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“मेरा पूर्वोत्तर” - नामदफा नेशनल पार्क

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें । 12 नवंबर 2017 हमारे उठते ही चाय आ गई और एक फोरेस्ट गार्ड भी आ गया - “आज आप लोग कहाँ घूमने जाएँगे?” “हमें तो इधर का कुछ भी नहीं पता।” “उधर पाँच किलोमीटर आगे एक व्यू पॉइंट है। बाकी सभी लोग उधर ही जा रहे हैं।” “उधर मतलब विजयनगर वाली सड़क की तरफ?” “हाँ जी, हमें उस सड़क पर ही चलना होगा। बहुत तरह की चिड़ियाँ मिलेंगी और तमाम तरह की तितलियाँ भी।” “फिलहाल उस तरफ जाने की इच्छा नहीं है। नदी के दूसरी तरफ भी कोई रास्ता है क्या?” “हाँ जी, उधर हल्दीबाड़ी है।” “तो हम उधर ही चलेंगे।” पानी, बिस्कुट और कैमरे लेकर हम नदी की ओर चल दिए। एक मल्लाह भी साथ था। नाव इस तरफ ही बँधी थी। एकदम पारदर्शी पानी और उस पर नाव से नदी पार करने में आनंद आ गया।

पचमढी: चौरागढ यात्रा

   आज हम जल्दी उठे और साढे छह बजे तक कमरा छोड दिया। आज हमें चौरागढ जाना था और वापस आकर दोपहर से पहले पचमढी छोड देना था। कल हम महादेव गये थे, जो कि पचमढी से दस किलोमीटर दूर है। आज भी सबसे पहले महादेव ही गये। रास्ते भर कोई नहीं मिला। लेकिन महादेव जाकर देखा तो हमसे पहले भी कई लोग चौरागढ जाने को तैयार मिले। दुकानें खुली मिलीं और उत्पाती बन्दर भी पूरे मजे में मिले। पार्किंग में बाइकें खडी करने लगे तो दुकान वालों ने कहा कि उधर बाइक खडी मत करो, बन्दर सीट कवर फाड देंगे। यहां हमारे पास खडी कर दो। उनके कहे अनुसार बाइक खडी कीं और उनके ही कहे अनुसार सीटों पर पत्थर रख दिये ताकि बन्दर सीटों पर ज्यादा ध्यान न दें।    पैदल रास्ता यहीं से शुरू हो जाता है हालांकि सडक भी थोडा घूमकर कुछ आगे तक गई है। करीब एक किलोमीटर बाद सडक और पैदल रास्ते मिले हैं। हमें किसी ने नहीं बताया इस बारे में। बाइक वहां तक आसानी से चली जाती हैं और उधर बन्दरों का आतंक भी नहीं है। खैर।

पूर्णागिरी – जहाँ सती की नाभि गिरी थी

वो किस्सा तो सभी को पता ही है – अरे वो ही, शिवजी-सती-दक्ष वाला। सती ने जब आत्महत्या कर ली, तो शिवजी ने उनकी अन्त्येष्टि तो की नहीं, बल्कि भारत भ्रमण पर ले गये। फिर क्या हुआ, कि विष्णु ने चक्र से सती की ’अन्त्येष्टी’ कर दी। कोई कहता है कि 51 टुकडे किये, कोई कहता है 52 टुकडे किये। हे भगवान! मरने के बाद सती की इतनी दुर्गति!!! जहाँ जहाँ भी ये टुकडे गिरे, वहीं शक्तिपीठ बन गयी। एक जगह पर नाभि भाग गिरा, वो पर्वत की चोटी पर गिरा और पर्वत में छेद करके नीचे नदी तक चला गया। यह नदी और कोई नहीं, भारत-नेपाल की सीमा निर्धारित्री शारदा नदी है। अब पता नहीं कैसे तो लोगों ने उस छेद का पता लगाया और कैसे इसे सती की नाभि सिद्ध करके शक्तिपीठ बना दिया। लेकिन इससे हम जैसी भटकती आत्माओं की मौज बन गयी और भटकने का एक और बहाना मिल गया। इस शक्तिपीठ को कहते हैं पूर्णागिरी। यह उत्तराखण्ड राज्य के कुमाऊं अंचल में चम्पावत जनपद की टनकपुर तहसील के अन्तर्गत आता है। जिस तरह से जम्मू व कटरा पर वैष्णों देवी का रंग छाया है, उसी तरह टनकपुर पर पूर्णागिरी का। आओ, पहले आपको टनकपुर पहुंचा देते हैं-

