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मानसून में बस्तर के जलप्रपातों की सैर

13 अगस्त 2019 यदि आपके मन में छत्तीसगढ़ और बस्तर का नाम सुनते ही डर समा जाता है और आप स्वयं, अपने बच्चों को और अपने मित्रों को बस्तर जाने से रोकते हैं, तो आप एक नंबर के डरपोक इंसान हैं और दुनिया की वास्तविकता को आप जानना नहीं चाहते। अपनी पूरी जिंदगी अपने घर में, अपने ऑफिस में और इन दोनों स्थानों को जोड़ने वाले रास्ते में ही बिता देना चाहते हैं। जब-जब भी छत्तीसगढ़ का नाम आता है, नक्सलियों का जिक्र भी अनिवार्य रूप से होता है। और आप डर जाते हैं। मैं दाद देना चाहूँगा कंचन सिंह को कि वह नहीं डरी। वह अपने एक फेसबुक मित्र (मैं और दीप्ति) और एक उसके भी मित्र (सुनील पांडेय) के साथ बस्तर की यात्रा कर रही थी। उसके सभी (अ)शुभचिंतक डरे हुए होंगे और हो सकता है कि उसने सबको अपने छत्तीसगढ़ में होने की बात बता भी न रखी हो। वह अपनी इस यात्रा को हर पल खुलकर जी रही थी और आज जब तक हम सब सोकर उठे, तब तक वह दंतेवाड़ा शहर की बाहरी सड़क पर चार किलोमीटर पैदल टहलकर आ चुकी थी। उसने सड़क पर एक साँप देखा था, जो कंचन के होने का आभास मिलते ही भाग गया था। दंतेवाड़ा से गीदम और बारसूर होते हुए हम जा रहे थे चित्र...

टाइगर फाल और लाखामंडल की यात्रा

1 अक्टूबर 2018 आज मैं सुबह सवेरे ही उठ गया था। इसका कारण था कि आज नाश्ते में पकौड़ियाँ बनवानी थीं, क्योंकि होटल के मालिक रोहन राणा को आलू के पराँठे बनाने नहीं आते। लेकिन सुबह सवेरे आठ बजे जब तक मैं उठा, तब तक पता नहीं किसने गोभी के पराँठे बनाने को कह दिया था। आज एहसास हुआ कि मुझसे पहले उठने वाले लोग भी इस दुनिया में होते हैं। और जब गोभी के पराँठे सामने आए, तो उनमें न गोभी थी और न ही पराँठा था। कतई पापड़ थे, जिनका नाम गोभी-पराँठा पापड़ रख देना चाहिए। यहाँ से चले तो सीधे पहुँचे चकराता बाजार में। असल में परसों झा साहब ने बताया था कि चकराता बाजार में फलां दुकान पर सबसे अच्छा पहाड़ी राजमा मिलता है, तो ग्रुप की महिलाओं ने खत्म हो जाने तक राजमा खरीद लिया। मुझे एक कोने में बिस्कुट का खुला पैकेट रखा मिल गया, सबको एक-एक बिस्कुट बाँटकर पुण्य कमा लिया। लेकिन सबसे अच्छा लगा गोल्डन एप्पल। सुनहरा सेब। वाह! एकदम नरम और मीठा।

मेघालय यात्रा - गार्डन ऑफ केव, चेरापूंजी का एक अनोखा स्थान

11 फरवरी 2018 ठीक तीन बजे हम थे ‘गार्डन ऑफ केव’ के द्वार पर। पास में ही कुछ स्थानीय लोग पिकनिक मना रहे थे और हिंदी गानों पर थिरक रहे थे। यहीं द्वार के पास एक महिला पकौड़ियाँ तल रही थीं। चाय और पकौड़ी। यह स्थान एक आश्‍चर्यजनक जगह है। सबसे शानदार है एक गुफा की छत में छेद और उससे नीचे गिरता पानी। पानी गुफा में बीचोंबीच गिरता है। यानी गुफा के भीतर जलप्रपात। फिलहाल बहुत थोड़ा पानी गिर रहा था। बारिश में तो वाकई दर्शनीय हो जाता होगा यह। इसके अलावा कुछ और भी जलप्रपात हैं। पूरे ‘गार्डन’ में पैदल घूमने के लिए पक्का रास्ता बना है। यह स्थान भी बड़ा पसंद आया।

