तरह के जैम के डिब्बे मेरे सामने लाकर रख दिये। पतली गर्दन वाला चाय का थर्मस भी। मुझे वैसे तो पता नहीं है कि इन रोटियों के खाने का सही तरीका क्या होता है लेकिन चिलिंग में प्रयोग में लाया तरीका यहां भी आजमाया। छुरे और चाकू से डिब्बे से जैम निकालकर रोटी पर बढिया तरह चुपडकर खा जाओ, साथ के साथ चाय पीते जाओ। लडकी ने टोका नहीं तो यही तरीका होगा इसे खाने का।
नौ बजे यहां से चल पडा। आज का लक्ष्य 61 किलोमीटर दूर लामायुरू पहुंचने का है। इसमें खालसी तक रास्ता सिन्धु के साथ साथ है, उसके बाद सिन्धु छोड देंगे और फोतूला की चढाई शुरू हो जायेगी।
ससपोल से निकलते ही बायें हाथ सिन्धु पार करके एक सडक प्रसिद्ध गोम्पा अल्ची चली जाती है। मुझे अल्ची नहीं जाना है, इसलिये सीधा चलता रहा।
दोनों तरफ रेतीले और चट्टानी पहाड व बीच में सिन्धु, बडा शानदार नजारा पेश करते हैं। सिन्धु काफी चौडाई में बहती है और बहाव भी काफी तेज है। रुककर इसे देखना अच्छा लगता है।
ससपोल से 23 किलोमीटर आगे नुरला है। साढे ग्यारह बजे नुरला पार हो गया। नुरला 3000 मीटर की ऊंचाई पर है। छोटा सा गांव और रुकने खाने को कुछ नहीं। नुरला से 12 किलोमीटर आगे खालसी है। खालसी 2978 मीटर की ऊंचाई पर है। जाहिर है रास्ते में उतराई तो है लेकिन उतनी नहीं जितनी अपेक्षा थी। एक बजे खालसी पहुंचा।
खालसी में ढाबे, होटल व गेस्ट हाउस हैं। धूलयुक्त सडक पर वाहन खडे थे। लोगबाग खाने के लिये रुके थे। मैंने भी एक पंजाबी ढाबे में शरण ली और दाल चावल का आनन्द उठाया।
नौ बजे ससपोल से चलकर एक बजे 35 किलोमीटर दूर खालसी आ गया था। ज्यादा ढलान नहीं थी, धूप काफी तेज इसलिये बहुत थकान हो गई थी। पिछले चौदह दिनों में आज पहली बार है जब 3000 मीटर से नीचे आया। एक यह भी कारण था ज्यादा गर्मी लगने का। फिर पूरा शरीर ढकना पड रहा था, यानी सारे समीकरण अपने विपरीत थे।
दो बजे यहां से चल पडा। सडक अच्छी मिली, ढलान भी इसलिये तीन किलोमीटर मात्र दस मिनट में नाप डाले। खालसी से तीन किलोमीटर आगे एक तिराहा है जहां से एक सडक बटालिक जाती है। बटालिक जाने के लिये परमिट लेना होता है। उसी सडक पर ही लद्दाख क्षेत्र के प्रसिद्ध और विलक्षण गांव धा और हनु हैं। कहा जाता है कि वे शुद्ध आर्य हैं। वैसे तो वहां और भी गांव हैं लेकिन बाहरी लोगों को केवल इन दो गांवों में ही जाने की अनुमति है।
यहां एक चेकपोस्ट भी है जहां हर आने जाने वाले को अपनी पहचान एक रजिस्टर में लिखनी पडती है। मैं पूरी तरह ढका हुआ था, पहरेदार ने साइकिल की वजह से विदेशी समझा और अंग्रेजी में समझाते हुए विदेशियों वाला रजिस्टर सामने रख दिया। मैं ऐसे मौकों का भरपूर मजा लेता हूं। मैंने ठेठ लहजे में कहा- भाई, देस्सी रजिस्टर कित सै? उसका चेहरा देखने लायक था।
बटालिक वाली सडक सिन्धु के साथ साथ दाहिने चली जाती है, जबकि अपनी कारगिल वाली सडक यहीं से सिन्धु पार कर जाती है। इस मुख्य सडक से खालसी से कारगिल 133 किलोमीटर है, जबकि बटालिक के रास्ते डेढ सौ किलोमीटर। मुख्य रास्ते में दो दर्रे पडते हैं जो 4100 मीटर व 3800 मीटर ऊंचे हैं जबकि बटालिक के रास्ते 4000 मीटर ऊंचा एक ही दर्रा है। कुल मिलाकर समीकरण बटालिक के पक्ष में है लेकिन वह पाकिस्तान की सीमा के नजदीक है इसलिये कारगिल व श्रीनगर जाने के लिये उसे नजरअन्दाज कर दिया है। बटालिक जाने के लिये परमिट की आवश्यकता होती है।
