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देवदार के खूबसूरत जंगल में स्थित है बाहू और बालो नाग मंदिर

एक दिन की बात है मैं मोटरसाइकिल लेकर घियागी से बाहू की तरफ चला। इरादा था गाड़ागुशैनी और छाछगलू पास तक जाना। छाछगलू पास का नाम मैंने पहली बार तरुण गोयल से सुना था और इस नाम को मैं हमेशा भूल जाता हूँ। तब हमेशा गोयल साहब से पूछता हूँ और आज भी गोयल साहब से पूछने के बाद ही लिख रहा हूँ। उनसे पूछने का एक कारण और भी है कि वे इसे “छाछगळू” बोलते हैं। और इस तरह बोलते हैं जैसे मुँह में छाछ और गुड़ भरकर बोल रहे हों। तो मुझे यह उच्चारण सुनना बड़ा मजेदार लगता है और मैं बार-बार उनसे इसका नाम पूछता रहता हूँ। तो उस दिन मैं बाहू तक गया और सामने दिखतीं महा-हिमालय की चोटियों को देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। यह समुद्र तल से 2300 मीटर ऊपर है और एकदम सामने ये चोटियाँ दिखती हैं। जीभी और घियागी तो नीचे घाटी में स्थित हैं और वहाँ से कोई बर्फीली चोटी नहीं दिखती। तो यहाँ आकर ऐसा लगा जैसे रोज आलू खाते-खाते आज शाही पनीर मिल गया हो। जीभी से इसकी दूरी 10 किलोमीटर है और शुरू में बहुत अच्छी सड़क है, फिर थोड़ी खराब है, फिर और खराब है और आखिर में जब आप बाहू में खड़े होते हैं और कोई बस गुजर जाए, तो आप धूल से सराबोर हो ज...

एक यात्रा लोखंडी और मोइला बुग्याल की

29 सितंबर 2018... जब भी सिर मुंडाते ही ओले पड़ने लगें, तो समझना कि अपशकुन होगा। पता नहीं होगा या नहीं होगा, लेकिन हमें यह गाड़ी बिल्कुल भी पसंद नहीं आई। दिल्ली से ही राज कुमार सुनेजा जी, सिरसा से डॉ. स्वप्निल गर्ग सर, रोहिणी से डॉ. विवेक पाठक और उनके बच्चे, गुड़गाँव से निशांत खुराना, कानपुर से शिखा गुप्ता इतनी सुबह हमारे यहाँ आ चुके थे। जैसे ही इन्होंने बस में कदम रखा, सबसे पहले सामना टायर से हुआ। और आगे बढ़े तो सीट-कवर के चीथड़ों के बीच सीट ढूँढ़ना मुश्किल हो गया। सीटों पर पड़ी चूहों की गोल-गोल टट्टियों को कुछ फूँक से और कुछ हाथ से साफ करना पड़ा। ड्राइवर अभी-अभी उठकर आया था और तकिये में से सबसे ज्यादा मैली शर्ट निकालकर लाया था। और कुछ ही देर में शालिनी जी भी आने वाली हैं... हे भगवान! आज रक्षा करना। पहली बार टेम्पो ट्रैवलर में किसी ग्रुप को ले जा रहे हैं, और पहली ही बार यह दिन देखना पड़ रहा है। साढ़े सात बजे बस चली तो मैं सबसे पीछे वाली सीट पर मुँह छुपाए बैठा था और बाकी सब चुप बैठे थे। शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन से ठेके वाले तिराहे तक पहुँचते-पहुँचते मुझे थोड़ी अक्ल आई... जिसके माध्यम से यह बस ...

