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दक्षिण भारत यात्रा: बादामी भ्रमण

11 फरवरी 2019 कर्नाटक कर्क रेखा के पर्याप्त दक्षिण में है। कर्क रेखा के दक्षिण का समूचा भारत उष्ण कटिबंध में स्थित है। इस क्षेत्र की खासियत होती है कि यहाँ गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है। उधर कर्क रेखा के उत्तर में यानी उत्तर भारत में भयानक शीतलहर चल रही थी और हिमालय में तो बर्फबारी के कई वर्षों के रिकार्ड टूट रहे थे। और इधर हम गर्मी से परेशान थे। और हम एक-दूसरे से पूछ भी रहे थे और इल्जाम भी लगा रहे थे - “इसी मौसम में साउथ आना था क्या?” तो हमने तय किया था कि अभी चूँकि हमें साउथ में कम से कम एक महीना और रहना है, इसलिए गर्मी तो परेशान करेगी ही। और इससे बचने का सर्वोत्तम तरीका था कि केवल सुबह और शाम के समय ही घूमने के लिए बाहर निकलो। दोपहर को कमरे में रहो। यहाँ तक कि दोपहर को कभी बाइक भी नहीं चलानी। इसी के मद्देनजर आज की योजना थी - सुबह छह बजे से दोपहर दस-ग्यारह बजे तक बादामी घूमना है, शाम चार बजे तक आराम करना है और चार बजे के बाद ऐहोल की तरफ निकल जाना है और साढ़े पाँच बजे तक पट्टडकल पहुँचना है। इन सभी की दूरियाँ बहुत ज्यादा नहीं हैं। बादामी में एक तालाब है - अगस्त्य त...

टाइगर फाल और लाखामंडल की यात्रा

1 अक्टूबर 2018 आज मैं सुबह सवेरे ही उठ गया था। इसका कारण था कि आज नाश्ते में पकौड़ियाँ बनवानी थीं, क्योंकि होटल के मालिक रोहन राणा को आलू के पराँठे बनाने नहीं आते। लेकिन सुबह सवेरे आठ बजे जब तक मैं उठा, तब तक पता नहीं किसने गोभी के पराँठे बनाने को कह दिया था। आज एहसास हुआ कि मुझसे पहले उठने वाले लोग भी इस दुनिया में होते हैं। और जब गोभी के पराँठे सामने आए, तो उनमें न गोभी थी और न ही पराँठा था। कतई पापड़ थे, जिनका नाम गोभी-पराँठा पापड़ रख देना चाहिए। यहाँ से चले तो सीधे पहुँचे चकराता बाजार में। असल में परसों झा साहब ने बताया था कि चकराता बाजार में फलां दुकान पर सबसे अच्छा पहाड़ी राजमा मिलता है, तो ग्रुप की महिलाओं ने खत्म हो जाने तक राजमा खरीद लिया। मुझे एक कोने में बिस्कुट का खुला पैकेट रखा मिल गया, सबको एक-एक बिस्कुट बाँटकर पुण्य कमा लिया। लेकिन सबसे अच्छा लगा गोल्डन एप्पल। सुनहरा सेब। वाह! एकदम नरम और मीठा।

मेघालय यात्रा - गार्डन ऑफ केव, चेरापूंजी का एक अनोखा स्थान

11 फरवरी 2018 ठीक तीन बजे हम थे ‘गार्डन ऑफ केव’ के द्वार पर। पास में ही कुछ स्थानीय लोग पिकनिक मना रहे थे और हिंदी गानों पर थिरक रहे थे। यहीं द्वार के पास एक महिला पकौड़ियाँ तल रही थीं। चाय और पकौड़ी। यह स्थान एक आश्‍चर्यजनक जगह है। सबसे शानदार है एक गुफा की छत में छेद और उससे नीचे गिरता पानी। पानी गुफा में बीचोंबीच गिरता है। यानी गुफा के भीतर जलप्रपात। फिलहाल बहुत थोड़ा पानी गिर रहा था। बारिश में तो वाकई दर्शनीय हो जाता होगा यह। इसके अलावा कुछ और भी जलप्रपात हैं। पूरे ‘गार्डन’ में पैदल घूमने के लिए पक्का रास्ता बना है। यह स्थान भी बड़ा पसंद आया।

मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी

11 फरवरी 2018 मॉसमाई केव - सन्नाटा। हर तरफ सन्नाटा। रविवार होने के कारण लोगों की छुट्‍टी थी। दुकान, होटल सब बंद। फिर भी कुछ खुले हुए। जो भी खुले थे, उनमें चाय आदि ले लेने में समझदारी थी। हम साढ़े आठ बजे मॉसमाई पहुँच गए। टिकट काउंटर बंद था। झाँककर भी देखा, कोई नहीं। कहीं गुफा भी तो बंद नहीं है! पार्किंग में बाइक खड़ी कर दी। पार्किंग के चारों ओर रेस्टोरेंट हैं। एक-दो के सामने एक-दो जने बैठे थे। उन्हें हमारी उपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ा। यह सन्नाटा अजीब-सा लगा। अरे भाई, कोई तो हमें टोक लो। एक जगह लिखा था - वेलकम टू मॉसमाई केव। हम उसी तरफ चल दिए। एक रेस्टोरेंट के सामने दो बंगाली बैठे दिखे - धूप में इत्मीनान से। तभी बगल में एक स्थानीय बूढ़े ने हमें टोका। उसने क्या कहा, यह तो समझ नहीं आया, लेकिन बड़ी खुशी मिली। कोई और मौका होता, तो हम अनसुनी करके आगे बढ़ जाते, लेकिन अब रुक गए। “क्या? व्हाट?” मैंने पूछा। “टेन मिनट्स।” “टेन मिनट्स क्या?”

धराली सातताल ट्रैक, गुफा और झौपड़ी में बचा-कुचा भोजन

ये पराँठे बच गए हैं... इन्हें कौन खाएगा?... लाओ, मुझे दो... 24 जून 2018 कल किसी ने पूछा था - सुबह कितने बजे चलना है? अगर सुबह सवेरे पाँच बजे मौसम खराब हुआ, तो छह बजे तक निकल पड़ेंगे और अगर मौसम साफ हुआ, तो आराम से निकलेंगे। क्यों? ऐसा क्यों? क्योंकि सुबह मौसम खराब रहा, तो दोपहर से पहले ही बारिश होने के चांस हैं। ऊपर सातताल पर सिर ढकने के लिए कुछ भी नहीं है। तो इसीलिए आज मुझे भी पाँच बजे उठकर बाहर झाँकना पड़ा। मौसम साफ था, तो लंबी तानकर फिर सो गया। ... आप सभी ने पराँठे खा लिए ना? हमने ऊपर सातताल में झील किनारे बैठकर खाने को कुछ पराँठे पैक भी करा लिए हैं और स्वाद बनाने को छोटी-मोटी और भी चीजें रख ली हैं। अभी दस बजे हैं। धूप तेज निकली है। कोई भी आधी बाजू के कपड़े नहीं पहनेगा, अन्यथा धूप में हाथ जल जाएगा। संजय जी, आप बिटिया को फुल बाजू के कपड़े पहनाइए। क्या कहा? फुल बाजू के कपड़े नहीं हैं? तो तौलिया ले लीजिए और इसके कंधे पर डाल दीजिए। हाथ पर धूप नहीं पड़नी चाहिए। और अब सभी लोग आगे-आगे चलो। मैं पीछे रहूँगा। बहुत आगे मत निकल जाना। निकल जाओ, तो थोड़ी-थोड़ी देर में हमारी प्रतीक्षा करना। सभी साथ ही...

पाताल भुवनेश्वर की यात्रा

13 जून 2017 हम मुन्स्यारी में थे और सोते ही रहे, सोते ही रहे। बारह बजे उठे। आधी रात के समय यहाँ बड़ी चहल-पहल मची थी। गाड़ी भरकर पर्यटक आये थे। उनकी गाड़ी कहीं ख़राब हो गयी थी तो लेट हो गये। और उन्होंने जो ऊधम मचाया, उसका नतीज़ा यह हुआ कि हम दोपहर बारह बजे तक सोते रहे। उठे तो आसमान में बादल थे और बर्फ़ीली चोटियों का ‘ब’ भी नहीं दिख रहा था। आज हमें मुन्स्यारी के आसपास ही घूम-घामकर वापसी के लिये चल देना था और थल के आसपास कहीं रुकना था। अब साफ़ मौसम नहीं था तो मुन्स्यारी घूमने का इरादा त्याग दिया और वापस चल दिये। बड़े दिनों से इच्छा थी मुन्स्यारी देखने की। वो इच्छा तो पूरी हो गयी, लेकिन घूम नहीं पाये। इच्छा कहीं न कहीं अधूरी भी रह गयी। इसे पूरा करने फिर कभी आयेंगे।

