Monday, July 29, 2013

लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला

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11 जून 2013
साढे आठ बजे आंख खुली। सचिन कभी का जग चुका था। आज बडा लम्बा रास्ता तय करना है। कम से कम पांग तक तो जाना ही पडेगा जो यहां से 78 किलोमीटर दूर है। सरचू व पांग के बीच में खाने ठहरने को कुछ नहीं। साथ ही दो दर्रे भी पार करने हैं। ज्यादातर रास्ता चढाई भरा है। और ज्यादा पूछताछ की तो पता चला कि व्हिस्की नाले पर रहने खाने को मिल जायेगा। व्हिस्की नाला यानी लगभग 50 किलोमीटर दूर। हमें आज व्हिस्की नाले तक पहुंचना भी मुश्किल लगा। इसलिये भरपेट खाना खाने के बाद आलू के छह परांठे पैक करा लिये।
दस बजे यहां से चले। कल सोचा था कि आज पूरा दिन सरचू में विश्राम करेंगे, इसलिये उठने में देर कर दी। फिर आज जब उठ गये तो चलने का मन बन गया।
सरचू हिमाचल प्रदेश में है लेकिन यहां से निकलकर जल्द ही जम्मू कश्मीर शुरू हो जाता है। जम्मू कश्मीर में भी लद्दाख। वैसे भौगोलिक रूप से लद्दाख बारालाचा-ला पार करते ही आरम्भ हो जाता है लेकिन राजनैतिक रूप से यहां से आरम्भ होता है। वास्तव मे सरचू से करीब सात-आठ किलोमीटर आगे एक पुल है- ट्विंग ट्विंग पुल, वही हिमाचल व लद्दाख की सीमा है। हालांकि कहीं जम्मू कश्मीर या लद्दाख का स्वागत बोर्ड नहीं दिखा। सरचू मनाली से 222 किलोमीटर दूर है और लेह से 252 किलोमीटर। फिर भी इसे इस मार्ग का मध्य स्थान माना जाता है। आप सरचू पहुंच गये, मानों आधी दूरी तय कर ली।
जिस नदी के किनारे सरचू है, उसके दूसरे किनारे पर एक गांव है। बौद्ध गांव है वह। उसका नाम अब मुझे ध्यान नहीं। बडी दुर्गति वाली जगह पर बसा है वह। लोगों का मुख्य पेशा तो निःसन्देह भेडपालन ही है। लेकिन सौ सौ किलोमीटर दोनों तरफ उसके कोई गांव नहीं है, इसलिये उनका कोई पडोसी भी नहीं है। नदी पर कोई पुल भी नहीं है, कैसे पार करते होंगे? बिजली और टेलीफोन का तो सवाल ही नहीं। वह गांव ट्विंग ट्विंग नदी के ठीक सामने है, इसलिये कह नहीं सकते कि हिमाचल में है या लद्दाख में।
गाटा लूप सरचू से 24 किलोमीटर आगे है और करीब 200 मीटर नीचे भी, इसलिये ढलान है। फिर भी मुझे पौने तीन घण्टे लगे वहां तक पहुंचने में। इस दौरान दिल्ली से लेह जाने वाली बस भी निकली। रास्ते के नजारे ही इतने जबरदस्त थे कि बार-बार रुकना पडता और फोटो खींचने पडते। आज वैसे तो पांग पहुंचना था लेकिन तय था कि नहीं पहुंच पायेंगे और कहीं रास्ते में टैण्ट लगाना पडेगा। इसलिये चलने में सुस्ती भी थी और मौज भी।
रास्ते में दो नाले और मिले, दोनों पर पुल थे- ब्राण्डी व व्हिस्की नाला। जब व्हिस्की पुल आया तो प्रश्न उठना स्वाभाविक ही था कि यह नाला तो नकी-ला पार करके उस तरफ है, यहां कैसे? लेकिन उत्तर कौन देता? खुद ही ढूंढना था।
पौने एक बजे उस स्थान पर पहुंचा जहां से गाटा लूप शुरू होते हैं। सचिन भी यहीं था। उसने देखते ही प्रशंसा की कि आज तो तू बडा तेज चल रहा है। मैंने कहा भाई ढलान है, अब देखना कैसे तेज चल सकूंगा, गाटा लूप की चढाई शुरू होने वाली है। यहां से आगे चढाई है। कुल 21 लूप हैं, दूरी दस किलोमीटर, निचला सिरा 4201 मीटर पर जबकि ऊपरी सिरा 4667 मीटर पर है। यह चढाई नकी-ला पार करने के लिये है। जब हमने गाटा लूप की चढाई शुरू की, चारों ओर बादल थे, धूप नहीं थी, तेज ठण्डी हवा चल रही थी व रह रहकर दो चार बूंदें भी पड जातीं। ऊपर की ओर देखते तो नकी-ला के पास घने काले बादलों का जमावडा था। सम्भावना थी कि वहां बर्फबारी मिल सकती है।