धराली सातताल ट्रैक, गुफा और झौपड़ी में बचा-कुचा भोजन

ये पराँठे बच गए हैं... इन्हें कौन खाएगा?... लाओ, मुझे दो... 24 जून 2018 कल किसी ने पूछा था - सुबह कितने बजे चलना है? अगर सुबह सवेरे पाँच बजे मौसम खराब हुआ, तो छह बजे तक निकल पड़ेंगे और अगर मौसम साफ हुआ, तो आराम से निकलेंगे। क्यों? ऐसा क्यों? क्योंकि सुबह मौसम खराब रहा, तो दोपहर से पहले ही बारिश होने के चांस हैं। ऊपर सातताल पर सिर ढकने के लिए कुछ भी नहीं है। तो इसीलिए आज मुझे भी पाँच बजे उठकर बाहर झाँकना पड़ा। मौसम साफ था, तो लंबी तानकर फिर सो गया। ... आप सभी ने पराँठे खा लिए ना? हमने ऊपर सातताल में झील किनारे बैठकर खाने को कुछ पराँठे पैक भी करा लिए हैं और स्वाद बनाने को छोटी-मोटी और भी चीजें रख ली हैं। अभी दस बजे हैं। धूप तेज निकली है। कोई भी आधी बाजू के कपड़े नहीं पहनेगा, अन्यथा धूप में हाथ जल जाएगा। संजय जी, आप बिटिया को फुल बाजू के कपड़े पहनाइए। क्या कहा? फुल बाजू के कपड़े नहीं हैं? तो तौलिया ले लीजिए और इसके कंधे पर डाल दीजिए। हाथ पर धूप नहीं पड़नी चाहिए। और अब सभी लोग आगे-आगे चलो। मैं पीछे रहूँगा। बहुत आगे मत निकल जाना। निकल जाओ, तो थोड़ी-थोड़ी देर में हमारी प्रतीक्षा करना। सभी साथ ही...

धराली सातताल ट्रैकिंग

12 जून 2018 मैं जब भी धराली के पास सातताल के बारे में कहीं पढ़ता था, तो गूगल मैप पर जरूर देखता था, लेकिन कभी मिला नहीं। धराली के ऊपर के पहाड़ों में, अगल के पहाड़ों में, बगल के पहाड़ों में, सामने के पहाड़ों में जूम कर-करके देखा करता, लेकिन कभी नहीं दिखा। इस तरह यकीन हो गया कि धराली के पास सातताल है ही नहीं। यूँ ही किसी वेबसाइट ने झूठमूठ का लिख दिया और बाकी वेबसाइटों ने उसे ही कॉपी-पेस्ट कर लिया। फिर एक दिन नफेराम यादव से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा - “हाँ, उधर सातताल झीलें हैं।” “झीलें? मतलब कई झीलें हैं?” “हाँ।” “लगता है आपने भी वे ही वेबसाइटें पढ़ी हैं, जो मैंने पढ़ी हैं। भाई, उधर कोई सातताल-वातताल नहीं है। अगर होती, तो सैटेलाइट से तो दिख ही जाती। फिर आप कह रहे हो कि कई झीलें हैं, तो एकाध तो दिखनी ही चाहिए थी।” “आओ चलो, तुम्हें दिखा ही दूँ।” उन्होंने गूगल अर्थ खोला। धराली और... “ये लो। यह रही एक झील।” “हाँ भाई, कसम से, यह तो झील ही है।” “अब ये लो, दूसरी झील।”

मोइला डांडा, बुग्याल और बुधेर गुफा

8 जून 2018 नाम रोहन राणा। इस होटल के मालिक का नाम। शानदार व्यक्तित्व। रौबीली मूँछें। स्थानीय निवासी। “भाई जी, आज हमें बुधेर केव जाना है।” “बुधेर केव? मतलब मोइला डांडा?” “मतलब?” “मतलब उसे हम मोइला डांडा कहते हैं।” मुझे यह जानकारी नहीं थी। अभी तक वो जगह मेरी नजरों में बुधेर केव ही थी, लेकिन अब इसे मैं मोइला डांडा कहूँगा। यह एक ‘डांडा’ है, इतना तो मुझे पता था, लेकिन इसका नाम मोइला है, यह नहीं पता था। “भाई जी, हम 12 बजे तक आ जाएँगे और तभी चेक-आउट करेंगे।” “नहीं भाई जी। आज होटल की कम्पलीट बुकिंग है। गुजराती लोगों ने इसे बुक किया हुआ है। अभी चेक-आउट कर देंगे, तो अच्छा रहेगा। सारा सामान हमने नीचे रेस्टोरेंट में रख दिया और बिस्कुट, नमकीन, पानी लेकर मोइला डांडे की ओर बढ़ चले। लोखंडी से तीन किलोमीटर तक कच्चा मोटर रास्ता है, जो फोरेस्ट रेस्ट हाउस के पास समाप्त हो जाता है। चौकीदार ने बताया कि इस रेस्ट हाउस की बुकिंग कालसी से होती है। यहाँ तक आने का रास्ता देवदार के घने जंगल से होकर है। वैसे यह जंगल देवदार का ही है या किसी और का, इसमें मुझे डाउट है। क्योंकि मेरा जैव-वनस्पति ज्ञान शून्य है। चीड़ और ...