पचमढी: पाण्डव गुफा, रजत प्रपात और अप्सरा विहार

20 अगस्त 2015 की रात नौ बजे हम पचमढी पहुंचे। दिल्ली से चलते समय हमने जो योजना बनाई थी, उसके अनुसार हमें पचमढी नहीं आना था इसलिये यहां के बारे में कोई खोजबीन, तैयारी भी नहीं की। मुझे पता था कि यह एक सैनिक छावनी है। हमारे यहां लैंसडाउन और चकराता में भी सैनिक छावनियां हैं। दोनों के अनुभवों से मुझे सन्देह था कि इतनी रात को यहां कोई कमरा मिल जायेगा। लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ। अच्छी चहल-पहल थी और बाजार भी खुला था। सुमित यहां पहले आ चुका था, इसलिये हमारा मार्गदर्शक वही था। मेरे पास समय की कोई कमी नहीं थी। मेरी बस एक ही इच्छा थी कि वापसी में पातालकोट देखना है। आज हमारे पास बाइक है और पातालकोट यहां से ज्यादा दूर भी नहीं, इसलिये इस मौके को मैं नहीं छोडने वाला था। बाकी रही पचमढी, तो जैसे भी घुमाना है, घुमा।

अदभुत फुकताल गोम्पा

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें ।    जब भी विधान खुश होता था, तो कहता था- चौधरी, पैसे वसूल हो गये। फुकताल गोम्पा को देखकर भी उसने यही कहा और कई बार कहा। गेस्ट हाउस से इसकी दूरी करीब एक किलोमीटर है और यहां से यह विचित्र ढंग से ऊपर टंगा हुआ दिखता है। इसकी आकृति ऐसी है कि घण्टों निहारते रहो, थकोगे नहीं। फिर जैसे जैसे हम आगे बढते गये, हर कदम के साथ लगता कि यह और भी ज्यादा विचित्र होता जा रहा है।    गोम्पाओं के केन्द्र में एक मन्दिर होता है और उसके चारों तरफ भिक्षुओं के कमरे होते हैं। आप पूरे गोम्पा में कहीं भी घूम सकते हैं, कहीं भी फोटो ले सकते हैं, कोई मनाही व रोक-टोक नहीं है। बस, मन्दिर के अन्दर फोटो लेने की मनाही होती है। यह मन्दिर असल में एक गुफा के अन्दर बना है। कभी जिसने भी इसकी स्थापना की होगी, उसी ने इस गुफा में इस मन्दिर की नींव रखी होगी। बाद में धीरे-धीरे यह विस्तृत होता चला गया। भिक्षु आने लगे और उन्होंने अपने लिये कमरे बनाये तो यह और भी बढा। आज इसकी संरचना पहाड पर मधुमक्खी के बहुत बडे छत्ते जैसी है। पूरा गोम्पा मिट्टी, लकडी व प...

बोर्रा गुहलू यानी बोरा गुफाएं

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 17 जुलाई 2014 की दोपहर बारह बजे तक हम अरकू पहुंच गये थे। अब हमें सबसे पहले बोरा गुफाएं देखने जाना था, हालांकि अभी कुछ ही देर पहले हम ट्रेन से वहीं से होकर आये थे लेकिन इस बात को आप जानते ही हैं कि हमने ऐसा क्यों किया? विशाखापट्टनम से किरन्दुल तक का पूरा रेलमार्ग देखने के लिये। अरकू घाटी में सबसे प्रसिद्ध बोरा गुफाएं ही हैं, इसलिये उन्हें देखना जरूरी था। एक कमरा लिया और सारा सामान उसमें पटककर, 800 रुपये में एक ऑटो लेकर बोरा की ओर चल पडे। वैसे तो बसें भी चलती हैं लेकिन वे बोरा गुफाओं तक नहीं जातीं। जाती भी होंगी तो हमें इंतजार करना पडता। मुख्य अरकू-विशाखापट्टनम सडक से बोरा गुफाएं आठ-दस किलोमीटर हटकर हैं। अरकू से गुफाओं की दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। हमने सोचा कि ऑटो वाला इस पहाडी मार्ग पर कम से कम दो घण्टे एक तरफ के लगायेगा, लेकिन पट्ठे ने ऐसा ऑटो चलाया, ऐसा ऑटो चलाया कि हमारी रूह कांप उठी। पौन घण्टे में ही बोरा जाकर लगा दिया जबकि रास्ते में एक व्यू पॉइण्ट पर दस मिनट रुके भी थे। मैं उससे बार-बार कहता रहा कि भाई, हमें कोई जल्दी ...

