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फोटो-यात्रा-18: एवरेस्ट के चरणों में

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 28 मई 2016 “हम मानसिक और शारीरिक रूप से इतने थक चुके थे कि 5500 मीटर चढ़ने के लिये - अपना एक रिकार्ड़ बनाने के लिये - हम काला पत्थर नहीं जाने वाले थे। यदि मौसम साफ़ होता, तो एवरेस्ट देखने के लालच में जा भी सकते थे, लेकिन ऊँचाई के लालच में कभी नहीं जायेंगे।” “मेरी शिखर पर चढ़ने की कभी इच्छा नहीं होती। बेसकैंप तक आने की इच्छा थी और आज बेसकैंप मेरे सामने था।” “बेसकैंप से लौटते समय एक कसक भी थी कि एवरेस्ट के दर्शन नहीं हुए। लेकिन आभास भी हो रहा था कि वह हमें देख रही है और हम उसके साये में चल रहे हैं।” “सोने से पहले आज के दिन के बारे में सोचने लगे। निःसंदेह आज का दिन हमारी ज़िंदगी का एक अहम दिन था। जिस ट्रैक पर जाने की इच्छा सभी ट्रैकर्स करते हैं, आज हमने उसी ट्रैक को पूरा कर लिया था। एवरेस्ट बेस कैंप। हालाँकि प्रत्येक पर्वत का एक बेसकैंप होता है, लेकिन अगर कहीं दो ट्रैकर्स खड़े ‘बेसकैंप’ का ज़िक्र कर रहे हों, तो समझ लेना कि एवरेस्ट बेसकैंप की ही चर्चा चल रही होगी।”

फोटो-यात्रा-14: गोक्यो और गोक्यो-री

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 24 मई 2016 “आज हमारा इरादा गोक्यो-री जाने का था। ‘री’ का अर्थ होता है चोटी। गोक्यो के पास 5300 मीटर से ऊँची एक चोटी है, इसे ही गोक्यो-री कहा जाता है। इस पर चढ़ना आसान है, हालाँकि अत्यधिक ऊँचाई का असर तो पड़ता ही है। दीप्ति ने पहले तो ना-नुकूर की, लेकिन बाद में चलने को राज़ी हो गयी। हम लगभग 4700 मीटर पर थे। ऐसे इलाके में 600 मीटर चढ़ना भी बेहद मायने रखता है। मुझे दीप्ति पर लगातार निगाह रखनी पड़ेगी। वह अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। और ऊपर जाने पर उसकी तबियत और ज्यादा ख़राब हो सकती है।” “ख़ूब आवाजाही होते रहने के कारण स्पष्ट पगडंड़ी बनी थी और भटकने का कोई डर नहीं था। हमारे पीछे-पीछे दो विदेशी और आ रहे थे। लेकिन वे भी उच्च पर्वतीय बीमारी से पीड़ित प्रतीत हो रहे थे। दीप्ति को भी बार-बार बैठना पड़ रहा था। वह थोड़ी देर बैठती, फिर दो कदम चलती और फिर बैठ जाती। आख़िरकार जब हम लगभग 5100 मीटर पर थे, उसने हिम्मत छोड़ दी - “अब और आगे नहीं जा सकती।”

