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दक्षिण के जंगलों में बाइक यात्रा

6 मार्च 2019 हम मैसूर में थे और इतना तो फाइनल हो ही गया था कि अब हम पूरा केरल नहीं घूमेंगे और कन्याकुमारी तक भी नहीं जाएँगे। यहाँ गर्मी बर्दाश्त से बाहर होने लगी थी और हिमालय से बर्फबारी की खबरें आ रही थीं। मुझे चेन्नई निवासी शंकर राजाराम जी की याद आई। आजकल वे हिमालय में थे और जनवरी में हिमालय जाते समय वे हमारे यहाँ भी होकर गए थे। और उस समय वे चेन्नई की गर्मी से परेशान थे और बार-बार कह रहे थे कि उन्हें भी साउथ की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती। अब जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे हैं, हमें शंकर सर भी याद आ रहे हैं और साउथ की गर्मी भी उतनी ही भयानक लगती जा रही है। लेकिन दीप्ति की इच्छा ऊटी देखने की थी। ऊटी समुद्र तल से 2000 मीटर से ज्यादा ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर तापमान काफी कम रहता है। लेकिन हम कितने दिन ऊटी में बिता सकते हैं? ऊटी के चारों तरफ ढलान है और चारों ही तरफ नीचे उतरने पर भयानक गर्मी है। हम दो-चार दिन ऊटी में रुक सकते हैं, लेकिन आखिरकार कहीं भी जाने के लिए इस भयानक गर्मी में एंट्री मारनी ही पड़ेगी। इसलिए मुझे ऊटी भी आकर्षक नहीं लग रहा था। अब जब दीप्ति की इच्छा के कारण मैसूर...

कुद्रेमुख, श्रंगेरी और अगुंबे

27 फरवरी 2019 सुबह सज-धजकर और पूरी तरह तैयार होकर कलश से निकले। आज हम कर्नाटक में पहली बार ट्रैकिंग करने जा रहे थे - कुद्रेमुख की ट्रैकिंग। पहले स्टेट हाइवे, फिर अच्छी ग्रामीण सड़क, फिर खराब ग्रामीण सड़क, फिर कच्ची सड़क और आखिर में फर्स्ट गियर में भी मुश्किल से चढ़ती बाइक... और हम पहुँचे फोरेस्ट ऑफिस, जहाँ से कुद्रेमुख ट्रैक का परमिट मिलता है। मैंने कहा - कुद्रेमुख। उन्होंने हाथ हिला दिया। यहाँ कुछ देर तक तो हिंदी, अंग्रेजी और कन्नड का लोचा पड़ा और आखिर में फोरेस्ट वालों ने किसी को आवाज लगाई। उसे बाकियों के मुकाबले हिंदी के कुछ शब्द ज्यादा आते थे। “ये ड्राइ सीजन है, फोरेस्ट में फायर लग जाती है, इसलिए 1 फरवरी से 31 मई तक कुद्रेमुख ट्रैक बंद रहता है।” यह तो बहुत गलत हुआ। हम इसी ट्रैक के कारण यहाँ इस क्षेत्र में आए थे। अगर पहले से पता होता, तो कुछ और प्लान करते। खैर, कोई बात नहीं। वो स्टेट हाइवे कुद्रेमुख नेशनल पार्क से होकर जाता है। 10-15 किलोमीटर उसी पर घूम आए। आज पहली बार हमें लगा कि हम गलत समय पर यहाँ घूम रहे हैं। यह पश्चिमी घाट और साउथ में घूमने का सही समय नहीं ह...

दारोजी भालू सेंचुरी में काले भालू के दर्शन

15 फरवरी 2019 उस दिन जब हम विट्ठल मंदिर से पैदल हम्पी लौट रहे थे, तो अंधेरा हो गया। हम तुंगभद्रा के किनारे-किनारे धीरे-धीरे चलते आ रहे थे। एक विदेशी महिला अपने दो बच्चों के साथ हम्पी से विट्ठल मंदिर की ओर जा रही थी। रास्ते में एक सिक्योरिटी गार्ड ने उन्हें टोका - “मैडम, गो बैक टू हम्पी। नॉट एलाऊड हियर आफ्टर दा इवनिंग। बीयर एंड चीता कम्स हीयर।” मेरे कान खड़े हो गए। चीते को तो मैंने सिरे से नकार दिया, क्योंकि भारत में चिड़ियाघरों के अलावा चीता है ही नहीं। हाँ, तेंदुआ हर जगह होता है। और बीयर? “क्या यहाँ भालू हैं?” मैंने पूछा। “हाँ जी, पास में बीयर सेंचुरी है, तो यहाँ तक भालू आ जाते हैं केले खाने।” और अगले ही दिन हम उस भालू सेंचुरी के गेट पर थे। दोपहर का डेढ़ बजा था। पता चला कि दो बजे के बाद ही एंट्री कर सकते हैं। तो दो बजे के बाद हमने एंट्री कर ली। प्रति व्यक्ति शुल्क है 25 रुपये और बाइक का कोई शुल्क नहीं। कार के 500 रुपये। चार किलोमीटर अंदर जंगल में जाने के बाद एक वाच टावर है। वहाँ बैठ जाना है और भालू के दिखने की प्रतीक्षा करनी है।