कार्तिक स्वामी मंदिर

13 जुलाई 2017 रुद्रप्रयाग में दही समोसे खा रहे थे तो प्लान बदल गया। अब हम पोखरी वाले रास्ते से जाएंगे। उधर दो स्थान दर्शनीय हैं। और दोनों के ही नाम मैं भूल गया था। बाइक उधर ही मोड़ दी। अलकनन्दा पार करके दाहिने मुड़ गए। चढ़ाई शुरू हो गयी। मोबाइल ख़राब था और नक्शा सामानों में कहीं गहरे दबा हुआ था। जगह का नाम याद नहीं आया। कहीं लिखा भी नहीं मिला और किसी से पूछ भी नहीं सकते। बाद में ध्यान आया कि एक जगह तो कोटेश्वर महादेव थी। रुद्रप्रयाग के नज़दीक ही अलकनन्दा के किनारे। कितनी नज़दीक? पता नहीं। कितनी दूर? पता नहीं। हम चलते रहे। ऊँचाई बढ़ती रही और अलकनंदा गहरी होती चली गयी। दूरियाँ लिखी आ रही थीं - चोपता, पोखरी, गोपेश्वर इतने-इतने किलोमीटर। लेकिन उस मंदिर का जिक्र नही आया। सोच लिया कि पोखरी पहुँचकर पूछूँगा किसी से। शायद पोखरी के बाद है वो मंदिर।

देवरिया ताल

1 नवंबर, 2016 सुबह पौड़ी से बिना कुछ खाये-पीये चले थे, अब भूख लगने लगी थी। लेकिन खाना खायेंगे तो नींद आयेगी और मैं इस अवस्था में बाइक नहीं चलाना चाहता था। पीछे बैठी निशा को बड़ी आसानी से नींद आ जाती है और वह झूमने लगती है। इसलिये उसे भी भरपेट भोजन नहीं करने दूँगा। इसलिये हमारी इच्छा थी थोड़ी-बहुत पकौड़ियाँ चाय के साथ खाना। रुद्रप्रयाग में हमारी पकौड़ी खाने की इच्छा पूरी हो जायेगी। लेकिन रुद्रप्रयाग से आठ किलोमीटर पहले नारकोटी में कई होटल-ढाबे खुले दिखे। चहल-पहल भी थी, तो बाइक अपने आप ही रुक गयी। स्वचालित-से चलते हुए हम सबसे ज्यादा भीड़ वाले एक होटल में घुस गये और 60 रुपये थाली के हिसाब से भरपेट रोटी-सब्जी खाकर बाहर निकले। यहाँ असल में लंबी दूरी के जीप वाले रुकते हैं। जीप के ड्राइवरों के लिये अलग कमरा बना था और उनके लिये पनीर-वनीर की सब्जियाँ ले जायी जा रही थीं। बाकी अन्य यात्रियों के लिये आलू-गोभी की सब्जी, दाल-राजमा, कढी और चावल थे। हाँ, खीर भी थी। खीर एक कटोरी ही थी, बाकी कितना भी खाओ, सब 60 रुपये में। 