फूलों की घाटी

16 जुलाई 2017 आज का दिन तो बड़ा ही शानदार रहा। कैसे शानदार रहा? बताऊंगा धीरे-धीरे। बताता-बताता ही बताऊंगा। रात 2 बजे आँख खुली। बाहर बूंदों की आवाज़ आ रही थी। बारिश हो रही थी। सोचा कि सुबह तक मौसम अच्छा हो जाएगा। सो गया। फिर 6 बजे आँख खुली। बारिश अभी भी हो रही थी। उठकर दरवाजा खोलकर देखा। बादल और रिमझिम बारिश। इसके बावजूद भी यात्रियों का आना-जाना। कुछ यात्री नीचे गोविंदघाट भी जा रहे थे और कुछ ऊपर हेमकुंड भी जाने वाले थे। हमें किसी भी तरह की जल्दी नही थी। कल ही सोच लिया था कि बारिश में कहीं भी नही जाएंगे। न फूलों की घाटी और न गोविंदघाट। वापस दरवाजा लगाया और सो गया। आठ बजे आँख खुली। उतनी ही बारिश थी, जितनी दो घंटे पहले थी। लेकिन इस बार मैं नीचे चला गया और एक बाल्टी गर्म पानी को कह आया। साथ ही यह भी कह दिया कि आज भी हम यहीं रुकेंगे। होटल मालिक बड़ी ही विचित्र प्रकृति का है। आप कुछ भी कहें, वह आपका उत्साह ही बढ़ाएगा। मसलन आप बारिश में हेमकुंड जाना चाह रहे हैं, वह आपको जाने को कहेगा। और बारिश की वजह से नहीं जाना चाह रहे हैं, तो आपसे रुक जाने को कह देगा। तो मुझसे भी उसने कह दिया कि बारिश में नहीं ...

यात्रा श्री हेमकुंड साहिब की

15 जुलाई 2017 सुबह उठे तो मौसम ख़राब मिला। निश्चय करते देर नहीं लगी कि आज फूलों की घाटी जाना स्थगित। क्या पता कल सुबह ठीक मौसम हो जाये। तो कल फूलों की घाटी जाएंगे। आज हेमकुंड साहिब चलते हैं। कल भी मौसम ख़राब रहा तो परसों जायेंगे। यह यात्रा मुख्यतः फूलों की घाटी की यात्रा है, जल्दी कुछ भी नहीं है। तो हम केवल साफ मौसम में ही घाटी देखेंगे। वैसे जुलाई तक मानसून पूरे देश में कब्जा जमा चुका होता है, तो साफ मौसम की उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही था, लेकिन हिमालय में अक्सर मौसम साफ ही रहता है। दोपहर बाद बरस जाये तो उसे खराब मौसम नहीं कहते। सुबह ही बरसता मिले तो खराब कहा जायेगा। अभी खराब मौसम था। इंतज़ार करते रहे। इसका यह अर्थ न लगाया जाये कि हमने बालकनी में कुर्सियाँ डाल लीं और चाय की चुस्कियों के साथ बारिश देखते रहे। इंतज़ार करने का अर्थ होता है रजाईयों में घुसे रहना और जगे-जगे सोना व सोते-सोते जगना। नींद आ गयी तो आँख कुछ मिनटों में भी खुल सकती है और कुछ घंटों में भी। हाँ, एक बार बाहर झाँककर अवश्य देख लिया था। सिख यात्री नीचे गोविंदघाट से आने शुरू हो गये थे। सुबह कब चले होंगे वे? और हो सकता है कि इनमे...

बाइक यात्रा: खरसाली से दिल्ली

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें । 21 मई 2017 कल ही तय हो गया था कि मैं और नरेंद्र आज सुबह-सवेरे पाँच बजे यमुनोत्री जायेंगे और रणविजय यहीं रहेगा। लेकिन पाँच कब बज गये, किसी को भी पता नहीं चला। छह बजे तक आँखें तो तीनों की खुल गयीं, लेकिन उठा कोई नहीं। सात भी बज गये और रणविजय व नरेंद्र फ्रेश होकर फिर से रज़ाईयों में दब गये। तीनों एक-दूसरे को ‘उठो भई’ कहते रहे और समय कटता रहा। अचानक मुझे महसूस हुआ कि कमरे में मैं अकेला हूँ। बाकी दोनों चुप हो गये - एकदम चुप। मैंने कुछ देर तक ‘नरेंद्र उठ, रणविजय उठ’ कहा, लेकिन कोई आहट नहीं हुई। मुझे कुछ अटपटा लगा। मामला क्या है? ये दोनों सो तो नहीं गये। ना, सवाल ही नहीं उठता। मैं सो सकता हूँ, लेकिन अब ये दोनों नहीं सो सकते। इसका मतलब मुझसे मज़ाक कर रहे हैं। इनकी ऐसी की तैसी! पूरी ताकत लगाकर रणविजय की रज़ाई में घुटना मारा, लेकिन यह क्या! घुटना रणविजय की रज़ाई पार करता हुआ नरेंद्र की रज़ाई तक पहुँच गया। किसी को भी नहीं लगा।