गोवा में दो दिन - जंगल और पहाड़ों वाला गोवा

25 सितंबर 2018 अक्सर हम सोचते हैं कि गोवा में केवल बीच ही हैं, केवल समुद्री एक्टिविटी ही हैं। ये बीच, वो बीच, ये एक्टिविटी, वो एक्टिविटी और गोवा खत्म। जबकि ऐसा नहीं है। यहाँ पश्चिमी घाट के बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं और ऊँचाई से गिरते जलप्रपात भी हैं। और इनसे भी ज्यादा... घने जंगल भी हैं। तो आज हम दूधसागर जलप्रपात की ओर चल दिए। कई साल पहले जब मैं दूधसागर गया था, तो रेलवे लाइन के साथ-साथ चला गया था। तब इतनी सख्ताई नहीं थी। जबकि अब बहुत सख्ताई है। दूधसागर का सबसे शानदार नजारा केवल रेलवे लाइन से ही दिखता है। इस कारण रेलवे लाइन पर इतनी भीड़ जमा हो जाया करती थी कि रेल यातायात बाधित होता था। कई बार दुर्घटनाएँ भी हो जाया करती थीं। तो रेलवे ने अब रेलवे ट्रैक के साथ-साथ पैदल जाने पर रोक लगा दी है। लेकिन यहाँ एक चक्कर और भी है। दूधसागर जलप्रपात भगवान महावीर वाइल्डलाइफ सेंचुरी के अंदर है। यहाँ जाने के लिए वन कानून लागू होता है। और शायद आपको पता हो कि ज्यादातर नेशनल पार्क और वाइल्डलाइफ सेंचुरी मानसून में पर्यटकों के लिए बंद रहते हैं। फिर भी हम दूधसागर की ओर चल दिए। इसके लिए हमें सबसे पहले पहुँचना था ...

उत्तर बंगाल यात्रा - नेवरा वैली नेशनल पार्क

16 फरवरी 2018 हमारी इस यात्रा की शुरूआत नामदफा नेशनल पार्क से हुई थी और आज हम नेवरा वैली नेशनल पार्क जाने वाले थे। इनके बीच में भी हमने कई नेशनल पार्कों की यात्राएँ कीं। ये दोनों ही नेशनल पार्क कई मायनों में एक जैसे हैं। सबसे खास बात है कि आप दोनों ही नेशनल पार्कों में कुछ ही दूरी तक सड़क मार्ग से जा सकते हैं, लेकिन आपको बाकी यात्रा पैदल ही करनी पड़ेगी। हिमालयन काले भालू, तेंदुए और बाघ के जंगल में पैदल भ्रमण करना रोमांच की पराकाष्ठा होती है। किसी अन्य नेशनल पार्क में आपको पैदल घूमने की अनुमति आसानी से नहीं मिल सकती। यहाँ तक कि आप काजीरंगा तक में अपनी गाड़ी से नीचे नहीं उतर सकते। कई बार तो हम बैठकर गणना करते रहते कि अपनी मोटरसाइकिल से जाएँ या गाड़ी बुक कर लें। कल फोरेस्ट वाले ने बताया था कि मोटरसाइकिल से न जाओ, तो अच्छा है। हालाँकि स्थानीय लोग बाहरियों को इस तरह हमेशा मना ही करते हैं, हमें भी एहसास था कि 15-16 किलोमीटर दूर जाने में हालत खराब हो जानी है। अभी कुछ ही दिन पहले हम मेघालय में अत्यधिक खराब रास्ते और अत्यधिक ढलान के कारण बीच रास्ते से वापस लौटे थे, तो आज हमने गाड़ी बुक करना ही उचित ...