मेघालय यात्रा - चेरापूंजी में नोह-का-लिकाई प्रपात और डबल रूट ब्रिज

10 फरवरी 2018 “एक महिला थी और नाम था का-लिकाई। उसने दूसरी शादी कर ली। पहले पति से उसे एक लड़की थी। तो उसका दूसरा पति उस लड़की से नफरत करता था। एक बार महिला बाहर से काम करके घर लौटी तो देखा कि पहली बार उसके पति ने उसके लिए मीट बनाया और परोसा भी। महिला बड़ी खुश हुई और साथ बैठकर भोजन कर लिया। बाद में उसे बाल्टी में कुछ उंगलियाँ मिलीं। उसे समझते देर नहीं लगी कि ये उंगलियाँ उसकी लड़की की हैं और उसके दूसरे पति ने लड़की को मार दिया है। इससे महिला बड़ी परेशान हुई और पास के झरने में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। बाद में उस झरने का नाम पड़ गया ‘नोह-का-लिकाई’, अर्थात का-लिकाई की छलांग।” यह कहानी थी नोह-का-लिकाई जलप्रपात की, जो वहाँ लिखी हुई थी। इस जलप्रपात को भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात माना जाता है। शुष्क मौसम होने के बावजूद भी एक पतली-सी जलधारा नीचे गिर रही थी। जलप्रपात बारिश में ही दर्शनीय होते हैं। यह भी बारिश में ही देखने योग्य है, लेकिन अब भी चूँकि इसमें पानी था, तो अच्छा लग रहा था। यहाँ ज्यादा देर नहीं रुके। वापस चेरापूंजी पहुँचे और ‘डबल रूट ब्रिज’ के लिए रवाना हो गए।

मेघालय यात्रा - जोवाई से डौकी की सड़क और क्रांग शुरी जलप्रपात

8 फरवरी 2018 जोवाई से डौकी जाने के लिए जिलाधिकारी कार्यालय के सामने से दाहिने मुड़ना था, लेकिन यहाँ बड़ी भीड़ थी। मेघालय में चुनावों की घोषणा हो चुकी थी और नामांकन आदि चल रहे थे। उसी के मद्‍देनजर शायद यहाँ भीड़ हो। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि हमें दाहिने डौकी की ओर जाता रास्ता नहीं दिखा और हम सीधे ही चलते रहे। हालाँकि भीड़ एकदम शांत थी और शोर-शराबा भी नहीं था। आगे निकलकर एक महिला से रास्ते की दिशा में इशारा करके पूछा - “डौकी?” उन्होंने अच्छी तरह नहीं सुना, लेकिन रुक गईं। मैंने फिर पूछा - “यह रास्ता डौकी जाता है?” “इधर डौकी नाम की कोई जगह नहीं है।” उन्होंने टूटी-फूटी हिंदी-अंग्रेजी में कहा। हमें नहीं पता था, ये लोग ‘डौकी’ को क्या कहते हैं। मैंने तो अंग्रेजी वर्तनी पढ़कर अपनी सुविधानुसार ‘डौकी’ उच्चारण करना शुरू कर दिया था। “डावकी?” “नहीं मालूम।” “डाकी?”, “डकी?”, “डेकी?”, “डूकी?”, “डबकी?” हर संभावित उच्चारण बोल डाला, लेकिन उन्हें समझ नहीं आया। आखिरकार गूगल मैप का सहारा लेना पड़ा। तब पता चला कि हम दूसरे रास्ते पर आ गए हैं।