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा से अनुसुईया

27 सितम्बर 2015    सवा ग्यारह बजे पंचगंगा से चल दिये। यहीं से मण्डल का रास्ता अलग हो जाता है। पहले नेवला पास (30.494732°, 79.325688°) तक की थोडी सी चढाई है। यह पास बिल्कुल सामने दिखाई दे रहा था। हमें आधा घण्टा लगा यहां तक पहुंचने में। पंचगंगा 3660 मीटर की ऊंचाई पर है और नेवला पास 3780 मीटर पर। कल हमने पितरधार पार किया था। इसी धार के कुछ आगे नेवला पास है। यानी पितरधार और नेवला पास एक ही रिज पर स्थित हैं। यह एक पतली सी रिज है। पंचगंगा की तरफ ढाल कम है जबकि दूसरी तरफ भयानक ढाल है। रोंगटे खडे हो जाते हैं। बादल आने लगे थे इसलिये अनुसुईया की तरफ कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। धीरे-धीरे सभी बंगाली भी यहीं आ गये।    बडा ही तेज ढलान है, कई बार तो डर भी लगता है। हालांकि पगडण्डी अच्छी बनी है लेकिन आसपास अगर नजर दौडाएं तो पाताललोक नजर आता है। फिर अगर बादल आ जायें तो ऐसा लगता है जैसे हम शून्य में टंगे हुए हैं। वास्तव में बडा ही रोमांचक अनुभव था।

रुद्रनाथ यात्रा- पंचगंगा-रुद्रनाथ-पंचगंगा

27 सितम्बर 2015    सुबह छह बजे उठे और चाय-बिस्कुट खाकर रुद्रनाथ की ओर चल दिये। रुद्रनाथ यहां से तीन किलोमीटर दूर है। पंचगंगा समुद्र तल से 3660 मीटर पर है जबकि रुद्रनाथ 3510 मीटर पर। जाहिर है कि ढलान है। पंचगंगा ही वो स्थान है जहां मण्डल से आने वाला रास्ता भी मिल जाता है। हमें चूंकि अनुसुईया और मण्डल के रास्ते वापस जाना था, इसलिये रुद्रनाथ जाकर पंचगंगा आना ही पडता, इसलिये अपना सारा सामान यहीं रख दिया। पानी की एक बोतल, ट्रेकिंग पोल लेकर ही चले। अच्छी धूप निकली थी, रेनकोट की कोई आवश्यकता नहीं थी।    करीब एक किलोमीटर बाद लोहे के सरिये को ऐसे ही मोडकर एक द्वार बना रखा है। यहां से रुद्रनाथ के प्रथम दर्शन होते हैं। बडा ही मनोहारी इलाका है यह। दूर दूर तक फैले बुग्याल, कोई जंगल नहीं। हम वृक्ष-रेखा से ऊपर जो थे। रुद्रनाथ के पीछे के पहाडों पर बादल थे, अन्यथा पता नहीं कौन-कौन सी चोटियां दिखतीं।