सिन्धु पार करके करीब एक किलोमीटर तक रास्ता सिन्धु के साथ साथ ही चलता है, फिर बायें मुड जाता है। यहां यह एक नदी के साथ साथ चलता है। लेकिन भूदृश्य में एक परिवर्तन आ जाता है। अभी तक बहुत चौडी घाटी में चल रहे थे, अब संकरी घाटी में हैं। नदी के दोनों तरफ सीधे खडे ऊंचे ऊंचे पहाड हैं, उनके बिल्कुल नीचे सडक है। कोई पत्थर भी गिरेगा तो सीधे सडक पर ही गिरेगा। कई जगह सडक इन्हीं पत्थरों की वजह से क्षतिग्रस्त भी थी। बरसात होती तो मुझे इस सडक से गुजरते हुए डर लगता, अब बिल्कुल भी डर नहीं लग रहा था। बल्कि एक नये परिवेश में आकर खुशी हो रही थी। हर मोड पर नया दृश्य।
मुझसे कुछ आगे जाकर एक गाडी रुकी। उसमें से चार लोग बाहर निकले और मेरे फोटो खींचने लगे। जब मैं उनके पास पहुंचा, तो जाहिर है रुकना पडा। पूरी तरह ढके होने के कारण उन्होंने मुझे विदेशी समझा, अंग्रेजी में शुरूआत हुई। जल्द ही वे समझ गये कि हमारे भारतीय भी ऐसा कर सकते हैं। वे कुछ दिन पहले श्रीनगर से लेह गये थे, अब लौट रहे हैं। उन्हें शिकायत थी कि रास्ता बहुत खराब है। मैंने कहा कि अगर आप मनाली के रास्ते आये होते, तब इस रास्ते को जन्नत बताते। खैर, बडी तारीफ की उन्होंने मेरी। चढाई भरा रास्ता था, मैं थक गया था और पसीने से लथपथ था, सारी थकान उतर गई। और हां, पानी भी एक भरी बोतल भी दी उन्होंने।
इस नदी के किनारे किनारे चलते हुए करीब छह किलोमीटर आगे एक तिराहा मिला। यहां से मुझे इस नदी का साथ छोड देना है। फोतूला की असली चढाई अब शुरू होगी। एक सडक नदी के किनारे किनारे भी गई है। यहीं एक सूचना पट्ट भी लगा है जिस पर लिखा है- वांगला- फोतोकसर-नेरक रोड। नेरक लिखा देखकर मैं जान गया कि यह सडक अभी निर्माणाधीन है। नेरक जांस्कर नदी के किनारे स्थित है और अभी किसी भी तरफ से सडक मार्ग से नहीं जुडा है।
यहां से आगे जो चढाई शुरू हुई, उसने मेरी जान निकाल दी। दो-तीन लूप भी हैं। थोडा सा चलता और ज्यादा देर रुकता। चूंकि अभी चार ही बजे थे और लामायुरू भी ज्यादा दूर नहीं था, इसलिये मैं देर होने के प्रति बेफिक्र था।
रास्ते में ‘मूनलैण्ड’ पडा। लामायुरू से पहले पहाडों की आकृति बिल्कुल अनोखी है। कहते हैं कि ऐसी आकृति चन्द्रमा की सतह की है। इनमें मिट्टी की मात्रा ज्यादा है और पानी व वायु के कटाव से ऐसी आकृतियां बन गई हैं। ये ऐसी हैं कि इनसे नजर नहीं हटतीं। आज अष्टमी थी और संयोग से चन्द्रमा ऊपर ही चमक रहा था, मूनलैण्ड में चन्द्रमा दिखने से अच्छा संयोजन बन गया।
साढे पांच बजे लामायुरू में प्रवेश किया। यह एक बौद्ध गांव है, एक गोम्पा भी है। गोम्पा में पूजा थी, इसलिये दूर-दूर से श्रद्धालु आये थे। शाम होने पर वापस भी लौटने लगे थे। गाडियां और बसें भर-भर कर लामायुरू से लौट रही थीं। पूजा कल भी रहेगी। बडी भीड थी।
मुझे आज यहीं रुकना है। मैं आज 61 किलोमीटर चल चुका हूं। जिसमें से ज्यादातर चढाई है। लामायुरू 3400 मीटर की ऊंचाई पर है। आगे कुछ दूर फोतूला है। मेरे पास लेह-श्रीनगर मार्ग का कोई डाटा नहीं था, इसलिये मुझे नहीं पता था कि फोतूला कितनी ऊंचाई पर है और यहां से कितनी दूर है। एक से पूछा तो दस किलोमीटर बताया। सोचा कि आज ही फोतूला पार लेता हूं और उधर तो ढलान मिलेगा, खारबू जाकर रात रुक जाऊंगा। फिर सोचा अगर फोतूला दस किलोमीटर भी है तो मुझे तीन घण्टे लगेंगे इसे पार करने में। साढे पांच अभी बज चुके हैं, फोतूला तक ही अच्छा अन्धेरा हो जायेगा। नहीं, आज यहीं लामायुरू में रुकता हूं।