टाइगर फाल और शराबियों का ‘एंजोय’

8 जून 2018 सुमित ने तार लगाकर अपनी बुलेट स्टार्ट की। अब जब भी इसे वह इस तरह स्टार्ट करता, हम खूब हँसते। “भाई जी, एक बात बताओ। त्यूणी वाली रोड कैसी है?” “एकदम खराब है जी।” “कहाँ से कहाँ तक खराब है?” “बस यहीं से खराब स्टार्ट हो जाती है और 15 किलोमीटर तक खराब ही है।” हमें यही सुनना था और हम चकराता की ओर चल पड़े। अगर त्यूणी वाली सड़क अच्छी हालत में होती, तो हम आज हनोल और वहाँ का चीड़ का जंगल देखते हुए पुरोला जाते। आपको अगर वाकई चीड़ के अनछुए जंगल देखने हैं तो त्यूणी से पुरोला की यात्रा कीजिए। धरती पर जन्म लेना सफल न हो जाए, तो कहना! और अगर देवदार देखना है, तो लोखंडी है ही। लोखंडी से त्यूणी की ओर ढलान है। कल विकासनगर में उदय झा साहब ने बता ही दिया था कि यह ढलान काफी तेज है और पथरीला कच्चा रास्ता और कीचड़ मोटरसाइकिल के लिए समस्या पैदा करेगा। फिर हमारा जाना भी कोई बेहद जरूरी तो था नहीं। क्यों कीचड़ में गिरने का रिस्क उठाएँ? टाइगर फाल ही चलो। आखिर में जाना तो गंगोत्री है, चाहे पुरोला से जाओ या लाखामंडल से। चकराता न जाकर टाइगर फाल वाली सड़क पर मुड़ गए। जून का महीना था और टूरिस्टों से यह सड़क भरी पड़ी ...

पचमढी: पाण्डव गुफा, रजत प्रपात और अप्सरा विहार

20 अगस्त 2015 की रात नौ बजे हम पचमढी पहुंचे। दिल्ली से चलते समय हमने जो योजना बनाई थी, उसके अनुसार हमें पचमढी नहीं आना था इसलिये यहां के बारे में कोई खोजबीन, तैयारी भी नहीं की। मुझे पता था कि यह एक सैनिक छावनी है। हमारे यहां लैंसडाउन और चकराता में भी सैनिक छावनियां हैं। दोनों के अनुभवों से मुझे सन्देह था कि इतनी रात को यहां कोई कमरा मिल जायेगा। लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ। अच्छी चहल-पहल थी और बाजार भी खुला था। सुमित यहां पहले आ चुका था, इसलिये हमारा मार्गदर्शक वही था। मेरे पास समय की कोई कमी नहीं थी। मेरी बस एक ही इच्छा थी कि वापसी में पातालकोट देखना है। आज हमारे पास बाइक है और पातालकोट यहां से ज्यादा दूर भी नहीं, इसलिये इस मौके को मैं नहीं छोडने वाला था। बाकी रही पचमढी, तो जैसे भी घुमाना है, घुमा।