अजन्ता गुफाएं

6 अगस्त 2013 दिन मंगलवार था जब मैं नई दिल्ली स्टेशन से झेलम एक्सप्रेस में बैठा। गाडी पौने दो घण्टे लेट थी। रास्ते में फरीदाबाद से कमल भी आने वाला था। यह दस दिनों का कार्यक्रम असल में एक ट्रेन यात्रा ही था। इसमें मुख्य रूप से पश्चिमी घाट की पहाडियों के दोनों ओर फैली रेलवे लाइनों पर यात्रा करनी थी। आरम्भ में इस यात्रा में मैं और प्रशान्त ही थे। कमल बाद में आया। कमल और मेरी मुलाकात पहली बार जब हुई, तभी अन्दाजा हो गया कि कमल के लिये यह यात्रा अच्छी नहीं हो सकती। कमल ने बताया था कि वह ज्यादातर कम्पनी के काम से ही घूमा है और उसमें भी ज्यादातर राजधानी एक्सप्रेस से। ऐसे में कैसे वह कई कई दिनों तक पैसेंजर ट्रेनों में बैठा रह सकता था? इसलिये उसकी मुश्किलों को कुछ कम करते हुए अपनी यात्रा में से मिराज से बिरूर तक की पैसेंजर यात्रा रद्द कर दी। उसके स्थान पर एक दिन गोवा को दे देंगे या फिर मालवन जायेंगे।

चादर ट्रेक- गुफा में एक रात

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 19 जनवरी 2013 आज शनिवार है। लेह वाली बस कल आयेगी। सुबह के दस बजे हैं, अभी अभी सोकर उठा हूं। हालांकि आंख तो दो घण्टे पहले ही खुल गई थी, लेकिन बस पडा रहा। घरवाले भी थोडी थोडी देर बाद दरवाजा खोलकर झांककर चले जाते हैं कि महाराज उठेगा तो चाय-नाश्ता परोसेंगे। उन्हें झांकते देखते ही तुरन्त अपनी आंख मीच लेता हूं। भारी भरकम पश्मीना कम्बल और उस पर रजाई; दोनों के नीचे दबे होने में एक अलग ही आनन्द मिल रहा है। साढे दस बजे उठ गया। तुरन्त चाय और रोटी आ गई। आज एक अलग तरह की रोटी बनी है। राजस्थान में जैसी बाटी होती है, उससे भी मोटी। लकडी की आग और अंगारों की कमी तो है नहीं, अच्छी तरह सिकी हुई है। इसे मक्खन और जैम के साथ खाया। आज का लक्ष्य है कि ग्रामीण जनजीवन को देखूंगा, कुछ फोटो खींचूंगा। अचानक अन्तरात्मा ने आदेश दिया- नेरक चलो। यह आदेश इतना तीव्र और तीक्ष्ण था कि शरीर के किसी भी अंग को संभलने और बचाव करने का मौका भी नहीं मिला। सभी ने चुपचाप इस आदेश को मान लिया। हालांकि पैरों ने कहा भी कि दर्द हो रहा है लेकिन आत्मा ने फौरन कहा-...