उत्तर बंगाल यात्रा - बक्सा टाइगर रिजर्व में

13 फरवरी 2018 नौ बजे दुधनोई से चल दिए और लक्ष्य रखा राजा भात खावा। यानी बक्सा टाइगर रिजर्व के पास। दूरी चाहे जो भी हो, लेकिन हम दिन छिपने से पहले पहुँच जाएँगे। लगभग ढाई किलोमीटर लंबा नरनारायण सेतु पार किया। यह रेल-सह-सड़क पुल है। नीचे रेल चलती है, ऊपर सड़क। यह पुल ज्यादा पुराना नहीं है। शायद 1998 में इसे खोला गया था। उसी के बाद इधर से रेल भी चलना शुरू हुई। उससे पहले केवल रंगिया के रास्ते ही रेल गुवाहाटी जाती थी। पुल पार करते ही जोगीघोपा है। कोयला ही कोयला और ट्रक ही ट्रक। लेकिन हमें बजरंग जी के कार्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्हें पता नहीं कैसे हमारी भनक लग गई थी और वे हमें सड़क पर ही हाथ हिलाते मिले। एक बार फिर से पुल पर आकर फोटोग्राफी का दौर चला। यहाँ राजस्थानी भोजनालय भी है। राजस्थानी भोजनालय मतलब शुद्ध शाकाहारी। कोयले और ट्रकों के कारण माहौल तो ‘काला-काला’ ही था, लेकिन यहाँ अच्छा खाना खाने वालों की अच्छी भीड़ थी। चलते समय हमें रास्ता भी समझा दिया गया कि आगे चलकर एक तिराहा आएगा और उधर से जाना, इधर से मत जाना। दो-चार स्थानों के नाम और बताए, लेकिन वे सब हमारे पल्ले नहीं पड़े।

मोटरसाइकिल यात्रा: सुकेती फॉसिल पार्क, नाहन

जून का तपता महीना था और हमने सोच रखा था कि 2500 मीटर से ऊपर ही कहीं जाना है। मई-जून में घूमने के लिए सर्वोत्तम स्थान 2500 मीटर से ऊपर ही होते हैं। और इसमें चकराता के आगे वह स्थान एकदम फिट बैठता है, जहाँ से त्यूनी की उतराई शुरू हो जाती है। इस स्थान का नाम हमें नहीं पता था, लेकिन गूगल मैप पर देवबन लिखा था, तो हम इसे भी देवबन ही कहने लगे। इसके पास ही 2700 मीटर की ऊँचाई पर एक बुग्याल है और इस बुग्याल के पास एक गुफा भी है - बुधेर गुफा। बस, यही हमें देखना था। उधर इंदौर से सुमित शर्मा अपनी बुलेट पर चल दिया था। वह 5 जून की शाम को चला और अगले दिन दोपहर बाद दिल्ली पहुँचा। पूरा राजस्थान उसने अंधेरे में पार किया, क्योंकि लगातार धूलभरी आँधी चल रही थी और वह दिन में इसका सामना नहीं करना चाहता था। लेकिन उसे क्या पता था कि इन आँधियों ने दिल्ली का भी रास्ता देख रखा है। दिल्ली पूरी तरह इनसे त्रस्त थी। जब मैं ऑफिस से लौटा तो सुमित बेसुध पड़ा सो रहा था। एक टांग दीवार पर इस तरह टिकी थी कि अगर वह जगा होता तो कोशिश करने पर भी इस स्टाइल में नहीं लेट सकता था। उसे रात मैंने सलाह भी दी थी कि चित्तौड़गढ़, अजमेर या जय...

“मेरा पूर्वोत्तर” - काजीरंगा नेशनल पार्क

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें । 17 नवंबर 2017 चाउमीन खाकर हम कोहोरा फोरेस्ट ऑफिस के बाहर बैठकर काजीरंगा और कर्बी आंगलोंग के बारे में तमाम तरह की सूचनाएँ पढ़ने में व्यस्त थे, तभी तीन आदमी और आए। यात्री ही लग रहे थे। आते ही पूछा – “क्या आप लोग भी काजीरंगा जाओगे?” मैंने रूखा-सूखा-सा जवाब दिया – “हाँ, जाएँगे।” बोले – “हम भी जाएँगे।” मैंने जेब से मोबाइल निकाला और इस पर नजरें गड़ाकर कहा – “हाँ, ठीक है। जाओ। जाना चाहिए।” बोले – “तो एक काम करते हैं। हम भी तीन और आप भी तीन। मिलकर एक ही सफारी बुक कर लेते हैं। पैसे बच जाएँगे।” और जैसे ही सुनाई पड़ा “पैसे बच जाएँगे”; तुरंत मोबाइल जेब में रखा और सारा रूखा-सूखा-पन त्यागकर सम्मान की मुद्रा में आ गया – “अरे वाह सर, यह तो बहुत बढ़िया बात रहेगी। मजा आ जाएगा। आप लोग कहाँ से आए हैं?” “इंदौर, मध्य प्रदेश से।”