रुद्रनाथ यात्रा- पुंग बुग्याल से पंचगंगा

26 सितम्बर 2015 आंख सात बजे से पहले ही खुल गई थी। बाहर निकले तो कोहरा था। चटाई बिछ गई और हम वहां जा भी बैठे। आलू के परांठे बनाने को कह दिया। परांठे खाये तो नीचे से एक ग्रुप आ गया। ये लोग खच्चर पर सवार थे। मुम्बई की कुछ महिलाएं थीं। सबसे पहले एक आईं, इनका नाम नीता था। 35 के आसपास उम्र रही होगी। भारी-भरकम कद-काठी। निशा ने धीरे से मुझसे कहा कि बेचारे खच्चर पर कैसी बीत रही होगी। खैर, अगले तीन दिनों तक हम मिलते रहे। उन्होंने पूर्वोत्तर समेत भारत के ज्यादातर इलाकों में भ्रमण कर रखा है। अच्छा लगता है जब कोई महिला इस तरह यात्रा करती हुई मिलती है। आठ बजे पुंग बुग्याल से चल दिये। घना जंगल तो है ही। आज कुछ चहल-पहल दिखी। कई बार तो ऊपर से लोग आते मिले और मुम्बई वाला ग्रुप हमारे पीछे था ही। खूब चौडी पगडण्डी है। जंगल होने के बावजूद भी कोई डर नहीं लगा। जितना ऊपर चढते जाते, नीचे पुंग बुग्याल उतना ही शानदार दिखता जाता। चारों ओर घना जंगल और बीच में घास का छोटा सा मैदान। हम आश्चर्य भी करते कि रात हम वहां रुके थे और अब इतना ऊपर आ गये।

रुद्रनाथ यात्रा: गोपेश्वर से पुंग बुग्याल

25 सितम्बर 2015 पांचों केदारों में केवल रुद्रनाथ ही अनदेखा बचा हुआ था, बाकी चारों केदार मैंने देख रखे हैं। सभी के लिये कुछ न कुछ पैदल अवश्य चलना पडता है। लेकिन रुद्रनाथ की यात्रा को कठिनतम माना जाता है। मैंने इसके कई यात्रा-वृत्तान्त पढ रखे हैं लेकिन एक बात का हमेशा सन्देह रहा। गोपेश्वर से रुद्रनाथ जाने के दो रास्ते हैं- एक तो मण्डल, अनुसुईया होते हुए और दूसरा सग्गर होते हुए। मुझे मण्डल का तो पता चल गया कि यह चोपता रोड पर गोपेश्वर से पन्द्रह किलोमीटर दूर है। लेकिन कभी यह पता नहीं चला कि सग्गर कहां है। चोपता रोड पर ही है या किसी और सडक पर है। सग्गर से आगे भी कोई सडक जाती है या सग्गर में ही सडक समाप्त हो जाती है- इस बात को जानने की मैंने खूब कोशिश कर ली लेकिन मैं यात्रा पर जाने तक नहीं जान पाया था कि सग्गर कहां है। गूगल मैप पर भी सग्गर की कोई स्थिति नहीं है। जब आपको यह आधारभूत जानकारी ही नहीं होगी तो आपको आगे का कार्यक्रम बनाने में भी परेशानी आयेगी।

पातालकोट से इंदौर वाया बैतूल

पातालकोट हम घूम चुके और अब बारी थी वापस इन्दौर जाने की। एक रास्ता तो यही था जिससे हम आये थे यानी पिपरिया, होशंगाबाद, भोपाल होते हुए। इस रास्ते को हम देख चुके थे। दूसरा रास्ता था बैतूल होते हुए। मैं इसी बैतूल वाले से जाना चाहता था। नया रास्ता, नई जगह देखने को मिलेगी। तामिया से दोनों रास्ते अलग होते हैं। हम बायें मुड गये और जुन्नारदेव के लिये ग्रामीण रास्ता पकड लिया। तामिया से जुन्नारदेव 28 किलोमीटर है और सारा रास्ता अच्छा बना है। सडक सिंगल लेन है यानी पतली सी है और कोई ट्रैफिक नहीं। ऊंची-नीची छोटी-छोटी पहाडियां इस रास्ते को बाइक चलाने के लिये शानदार बनाती हैं। आधा घण्टा लगा जुन्नारदेव पहुंचने में। शाम के चार बज चुके थे। बैतूल अभी भी लगभग 100 किलोमीटर था। मुझे इस दूरी को तय करने में लगभग तीन घण्टे लगेंगे, अगर सडक अच्छी हुई तो। यानी बैतूल पहुंचने में अन्धेरा हो जाना है। मैं अन्धेरे में बाइक चलाना पसन्द नहीं करता इसलिये तय कर लिया कि रात बैतूल रुकना है। उधर सुमित पहले ही काफी लेट हो रहा था। उन्हें जल्द से जल्द इन्दौर पहुंचना था इसलिये आज वे बैतूल नहीं रुक सकते थे। सहमति बनी और हम जुन्नारदे...