शीतला माता जलप्रपात, जानापाव पहाडी और पातालपानी

शीतला माता जलप्रपात (विपिन गौड की फेसबुक से अनुमति सहित)    इन्दौर से जब महेश्वर जाते हैं तो रास्ते में मानपुर पडता है। यहां से एक रास्ता शीतला माता के लिये जाता है। यात्रा पर जाने से कुछ ही दिन पहले मैंने विपिन गौड की फेसबुक पर एक झरने का फोटो देखा था। लिखा था शीतला माता जलप्रपात, मानपुर। फोटो मुझे बहुत अच्छा लगा। खोजबीन की तो पता चल गया कि यह इन्दौर के पास है। कुछ ही दिन बाद हम भी उधर ही जाने वाले थे, तो यह जलप्रपात भी हमारी लिस्ट में शामिल हो गया।    मानपुर से शीतला माता का तीन किलोमीटर का रास्ता ज्यादातर अच्छा है। यह एक ग्रामीण सडक है जो बिल्कुल पतली सी है। सडक आखिर में समाप्त हो जाती है। एक दुकान है और कुछ सीढियां नीचे उतरती दिखती हैं। लंगूर आपका स्वागत करते हैं। हमारा तो स्वागत दो भैरवों ने किया- दो कुत्तों ने। बाइक रोकी नहीं और पूंछ हिलाते हुए ऐसे पास आ खडे हुए जैसे कितनी पुरानी दोस्ती हो। यह एक प्रसाद की दुकान थी और इसी के बराबर में पार्किंग वाला भी बैठा रहता है- दस रुपये शुल्क बाइक के। हेलमेट यहीं रख दिये और नीचे जाने लगे।

तीरथगढ जलप्रपात

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । बारह बजे के आसपास जगदलपुर से तीरथगढ के लिये चल पडे। इस बार हम चार थे। मेरे और सुनील जी के अलावा उनके भतीजे शनि, ममेरे भाई मनीष दुबे और भानजे प्रशान्त भी साथ हो लिये। लेकिन ये तो कुल पांच हो गये। चलो, पांच ही सही। शनि ने अपनी कार उठा ली। बारिश में भीगने का खतरा टला। कुछ दूर तक दन्तेवाडा वाली सडक पर चलना होता है, फिर एक रास्ता बायें सुकमा, कोंटा की ओर जाता है। इसी पर चल दिये। मुडते ही वही रेलवे लाइन पार करनी पडी जिससे अभी कुछ देर पहले मैं किरन्दुल से आया था। थोडा ही आगे चलकर कुख्यात जीरम घाटी शुरू हो जाती है जो तकरीबन चालीस किलोमीटर तक फैली है। पिछले साल नक्सलियों ने जोरदार आक्रमण करके 28 कांग्रेसी नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था। देश हैरान रह गया था इस आक्रमण को देखकर। यह पूरा इलाका पहाडी है और घना जंगल है। तीरथगढ जलप्रपात और कुटुमसर की गुफाएं इसी घाटी में स्थित हैं।

चित्रकोट जलप्रपात- अथाह जलराशि

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । चित्रधारा से निकले तो सीधे चित्रकोट जाकर ही रुके। जगदलपुर से ही हम इन्द्रावती नदी के लगभग समान्तर चले आ रहे थे। चित्रकोट से करीब दो तीन किलोमीटर पहले से यह नदी दिखने भी लगती है। मानसून का शुरूआती चरण होने के बावजूद भी इसमें खूब पानी था। इस जलप्रपात को भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। और वास्तव में है भी ऐसा ही। प्रामाणिक आंकडे तो मुझे नहीं पता लेकिन मानसून में इसकी चौडाई बहुत ज्यादा बढ जाती है। अभी मानसून ढंग से शुरू भी नहीं हुआ था और इसकी चौडाई और जलराशि देख-देखकर आंखें फटी जा रही थीं। हालांकि पानी बिल्कुल गन्दला था- बारिश के कारण। मोटरसाइकिल एक तरफ खडी की। सामने ही छत्तीसगढ पर्यटन का विश्रामगृह था। विश्रामगृह के ज्यादातर कमरों की खिडकियों से यह विशाल जलराशि करीब सौ फीट की ऊंचाई से नीचे गिरती दिखती है। मोटरसाइकिल खडी करके हम प्रपात के पास चले गये। जितना पास जाते, उतने ही रोंगटे खडे होने लगते। कभी नहीं सोचा था कि इतना पानी भी कहीं गिर सकता है। जहां हम खडे थे, कुछ दिन बाद पानी यहां तक भी आ जायेगा और प्रपात की चौडाई और भी बढ ...