पेट में दबाव बना था, लेकिन आसपास पानी नहीं था। सोचा कि आगे जहां भी पानी मिलेगा, दबाव हल्का कर लूंगा। हालांकि कुछ आगे चलकर अत्यधिक दबाव के कारण बिना पानी के ही हल्का होना पडा। ऐसी यात्राओं में इसे अशुद्धता नहीं मानता।
यहां भी गाडी वालों ने शॉर्ट कट बना रखे हैं। इसी तरह के एक छोटे रास्ते से एक सूमो उतरती दिखी तो हमने भी उसी से चढने का निश्चय कर लिया। हद से हद दो सौ मीटर का रास्ता ही रहा होगा वह, लेकिन हमने कान पकड लिये कि अब के बाद छोटे रास्ते की तरफ देखेंगे भी नहीं।
थोडी देर चलते और ज्यादा देर रुकते। गाटा लूप पर चढाई ही चढाई है। इसी तरह एक जगह जब हम साइकिल को चट्टान पर टिकाकर खुद साइकिल से टिककर सुस्ता रहे थे तो एक कार आकर सडक के मध्य में ही रुकी। उसमें से एक बूढा सिर बाहर झांका और आंख के सामने कैमरा लगाकर बोला- अरे ओये, जरा सामने आना। चढाई की वजह से दिमाग वैसे ही भन्ना रहा था, उसका यह लहजा सुनकर और गर्म हो गया। फिर भी बूढे की इज्जत करता हुआ मैं उसके सामने आ गया। झुंझलाई सी आवाज में बोला- तुम्हारा क्या करूंगा मैं? साइकिल लेकर आओ। जी में आया कि पत्थर उठाकर फोड दूं उसका सिर। पर उसके लिये हिम्मत चाहिये, हिम्मत खत्म हो चुकी थी। मैं वापस साइकिल के पास चला गया और पहले की तरह टिक कर बैठ गया। बोला- अरे, तुम्हें सुनता नहीं क्या? मैंने कहा- ताऊ, पहले तो गाडी सडक से नीचे साइड में लगाओ, फिर नीचे उतरकर मेरे पास आओ, हाथ मिलाओ और हाल-चाल पूछो। उसके बाद फोटो खींचने के लिये परमिशन लो। अगर परमिशन मिल गई, तब फोटो खींचना। तुम्हारे कैमरे में आने के लिये हम पसीना नहीं बहा रहे हैं। खैर, गाडी से उतरना ही उसके बसकी नहीं था, हवा इतनी तेज और ठण्डी चल रही थी। उसने बडबडाते हुए शीशा चढाया और चलता बना।
पौने दो बजे बारहवें लूप के पास खाने के लिये रुके। यह जगह 4368 मीटर पर है। खुली जगह भी है, बैठने का अच्छा इन्तजाम है। दोनों ने एक-एक परांठा खाया। इस समय धूप थी, यहीं लेटकर सो गये। कुछ देर बाद गडगडाहट सुनकर आंख खुली। दूर के पहाडों पर बारिश हो रही थी। एक घण्टे बाद पौने तीन बजे यहां से चले।
चार बजे गाटा लूप को खत्म किया। लूप भले ही खत्म हो गये हों, लेकिन चढाई जारी थी। जैसे जैसे हम नकी-ला की ओर बढ रहे थे, बादल भी घने होते जा रहे थे, बारिश की सम्भावना भी बढती जा रही थी। रास्ते में टीन का एक शेड मिला विश्राम के लिये। यह अच्छे समय में ही विश्राम का लाभ दे सकता था, इस तूफानी व बारिश के समय में नहीं।
अब हमने टैण्ट लगाने की जगह ढूंढनी शुरू कर दी। सामने से इतनी तेज हवा चल रही थी कि साइकिल चलानी मुश्किल थी। टैण्ट ऐसी जगह लगेगा जहां हवा न्यूनतम लगती हो और बारिश होने पर पत्थर गिरने व पानी आने की सम्भावना भी न हो।
आखिरकार ऐसी जगह मिल गई। लेकिन मन नहीं माना। सामने वाले मोड पर देख लेते हैं आगे कैसा रास्ता है। गये तो वहीं चढाई वाला मिला। वापस लौटे। सडक से थोडा नीचे साइकिल उतारी। यहां पहले भी कभी टैण्ट लगाये गये थे, आग जलाई गई थी व दारू भी पी गई थी।
व्हिस्की पुल के बाद हमें पानी नहीं मिला था। अब तक आखिरी घूंट पानी भी खत्म हो चुका था। ऐसे में पानी का सर्वोत्तम स्रोत मुझे मालूम है। एक गाडी रोकी, एक बोतल पानी मिल गया। रात भर का काम चल जायेगा।
जैसे ही टैण्ट लगा, हम सामान सहित इसमें घुसे, बाहर बारिश होने लगी। चार परांठे अब भी बचे थे, दो खाये, दो सुबह खायेंगे।
जिन्दगी में पहली बार इतनी ऊंचाई पर सो रहा था- 4700 मीटर पर।
आज 37 किलोमीटर साइकिल चलाई।

