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तीसरा दिन: जैसलमेर में मस्ती तो है

13 दिसंबर 2019 कुछ साल पहले जब मैं साइकिल से जैसलमेर से तनोट और लोंगेवाला गया था, तो मुझे जैसलमेर में एक फेसबुक मित्र मिला। उसने कुछ ही मिनटों में मुझे पूरा जैसलमेर ‘करा’ दिया था। किले के गेट के सामने ले जाकर उसने कहा - “किले में कुछ नहीं है... आओ, आपको हवेलियाँ दिखाता हूँ।” फिर हवेलियों के सामने भी ऐसा ही कहा और इस प्रकार मैंने पूरा जैसलमेर कुछ ही मिनटों में देख लिया। मुझे यह सब बड़ा खराब लगा था और बाद में मैंने उसे फेसबुक पर ब्लॉक कर दिया। हमारा अपना एक फ्लो होता है, अपनी रुचि होती है, अपना समय होता है, तब हम कहीं घूमने या न घूमने का निर्णय लेते हैं। अक्सर जब हम किसी शहर में जाते हैं, तो उस शहर के मित्र हमारी रुचि, फ्लो और समय का ध्यान न रखते हुए अपनी मर्जी से शहर घुमाने लगते हैं... हम मना करने में संकोच कर जाते हैं और इस प्रकार हमारा वह समय भी बर्बाद हो जाता है और हमारे मन में उस शहर की भी छवि खराब होती है। ऐसा ही जैसलमेर के साथ था। फिर हमने परसों जोधपुर का किला देखा... वहाँ हमारा मन नहीं लगा, तो लग रहा था कि कहीं जैसलमेर के किले में भी ऐसा न हो। लेकिन जैसलमेर आए हैं...

जोधपुर में मेरा मन नहीं लगा

मैं अनगिनत बार जोधपुर जा चुका हूँ, लेकिन कभी भी यहाँ के दर्शनीय स्थल नहीं देखे। ज्यादातर बार अपनी ट्रेन-यात्राओं के सिलसिले में गया हूँ और एक बार दो साल पहले बाइक से। तब भी जोधपुर नहीं घूमे थे और एक रात रुककर आगे बाड़मेर की ओर निकल गए थे। इस बार भी हम जोधपुर नहीं घूमने वाले थे, लेकिन मित्रों के सुझाव पर जोधपुर लिस्ट में जोड़ा गया। यह यात्रा जैसलमेर और थार मरुस्थल की होने वाली थी, लेकिन सभी के लिए जोधपुर पहुँचना ज्यादा सरल है, इसलिए जोधपुर जोड़ना पड़ा - जोधपुर से शुरू और जोधपुर में खत्म। मैं भूल गया था कि हमारे सभी मित्र हमारे एक आग्रह पर कहीं भी पहुँच सकते हैं। मैंने सभी मित्रों को सुविधाभोगी समझ लिया था और मान लिया था कि अगर हम इस यात्रा को जोधपुर से जोधपुर तक रखेंगे, तो ज्यादा मित्र शामिल होंगे। हम आजकल दो तरह की यात्राएँ करते हैं - अपनी निजी यात्राएँ और कॉमर्शियल यात्राएँ। यह यात्रा एक कॉमर्शियल यात्रा थी - 11 से 15 दिसंबर 2019... सभी को 11 की सुबह जोधपुर में एकत्र होना था, पूरे दिन जोधपुर के दर्शनीय स्थल देखने थे और रात जोधपुर में रुककर अगले दिन टैक्सी से जैसलमेर के लिए निकल...