नचिकेता ताल

18 फरवरी 2016 आज इस यात्रा का हमारा आख़िरी दिन था और रात होने तक हमें कम से कम हरिद्वार या ऋषिकेश पहुँच जाना था। आज के लिये हमारे सामने दो विकल्प थे - सेम मुखेम और नचिकेता ताल।  यदि हम सेम मुखेम जाते हैं तो उसी रास्ते वापस लौटना पड़ेगा, लेकिन यदि नचिकेता ताल जाते हैं तो इस रास्ते से वापस नहीं लौटना है। मुझे ‘सरकुलर’ यात्राएँ पसंद हैं अर्थात जाना किसी और रास्ते से और वापस लौटना किसी और रास्ते से। दूसरी बात, सेम मुखेम एक चोटी पर स्थित एक मंदिर है, जबकि नचिकेता ताल एक झील है। मुझे झीलें देखना ज्यादा पसंद है। सबकुछ नचिकेता ताल के पक्ष में था, इसलिये सेम मुखेम जाना स्थगित करके नचिकेता ताल की ओर चल दिये। लंबगांव से उत्तरकाशी मार्ग पर चलना होता है। थोड़ा आगे चलकर इसी से बाएँ मुड़कर सेम मुखेम के लिये रास्ता चला जाता है। हम सीधे चलते रहे। जिस स्थान से रास्ता अलग होता है, वहाँ से सेम मुखेम 24 किलोमीटर दूर है।  उत्तराखंड के रास्तों की तो जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। ज्यादातर तो बहुत अच्छे बने हैं और ट्रैफिक है नहीं। जहाँ आप 2000 मीटर के आसपास पहुँचे, चीड़ का जंगल आरंभ हो जाता है। चीड़ के जंगल मे...

चंद्रबदनी मंदिर और लंबगांव की ओर

17 फरवरी 2016 ज्यादा विस्तार से नहीं लिखेंगे। एक तो यात्रा किये हुए अरसा हो गया है, अब वृत्तांत लिखने बैठा हूं तो वैसा नहीं लिखा जाता, जैसा ताजे वृत्तांत में लिखा जाता है। लिखने में तो मजा नहीं आता, पता नहीं आपको पढने में मजा आता है या नहीं। तो जामणीखाल से सुबह नौ बजे बाइक स्टार्ट कर दी और चंद्रबदनी की ओर मुड गये। चंद्रबदनी मैं पहले भी जा चुका हूं - शायद 2009 में। तब जामणीखाल तक हम बस से आये थे और यहां से करीब आठ-नौ किलोमीटर दूर चंद्रबदनी तक पैदल गये थे। पक्की अच्छी सडक बनी है। आज बीस मिनट लगे हमें चंद्रबदनी के आधार तक पहुंचने में। यहां सडक समाप्त हो जाती है और बाकी एक किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी होती है। यह दूरी भी तय हो गई। पक्का रास्ता बना है। लेकिन अच्छी चढाई है। चंद्रबदनी मंदिर की समुद्र तल से ऊंचाई करीब 2200 मीटर है। मंदिर के सामने पहुंचे तो वो नजारा दिखाई पडा, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। किन्नौर हिमालय से लेकर नंदादेवी तक की चोटियां स्पष्ट दिखाई दे रही थीं और चौखंबा इनके राजा की तरह अलग ही चमक रही थी। कुमाऊं में किसी ऊंचाई वाले स्थान से देखेंगे तो नंदादेवी और पंचचूली चोट...

जनवरी में नागटिब्बा-3

26 जनवरी 2016 सुबह उठे तो आसमान में बादल मिले। घने बादल। पूरी सम्भावना थी बरसने की। और बर्फबारी की भी। आखिर जनवरी का महीना है। जितना समय बीतता जायेगा, उतनी ही बारिश की सम्भावना बढती जायेगी। इसलिये जल्दी उठे और जल्दी ही नागटिब्बा के लिये चल भी दिये। इतनी जल्दी कि जिस समय हमने पहला कदम बढाया, उस समय नौ बज चुके थे। 2620 मीटर की ऊंचाई पर हमने टैंट लगाया था और नागटिब्बा 3020 मीटर के आसपास है। यानी 400 मीटर ऊपर चढना था और दूरी है 2 किमी। इसका मतलब अच्छी-खासी चढाई है। पूरा रास्ता रिज के साथ-साथ है। ऊपर चढते गये तो थोडी-थोडी बर्फ मिलने लगी। एक जगह बर्फ में किसी हथेली जैसे निशान भी थे। निशान कुछ धूमिल थे और पगडण्डी के पास ही थे। हो सकता है कि भालू के पंजों के निशान हों, या यह भी हो सकता है कि दो-चार दिन पहले किसी इंसान ने हथेली की छाप छोड दी हो।