“मेरा पूर्वोत्तर” - नामदफा नेशनल पार्क

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें । 12 नवंबर 2017 हमारे उठते ही चाय आ गई और एक फोरेस्ट गार्ड भी आ गया - “आज आप लोग कहाँ घूमने जाएँगे?” “हमें तो इधर का कुछ भी नहीं पता।” “उधर पाँच किलोमीटर आगे एक व्यू पॉइंट है। बाकी सभी लोग उधर ही जा रहे हैं।” “उधर मतलब विजयनगर वाली सड़क की तरफ?” “हाँ जी, हमें उस सड़क पर ही चलना होगा। बहुत तरह की चिड़ियाँ मिलेंगी और तमाम तरह की तितलियाँ भी।” “फिलहाल उस तरफ जाने की इच्छा नहीं है। नदी के दूसरी तरफ भी कोई रास्ता है क्या?” “हाँ जी, उधर हल्दीबाड़ी है।” “तो हम उधर ही चलेंगे।” पानी, बिस्कुट और कैमरे लेकर हम नदी की ओर चल दिए। एक मल्लाह भी साथ था। नाव इस तरफ ही बँधी थी। एकदम पारदर्शी पानी और उस पर नाव से नदी पार करने में आनंद आ गया।

फूलों की घाटी

16 जुलाई 2017 आज का दिन तो बड़ा ही शानदार रहा। कैसे शानदार रहा? बताऊंगा धीरे-धीरे। बताता-बताता ही बताऊंगा। रात 2 बजे आँख खुली। बाहर बूंदों की आवाज़ आ रही थी। बारिश हो रही थी। सोचा कि सुबह तक मौसम अच्छा हो जाएगा। सो गया। फिर 6 बजे आँख खुली। बारिश अभी भी हो रही थी। उठकर दरवाजा खोलकर देखा। बादल और रिमझिम बारिश। इसके बावजूद भी यात्रियों का आना-जाना। कुछ यात्री नीचे गोविंदघाट भी जा रहे थे और कुछ ऊपर हेमकुंड भी जाने वाले थे। हमें किसी भी तरह की जल्दी नही थी। कल ही सोच लिया था कि बारिश में कहीं भी नही जाएंगे। न फूलों की घाटी और न गोविंदघाट। वापस दरवाजा लगाया और सो गया। आठ बजे आँख खुली। उतनी ही बारिश थी, जितनी दो घंटे पहले थी। लेकिन इस बार मैं नीचे चला गया और एक बाल्टी गर्म पानी को कह आया। साथ ही यह भी कह दिया कि आज भी हम यहीं रुकेंगे। होटल मालिक बड़ी ही विचित्र प्रकृति का है। आप कुछ भी कहें, वह आपका उत्साह ही बढ़ाएगा। मसलन आप बारिश में हेमकुंड जाना चाह रहे हैं, वह आपको जाने को कहेगा। और बारिश की वजह से नहीं जाना चाह रहे हैं, तो आपसे रुक जाने को कह देगा। तो मुझसे भी उसने कह दिया कि बारिश में नहीं ...

अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क

23 जनवरी, 2017 तो हम बंबू-फ्लैट पहुँच गये। बढ़िया रोचक नाम है - बंबू-फ्लैट। यहाँ से चाथम बहुत नज़दीक है और नियमित बोट चलती हैं। हम बोट में रखकर भी बाइक को इधर ला सकते थे, लेकिन अंडमान की सड़कों को भी नापना चाहते थे। बंबू-फ्लैट से थोड़ा आगे एक तिराहा है, जहाँ से एक रास्ता नोर्थ-बे जाता है। रास्ता टूटा-फूटा था, लेकिन शायद बाइक तो चली ही जाती होगी। हम कुछ दिन पहले नोर्थ-बे जा चुके थे, तो आज वहाँ जाने की आवश्यकता नहीं थी। 25-25 रुपये की हमारी और 20 रुपये की बाइक की पर्ची कटी। आख़िरी दो-तीन किलोमीटर तक चढ़ाई बड़ी जोरदार है, लेकिन सड़क अच्छी बनी है। रास्ता - ऑफ़ कोर्स - घने जंगल से होकर गुज़रता है। फिर एक जगह पार्किंग है और बाइक यहीं खड़ी करके हम आगे चल दिये।