चित्रधारा प्रपात, छत्तीसगढ

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 19 जुलाई 2014 आज हमें चित्रकोट जलप्रपात देखने जाना था। सुनील जी के बडे भाई यहां जगदलपुर में रहते हैं तो हमें उम्मीद थी कि यहां से हमें कुछ न कुछ साधन मिल ही जायेगा। घर पर वैसे तो मोटरसाइकिल और कार दोनों थीं लेकिन मौसम को देखते हुए मैं कार को ज्यादा वरीयता दे रहा था। लेकिन सुनील जी के भतीजे साहब कार देने में आनाकानी करने लगे। अपनी चीज आखिर अपनी होती है। उन्हें अच्छी तरह पता है कि सुनील जी एक बेहतरीन ड्राइवर हैं, स्वयं उससे भी ज्यादा सुरक्षित तरीके से गाडी चलाते हैं, कई बार रायपुर से जगदलपुर कार से आ भी चुके हैं लेकिन फिर भी उसे कहीं न कहीं सन्देह था। मैंने सुनील जी के कान में फुसफुसाकर कहा भी कि जैसे भी हो सके, कार ले लो। बारिश के मौसम में उससे बेहतरीन कुछ और नहीं है। दो दिन की बात है बस। सुनील जी ने समझा दिया कि भले ही मैं कितना ही अच्छा ड्राइवर क्यों न होऊं लेकिन इनके लिये अच्छा ड्राइवर नहीं हूं।

चापाराई प्रपात और कॉफी के बागान

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । बोरा गुफाओं से करीब चार किलोमीटर दूर कतिकी जलप्रपात है। वहां जाने वाला रास्ता बहुत ऊबड-खाबड है इसलिये ऑटो जा नहीं सकता था। हमें चार पहियों की कोई टैक्सी करनी पडती। उसके पैसे अलग से लगते, हमने इरादा त्याग दिया। लेकिन जब एक गांव में ऑटो वाले ने मुख्य सडक से उतरकर बाईं ओर मोडा, तो हम समझ गये कि यहां भी कुछ है। यह चापाराई जलप्रपात है। यह सडक एक डैड एण्ड पर खत्म होती है। हमें पैदल करीब सौ मीटर नीचे उतरना पडा और प्रपात हमारे सामने था। यह कोई ज्यादा लम्बा चौडा ऊंचा प्रपात नहीं था। फिर भी अच्छा लग रहा था। भीड नहीं थी और सबसे अच्छी बात कि यहां बस हमीं थे। कुछ और भी लोग थे लेकिन हमारे जाते ही वे वहां से चले गये। चारों तरफ बिल्कुल ग्रामीण वातावरण, खेत और जंगल। ऐसे में अगर यहां प्रपात न होता, बस जलधारा ही होती, तब भी अच्छा ही लगता।

लोंडा से तालगुप्पा रेलयात्रा और जोग प्रपात

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । हमें लोंडा से बिरूर तक रानी चेन्नम्मा एक्सप्रेस से जाना था और बिरूर से तालगुप्पा तक बैंगलोर-तालगुप्पा एक्सप्रेस से। रानी चेन्नम्मा एक्सप्रेस रात 02:48 पर बिरूर पहुंचती है जबकि वहां से तालगुप्पा एक्सप्रेस 03:25 पर मिलती है अर्थात 37 मिनट बाद। दोनों गाडियों में हमारा आरक्षण था। रानी चेन्नम्मा एक्सप्रेस एक घण्टे विलम्ब से लोंडा आई। यह आती तो कोल्हापुर से ही है, जो यहां से ज्यादा दूर नहीं लेकिन पता नहीं क्यों लेट हो गई। शायद सम्पर्क क्रान्ति की वजह से हुई होगी। सम्पर्क क्रान्ति लोंडा नहीं रुकती और हमारे सामने ही बैंगलोर की तरफ निकली थी। शुरू में हमारा आरक्षण आरएसी में था। चार्ट बनने के बाद मेरी और प्रशान्त की सीटें तो कन्फर्म हो गईं लेकिन कमल आरएसी में ही रहा। कमल हमारी तरह रेलयात्री नहीं है इसलिये यह हमारे लिये जश्न मनाने की बात थी। कोई दया नहीं करेंगे। फिर रात तीन बजे उठना भी है, इसलिये कन्फर्म बर्थ वाले सो गये। कमल की आरएसी बर्थ एक अन्य यात्री के साथ इसी डिब्बे में थी।