मानसून में बस्तर: दंतेवाड़ा, समलूर और बारसूर

11 अगस्त 2019 छत्तीसगढ़ के हमारे सदाबहार, सदाहरित मित्र सुनील पांडेय जी अपने अडतालीस काम छोड़कर कसडोल से रायपुर आ गए थे - अपनी गाड़ी से। उधर कंचन भी आ चुकी थी, जो पहले लखनऊ से आगरा गई, आगरा से झेलम एक्सप्रेस पकड़कर दिल्ली गई और अगले दिन दिल्ली से फ्लाइट से रायपुर। तो इस तरह हम चार जने रायपुर से बस्तर की ओर जा रहे थे। वैसे तो हमने अपनी पूरी फेसबुक बिरादरी से इस यात्रा पर चलने को कहा था, लेकिन "डर के आगे जीत है" का हौंसला इन चार ने ही दिखाया। हम ये तो नहीं जानते कि हमारी इस यात्रा पर कितने लोगों की आँखें लगी थीं, लेकिन यह जरूर जानते हैं कि कुछ लोग नक्सली हमला और बम-भड़ाम होने की उम्मीद जरूर कर रहे होंगे। कंचन को भूख लगी थी, इसके बावजूद भी उन्होंने हमें फ्लाइट में मिले पेटीज, बर्गर बाँट दिए। इससे हमारी भूख तो कांकेर तक के लिए मिट गई, लेकिन कंचन की भूख ने धमतरी भी नहीं पहुँचने दिए। कुरुद में बस अड्डे पर कुछ छोटा-मोटा मिलने की आस में गाड़ी रोकी, लेकिन वहाँ तो जन्नत मिल गई। चाय के साथ ताजे समोसे और जलेबियाँ। पोहा भी था, लेकिन मैं और दीप्ति रायपुर से ही इतना पोहा खाकर चले ...

आश्चर्यचकित कर देने वाली इमारत: चैहणी कोठी

घर की मुर्गी दाल बराबर... इस वजह से हम डेढ़ महीने यहाँ गुजारने के बाद भी चैहणी कोठी नहीं जा पाए। हमारे यहाँ घियागी से यह जगह केवल 10 किलोमीटर दूर है और हम ‘चले जाएँगे’, ‘चले जाएँगे’ ऐसा सोचकर जा ही नहीं पा रहे थे। और फिर एक दिन शाम को पाँच बजे अचानक मैं और दीप्ति मोटरसाइकिल से चल दिए। चलते रहे, चलते रहे और आखिर में सड़क खत्म हो गई। इससे आगे काफी चौड़ा एक कच्चा रास्ता ऊपर जाता दिख रहा था, जिस पर मोटरसाइकिल जा सकती थी, लेकिन कुछ दिन पहले यहाँ आए निशांत खुराना ने बताया कि उस कच्चे रास्ते पर मोटरसाइकिल से बिल्कुल भी मत जाना। तो इस बारे में वहीं बैठे एक स्थानीय से पूछा। उसने भी एकदम निशांत वाले शब्द कहे। मोटरसाइकिल यहीं किनारे पर खड़ी करने लगे, तो उसने कहा - “यहाँ की बजाय वहाँ खड़ी कर दो। अभी बस आएगी, तो उसे वापस मुड़ने में समस्या आएगी।” यहाँ से आगे पैदल रास्ता है। “कितना दूर है? आधे घंटे में पहुँच जाएँगे क्या?” “नहीं, आधे घंटे में तो नहीं, लेकिन पौण घंटे में पहुँच जाओगे।” उसी स्थानीय ने बताया। “मतलब दो किलोमीटर दूर है।” “हाँ जी।”

प्राचीन मंदिरों के शहर: तालाकाडु और सोमनाथपुरा

5 मार्च 2019 कुछ दिन पहले जब हमारे एक दोस्त मधुर गौर मैसूर घूमने आए थे, तो उन्होंने अपनी वीडियो में तालाकाडु और सोमनाथपुरा का भी जिक्र किया था। इससे पहले इन दोनों ही स्थानों के बारे में हमने कभी नहीं सुना था। फिर जब हम विस्तार से कर्नाटक घूमने लगे और बादामी, हंपी, बेलूर, हालेबीडू जैसी जगहों पर घूमने लगे, तो बार-बार सोमनाथपुरा और तालाकाडु का नाम सामने आ ही जाता। तो इसी के मद्देनजर हम आज जा पहुँचे पहले तालाकाडु और फिर सोमनाथपुरा। तालाकाडु कावेरी नदी के किनारे स्थित है और मैसूर से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। किसी जमाने में यह एक अच्छा धार्मिक स्थान हुआ करता था, लेकिन कालांतर में कावेरी में आई बाढ़ों के कारण यह पूरा शहर रेत के नीचे दब गया, जो आज भी दबा हुआ है। कुछ मंदिर रेत के नीचे से झाँकते दिखते हैं, जिनमें पातालेश्वर मंदिर, कीर्तिनारायण मंदिर, मरालेश्वर मंदिर और वैद्येश्वर मंदिर प्रमुख हैं। तालाकाडु से 25 किलोमीटर और मैसूर से 33 किलोमीटर दूर सोमनाथपुरा स्थित है। इसे होयसला राजाओं ने 13वीं शताब्दी में बनवाया था। मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और इसकी दीवारों व छतों पर...