जनवरी में नागटिब्बा-2

25 जनवरी 2016 साढे आठ बजे हम सोकर उठे। हम मतलब मैं और निशा। बाकी तो सभी उठ चुके थे और कुछ जांबाज तो गर्म पानी में नहा भी चुके थे। सहगल साहब के ठिकाने पर पहुंचे तो पता चला कि वे चारों मनुष्य नागलोक के लिये प्रस्थान कर चुके हैं। उन्हें आज ऊपर नहीं रुकना था, बल्कि शाम तक यहीं पन्तवाडी आ जाना था, इसलिये वे जल्दी चले गये। जबकि हमें आज ऊपर नाग मन्दिर के पास ही रुकना था, दूरी ज्यादा नहीं है, इसलिये खूब सुस्ती दिखाई। मेरी इच्छा थी कि सभी लोग अपना अपना सामान लेकर चलेंगे। दूरी ज्यादा नहीं है, इसलिये शाम तक ठिकाने पर पहुंच ही जायेंगे। अगर न भी पहुंचते, तो रास्ते में कहीं टिक जाते और कल वहीं सब सामान छोडकर खाली हाथ नागटिब्बा जाते और वापसी में सामान उठा लेते। लेकिन ज्यादातर सदस्यों की राय थी कि टैंटों और स्लीपिंग बैगों के लिये और बर्तन-भाण्डों और राशन-पानी के लिये एक खच्चर कर लेना चाहिये। सबकी राय सर-माथे पर। 700 रुपये रोज अर्थात 1400 रुपये में दो दिनों के लिये खच्चर होते देर नहीं लगी। जिनके यहां रात रुके थे, वे खच्चर कम्पनी भी चलाते हैं। बडी शिद्दत से उन्होंने सारा सामान बेचारे जानवर की पीठ पर ब...

जनवरी में नागटिब्बा-1

24 जनवरी 2016 दिसम्बर 2015 की लगभग इन्हीं तारीखों में हम तीन जने नागटिब्बा गये थे। वह यात्रा क्यों हुई थी, इस बारे में तो आपको पता ही है। मेरा काफी दिनों से एक यात्रा आयोजित करने का मन था। नवम्बर में ही योजना बन गई थी कि क्रिसमस के आसपास और गणतन्त्र दिवस के आसपास दो ग्रुपों को नागटिब्बा लेकर जाऊंगा। नागटिब्बा लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर है और यहां अच्छी खासी बर्फ पड जाया करती है। लेकिन इस बार पूरे हिमालय में कम बर्फबारी हुई है तो नागटिब्बा भी इससे अछूता नहीं रहा। दिसम्बर में हमें बर्फ नहीं मिली। फिर हमने देवलसारी वाला रास्ता पकड लिया और खूब पछताये। उस रास्ते में कहीं भी पानी नहीं है। हम प्यासे मर गये और आखिरकार नागटिब्बा तक नहीं पहुंच सके। वापस पंतवाडी की तरफ उतरे। इस रास्ते में खूब पानी है, इसलिये तय कर लिया कि जनवरी वाली यात्रा पन्तवाडी के रास्ते ही होगी। लेकिन पन्तवाडी की तरफ मुझे जिस चीज ने सबसे ज्यादा डराया, वो था उस रास्ते का ढाल। इसमें काफी ज्यादा ढाल है। नीचे उतरने से ही खूब पता चल रहा था। फिर अगर जनवरी में इस रास्ते से आयेंगे तो इसी पर चढना पडेगा। यही सोच-सोचकर मेरी सांस रुकी ...

