29 सितंबर 2018... जब भी सिर मुंडाते ही ओले पड़ने लगें, तो समझना कि अपशकुन होगा। पता नहीं होगा या नहीं होगा, लेकिन हमें यह गाड़ी बिल्कुल भी पसंद नहीं आई। दिल्ली से ही राज कुमार सुनेजा जी, सिरसा से डॉ. स्वप्निल गर्ग सर, रोहिणी से डॉ. विवेक पाठक और उनके बच्चे, गुड़गाँव से निशांत खुराना, कानपुर से शिखा गुप्ता इतनी सुबह हमारे यहाँ आ चुके थे। जैसे ही इन्होंने बस में कदम रखा, सबसे पहले सामना टायर से हुआ। और आगे बढ़े तो सीट-कवर के चीथड़ों के बीच सीट ढूँढ़ना मुश्किल हो गया। सीटों पर पड़ी चूहों की गोल-गोल टट्टियों को कुछ फूँक से और कुछ हाथ से साफ करना पड़ा। ड्राइवर अभी-अभी उठकर आया था और तकिये में से सबसे ज्यादा मैली शर्ट निकालकर लाया था। और कुछ ही देर में शालिनी जी भी आने वाली हैं... हे भगवान! आज रक्षा करना। पहली बार टेम्पो ट्रैवलर में किसी ग्रुप को ले जा रहे हैं, और पहली ही बार यह दिन देखना पड़ रहा है। साढ़े सात बजे बस चली तो मैं सबसे पीछे वाली सीट पर मुँह छुपाए बैठा था और बाकी सब चुप बैठे थे। शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन से ठेके वाले तिराहे तक पहुँचते-पहुँचते मुझे थोड़ी अक्ल आई... जिसके माध्यम से यह बस ...
नीरज मुसाफिर का यात्रा ब्लॉग