जांस्कर यात्रा- दिल्ली से कारगिल

तैयारी अगस्त में भारत में मानसून पूरे जोरों पर होता है। हिमालय में तो यह काल बनकर बरसता है। मानसून में घुमक्कडी के लिये सर्वोत्तम स्थान दक्षिणी प्रायद्वीप माना जाता है लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां बेफिक्र होकर मानसून में घूमने जाया जा सकता है। वो जगह है लद्दाख। लद्दाख मूलतः एक मरुस्थल है लेकिन अत्यधिक ऊंचाई पर होने के कारण यहां ठण्ड पडती है। हिमालय के पार का भूभाग होने के कारण यहां बारिश नहीं पडती- न गर्मियों में और न सर्दियों में। मानसून हो या पश्चिमी विक्षोभ; हिमालय सबकुछ रोक लेता है और लद्दाख तक कुछ भी नहीं पहुंचता। जो बहुत थोडी सी नमी पहुंचती भी है वो नगण्य होती है। जांस्कर भी राजनैतिक रूप से लद्दाख का ही हिस्सा है और कारगिल जिले में स्थित है। जांस्कर का मुख्य स्थान पदुम है। अगर आप जम्मू कश्मीर राज्य का मानचित्र देखेंगे तो पायेंगे कि हिमाचल प्रदेश की सीमा पदुम के काफी नजदीक है। पदुम जाने के लिये केवल एक ही सडक है और वो कारगिल से है। बाकी दिशाओं में आने-जाने के लिये अपने पैरों व खच्चरों का ही सहारा होता है। चूंकि जांस्कर की ज्यादातर आबादी बौद्ध है इसलिये इनका सिन्धु घाटी में स्थित ...

चन्द्रखनी दर्रे की ओर- दिल्ली से नग्गर

इस यात्रा पर चलने से पहले इसका परिचय दे दूं। यह दर्रा हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में है। जैसा कि हर दर्रे के साथ होता है कि ये किन्हीं दो नदी घाटियों को जोडने का काम करते हैं, तो चन्द्रखनी भी अपवाद नहीं है। यह ब्यास घाटी और मलाणा घाटी को जोडता है। मलाणा नाला या चाहें तो इसे मलाणा नदी भी कह सकते हैं, आगे चलकर जरी के पास पार्वती नदी में मिल जाता है और पार्वती भी आगे भून्तर में ब्यास में मिल जाती है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 3640 मीटर है। बहुत दिन से बल्कि कई सालों से मेरी यहां जाने की इच्छा थी। काफी समय पहले जब बिजली महादेव और मणिकर्ण गया था तब भी एक बार इस दर्रे को लांघने का इरादा बन चुका था। अच्छा किया कि तब इसकी तरफ कदम नहीं बढाये। बाद में दुनियादारी की, ट्रेकिंग की ज्यादा जानकारी होने लगी तो पता चला कि चन्द्रखनी के लिये एक रात कहीं रास्ते में बितानी पडती है। उस जगह रुकने को छत मिल जायेगी या नहीं, इसी दुविधा में रहा। खाने पीने की मुझे कोई ज्यादा परेशानी नहीं थी, बस छत चाहिये थी। तभी एक दिन पता चला कि रास्ते में कहीं एक गुफा है, जहां स्लीपिंग बैग के सहारे रात गुजारी जा सकती है। लेकि...