सरचू से प्रस्थान




यह ट्विंग ट्विंग नाला है। यही हिमाचल व लद्दाख की सीमा है।





सरचू के उस तरफ का गांव

लद्दाख की जीवन रेखा। दिनभर में सैंकडों टैंकर गुजरते हैं।

ब्राण्डी नाले पर बना पुल।

व्हिस्की पुल

ऐसे ही दृश्य तो लद्दाख की पहचान हैं।

खाना खाते सडक बनाने वाले मजदूर

यह एक अनोखी आकृति है। इसका दूसरे कोण से लिया गया फोटो आगे है।


यही वो आकृति है जो पहले दिखाई थी।

दिल्ली से लेह जाने वाली हिमाचल परिवहन की बस।


यहां से गाटा लूप शुरू होते हैं।

अलविदा ‘सरचू’ नदी। यह आगे जाकर जांस्कर में मिल जाती है।

गाटा लूप


पहचानो कौन?

मौसम खराब होता दिख रहा है।

गाटा लूप का बीसवां लूप

वायु क्षरण का सुन्दर उदाहरण

लग गया टैण्ट

बिल्कुल वीराने में लगा अपना आशियाना।

अगला भाग: लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला

मनाली-लेह-श्रीनगर साइकिल यात्रा
1. साइकिल यात्रा का आगाज
2. लद्दाख साइकिल यात्रा- पहला दिन- दिल्ली से प्रस्थान
3. लद्दाख साइकिल यात्रा- दूसरा दिन- मनाली से गुलाबा
4. लद्दाख साइकिल यात्रा- तीसरा दिन- गुलाबा से मढी
5. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौथा दिन- मढी से गोंदला
6. लद्दाख साइकिल यात्रा- पांचवां दिन- गोंदला से गेमूर
7. लद्दाख साइकिल यात्रा- छठा दिन- गेमूर से जिंगजिंगबार
8. लद्दाख साइकिल यात्रा- सातवां दिन- जिंगजिंगबार से सरचू
9. लद्दाख साइकिल यात्रा- आठवां दिन- सरचू से नकी-ला
10. लद्दाख साइकिल यात्रा- नौवां दिन- नकीला से व्हिस्की नाला
11. लद्दाख साइकिल यात्रा- दसवां दिन- व्हिस्की नाले से पांग
12. लद्दाख साइकिल यात्रा- ग्यारहवां दिन- पांग से शो-कार मोड
13. शो-कार (Tso Kar) झील
14. लद्दाख साइकिल यात्रा- बारहवां दिन- शो-कार मोड से तंगलंगला
15. लद्दाख साइकिल यात्रा- तेरहवां दिन- तंगलंगला से उप्शी
16. लद्दाख साइकिल यात्रा- चौदहवां दिन- उप्शी से लेह
17. लद्दाख साइकिल यात्रा- पन्द्रहवां दिन- लेह से ससपोल
18. लद्दाख साइकिल यात्रा- सोलहवां दिन- ससपोल से फोतूला
19. लद्दाख साइकिल यात्रा- सत्रहवां दिन- फोतूला से मुलबेक
20. लद्दाख साइकिल यात्रा- अठारहवां दिन- मुलबेक से शम्शा
21. लद्दाख साइकिल यात्रा- उन्नीसवां दिन- शम्शा से मटायन
22. लद्दाख साइकिल यात्रा- बीसवां दिन- मटायन से श्रीनगर
23. लद्दाख साइकिल यात्रा- इक्कीसवां दिन- श्रीनगर से दिल्ली
24. लद्दाख साइकिल यात्रा के तकनीकी पहलू

