Skip to main content

लेपाक्षी मंदिर


Lepakshi Temple History

19 फरवरी 2019

लेपाक्षी मंदिर का नाम हमने एक खास वजह से सुना था। यहाँ एक ऐसा पिलर है जो हवा में लटका है। अब जब हमें आंध्र प्रदेश में गंडीकोटा से कर्नाटक में बंगलौर जाना था, तो लेपाक्षी जाने की भी योजना बन गई। इसके लिए कोई बहुत ज्यादा लंबा चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा।

गंडीकोटा से कदीरी जाने वाला रास्ता बहुत खूबसूरत है। ट्रैफिक तो है ही नहीं, साथ ही खेतों में काम करते ग्रामीण असली भारत की झलक दिखाते हैं। अगर आप मोटरसाइकिल यात्रा पर हैं, तो आपको ऐसे डी-टूर भी लगा देने चाहिए। कई बार तो लोग मुड़-मुड़कर आपको देखते हैं, क्योंकि इस तरह बहुत कम लोग ही उनकी सड़कों पर आते हैं। और अगर आप रुक गए तो इनका अपनापन आपको हैरान कर देगा।

वैसे तो हम श्री सत्य साईं प्रशांति निलयम यानी पुट्टापार्थी होते हुए भी जा सकते थे, लेकिन हमारी दिलचस्पी इन बातों में नहीं है, इसलिए कदीरी से सीधे ग्रंथला का रास्ता पकड़ा और सीधे नेशनल हाइवे 44 पर आ गए। यह नेशनल हाइवे कश्मीर को कन्याकुमारी को जोड़ता है। कुछ दूर बंगलौर की ओर चलने पर लेपाक्षी का रास्ता अलग हो जाता है। लेपाक्षी इस हाइवे से 15-16 किलोमीटर दूर है।


सबसे पहले हमने उस खंबे को ही ढूँढ़ा। और फिर इसके नीचे से कपड़ा निकालकर यह तय किया कि क्या यह वाकई जमीन को स्पर्श करता है। लेकिन इसका एक छोटा-सा कोना जमीन को स्पर्श करता है। अभी तक हमने यही सुना था कि यह एक खंबा छत से लटका है और इसके व जमीन के बीच में गैप है, लेकिन आज अपनी आँखों से देखने पर सिद्ध हो गया कि यह छत से नहीं लटका है।

यह मंदिर भी हम्पी के विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा था। इसमें भी बेहद उन्नत कारीगरी का प्रदर्शन किया गया है। छतों पर आपको पेंटिंग भी देखने को मिल जाएगी। लेकिन खंबों की नाप उतनी परिष्कृत नहीं है। कोई खंबा तो छोटा रह गया है और उसके नीचे अतिरिक्त सपोर्ट लगाई गई है, तो कोई खंबा अधिक लंबा हो गया है और उसके नीचे का फर्श काटकर गड्ढा बनाया गया है ताकि खंबा एकदम फिट आ सके।

लेकिन बंगलौर से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर एक बार तो देखने लायक है ही।




Road Journey to Lepakshi





Monuments of Lepakshi

Hyderabad to Lepakshi Driving

Places to see in Lepakshi

Hotels in Lepakshi

Best Hotel in Lepakshi

Lepakshi Temple Description





Lepakshi Travel in Hindi

Lepakshi Temple Piller

Lepakshi Piller without support


History of Lepakshi
मंदिर की छत पर पेंटिंग


Best Food in Andhra Pradesh Lepakshi

Lepakshi Nandi Idol


Video










आगे पढ़ें: बंगलौर से बेलूर और श्रवणबेलगोला


1. दक्षिण भारत यात्रा के बारे में
2. गोवा से बादामी की बाइक यात्रा
3. दक्षिण भारत यात्रा: बादामी भ्रमण
4. दक्षिण भारत यात्रा: पट्टडकल - विश्व विरासत स्थल
5. क्या आपने हम्पी देखा है?
6. दारोजी भालू सेंचुरी में काले भालू के दर्शन
7. गंडीकोटा: भारत का ग्रांड कैन्योन
8. लेपाक्षी मंदिर
9. बंगलौर से बेलूर और श्रवणबेलगोला
10. बेलूर और हालेबीडू: मूर्तिकला के महातीर्थ - 1
11. बेलूर और हालेबीडू: मूर्तिकला के महातीर्थ - 2
12. बेलूर से कलश बाइक यात्रा और कर्नाटक की सबसे ऊँची चोटी मुल्लायनगिरी
13. कुद्रेमुख, श्रंगेरी और अगुंबे
14. सैंट मैरी आइलैंड की रहस्यमयी चट्टानें
15. कूर्ग में एक दिन
16. मैसूर पैलेस: जो न जाए, पछताए
17. प्राचीन मंदिरों के शहर: तालाकाडु और सोमनाथपुरा
18. दक्षिण के जंगलों में बाइक यात्रा
19. तमिलनाडु से दिल्ली वाया छत्तीसगढ़



Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

चूडधार की जानकारी व नक्शा

चूडधार की यात्रा कथा तो पढ ही ली होगी। ट्रेकिंग पर जाते हुए मैं जीपीएस से कुछ डाटा अपने पास नोट करता हुआ चलता हूं। यह अक्षांस, देशान्तर व ऊंचाई होती है ताकि बाद में इससे दूरी-ऊंचाई नक्शा बनाया जा सके। आज ज्यादा कुछ नहीं है, बस यही डाटा है। अक्षांस व देशान्तर पृथ्वी पर हमारी सटीक स्थिति बताते हैं। मैं हर दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद अपनी स्थिति नोट कर लेता था। अपने पास जीपीएस युक्त साधारण सा मोबाइल है जिसमें मैं अपना यात्रा-पथ रिकार्ड नहीं कर सकता। हर बार रुककर एक कागज पर यह सब नोट करना होता था। इससे पता नहीं चलता कि दो बिन्दुओं के बीच में कितनी दूरी तय की। बाद में गूगल मैप पर देखा तो उसने भी बताने से मना कर दिया। कहने लगा कि जहां सडक बनी है, केवल वहीं की दूरी बताऊंगा। अब गूगल मैप को कैसे समझाऊं कि सडक तो चूडधार के आसपास भी नहीं फटकती। हां, गूगल अर्थ बता सकता है लेकिन अपने नन्हे से लैपटॉप में यह कभी इंस्टाल नहीं हो पाया।

पराशर झील ट्रेकिंग- झील से कुल्लू तक

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 7 दिसम्बर, 2011 की दोपहर करीब बारह बजे हम पराशर झील से वापस चल पडे। हमें बताया गया कि यहां से छह किलोमीटर नीचे उतरकर बागी नामक गांव है जहां से मण्डी जाने वाली बस मिल जायेगी और यह भी पता चला कि बस का टाइम ढाई बजे है। उसके बाद साढे चार बजे अगली बस मिलेगी। अभी बारह सवा बारह का टाइम था और हम अगले दो घण्टे में छह किलोमीटर का फासला तय करके बागी पहुंच सकते थे। लेकिन आज की सबसे बडी दिक्कत थी भरत जो चल नहीं पा रहा था।  पराशर झील एक ऐसी जगह पर स्थित है जहां से लौटकर वापस आने के लिये कम से कम चार रास्ते हैं और चारों नीचे ही उतरते हैं। एक तो वही है जिससे हम आये थे यानी पण्डोह की तरफ, दूसरा तुंगा माता से होकर ज्वालापुर की तरफ, तीसरा कच्चा रास्ता बागी-कटौला की तरफ और चौथा यानी पक्की सडक बागी-कटौला की तरफ। सडक से बागी 18 किलोमीटर दूर है जबकि पैदल रास्ते से सीधे नीचे उतरते जाओ तो छह किलोमीटर में ही मामला सुलट जाता है।

चूडधार यात्रा- 2

इस यात्रा-वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 9 मई 2014, शुक्रवार आलू के परांठे खाने की इच्छा थी लेकिन इस समय यहां आलू न होने के कारण यह पूरी न हो सकी। इसलिये सादे परांठों से ही काम चलाना पडा। अभी हवा नहीं चल रही थी और मौसम भी साफ था लेकिन हो सकता है कि कुछ समय बाद हवा भी चलने लगे और मौसम भी बिगडने लगे। निकलने से पहले चेहरे पर थोडी सी क्रीम लगा ली। ट्रैकिंग पोल जो अभी तक बैग में ही था, अब बाहर निकाल लिया। आज मुझे बर्फ में एक लम्बा सफर तय करना है। साढे आठ बजे चल पडा। तीसरी से चूडधार की दूरी छह किलोमीटर है लेकिन खतरनाक रास्ता होने के कारण मैं इसे चार घण्टे में पार कर लेने की सोच रहा था। तीन घण्टे वापस आने में लगेंगे। यानी शाम चार बजे तक यहां लौट आऊंगा। नोहराधार से कल यहां तक आने में पांच घण्टे लगे थे, तीन घण्टे में यहां से नोहराधार जा सकता हूं। इसलिये आज रात को नोहराधार में ही रुकने की कोशिश करूंगा।