बेलूर और हालेबीडू: मूर्तिकला के महातीर्थ - 2

होयसलेश्वर मंदिर, हालेबीडू 24 फरवरी 2019 बेलूर से 15-16 किलोमीटर दूर हालेबीडू भी अपने मंदिरों और मूर्तिकला के लिए विख्यात है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका निर्माण सन 1221 में करवाया गया था। मंदिर के बारे में और अपने यात्रा-वृत्तांत के बारे में हम कभी बाद में डिसकस करेंगे, फिलहाल फोटो के माध्यम से यहाँ की यात्रा कीजिए। मंदिर के द्वारपाल

बेलूर और हालेबीडू: मूर्तिकला के महातीर्थ - 1

24 फरवरी 2019 अगर आप कर्नाटक घूमने जा रहे हैं, तो इन दो स्थानों को अपनी लिस्ट में जरूर शामिल करें। एक तो बेलूर और दूसरा हालेबीडू। दोनों ही स्थान एक-दूसरे से 16 किलोमीटर की दूरी पर हैं और हासन जिले में आते हैं। बंगलौर से इनकी दूरी लगभग 200 किलोमीटर है। 11वीं से 13वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में होयसला राजवंश ने शासन किया और ये मंदिर उसी दौरान बने। पहले हम बात करेंगे बेलूर की। यहाँ चन्नाकेशव मंदिर है। चन्ना यानी सुंदर और केशव विष्णु को कहा जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। 300 रुपये तो जरूर खर्च होंगे, लेकिन मेरी सलाह है कि आप एक गाइड अवश्य ले लें। गाइड आपको वे-वे चीजें दिखाएँगे, जिन पर आपका ध्यान जाना मुश्किल होता।

लेपाक्षी मंदिर

19 फरवरी 2019 लेपाक्षी मंदिर का नाम हमने एक खास वजह से सुना था। यहाँ एक ऐसा पिलर है जो हवा में लटका है। अब जब हमें आंध्र प्रदेश में गंडीकोटा से कर्नाटक में बंगलौर जाना था, तो लेपाक्षी जाने की भी योजना बन गई। इसके लिए कोई बहुत ज्यादा लंबा चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। गंडीकोटा से कदीरी जाने वाला रास्ता बहुत खूबसूरत है। ट्रैफिक तो है ही नहीं, साथ ही खेतों में काम करते ग्रामीण असली भारत की झलक दिखाते हैं। अगर आप मोटरसाइकिल यात्रा पर हैं, तो आपको ऐसे डी-टूर भी लगा देने चाहिए। कई बार तो लोग मुड़-मुड़कर आपको देखते हैं, क्योंकि इस तरह बहुत कम लोग ही उनकी सड़कों पर आते हैं। और अगर आप रुक गए तो इनका अपनापन आपको हैरान कर देगा। वैसे तो हम श्री सत्य साईं प्रशांति निलयम यानी पुट्टापार्थी होते हुए भी जा सकते थे, लेकिन हमारी दिलचस्पी इन बातों में नहीं है, इसलिए कदीरी से सीधे ग्रंथला का रास्ता पकड़ा और सीधे नेशनल हाइवे 44 पर आ गए। यह नेशनल हाइवे कश्मीर को कन्याकुमारी को जोड़ता है। कुछ दूर बंगलौर की ओर चलने पर लेपाक्षी का रास्ता अलग हो जाता है। लेपाक्षी इस हाइवे से 15-16 किलोमीटर दूर है। ...

क्या आपने हम्पी देखा है?