नागटिब्बा ट्रैक-2

27 दिसम्बर 2015    सुबह उठे। बल्कि उठे क्या, पूरी रात ढंग से सो ही नहीं सके। स्थानीय लडकों ने शोर-शराबा और आपस में गाली-गलौच मचाये रखी। वे बस ऐसे ही मुंह उठाकर इधर आ गये थे। जैसे-जैसे रात बीतती गई, ठण्ड भी बढती गई। उनके पास न ओढने को कुछ था और न ही बिछाने को। वे ठण्ड से नहीं सो सके, हम शोर-शराबे से नहीं सो सके। हमने उन्हें परांठे और एक कम्बल दे दिया था। नहीं तो क्या पता वे हमारे साथ भी गाली-गलौच करने लगते। रात में पता नहीं किस समय उन्होंने अपनी बनाई झौंपडी भी जला दी।    अभी तक मैं यही मानता आ रहा था कि पन्तवाडी से आने वाला रास्ता भी यहीं आकर मिलता है। हिमाचल वालों से भी मैंने यही कहा कि मेरी जानकारी के अनुसार पन्तवाडी वाला रास्ता आकर मिलता है, इसलिये हमें अपने टैंट आदि आगे नागटिब्बा तक ले जाने की आवश्यकता नहीं है। खाली हाथ जायेंगे और वापस यहां आकर सामान उठाकर नीचे पन्तवाडी चले जायेंगे। इसलिये पहले हिमाचल वालों ने और बाद में मैंने पन्तवाडी की तरफ उतरती पगडण्डी ढूंढी, लेकिन कोई पगडण्डी नहीं मिली। एक हल्की सी पगडण्डी धार के नीचे की तरफ अवश्य जा रही थी, लेकिन यह पन्तवाडी...

नागटिब्बा ट्रेक-1

   नागटिब्बा जाना तो अपने घर की बात लगती थी। वो रहा देहरादून, वो रहा मसूरी और वो रहा नागटिब्बा। फिर भी कई सालों तक बस सोचते ही रहे, लेकिन जाना नहीं हो पाया। लेकिन इस बार कमर कस ली। नागटिब्बा समुद्र तल से 3000 मीटर से भी ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है, इसलिये सर्दियों में अच्छी-खासी बर्फ गिर जाती है। कम दूरी का ट्रैक होने के कारण यह विण्टर ट्रैकों में भी अहम स्थान रखता है। यही सोचकर दिसम्बर में यहां जाने की योजना बनी।    मेरी बडे दिनों से इच्छा थी कि किसी ग्रुप को ट्रैकिंग पर लेकर जाऊं। एक बार इस बारे में अपने फेसबुक पेज पर भी लिखा था। इस बार की योजना थी कि क्रिसमस की छुट्टियों में एक ग्रुप को तो अवश्य तैयार कर लेना है। शुक्रवार का क्रिसमस था, उसके बाद शनिवार और फिर रविवार। किसी भी नौकरीपेशा के लिये यह एक शानदार संयोग होता है। इसलिये कोई सन्देह नहीं था कि ग्रुप नहीं बनेगा। खर्चे का अन्दाजा लगाया और आखिरकार तय हुआ कि दिल्ली से दिल्ली तक प्रति व्यक्ति 5000 रुपये और देहरादून से देहरादून तक 4000 रुपये लगेंगे। इसमें आना-जाना, रहना और खाना-पीना सब शामिल था। ग्रुप बडा हुआ तो दिल्ल...