चादर ट्रेक- गुफा में एक रात

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 19 जनवरी 2013 आज शनिवार है। लेह वाली बस कल आयेगी। सुबह के दस बजे हैं, अभी अभी सोकर उठा हूं। हालांकि आंख तो दो घण्टे पहले ही खुल गई थी, लेकिन बस पडा रहा। घरवाले भी थोडी थोडी देर बाद दरवाजा खोलकर झांककर चले जाते हैं कि महाराज उठेगा तो चाय-नाश्ता परोसेंगे। उन्हें झांकते देखते ही तुरन्त अपनी आंख मीच लेता हूं। भारी भरकम पश्मीना कम्बल और उस पर रजाई; दोनों के नीचे दबे होने में एक अलग ही आनन्द मिल रहा है। साढे दस बजे उठ गया। तुरन्त चाय और रोटी आ गई। आज एक अलग तरह की रोटी बनी है। राजस्थान में जैसी बाटी होती है, उससे भी मोटी। लकडी की आग और अंगारों की कमी तो है नहीं, अच्छी तरह सिकी हुई है। इसे मक्खन और जैम के साथ खाया। आज का लक्ष्य है कि ग्रामीण जनजीवन को देखूंगा, कुछ फोटो खींचूंगा। अचानक अन्तरात्मा ने आदेश दिया- नेरक चलो। यह आदेश इतना तीव्र और तीक्ष्ण था कि शरीर के किसी भी अंग को संभलने और बचाव करने का मौका भी नहीं मिला। सभी ने चुपचाप इस आदेश को मान लिया। हालांकि पैरों ने कहा भी कि दर्द हो रहा है लेकिन आत्मा ने फौरन कहा-...

रूपकुण्ड यात्रा की शुरूआत

रूपकुण्ड उत्तराखण्ड में 4800 मीटर की ऊंचाई पर एक छोटी सी झील है। वैसे तो हिमालय की ऊंचाईयों पर इस तरह की झीलों की भरमार है लेकिन रूपकुण्ड एक मामले में अद्वितीय है। इसमें मानव कंकाल बिखरे पडे हैं। वैज्ञानिकों ने इनकी जांच की तो पाया कि ये कई सौ साल पुराने हैं। इतने सारे मानव कंकाल मिलने का एक ही कारण हो सकता है कि कोई बडा दल वहां था और उनके ऊपर जानलेवा विपत्ति आ पडी। वहां इतनी ऊंचाई पर इतने लोग क्या कर रहे थे, क्यों थे; यह भी एक सवाल है। इसके भी दो जवाब बनते हैं- एक तो यह कि जिस तरह आज हर बारह साल में यहां नन्दा देवी राजजात यात्रा होती है, उसी तरह तब भी होती होगी और यात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालु थे वे। दूसरा जवाब है कि वे व्यापारी थे जो शायद तिब्बत जा रहे थे। लेकिन व्यापारियों वाली बात हजम नहीं होती क्योंकि इधर से तिब्बत जाने का मतलब है कि वे नीति पास के रास्ते जायेंगे। वान या लोहाजंग या देवाल के लोग अगर नीति पास जायेंगे तो अलकनन्दा घाटी के सुगम रास्ते का इस्तेमाल करेंगे, रूपकुण्ड और उससे आगे के दर्रे का इस्तेमाल करना गले नहीं उतरता। इसलिये तीर्थयात्रा वाली कहानी ज्यादा वास्तव...