जब हम बादामी से हम्पी जा रहे थे, तो मन में एक सवाल बार-बार आ रहा था। क्या हमें हम्पी पसंद आएगा? क्योंकि मैंने हम्पी की बहुत ज्यादा प्रशंसा सुनी थी। कभी भी आलोचना नहीं सुनी। जहाँ भी पढ़ी, हम्पी की प्रशंसा... जिससे भी सुनी, हम्पी की प्रशंसा। Top 100 Places to see before you die की लिस्ट हो या Top 10 Places to see before you die की लिस्ट हो... हम्पी जरूर होता। तो एक सवाल बार-बार मन में आता - कहीं हम्पी ओवररेटिड तो नहीं? इस सवाल का जवाब हम्पी पहुँचते ही मिल गया। हम यहाँ दो दिनों के लिए आए थे और पाँच दिनों तक रुके। छठें दिन जब प्रस्थान कर रहे थे, तो आठ-दस दिन और रुकने की इच्छा थी। वाकई हम्पी इस लायक है कि आप यहाँ कम से कम एक सप्ताह रुककर जाओ। जिस समय उत्तर में मुगल साम्राज्य का दौर था, यहाँ विजयनगर साम्राज्य था। इस साम्राज्य के सबसे प्रतापी राजा थे कृष्णदेवराय। और आपको शायद पता हो कि तेनालीराम भी इन्हीं के एक दरबारी थे। तो इस दौर में हम्पी का जमकर विकास हुआ। इनके साम्राज्य की सीमा पश्चिम में अरब सागर तक थी और विदेशों से समुद्र के रास्ते खूब व्यापार और आवागमन होता था।...

दक्षिण भारत यात्रा: पट्टडकल - विश्व विरासत स्थल

11 फरवरी 2019 पट्टडकल एक ऐसा विश्व विरासत स्थल है, जिसका नाम हम भारतीयों ने शायद सबसे कम सुना हो। मैंने भी पहले कभी सुना था, लेकिन आज जब हम पट्टडकल के इतना नजदीक बादामी में थे, तो हमें इसकी याद बिल्कुल भी नहीं थी। इसकी याद बाई चांस अचानक आई और हम पट्टडकल की तरफ दौड़ पड़े। सूर्यास्त होने वाला था और टिकट काउंटर से टिकट लेने वाले हम आखिरी यात्री थे। हालाँकि हम यहाँ की स्थापत्य कला को उतना गहराई से नहीं देख पाए, क्योंकि उसके लिए गहरी नजर भी चाहिए। हमें स्थापत्य कला में दिलचस्पी तो है, लेकिन उतनी ही दिलचस्पी है जितनी देर हम वहाँ होते हैं। वहाँ से हटते ही सारी दिलचस्पी भी हट जाती है और फिर दो-चार और भी स्थानों की खासियत मिक्स हो जाती है। “मैं स्थापत्य कला के क्षेत्र में एक दिन कोई बड़ा काम जरूर करूँगा” - यह वादा मैं पिछले दस सालों से करता आ रहा हूँ और तभी करता हूँ, जब ब्लॉग लिखना होता है और शब्द नहीं सूझते।

दक्षिण भारत यात्रा: बादामी भ्रमण

11 फरवरी 2019 कर्नाटक कर्क रेखा के पर्याप्त दक्षिण में है। कर्क रेखा के दक्षिण का समूचा भारत उष्ण कटिबंध में स्थित है। इस क्षेत्र की खासियत होती है कि यहाँ गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है। उधर कर्क रेखा के उत्तर में यानी उत्तर भारत में भयानक शीतलहर चल रही थी और हिमालय में तो बर्फबारी के कई वर्षों के रिकार्ड टूट रहे थे। और इधर हम गर्मी से परेशान थे। और हम एक-दूसरे से पूछ भी रहे थे और इल्जाम भी लगा रहे थे - “इसी मौसम में साउथ आना था क्या?” तो हमने तय किया था कि अभी चूँकि हमें साउथ में कम से कम एक महीना और रहना है, इसलिए गर्मी तो परेशान करेगी ही। और इससे बचने का सर्वोत्तम तरीका था कि केवल सुबह और शाम के समय ही घूमने के लिए बाहर निकलो। दोपहर को कमरे में रहो। यहाँ तक कि दोपहर को कभी बाइक भी नहीं चलानी। इसी के मद्देनजर आज की योजना थी - सुबह छह बजे से दोपहर दस-ग्यारह बजे तक बादामी घूमना है, शाम चार बजे तक आराम करना है और चार बजे के बाद ऐहोल की तरफ निकल जाना है और साढ़े पाँच बजे तक पट्टडकल पहुँचना है। इन सभी की दूरियाँ बहुत ज्यादा नहीं हैं। बादामी में एक तालाब है - अगस्त्य त...