दारनघाटी और सरायकोटी मन्दिर

8 मई 2015 दारनघाटी की कुछ जानकारी तो पिछली बार दे दी थी। बाकी इस बार देखते हैं। दारनघाटी 2900 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और यहां से दो किलोमीटर दूर सरायकोटी माता का मन्दिर है जो समुद्र तल से 3090 मीटर ऊपर है। 3000 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचने का अलग ही आकर्षण होता है। 2999 मीटर में उतना आकर्षण नहीं है जितना इससे एक मीटर और ऊपर जाने में। दारनघाटी का जो मुख्य रास्ता है यानी तकलेच-मशनू को जोडने वाला जो रास्ता है, उसमें से सरायकोटी मन्दिर जाने के लिये एक रास्ता और निकलता है। यह सरकारी रेस्ट हाउस से एक किलोमीटर तकलेच की तरफ चलने पर आता है। यह पूरी तरह कच्चा है, खूब धूल है और तीव्र चढाई। इसी तरह की चढाई पर एक जगह जहां खूब रेत थी, बाइक धंस गई। आगे एक मोड था और रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था; हमने सोचा कि आगे अब पैदल जाना पडेगा। बाइक वहीं रेत में खडी की, सामान इसी पर बंधा रहने दिया और पैदल बढ चले।

रोहांडा से कमरुनाग

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 12 मई 2014, सोमवार बताते हैं, पांच हजार साल पहले कोई रतन यक्ष था। उसने भगवान विष्णु को गुरू मानकर स्वयं ही प्रचण्ड युद्धकला सीख ली थी। उसे जब पता चला कि महाभारत का युद्ध होने वाला है, तो उसने भी युद्ध में जाने की ठानी। लेकिन वह चूंकि प्रचण्ड योद्धा था, उसने तय किया कि जो भी पक्ष कमजोर होगा, वह उसकी तरफ से लडेगा। यह बात जब कृष्ण को पता चली तो वह चिन्तित हो उठे क्योंकि इस युद्ध में कौरव ही हारने वाले थे और रतन के कारण इसमें बडी समस्या आ सकती थी। कृष्ण एक साधु का रूप धारण करके उसके पास गये और उसके आने का कारण पूछा। सबकुछ जानने के बाद उन्होंने उसकी परीक्षा लेनी चाही, रतन राजी हो गया। कृष्ण ने कहा कि एक ही तीर से इस पीपल से सभी पत्ते बेध दो। इसी दौरान कृष्ण ने नजर बचाकर कुछ पत्ते अपने पैरों के नीचे छुपा दिये। जब रतन ने सभी पत्ते बेध दिये तो कृष्ण ने देखा कि उनके पैरों के नीचे रखे पत्ते भी बिंधे पडे हैं, तो वे उसकी युद्धकला को मान गये। जब उन्होंने उसके गुरू के बारे में पूछा तो यक्ष ने भगवान विष्णु का नाम लिया। चूंकि कृष्ण स्वयं व...

हिमानी चामुण्डा ट्रेक

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 3 अप्रैल 2013 शलभ की वेबसाइट पर मैंने पहले पहल पुरानी चामुण्डा का नाम देखा था। बाद में केवलराम से भी बात हुई जिससे इसकी और ज्यादा पुष्टि हो गई। कल रात होटल के कर्मचारियों ने बताया कि चामुण्डा जाने वाली किसी भी बस में बैठकर कंडक्टर से कह देना कि पुरानी चामुण्डा जाना है, वो उतार देगा। मेरी और नटवर के विचारों में एक बडी जबरदस्त समानता है कि दोनों एक नम्बर के सोतडू हैं। रात तय हुआ था कि सुबह छह या सात बजे यहां से चल पडेंगे। दोपहर बाद तक पुरानी चामुण्डा घूमकर आ जायेंगे और शाम को चिडियाघर देखेंगे। तब पता नहीं था कि पुरानी चामुण्डा की एक तरफ की पैदल दूरी सोलह किलोमीटर है। मैं पांच-छह किलोमीटर मान रहा था। सूरज सिर पर चढ आया, जब हम उठे। पानी ठण्डा था, इसलिये नहाये नहीं। सीधे बस अड्डे पर पहुंचे। सबसे पहले नाश्ता किया। नगरोटा जाने वाली एक बस में बैठ गये और कंडक्टर से कह दिया कि पुरानी चामुण्डा जाना है। उसने दोनों के पैंतीस रुपये लिये और उतारने का वादा कर लिया। वर्तमान चामुण्डा से डेढ दो किलोमीटर पहले एक पुलिया के पास हमें उत...