दूधसागर जलप्रपात

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 8 अगस्त 2013 की सुबह हम गोवा में थे। स्टेशन के पास ही एक कमरा ले रखा था। आज का पूरा दिन गोवा के नाम था। लेकिन मैंने सोच रखा था कि गोवा नहीं घूमूंगा। गोवा से मेरा पहला परिचय बडा ही भयानक हुआ जब मोटरसाइकिल टैक्सी वालों ने हमसे कल कहा था कि जेब में पैसे नहीं हैं तो गोवा घूमने क्यों आये? पैसे निकालो और मनपसन्द कमरा लो। तभी मन बना लिया था कि गोवा नहीं घूमना है। जहां पैसे का खेल होता हो, वहां मेरा दम घुटता है। प्रशान्त और कमल ने एक टूर बुक कर लिया। वे आज पूरे दिन टूर वालों की बस में घूमेंगे, मैं यहीं होटल में पडा रहूंगा। वैसे भी बाहर धूप बहुत तेज है। धूप में निकलते ही जलन हो रही है। जब वे चले गये तो ध्यान आया कि अगर इसी तरह चलता रहा हो मैं मडगांव-वास्को रेल लाइन पर नही घूम सकूंगा। आज मौका है। जेब में नेट है, नेट पर समय सारणी है। मडगांव से वास्को के लिये सवा एक बजे पैसेंजर जाती है। उससे वास्को जाकर वापस लौट आऊंगा। आज के लिये इतना काफी। अभी ग्यारह बजे हैं।

पोखरा- फेवा ताल और डेविस फाल

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 12 जुलाई 2012 की शाम पांच बजे तक मैं पोखरा पहुंच गया। मुझे पोखरा के बारे में बस इतना ही मालूम था कि यहां एक ताल है जिसका नाम फेवा ताल है। मैं पृथ्वी चौक के पास था। बारिश हो रही थी, इसलिये एक शेड में शरण ले ली। बारिश थमी तो बाहर निकला और एक टैक्सी वाले से पूछा कि फेवा ताल कितना दूर है। बोला कि छह किलोमीटर है, आओ बैठो, आठ सौ रुपये लगेंगे। मैं किसी टैक्सी वाले से इस तरह के प्रश्न नहीं पूछता हूं, लेकिन पृथ्वी चौक से काठमाण्डू रोड पर काफी दूर तक इन्हीं लोगों का साम्राज्य रहता है, तो पूछना पडा। काठमाण्डू की तरह यहां भी लोकल बस सेवा बडी अच्छी है- पोखरा मिनी माइक्रो बस सेवा। मुझे पूरी उम्मीद थी कि यहां से फेवा ताल के लिये कोई ना बस जरूर मिल जायेगी। मैं आज ताल के किनारे ही रुकना चाहता था। हालांकि ताल से दूर रुकने की अपेक्षा ताल के किनारे रुकना हमेशा महंगा होता है। किसी राह चलते आदमी से इस बारे में पूछा तो उसने बता दिया कि कहां से फेवा ताल की बस मिलेगी। बस मिलती, इससे पहले ही एक लडका मेरे पास आया और पूछा कि कमरा चाहिये? मैंने म...

