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उत्तर बंगाल यात्रा - तीन बीघा कोरीडोर

14 फरवरी 2018 हम इतिहास की गहराइयों में नहीं जाएँगे, लेकिन इतना जान लीजिए कि आजादी से पहले इधर दो प्रमुख रियासतें हुआ करती थीं – कूचबिहार रियासत और रंगपुर रियासत। बँटवारा हुआ तो कूचबिहार भारत में आ गया और रंगपुर पूर्वी पाकिस्तान में। लेकिन इन दोनों रियासतों की सीमाएँ बड़ी अजीबो-गरीब थीं। एक रियासत के अंदर दूसरी रियासत की जमीनें थीं, जिन्हें ‘एंकलेव’ कहते हैं। यहाँ तक कि एक एंकलेव के अंदर दूसरा एंकलेव भी था और एक जगह तो तिहरा एंकलेव भी। बँटवारे में एंकलेव भी बँट गए। 1971 में बांग्लादेश बना, तब तक भी मामला ऐसा ही था। मुझे पता है कि ऊपर का पैरा आप बिल्कुल भी नहीं समझे होंगे। चलिए, आसान शब्दों में बताता हूँ। एंकलेव मतलब एक देश की मुख्यभूमि के अंदर दूसरे देश के आठ-दस गाँव, जो चारों ओर से पूरी तरह पहले देश से घिरे हुए हों। भारत के अंदर बांग्लादेश के गाँव भी थे और बांग्लादेश के अंदर भारत के गाँव भी। ऐसे एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 200 एंकलेव थे। यानी भारत के उस एंकलेव में स्थित आठ-दस गाँवों के लोगों को अगर कोलकाता या सिलीगुड़ी कहीं भी जाना होता था, तो बांग्लादेश से होकर ही निकलना पड़ता था। इसी तरह बा...

मेघालय यात्रा - डौकी में भारत-बांग्लादेश सीमा पर रोचक अनुभव

9 फरवरी 2018 सुबह-सुबह ही वो नाववाला आ गया, जो कल हमें यहाँ छोड़कर गया था। आज वह हमें उमगोट नदी में नौका विहार कराएगा। हमें वैसे तो नौका विहार में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन यह नदी इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि नौका विहार का मन करने लगा। जब भी आप कभी इंटरनेट पर ऐसा कोई फोटो देखें, जिसमें इतना पारदर्शी पानी हो कि नाव हवा में चलती दिखती हो, तो बहुत ज्यादा संभावना है कि वह यही नदी होगी। लेकिन ऐसा फोटो लेने की भी एक तकनीक है। वो यह कि धूप निकली हो और नाव की परछाई नाव से बिल्कुल अलग होकर नदी की तली में दिख रही हो। साथ ही हवा एकदम शांत हो और पानी पर लहरें न बन रही हों। “बांग्लादेश चलेंगे सर?” अचानक नाववाले ने ऐसी बात कह दी, जो अप्रत्याशित थी। “क्या? बांग्लादेश?” “हाँ जी, उधर झाल-मूड़ी खाकर आएँगे।”

जैसलमेर से तनोट - एक नये रास्ते से

19 दिसंबर 2016 आज हम यात्रा करेंगे जैसलमेर से तनोट तक, लेकिन परंपरागत रास्ते से नहीं बल्कि निहायत नये और अनछुए रास्ते से। जैसलमेर-सम रोड़ पर जहाँ से लोद्रवा की सड़क अलग होती है, वहाँ कुछ दूरियाँ लिखी थीं। इनमें प्रमुख था आसूतार 94 किलोमीटर। हमारी योजना इसी सड़क पर आसूतार, घोटारू, लोंगेवाला होते हुए तनोट जाने की थी। मैं सैटेलाइट से पहले ही इस सड़क की स्थिति देख चुका था। यह पूरी सड़क पक्की बनी है। इंटरनेट पर इसका कोई भी यात्रा-वृत्तांत नहीं मिलता। लोद्रवा से आगे छत्रैल है और फिर कुछड़ी है। कुछड़ी में एक टी-पॉइंट है - बाये सड़क सम जाती है और दाहिने आसूतार। अगर कल हम सम रुकते, तो शायद सीधे इधर ही आते। हम दाहिने मुड़ गये। थोड़ा आगे हाबुर गाँव है। यहाँ से सीधी सड़क जैसलमेर-तनोट रोड़ में मोकल के पास जाकर मिल जाती है और बायें जाने वाली सड़क आसूतार जाती है। यहाँ से हम भी आसूतार का पीछा करते-करते बायें मुड़ गये। दो-लेन की यह सड़क सीमा सड़क संगठन ने बनायी है और बेहद शानदार बनी है। राजस्थान के इस सुदूर इलाके में जरा भी यातायात नहीं है। कभी-कभार कोई जीप आ जाती, जिससे स्थानीय निवासी आना-जाना करते हैं। बस कोई नहीं द...