कल्पेश्वर यानी पांचवां केदार

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 5 अप्रैल 2012 और हम थे जोशीमठ में। हम यहां तीन तारीख की शाम को आ गये थे। हमारा इरादा बद्रीनाथ जाने का था। कपाट नहीं खुले थे लेकिन फिर भी हम जाना चाहते थे। लोगों ने बताया कि बिना परमिट के नहीं जा पाओगे। हम परमिट भी ले लेते लेकिन फिर दिक्कत आती गाडी की। हजार दो हजार से कम में कोई नहीं ले जाता हमें बद्रीनाथ। इसलिये बद्रीनाथ जाना कैंसिल कर दिया और कल यानी चार तारीख को औली चले गये। वहां से शाम को वापस आये। आज जाना था हमें कल्पेश्वर। पहले से ही सोचकर आये थे कि अगर बद्रीनाथ नहीं जा पाये तो कल्पेश्वर जाना है। हां, एक बात और रह गई। हम रास्ते में पडने वाले सभी प्रयाग देखते हुए आ रहे थे- देवप्रयाग , रुद्रप्रयाग , कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग । अब बचा पांचवां यानी विष्णुप्रयाग। मुझे पता था कि अलकनन्दा में विष्णु गंगा आकर मिलती है, वहीं विष्णु प्रयाग है। विष्णुगंगा की घाटी यहां जोशीमठ से दिखाई देती है। कल जब औली गये थे तो अलकनन्दा के साथ साथ दूसरी दिशा में विष्णु घाटी भी दिखाई दे रही थी। औली से ही देखकर मैंने अन्दाजा लगाया था कि जोश...

पराशर झील ट्रेकिंग- दिल्ली से पण्डोह

पराशर झील... ह्म्म्म। आखिरकार 7 दिसम्बर को इसे देखने हम निकल ही पडे। ऐसा नहीं है कि यह मेरी पहली कोशिश थी इसे देखने की। इससे पहले भी एक बार नाकाम कोशिश कर चुका हूं। मेरी उस कोशिश की किसी को जानकारी नहीं है। 15 मार्च 2010 को मैं निकला तो पराशर के लिये ही था। लेकिन उसके बदले रिवालसर झील देख आया। और हां, कटौला तक भी पहुंच गया था। कटौला जो है, वो मण्डी-कुल्लू ग्रामीण रोड पर बसा है। मण्डी से दस दस मिनट में बसें निकलती हैं।  तो जी, कटौला पहुंचकर पराशर के बारे में पता किया तो मालूम पडा कि वहां तक पक्की सडक बनी हुई है, और टैक्सी से ही जा सकते हैं। टैक्सी का किराया उसने कटौला से आने जाने का 800 रुपये बता दिया। मैंने पैदल रास्ते के बारे में पूछा तो भला टैक्सी वाला कब पैदल का समर्थन करने लगा। तो भईया, उस दिन मुझे कटौला से ही वापस लौट जाना पडा।

सुरकण्डा देवी

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । सुरकण्डा देवी गढवाल में बहुत प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। इसकी दूर-दूर तक मान्यता है। मसूरी-चम्बा के बीच में धनोल्टी है। यह चम्बा वो हिमाचल वाला चम्बा नहीं है बल्कि उत्तराखण्ड में भी एक चम्बा है। यह हिमाचल वाले की तरह जिला तो नहीं है लेकिन काफी बडा कस्बा है। चम्बा ऋषिकेश-टिहरी रोड पर पडता है।  धनोल्टी से छह किलोमीटर दूर कद्दूखाल नाम की एक जगह है जहां से सुरकण्डा देवी के लिये रास्ता जाता है। दो किलोमीटर पैदल चलना पडता है। पक्का रास्ता बना है और खच्चर भी मिल जाते हैं। मेरे लिये इस जगह का आकर्षण दूसरी वजह से था। वो यह कि मुझे बताया जाता था कि यहां जाने के लिये हालांकि पैदल का रास्ता कम ही है लेकिन चढाई बडी भयानक है। जब सन्दीप भाई ने भी इस चढाई की भयानकता पर मोहर लगा दी तो लगने लगा कि वाकई कुछ तो है।