19 comments:

  1. बहुत ही सुंदर चित्रकारी, ऐसे ही घुमाते रहो......

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  2. aisi veeran jageh per neend bhala kya aai hogi??

    kabhi suraksha ki chinta nahi hoti thi kya neerajji aise me??

    khair aise veeran safar me koi sathi mil guya yehi badi acchi baat ho gai..

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  3. Great Yar, Maja aa gaya, lekin bhai ye to batawo ki Brandy aur Whisky naale ka raj kya hai

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  4. jaat ram ji bahut badhiya vratant pedhkar maja aaya. bhai dho bhi lee ya uhi khana kha leya.

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  5. is poori yatra me GEARED BICYCLE ki kitni IMPORTANCE rahi is bhi kuch roshni dalo bhai neeraj..

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  6. Whisky naula... ajeeb naam hai bhai

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  7. तस्‍वीरें खूबसूरत बन पड़ी हैं... इतने श्रम का सही पुरस्‍कार हैं ये।।

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  8. बहुत जोरदार और साहसिक, देख देख कर ही आनंद आ रहा है, शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  9. adbhut, aapke jajbe ko salaam ,

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  10. बुढे धोरे फ़ोटू खिंचवा लेनी थी, हो सके था तेरा रिश्ता हो जाता :)

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  11. यहां भी गाडी वालों ने शॉर्ट कट बना रखे हैं। इसी तरह के एक छोटे रास्ते से एक सूमो उतरती दिखी तो हमने भी उसी से चढने का निश्चय कर लिया। हद से हद दो सौ मीटर का रास्ता ही रहा होगा वह, लेकिन हमने कान पकड लिये कि अब के बाद छोटे रास्ते की तरफ देखेंगे भी नहीं।

    KYUN AISA KYA HO GUYA THA???

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  12. दिनांक: 8 जुलाई 2013 तक
    कुल: 582 बार
    कुल दूरी: 95451 किलोमीटर

    पैसेंजर से: 28002 किलोमीटर (310 बार)
    मेल/एक्सप्रेस से: 34556 किलोमीटर (202 बार)
    सुपरफास्ट से: 32853 किलोमीटर (70 बार)

    EK COLUMN AUR HONA CHAHIYE :- साइकिल द्वारा : ..... किलोमीटर ( ..... बार)

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  13. गजब की दृश्यावली है। धन्यवाद!

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  14. Absolutely stunning..particularly the last picture

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  15. वायुक्षरण वाली तस्वीरें देखने पर, कुदरत की ये अदभुत कलाकृतियाँ विस्मय में डाल देती हैं।
    -Anilkv

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  16. लद्दाख के ऐसे दृश्य सम्मोहित करते हैं।

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  17. यहाँ के पहाड़ देखकर ऐसा लगता है जैसे कई बूढ़े एकसाथ हंस रहे हो हा हा हा हा ...'ऐसे ही दृश्य तो लद्दाख की पहचान हैं।' तुमने ठीक कहा है ,। इन पहाड़ो को देख कर ऐसा लगता है मानो किसी स्वप्नलोक में आ गए हो .'.यह एक अनोखी आकृति है"ऐसा लगता है जैसे कोई लामा पहाड़ पर चढ़ रहा हो ..सचमुच अद्भुत !!!!हमारे देश में कितने आश्चर्य भरे पड़े है ...

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  18. अद्भुत.......बहुत ही सुंदर वर्णन ------- बहुत ही खतरा उठाया आपने । टेंट लगाते समय आपको जंगली जानवर वगैरहा का डर नहीं लगता क्‍या ।

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