धनाना: सम से आगे की दुनिया

18 दिसंबर 2016 जब हम गूगल मैप में जैसलमेर से सम की सड़क देखते हैं, तो इस पर लिखा आता है - जैसलमेर-सम-धनाना रोड़। ज़ाहिर है कि इसी सड़क पर सम से भी आगे कहीं धनाना है। गौर से देखें तो यह सड़क आगे भारत-पाक सीमा तक जाती है। मतलब कहीं न कहीं बी.एस.एफ. वाले बैठे होंगे ताकि आम नागरिक सीमा तक न जा सकें। मेरी इच्छा उस बैरियर तक जाने की थी। पता नहीं वो बैरियर कहाँ होगा। इंटरनेट पर भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी। इसके बाद ज्यादा ध्यान देकर सैटेलाइट इमेज देखीं तो पता चला कि हरनाऊ तक और उससे भी आगे तक पक्की सड़क बनी हुई है। यह सड़क पश्चिम में होती हुई उत्तर में मुड़ जाती है और आगे लोंगेवाला जा पहुँचती है और 150 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी है। लेकिन बीच में 14 किलोमीटर का छोटा-सा टुकड़ा कच्चा दिख गया। शायद यह सैटेलाइट इमेज दो साल पुरानी हो, शायद अब उस 14 किलोमीटर में पक्की सड़क बन गयी हो, लेकिन यह तय कर लिया कि भले ही सम से आगे 100 किलोमीटर निकलकर वापस सम लौटना पड़े, लेकिन किसी भी हालत में उस कच्चे रास्ते पर बाइक नहीं चलायेंगे।

थार के सुदूर इलाकों में : किराडू - मुनाबाव - म्याजलार

17 दिसंबर 2016 किराडू से साढ़े ग्यारह बजे चले। अगला लक्ष्य था मुनाबाव में भारत-पाक सीमा देखना। सड़क सिंगल है, लेकिन ट्रैफिक न होने के कारण कोई दिक्कत नहीं होती। कभी-कभार कोई ट्रक या कोई जीप सामने से आ जाती। रामसर एक बड़ा गाँव है। अच्छी चहल-पहल थी। गड़रा रोड़ से दो किलोमीटर पहले सड़क किनारे लगे एक सूचना-पट्ट पर निगाह गयी - “शहीद स्मारक लोको पायलट, 1965 भारत पाक युद्ध।” तुरंत बाइक रोकी और मुख्य सड़क से लगभग 100 मीटर दूर रेलवे लाइन के किनारे ले गये। यहाँ एक स्मारक बना है। गौरतलब है कि 1965 के भारत-पाक युद्ध में कश्मीर से लेकर गुजरात तक लड़ाई छिड़ी हुई थी। इतनी लंबी सीमा में कभी भारतीय सेना पाकिस्तान के अंदर जाकर कब्जा कर लेती, तो कभी पाकिस्तानी सेना भारत के अंदर। मुनाबाव रेलवे स्टेशन पाकिस्तान के कब्जे में आ गया था। उसी दौरान बाड़मेर से मुनाबाव जाती एक ट्रेन पर 10 सितंबर की रात साढ़े दस बजे गड़रा रोड़ के पास पाकिस्तान ने निशाना साधा। इसके गार्ड़ और फायरमैन समेत कई कर्मचारी शहीद हो गये। थोड़ा आगे इंजीनियरिंग स्टाफ का शहीद स्मारक भी है।

लद्दाख बाइक यात्रा- 16 (मेरक-चुशुल-सागा ला-लोमा)