गंगोत्री-गोमुख-तपोवन यात्रा- दिल्ली से उत्तरकाशी

अक्सर ऐसा होता है कि जब भी मैं कहीं जाने की योजना बनाता हूं तो पेट में मरोडे उठने लगते हैं। जी खुश हो जाता है कि इतने दिन और बचे हैं, मैं फलां तारीख को इतने बजे वहां पर रहूंगा। और उन मरोडों की वजह से पेट खराब हो जाता है, दस्त भी लग जाते हैं। उसी खराबी की वजह से मेरी कई यात्राएं कैंसिल हुई हैं। मई में ग्वालियर वाली नैरो गेज ट्रेन की सवारी करनी थी, पेट खराब और यात्रा कैंसिल। उसका सारा रिजर्वेशन करा लिया था, पक्की योजना बन गई थी, लेकिन ऐन टाइम पर पेट में मरोडे उठे। सोचा गया कि भयंकर गर्मी की वजह से ऐसा हो रहा है, तुरन्त रिजर्वेशन कैंसिल और यात्रा भी कैंसिल। अपने एक और घुमक्कड दोस्त हैं- सन्दीप पंवार । उन्हें बीस मई के आसपास सारपास की ट्रेकिंग पर जाना था यूथ हॉस्टल की तरफ से। उनकी देखा-देखी मैंने भी अपने खुद के आधार पर सारपास पार करने की योजना बनाई। और कब बीस मई आई और कब चली गई, पता ही नहीं चला। ये भी ध्यान नहीं रहा कि सन्दीप भाई ने वो यात्रा की या नहीं। ... एक मिनट, पूछ लेता हूं उनसे....

मदमहेश्वर यात्रा

15 नवम्बर 2010, दिन सोमवार। सुबह छह बजे नाइट ड्यूटी से फारिग हुआ और छह बजकर तीन मिनट पर अहमदाबाद से हरिद्वार जाने वाली 9105 हरिद्वार मेल पकड ली। रात्रि जागरण के कारण नींद आ रही थी। जनरल डिब्बे में बैठने की ही जगह मिल जाये तो गनीमत है। इसलिये सीधे शयनयान में एक ऊपर वाली बर्थ कब्जाई, नौ बजे का अलार्म लगाया और सो गया। नौ बजे के लगभग यह गाडी मुजफ़्फ़रनगर पहुंचती है। हरिद्वार जाने के लिये मैं मुज़फ़्फ़रनगर तक ट्रेन का इस्तेमाल करता हूं और इससे आगे बस का। परसों यानी 17 को बद्रीनाथ धाम के कपाट बन्द हो रहे हैं। कल शाम तक मैं वहां पहुंच जाऊंगा और उस उत्सव का हिस्सा बनूंगा; यही सोचकर मैं निकला था। उत्तराखण्ड में रात को बसें नहीं चलतीं। बद्रीनाथ जाने वाली बसें भी हरिद्वार और ऋषिकेश से सुबह-सुबह निकलती हैं और शाम तक वहां पहुंचती हैं। ग्यारह-साढे ग्यारह बजे हरिद्वार से बद्रीनाथ तो क्या जोशीमठ की बस भी मिलनी मुश्किल है। फिर भी देखते हैं कहां की बस मिलेगी और कहां तक पहुंच पाते हैं आज। श्रीनगर तक तो पहुंच ही सकता हूं, आगे रुद्रप्रयाग? देखा जायेगा।

अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा वृत्तान्त शुरू करने से पहले कुछ आवश्यक जानकारी जरूरी है। मित्रों का आग्रह था कि मैं ये जानकारियां यहां जोड दूं। रास्ता वैसे तो आप आगे पढेंगे तो सारी जानकारी विस्तार से मिलती जायेगी, लेकिन फिर भी संक्षिप्त में: यात्रा पहलगाम से शुरू होती है। पहलगाम जम्मू और श्रीनगर से सडक मार्ग से अच्छी तरह जुडा है। पहलगाम (2100) से चन्दनवाडी (2800)= 16 किलोमीटर सडक मार्ग चन्दनवाडी (2800) से शेषनाग झील (3700)=16 किलोमीटर पैदल शेषनाग झील (3700) से महागुनस दर्रा (4200)=4 किलोमीटर पैदल महागुनस दर्रे (4200) से पंचतरणी (3600)=6 किलोमीटर पैदल पंचतरणी (3600) से अमरनाथ गुफा (3900)=6 किलोमीटर पैदल अमरनाथ गुफा (3900) से बालटाल (2800)=16 किलोमीटर पैदल