एक गेस्ट हाउस में गया। एक कमरा बताया पन्द्रह सौ रुपये का। दूसरे में गया- बारह सौ का। होश उड गये। पूजा की वजह से आज लामायुरू इतना महंगा है। खाने को भी कुछ नहीं मिला। आगे बढने के अलावा कोई चारा नहीं।
आगे बढना पडा। यहां से आगे चढाई तो है, लेकिन लूप नहीं है। फिर मानसिक स्थिति भी मजबूत हो चुकी थी कि चलना ही चलना है, चाहे रो-धोकर चल या हंसी खुशी। इसलिये शरीर ने इस चढाई को स्वीकार कर लिया और हर दस मिनट में एक किलोमीटर चलने का औसत निकलने लगा।
चार किलोमीटर चलकर कुछ मोटरसाइकिल वाले मिले। मैंने एक से पूछा कि फोतूला कितना दूर है, तो बताया मात्र चार किलोमीटर। जी खुश हो गया। मैं आज ही फोतूला पार कर लूंगा। पौन घण्टे में या हद से हद एक घण्टे में फोतूला पार हो जायेगा। और दुगने जोश से पैडल मारने लगा।
चार किलोमीटर चलकर जब देखा कि सडक कुछ आगे जाकर एक मोड के बाद गुम होती दिख रही है तो उस मोड के फोतूला होने का एहसास हुआ। रुककर उस ‘फोतूला’ को अच्छी तरह देखा। बेटा फोतूला, आज तुझे फतह करने की उम्मीद नहीं थी। आज तो मैं लामायुरू में रुकने वाला था। तू लेह-श्रीनगर रोड पर सबसे ऊंचा दर्रा है। देख, लेह से चलने के दो दिन बाद ही तुझे पार करने वाला हूं। साइकिल आगे बढा दी।
जब उस मोड पर पहुंचा तो हैरान रह गया। फोतूला वोतूला कुछ नहीं था, दूर कम से कम सात आठ किलोमीटर की सडक दिख रही थी, वो भी एक के ऊपर एक लूप बनाती हुई। कहां तो इस मोड के बाद चढाई खत्म होने वाली थी, कहां अब लूप वाली चढाई स्वागत के लिये तैयार खडी है। मैंने उन मोटरसाइकिल वालों को पंक्चर होने वाला श्राप दिया जिन्होंने कहा था कि मात्र चार किलोमीटर दूर है फोतूला।
शरीर ने मना कर दिया कि अब नहीं चलेंगे। लामायुरू से ठीक नौ किलोमीटर दूर एक नाला है। इसी के किनारे बीआरओ की कुछ मशीनें हैं, उनकी रखवाली के लिये एक लद्दाखी तैनात था। एक छोटा सा शेड था उसके लिये। मैंने उसी के पास टैण्ट लगाने का फैसला किया। वो लामायुरू का ही रहने वाला था। टैण्ट लगाने में उसने साथ दिया। टैण्ट लगवाकर वो अपने घर चला गया। सुबह पता चला कि उसकी पूरी रात की चौकीदारी की ड्यूटी थी। उसके जाने से मुझे एक नुकसान हुआ। अब मैं इस सन्नाटे में अकेला हो गया। रुकते समय सोचा था कि पडोस में यह भी रहेगा, भय कुछ कम लगेगा। इससे पहले मैं गुलाबा में सोया था लेकिन वहां बगल में बीआरओ का पूरा का पूरा समुदाय था। उसके बाद नकीला के पास भी टैण्ट लगाया सन्नाटे में लेकिन वहां सचिन साथ था। यहां मैं अकेला रह गया।
मुझे ऐसी जगहों पर भूत से डर लगता है। रात को सन्नाटे में जहां दूर दूर तक कोई भी न हो, मुझे हर आवाज भूत की लगती है, हर तरफ भूत दिखाई भी देने लगते हैं। दिन में मैं भूतों के खिलाफ बोल सकता हूं। भूत नहीं होते, इस बात को सिद्ध भी कर सकता हूं। लेकिन रात को वो भी ऐसी जगह पर मैं उनके खिलाफ सोच तक नहीं सकता। टैण्ट लगाते ही स्लीपिंग बैग में घुस गया और सुबह होने तक आंख नहीं खोली।
आज 70 किलोमीटर साइकिल चलाई।