शिव का स्थान है - शिवखोडी

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । एक बार की बात है। एक असुर था- भस्मासुर। उसने शिवजी से वरदान ले लिया था कि वो जिसके सिर पर भी हाथ रखेगा, भस्म हो जायेगा। इसका पहला प्रयोग उसने शिवजी पर ही करना चाहा। शिवजी की जब जान पर बन आयी तो शिवजी जान बचाकर दौडे। लेकिन भस्मासुर भी कोई लंगडा नही था, शिवजी का पीछा किया। वे एक गुफा में जा घुसे। फिर अपने त्रिशूल से गुफा के अन्दर ही संकरा सा रास्ता बनाते बनाते और अन्दर घुसते रहे। हां, उन्होने इस गुफा का रास्ता भी बन्द कर दिया था। भस्मासुर बाहर ही बैठ गया। कभी ना कभी तो बाहर निकलेंगे ही। शिवजी नहीं निकले। फिर आये विष्णुजी, माता पार्वती का वेश बनाकर। भस्मासुर मोहित हो गया। बोला कि हे पार्वती, मुझसे विवाह करो। पार्वती ने शर्त रख दी कि अगर तुम भोले शंकर की तरह ताण्डव नृत्य करो, तो विवाह हो सकता है। भस्मासुर बोला कि ताण्डव तो मुझे आता ही नही है। पार्वती ने कहा कि, मुझे आता है, मेरे साथ करो। भस्मासुर खुश। पार्वती की नकल करने लगा। जैसे ही पर्वती ने अपना हाथ अपने सिर पर रखा, भस्मासुर ने भी ऐसा ही किया और भस्मासुर ध्वस्त।

वैष्णों देवी यात्रा

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । वैष्णों देवी गए और फिर आये, आते ही एक शुभ काम हो गया। खैर, मेरे साथ अभी तक आप जम्मू मेल से सफ़र कर रहे हो, पानीपत से निकलते ही खर्राटे भरने लगे हो। जागने पर क्या हुआ, ये बताऊंगा मैं बाद में, पहले एक खुशखबरी। हमने एक कंप्यूटर खरीद लिया है। अपनी खाट पर बैठे-बैठे ही रजाई की भुक्कल मारकर (ओढ़कर), गोद में कीबोर्ड रखकर, बराबर में माऊस रखकर ई-आनन्द लेना शुरू कर दिया है। लेकिन सुख है, तो दुःख भी है। अरे भाई, एक कंजूस की जेब से जब पैसा निकलता है तो दुःख तो होगा ही। कोई मामूली रकम नहीं, पूरे पांच अंकों में, वो भी एक ही झटके में। चलो खैर, वापस जम्मू मेल में पहुँचते हैं, और देखते हैं कहाँ पहुँच गए।

बरसात में नीलकंठ के नज़ारे

कुछ दिन पहले मैंने प्रतिज्ञा की थी कि जल्दी ही नीलकंठ महादेव के नज़ारे दिखाए जायेंगे। हमारे यहाँ देर तो है पर अंधेर नहीं है। इसलिए थोडी देर में आप देखोगे नीलकंठ की हिमालयी वादियों को। मैं वहां करीब महीने भर पहले 15 जुलाई को गया था। उस दिन दोपहर से पहले बारिश हुई थी इसलिए नजारों में चाँद भी लगे थे और तारे भी। ... चलो, आज फिर चलते हैं वहीं पर। सबसे पहले किसी भी तरह ऋषिकेश पहुंचेंगे। अरे यार, वही हरिद्वार वाला ऋषिकेश। हवाई जहाज से, ट्रेन से, बस से, कार से, टम्पू से; जैसा भी साधन मिले, बस पहुँच जाइए। इसके बाद राम झूला पार करके स्वर्गाश्रम। पहुँच गए? ठीक है। यहाँ से नीलकंठ की दूरी कम से कम चौदह किलोमीटर है- वो भी पैदल। दम-ख़म हो तो पैदल चले जाओ। पूरा रास्ता पक्का है लेकिन महाघनघोर जंगल भी है। दस किलोमीटर तक तो निरंतर खड़ी चढाई है। सावन को छोड़कर पूरे साल सुनसान पड़ा रहता है। बन्दर व काले मुहं-लम्बी पूंछ वाले लंगूर जगह-जगह आपका स्वागत करेंगे। ये ही यहाँ की पुलिस है। बैग व जेबों की तलाशी लेकर ही आगे जाने देते हैं।

नीलकंठ महादेव और झिलमिल गुफा, ऋषिकेश

अभी कुछ ही दिन पहले धुन सवार हुई कि नीलकंठ चलें। मैंने ख़ुद ही दिन भी तय कर लिया कि इस इतवार को जाऊँगा। अपना तो एक ही ध्येय वाक्य है- चल अकेला चल अकेला। फिर भी टोकने वाले अंदाज में सभी दोस्तों को टोक डाला। कोई भी साथ चलने को तैयार नहीं हुआ। कोई बात नहीं, यह मुसाफिर जाट किसी की मर्जी का मोहताज नहीं है। नीलकंठ जाना थोड़ा दुर्गम भी है और सुगम भी। पैदल जायें तो दुर्गम और बेहद थकाऊ व खतरनाक। ऋषिकेश से चौदह किलोमीटर की अनवरत खड़ी चढाई। कोई अपने को कितना भी तीसमार खां समझता हो, पैदल जाने में तो फूँक निकल जाती है। दूसरा रास्ता जीप वाला है, जो करीब तीस किलोमीटर पड़ता है।