मुम्बई- गेटवे ऑफ इण्डिया और एलीफेण्टा गुफाएं

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें । 19 फरवरी 2012 की सुबह चार बजे मैं कुशीनगर एक्सप्रेस से कल्याण स्टेशन पर उतरा। कल शाम मैं भुसावल में था और अगले दिन यानी आज अजन्ता गुफा देखने जाने वाला था। लेकिन घटनाक्रम कुछ इस तरह बदला कि मुझे मुम्बई जाना पड गया। मुझे पता चला था कि अतुल मुम्बई में है। अतुल के साथ मैं दो बार हिमालय भ्रमण पर जा चुका हूं और हम दोनों की अच्छी बनती है। अतुल के साथ बिल्कुल देसी तरीके से मुम्बई घूमने में अलग ही आनन्द आने वाला था।  मैंने सोचा कि ट्रेन लोकमान्य तिलक पहुंच गई और मैं अपना तामझाम उठाकर अन्धेरे में बिना स्टेशन देखे ही उतर गया। अपने साथ वाली सवारियों को भी जगा दिया कि उठो, बम्बई आ गया। वे भी बेचारे हडबडी में जल्दी जल्दी उठे और सामान ट्रेन से बाहर निकाल लिया। जब तक हमारी आंख खुलती और कुछ पता चलता तब तक ट्रेन जा चुकी थी। तब पता चला कि अभी हम लोकमान्य से करीब 50 किलोमीटर पहले कल्याण स्टेशन पर हैं। अभी हम एक घण्टे की नींद और खींच सकते थे। मेरे पास वैसे तो सीएसटी तक का टिकट था, इसलिये इससे पहले कि मेरे द्वारा ट्रेन से निकाली गई सवार...

अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा वृत्तान्त शुरू करने से पहले कुछ आवश्यक जानकारी जरूरी है। मित्रों का आग्रह था कि मैं ये जानकारियां यहां जोड दूं। रास्ता वैसे तो आप आगे पढेंगे तो सारी जानकारी विस्तार से मिलती जायेगी, लेकिन फिर भी संक्षिप्त में: यात्रा पहलगाम से शुरू होती है। पहलगाम जम्मू और श्रीनगर से सडक मार्ग से अच्छी तरह जुडा है। पहलगाम (2100) से चन्दनवाडी (2800)= 16 किलोमीटर सडक मार्ग चन्दनवाडी (2800) से शेषनाग झील (3700)=16 किलोमीटर पैदल शेषनाग झील (3700) से महागुनस दर्रा (4200)=4 किलोमीटर पैदल महागुनस दर्रे (4200) से पंचतरणी (3600)=6 किलोमीटर पैदल पंचतरणी (3600) से अमरनाथ गुफा (3900)=6 किलोमीटर पैदल अमरनाथ गुफा (3900) से बालटाल (2800)=16 किलोमीटर पैदल

मणिकर्ण में ठण्डी गुफा और गर्म गुफा

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । मणिकर्ण में दो गुफाएं प्रसिद्ध हैं। एक तो है ठण्डी और दूसरी गर्म गुफा। ठण्डी गुफा मणिकर्ण से लगभग पांच किलोमीटर ऊपर है। असल में हुआ ये कि कहीं सही सी जगह ढूंढता-ढूंढता मैं ठण्डी गुफा जाने वाले रास्ते के पास एक पत्थर पर बैठ गया। बाजार से गुजरते समय एक किताब खरीद ली थी- मणिकर्ण के बारे में। पत्थर पर बैठा बैठा किताब पढने लगा। उस समय मुझे ये नहीं पता था कि यह रास्ता जाता कहां है। कोई लम्बा-चौडा रास्ता नहीं था, बस ऐसे ही पगडण्डी सी बनी है। मैने गौर किया कि इस रास्ते से लोगों का आना-जाना लगा है। एक से पूछा तो उसने बताया कि यह रास्ता ठण्डी गुफा जाता है। कितनी दूर है? बस एक-डेढ किलोमीटर है। चलो, निकल चलो। चढना शुरू किया।