18 जून 2015 दोपहर के पौने दो बजे हम पेंगोंग किनारे स्थित मेरक गांव से चले। हमारा आज का लक्ष्य हनले पहुंचने का था जो अभी भी लगभग 150 किलोमीटर दूर है। मेरे पास सभी स्थानों की दूरियां थीं और यह भी ज्ञात था कि कितनी दूर खराब रास्ता मिलेगा और कितनी दूर अच्छा रास्ता। इन 150 किलोमीटर में से लगभग 60 किलोमीटर खराब रास्ता है, बिल्कुल वैसा ही जैसा हमने स्पांगमिक से यहां तक तय किया है। इन 60 किलोमीटर को तय करने में तीन घण्टे लगेंगे और बाकी के 90 किलोमीटर को तय करने में भी तीन ही घण्टे लगेंगे; ऐसा मैंने सोचा था। यानी हनले पहुंचने में अन्धेरा हो जाना है। अगर कुछ देर पहले वो बुलेट खराब न होती तो हम उजाला रहते हनले पहुंच सकते थे।

लद्दाख बाइक यात्रा- 8 (बटालिक-खालसी)

12 जून 2015 सिन्धु यहां बहुत गहरी घाटी में बहती है। पहाड बिल्कुल सीधे खडे हैं। ऐसे इलाके दुर्गम होते हैं। लेकिन इसके बावजूद भी यहां कुछ बसावट है, कुछ गांव हैं। इनमें जो लोग निवास करते हैं, वे स्वयं को शुद्ध आर्य बताते हैं। इसीलिये धा और हनुथांग व अन्य गांव प्रसिद्ध हैं। वैसे तो हिमाचल के मलाणा निवासी भी स्वयं को आर्य कहते हैं लेकिन उनमें बहुत सी गन्दगी पनप गई है। यहां वो गन्दगी नहीं है। मेरी इच्छा इसी तरह के किसी गांव में रुकने की थी। लद्दाख के ज्यादातर गांवों में होम-स्टे की सुविधा मिलती है, रुकने की ज्यादा समस्या नहीं आती। लेकिन हम चलते रहे। शाम का समय था और सूरज की किरणें अब नीचे नहीं आ रही थीं। अन्धेरा होने से पहले ही रुक जाना ठीक था। लेकिन धा गांव कब निकल गया, पता ही नहीं चला। एक निर्जन पुल के पास साइनबोर्ड अवश्य लगा था जिस पर मोटे मोटे अक्षरों में अंग्रेजी में लिखा था- धा। हो सकता है कि गांव सडक से कुछ ऊपर हो। हम इसे छोडकर आगे बढ गये। धा के बाद एक गांव और मिला। यहां एक होम-स्टे का बोर्ड भी लगा था लेकिन हम इसे भी छोडकर आगे चल दिये।

लद्दाख बाइक यात्रा- 7 (द्रास-कारगिल-बटालिक)

12 जून 2015, शुक्रवार सुबह आराम से सोकर उठे। कल जोजी-ला ने थका दिया था। बिजली नहीं थी, इसलिये गर्म पानी नहीं मिला और ठण्डा पानी बेहद ठण्डा था, इसलिये नहाने से बच गये। आज इस यात्रा का दूसरा ‘ऑफरोड’ करना था। पहला ऑफरोड बटोट में किया था जब मुख्य रास्ते को छोडकर किश्तवाड की तरफ मुड गये थे। द्रास से एक रास्ता सीधे सांकू जाता है। कारगिल से जब पदुम की तरफ चलते हैं तो रास्ते में सांकू आता है। लेकिन एक रास्ता द्रास से भी है। इस रास्ते में अम्बा-ला दर्रा पडता है। योजना थी कि अम्बा-ला पार करके सांकू और फिर कारगिल जायेंगे, उसके बाद जैसा होगा देखा जायेगा। लेकिन बाइक में पेट्रोल कम था। द्रास में कोई पेट्रोल पम्प नहीं है। अब पेट्रोल पम्प कारगिल में ही मिलेगा यानी साठ किलोमीटर दूर। ये साठ किलोमीटर ढलान है, इसलिये आसानी से बाइक कारगिल पहुंच जायेगी। अगर बाइक में पेट्रोल होता तो हम सांकू ही जाते। यहां से अम्बा-ला की ओर जाती सडक दिख रही थी। ऊपर काफी बर्फ भी थी। पूछताछ की तो पता चला कि अम्बा-ला अभी खुला नहीं है, बर्फ के कारण बन्द है। कम पेट्रोल का जितना दुख हुआ था, सब खत्म हो गया। अब मुख्य रास्ते से ही कार...