वुड़ फॉसिल पार्क, आकल, जैसलमेर

20 दिसंबर 2012 हम तनोट में थे। सुबह उठे तो मंदिर में आरती समाप्त होने वाली थी। जाकर एक बार फिर दर्शन किये और प्रसाद लिया। कैंटीन में चाय पी और निकल पड़े - अपने दिल्ली वापसी के सफ़र पर। तनोट से निकलते ही घंटियाली माता का मंदिर है। रेत का ऊँचा धोरा भी है। अच्छी लोकेशन पर है यह मंदिर। इसकी भी देखरेख बी.एस.एफ. ही करती है। इसलिये फोटो लेने पर कोई रोक नहीं। सड़क दो-लेन की है, बेहद शानदार बनी है। पिछली बार जब मैं साइकिल से आया था, तो यह सिंगल थी और इसे दोहरा बनाने का काम चल रहा था। रास्ते में रणाऊ गाँव आता है। यह भी रेत के टीलों से घिरा है और इसकी स्थिति भी फोटोग्राफी के लिये शानदार है। कहते हैं कि यहाँ कुछ फिल्मों की भी शूटिंग हो चुकी है।

राष्ट्रीय मरु उद्यान - डेजर्ट नेशनल पार्क

18 दिसंबर 2016 इस नेशनल पार्क से हमारा सामना अचानक अपने आप ही हो गया। असल में हमारी योजना थी - मुनाबाव से तनोट जाना। सीधा रास्ता है जैसलमेर के रास्ते जाओ। लेकिन मैं चाहता था कि सीमा के नज़दीक-नज़दीक ही रहें। एक सड़क म्याजलार से पश्चिम में जाती है और आगे सम के पास कहीं जाकर निकलती है। इसका और अन्य कई सड़कों का मैंने सैटेलाइट से अच्छी तरह अध्ययन किया। चूँकि इंटरनेट पर इस इलाके के बारे में, इसकी सड़कों के बारे में कुछ भी जानकारी उपलब्ध नहीं थी, सैटेलाइट इमेज पर भरोसा करके तय कर लिया था कि इस सड़क से पश्चिम में जायेंगे। यह कच्ची सड़क नहीं थी और सैटेलाइट से देखने पर काली लकीर स्पष्ट दिख रही थी, जिससे इतना तो पक्का हो गया कि एक साल पहले तक या दो साल पहले तक यहाँ पक्की सड़क थी। गूगल में सैटेलाइट इमेज एक-दो साल पुरानी होती हैं। ट्रैफिक नहीं होता और बारिश नहीं होती, इसलिये सड़क ख़राब होने की कोई संभावना नहीं।

जनवरी में स्पीति: किब्बर में हिम-तेंदुए की खोज

9 जनवरी 2016 कल जब हम दोरजे साहब के यहां बैठकर देर रात तक बातें कर रहे थे तो हिम तेंदुए के बारे में भी बातचीत होना लाजिमी था। किब्बर हिम तेंदुए के कारण प्रसिद्ध है। किब्बर के आसपास खूब हिम तेंदुए पाये जाते हैं। यहां तक कि ये गांव में भी घुस आते हैं। हालांकि हिम तेंदुआ बेहद शर्मीला होता है और आदमी से दूर ही दूर रहता है लेकिन गांव में आने का उसका मकसद भोजन होता है। यहां कुत्ते और भेडें आसानी से मिल जाते हैं। दोरजे साहब जिन्हें हम अंकल जी कहने लगे थे, का घर नाले के बगल में है। किब्बर इसी नाले के इर्द-गिर्द बसा है। घर में नाले की तरफ कोई भी रोक नहीं है, जिससे कोई भी जानवर किसी भी समय घर में घुस सकता है। कमरों में तो अन्दर से कुण्डी लग जाती है, लेकिन बाहर बरामदा और आंगन खुले हैं। अंकल जी ने बताया कि रात में तेंदुआ और रेड फॉक्स खूब इधर आते हैं। आजकल तो बर्फ भी पडी है। उन्होंने दावे से यह भी कहा कि सुबह आपको इन दोनों जानवरों के पदचिह्न यहीं बर्फ में दिखाऊंगा। यह बात हमें रोमांचित कर गई।