कार्बेट म्यूजियम और कार्बेट फाल

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 23 मार्च 2012 और मैं था हल्द्वानी में। आज सबसे पहले मुझे कालाढूंगी जाना था। कालाढूंगी के बारे में उस समय जाने से पहले मेरी जानकारी बस इतनी ही थी कि यह रामनगर-नैनीताल के बीच में पडता है और यहां से नैनीताल की चढाई शुरू होती है। यह मेरे लिये एक साधारण जगह थी। यहां से मुझे खुरपा ताल जाने के लिये नैनीताल वाली बस पकडनी थी। और वापस आने के बाद कालाढूंगी एक खास जगह बन गई। और आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि मैंने कालाढूंगी देखा है। मैंने वो जंगल देखा है जहां जिम कार्बेट साहब पले-बढे और महान बने। मैंने नयागांव वाली सडक देखी है, नैनीताल वाली सडक देखी है और छोटी हल्द्वानी भी देखी है। इन जगहों का नाम जिम साहब अपनी किताब ‘जंगल लोर’ में बार बार लेते हैं। मैं कालाढूंगी गांव में उतर गया। यह हल्द्वानी-रामनगर के बीच में है। यहां एक तिराहा है जहां से एक सडक नैनीताल भी जाती है। मुझे नैनीताल वाली बस पकडनी थी। यहां उतरकर पता चला कि मुझसे थोडी सी गलती हो गई है। वो यह कि मुझे यहां से दो किलोमीटर आगे नैनीताल मोड पर उतरना था। गलती का प्रायश्चित दो ...

मसूरी झील और केम्पटी फाल

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । मन्दिर से निकलकर फिर मसूरी की तरफ चल पडे। रास्ते में एक जगह सडक के बराबर में ही गाडियां खडी दिखीं। तभी निगाह पडी- मसूरी झील। गाडी हमने भी साइड में लगा दी। यह एक कृत्रिम झील है जहां पैडल बोट का मजा लिया जा सकता है। हमने भी लिया। लेना पडता है अगर परिवार में हैं तो। जो होता मैं अकेला तो इस झील की तरफ देखता भी नहीं। और हां, एक बात बडी हास्यास्पद लगती है जब कोई फोटोग्राफर जिद करता है कि गढवाली ड्रेस में फोटो खिंचवा लो। पता नहीं क्या-क्या पहनाकर ‘शिकार’ को ऊपर से नीचे तक लाद दिया जाता है और दो घडे देकर ‘पनघट’ के किनारे बैठा दिया जाता है। एक घडा हाथ में और दूसरा सिर पर। कसम खाकर कह रहा हूं कि मैं गढवाल में काफी घूमा हूं, और ज्यादातर घुमक्कडी देहात में ही की है, लेकिन कभी भी ऐसी ड्रेस नहीं देखी। यहां तक कि कुमाऊं और हिमाचल में भी नहीं। और हां, एक घडा सिर पर रखकर दूसरा हाथ में लेकर तो पहाड पर चल ही नहीं सकते। अगर घडे की जगह घास या लकडी का गट्ठर होता तो कुछ बात बनती।

भागसू नाग और भागसू झरना, मैक्लोडगंज

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । हमारी करेरी झील की असली यात्रा शुरू होती है धर्मशाला से। 23 मई की आधी रात तक मैं, गप्पू और केवल राम योजना बनाने में ही लगे रहे। केवल राम ने पहले ही हमारे साथ जाने से मना कर दिया था। अब आगे का सफर मुझे और गप्पू को ही तय करना था। गप्पू जयपुर का रहने वाला है। एक दो बार हिमालय देख रखा है लेकिन हनीमून तरीके से। गाडी से गये और खा-पीकर पैसे खर्च करके वापस आ गये। जब मैंने करेरी झील के बारे में ‘इश्तिहार’ दिया तो गप्पू जी ने भी चलने की हामी भर दी थी। सुबह कश्मीरी गेट पर जब मैंने गप्पू को पहली बार देखा तो सन्देह था कि यह बन्दा करेरी तक साथ निभा पायेगा। क्योंकि महाराज भारी शरीर के मालिक हैं।