शिव का स्थान है - शिवखोडी

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । एक बार की बात है। एक असुर था- भस्मासुर। उसने शिवजी से वरदान ले लिया था कि वो जिसके सिर पर भी हाथ रखेगा, भस्म हो जायेगा। इसका पहला प्रयोग उसने शिवजी पर ही करना चाहा। शिवजी की जब जान पर बन आयी तो शिवजी जान बचाकर दौडे। लेकिन भस्मासुर भी कोई लंगडा नही था, शिवजी का पीछा किया। वे एक गुफा में जा घुसे। फिर अपने त्रिशूल से गुफा के अन्दर ही संकरा सा रास्ता बनाते बनाते और अन्दर घुसते रहे। हां, उन्होने इस गुफा का रास्ता भी बन्द कर दिया था। भस्मासुर बाहर ही बैठ गया। कभी ना कभी तो बाहर निकलेंगे ही। शिवजी नहीं निकले। फिर आये विष्णुजी, माता पार्वती का वेश बनाकर। भस्मासुर मोहित हो गया। बोला कि हे पार्वती, मुझसे विवाह करो। पार्वती ने शर्त रख दी कि अगर तुम भोले शंकर की तरह ताण्डव नृत्य करो, तो विवाह हो सकता है। भस्मासुर बोला कि ताण्डव तो मुझे आता ही नही है। पार्वती ने कहा कि, मुझे आता है, मेरे साथ करो। भस्मासुर खुश। पार्वती की नकल करने लगा। जैसे ही पर्वती ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा, भस्मासुर ने भी ऐसा ही किया और भस्मासुर ध्वस्त।

वैष्णों देवी यात्रा

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । वैष्णों देवी गए और फिर आये, आते ही एक शुभ काम हो गया। खैर, मेरे साथ अभी तक आप जम्मू मेल से सफ़र कर रहे हो, पानीपत से निकलते ही खर्राटे भरने लगे हो। जागने पर क्या हुआ, ये बताऊंगा मैं बाद में, पहले एक खुशखबरी। हमने एक कंप्यूटर खरीद लिया है। अपनी खाट पर बैठे-बैठे ही रजाई की भुक्कल मारकर (ओढ़कर), गोद में कीबोर्ड रखकर, बराबर में माऊस रखकर ई-आनन्द लेना शुरू कर दिया है। लेकिन सुख है, तो दुःख भी है। अरे भाई, एक कंजूस की जेब से जब पैसा निकलता है तो दुःख तो होगा ही। कोई मामूली रकम नहीं, पूरे पांच अंकों में, वो भी एक ही झटके में। चलो खैर, वापस जम्मू मेल में पहुँचते हैं, और देखते हैं कहाँ पहुँच गए।

करोल टिब्बा और पांडव गुफा

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । ... अभी तक आपने पढ़ा कि मैं अकेला ही सोलन जा पहुंचा। यहाँ से आगे करोल के जंगलों में एक कॉलेज का ग्रुप मिल गया। और मैं भी उस ग्रुप का हिस्सा बन गया। फिर हम जंगल में भटक गए लेकिन फिर भी दो घंटे बाद करोल के टिब्बे पर पहुँच ही गए। अब पढिये आगे:- टिब्बा यानी पहाड़ की चोटी पर छोटा सा समतल भाग। मेरे अंदाज से इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 2500 मीटर से ज्यादा ही होगी। पेडों पर बरफ के निशान स्पष्ट दिख रहे थे। यानी कि शिमला में बरफ पड़े या ना पड़े यहाँ जरूर पड़ती है। इसके आस पास इसके बराबर की चोटी नहीं है। इस कारण हवा पूरे जोश से बह रही थी - पेडों व झाडियों के बीच से सीटी बजाते हुए।

नीलकंठ महादेव और झिलमिल गुफा, ऋषिकेश

अभी कुछ ही दिन पहले धुन सवार हुई कि नीलकंठ चलें। मैंने ख़ुद ही दिन भी तय कर लिया कि इस इतवार को जाऊँगा। अपना तो एक ही ध्येय वाक्य है- चल अकेला चल अकेला। फिर भी टोकने वाले अंदाज में सभी दोस्तों को टोक डाला। कोई भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ। कोई बात नहीं, यह मुसाफिर जाट किसी की मर्जी का मोहताज नहीं है। नीलकंठ जाना थोड़ा दुर्गम भी है और सुगम भी। पैदल जायें तो दुर्गम और बेहद थकाऊ व खतरनाक। ऋषिकेश से चौदह किलोमीटर की अनवरत खड़ी चढाई। कोई अपने को कितना भी तीसमार खां समझता हो, पैदल जाने में तो फूँक निकल जाती है। दूसरा रास्ता जीप वाला है, जो करीब तीस किलोमीटर पड़ता है।