जंजीरा किले के आसपास की खूबसूरती

19 सितंबर 2018 उस दिन मुंबई में अगर प्रतीक हमें न बताता, तो हम पता नहीं आज कहाँ होते। कम से कम जंजीरा तो नहीं जाते और दिवेआगर तो कतई नहीं जाते। और न ही श्रीवर्धन जाते। आज की हमारी जो भी यात्रा होने जा रही है, वह सब प्रतीक के कहने पर ही होने जा रही है। सबसे पहले चलते हैं जंजीरा। इंदापुर से जंजीरा की सड़क एक ग्रामीण सड़क है। कहीं अच्छी, कहीं खराब। लेकिन आसपास की छोटी-छोटी पहाड़ियाँ खराब सड़क का पता नहीं चलने दे रही थीं। हरा रंग कितने प्रकार का हो सकता है, यह आज पता चल रहा था। रास्ते में एक नदी मिली। इस पर पुल बना था और पानी लगभग ठहरा हुआ था। यहाँ से समुद्र ज्यादा दूर नहीं था और ऊँचाई भी ज्यादा नहीं थी, इसलिए पानी लगभग ठहर गया था। ऐसी जगहों को ‘क्रीक’ भी कहते हैं। दोनों तरफ वही छोटी-छोटी पहाड़ियाँ थीं और नजारा भी वही मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। जंजीरा गाँव एक गुमसुम-सा गाँव है। गूगल मैप के अनुसार सड़क समाप्त हो गई थी और यहीं कहीं जंजीरा किले तक जाने के लिए जेट्टी होनी चाहिए थी, लेकिन हमें मिल नहीं रही थी। अपने घर के बाहर बैठे एक बुजुर्ग ने हमारे रुकते ही हमारी मनोदशा समझ ली और बिना कुछ बोले एक...

“मेरा पूर्वोत्तर” - चराईदेव: भारत के पिरामिड

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें । 10 नवंबर 2017 हम जब सत्‍तर की रफ्तार से दौड़े जा रहे थे, तो दाहिनी तरफ पुरातत्व विभाग का एक सूचना-पट्‍ट लगा दिखा - चराइदेव मैदाम। स्पीड़ सत्‍तर ही रही, लेकिन यह नाम दिमाग में घूमने लगा - पढ़ा है इस नाम को कहीं। शायद कल इंटरनेट पर पढ़ा है। शायद इसे देखने का इरादा भी किया था। बाइक रोक ली। दीप्‍ति से पूछा - “वो पीछे चराइदेव ही लिखा था ना?” “कहाँ? कहाँ लिखा था? क्या लिखा था?” “चराइदेव।” “मैंने ध्यान नहीं दिया।” मोबाइल निकाला। इंटरनेट चलाया - “हाँ, यह चराइदेव ही है। अहोम राजाओं की पहली राजधानी।” बाइक वापस मोड़ी और चराइदेव मैदाम वाली सड़क पर चल दिए।

कुलधरा: एक वीरान भुतहा गाँव

18 दिसंबर 2016 कुलधरा - पता नहीं आपने इस स्थान का नाम सुना है या नहीं, लेकिन मैं मानता हूँ कि सुना भी होगा और देखा भी होगा। जैसलमेर से ज्यादा दूर नहीं है और सम जाने के रास्ते से थोड़ा-सा ही हटकर है। जब हम वहाँ पहुँचे तो पाँच बज चुके थे और जल्दी ही सूरज छिपने वाला था। यह मरुभूमि को देखते हुए काफ़ी बड़ा गाँव था और इसे योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया था। गाँव के अंदर सीधी सड़कें इसकी पुष्टि करती हैं। फिर किसी कारण से यह उजड़ गया और अब यहाँ कोई नहीं रहता। कोई कहता है कि इसका कारण पानी की तंगी था, कोई कहता है कि जैसलमेर के किसी वज़ीर के कारण उजड़ा और ज्यादा मान्यता है कि यह शापित और भुतहा है।