ससपोल गांव

ससपोल के पास सिन्धु



सिन्धु के साथ साथ राष्ट्रीय राजमार्ग-1


खालसी में एक पुल

खालसी में पुल के ऊपर पुल

खालसी से तीन किलोमीटर आगे वो तिराहा जहां से दाहिने सडक बटालिक जाती है और बायें कारगिल।


सिन्धु छोडकर इस संकरी घाटी में प्रवेश करते हैं।

नदी पार कर रहे हैं ये

यह थी अपनी वेशभूषा। आंखों पर चश्मा होता था और कोई नहीं कह सकता था कि यह भारतीय है या विदेशी।


रास्ते में मिला एक छोटा सा गोम्पा

लामायुरु की ओर


वहीं नीचे से आया हूं अभी। इस चढाई ने जान निकाल दी थी।


लामायुरू से कुछ पहले ‘मूनलैण्ड’ है।

मूनलैण्ड


मूनलैण्ड और मून

यह है मूनलैण्ड का जबरदस्त फोटो



यह चित्र मुझे बडा प्यारा लगता है, किसी स्वप्नलोक की तरह।

लामायुरू में आपका स्वागत है।


लामायुरू में मेला है।



अलविदा लामायुरू! फिर मिलेंगे।

लामायुरू से आगे।
अगला भाग: लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकी-ला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

17 comments:

  1. बहुत दिनों बाद इस ब्लॉग पर आई हूँ ... एक से एक फोटो ...अभी पढ़ा तो नहीं ही है ...:-P

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  2. नीरज जी! नस्कार! आपकी सभी तस्वीर अच्छी लगी, वो सबसे अच्छी तस्वीर जिसमें चारो तरफ पहाड़ और बीच में हरियाली मजा आ गया।

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  3. मुझे ऐसी जगहों पर भूत से डर लगता है। रात को सन्नाटे में जहां दूर दूर तक कोई भी न हो, मुझे हर आवाज भूत की लगती है, हर तरफ भूत दिखाई भी देने लगते हैं। दिन में मैं भूतों के खिलाफ बोल सकता हूं। भूत नहीं होते, इस बात को सिद्ध भी कर सकता हूं। लेकिन रात को वो भी ऐसी जगह पर मैं उनके खिलाफ सोच तक नहीं सकता। टैण्ट लगाते ही स्लीपिंग बैग में घुस गया और सुबह होने तक आंख नहीं खोली।
    आज 70 किलोमीटर साइकिल चलाई। bahut badiya or sach swikarne ki himmat par dad

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  4. तस्‍वीरें जान डाल दे रही हैं, इस यात्रा में.
    कैमरा कौन सा इस्‍तेमाल कर रहे हैं?

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  5. sare hi fotu mst hai ....sabhi swpnlok se dikh rahe hai ....

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  6. मूनलैण्ड और मून..
    शानदार ..

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  7. देस्सी रजिस्टर कित सै? हा - हा - हा !!!


    नीरज भाई आपने फोतूला के बारे में जो पंक्ति लिखी है - "तू लेह-मनाली रोड पर सबसे ऊंचा दर्रा है"
    इसमें एक छोटी सी टाइपिंग भूल हो गयी लगता है, लेह-श्रीनगर रोड की जगह लेह-मनाली रोड छप गया है।
    -Anilkv

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    1. अनिल जी,
      गलती की तरफ ध्यान आकृष्ट कराने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद।
      गलती सुधार ली गई है।

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  8. याञा वणॅन मे फोटो जान डाल देते हे आज का वणॅन हर लिहाज से काबीलेतारीफ हे । सभी रस इस याञा मे मौजुद हे।आज भय रस भी पढने को मिला।

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  9. Neeraj, fir bhoot ki koi awaaz aayi kya???

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  10. राम राम जी, आपने तो कमाल ही कर दिया हैं. इससे पहले लद्दाख क्षेत्र के इतने सुंदर चित्र नही देखे. अब तो आप एक पुस्तक केवल लद्दाख यात्रा पर लिख डालो. मेरे ख्याल से यह यात्रा आपकी सबसे अच्छी यात्रा हैं. मून वेल्ली के चित्र ग़ज़ब हैं...बहुत बढ़िया, हमे गर्व हैं आप पर....

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  11. भूत नहीं होते, इस बात को सिद्ध भी कर सकता हूं..
    ker k dikhaao tho jaane hum..

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  12. अद्भुत दृश्य, कितना सुन्दर है देश हमारा

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  13. खूबसूरत तस्वीरे

    प्रणाम

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