किराडू मंदिर - थार की शान

17 दिसंबर 2016 सूरज की पहली किरण निकलने से पहले ही हमने टैंट उखाड़कर पैक कर लिये थे। हम नहीं चाहते थे कि उत्सुक ग्रामीण यहाँ आयें और पूछताछ करें। थोड़े-से फोटो खींचे और निकल पड़े। बाड़मेर बाईपास पर एक जगह चाय-नाश्ता किया और मुनाबाव वाली सड़क पर चल दिये। सीमा सड़क संगठन द्वारा लगाया गया हरे रंग का बोर्ड़ कह रहा था - “प्रोजेक्ट चेतक बाड़मेर-गड़रा-मुनाबाव सड़क पर आपका स्वागत करता है।” साथ ही दूरियाँ भी लिखी थीं - मारुडी 10 किलोमीटर, जसई 20 किलोमीटर, हतमा 34 किलोमीटर, रामसर 59 किलोमीटर, गड़रा 85 किलोमीटर और मुनाबाव 125 किलोमीटर। मारुडी में दो पेट्रोल पंप हैं। हमने टंकियाँ फुल करा लीं। आगे मुनाबाव तक या जैसलमेर तक 250-300 किलोमीटर तक कोई पेट्रोल पंप हो या न हो। बाद में पता चला कि रामसर में भी पेट्रोल पंप है और शायद गड़रा में भी।

भोजपुर, मध्य प्रदेश

   अगस्त 2009 में मैं पहली बार मध्य प्रदेश घूमने गया था। सबसे पहले पहुंचा था भीमबेटका । उसी दिन इरादा बना भोजपुर जाने का। भीमबेटका के पास ही है। लेकिन कोई सार्वजनिक वाहन उपलब्ध न होने के कारण आधे रास्ते से वापस लौटना पडा। तब से कसक थी कि भोजपुर जाना है। आज जब बाइक साथ थी और हम उसी सडक पर थे जिससे थोडा सा हटकर भोजपुर है, तो हमारा भोजपुर जाना निश्चित था। भोपाल से थोडा सा आगे भैरोंपुर है। भैरोंपुर से अगर सीधे हाईवे से जायें तो औबेदुल्लागंज 22 किलोमीटर है। लेकिन अगर भोजपुर होते हुए जायें तो यही दूरी 30 किलोमीटर हो जाती है। यह कोई ज्यादा बडा फर्क नहीं है।    सावन का महीना होने के कारण भोजपुर में थोडी चहल-पहल थी अन्यथा बाकी समय यहां सन्नाटा पसरा रहता होगा। बेतवा के किनारे है भोजपुर। राजा भोज के कारण यह नाम पडा। उन्होंने यहां बेतवा पर बांध बनवाये थे और इस शिव मन्दिर का निर्माण करवाया था। किन्हीं कारणों से निर्माण अधूरा रह गया। पूरा हो जाता तो यह बडा ही भव्य मन्दिर होता। इसकी भव्यता का अन्दाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एक बडे ऊंचे चबूतरे पर मन्दिर बना है और मन्दिर में...

महेश्वर यात्रा

20 अगस्त 2015    हमें आज इन्दौर नहीं आना था। अभी दो दिन पैसेंजर ट्रेनों में घूमना था और तीसरे दिन यहां आना था लेकिन निशा एक ही दिन में पैसेंजर ट्रेन यात्रा करके थक गई और तब इन्दौर आने का फैसला करना पडा। महेश्वर जाने की योजना तो थी लेकिन साथ ही यह भी योजना थी कि दो दिनों में पैसेंजर यात्रा करते करते हम महेश्वर के बारे में खूब सारी जानकारी जुटा लेंगे, नक्शा देख लेंगे लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं हो सका। सुमित के यहां नेट भी बहुत कम चलता है, इसलिये हम रात को और अगले दिन सुबह को भी जानकारी नहीं जुटा पाये। हालांकि सुमित ने महेश्वर के बारे में बहुत कुछ समझा दिया लेकिन फिर भी हो सकता है कि हम महेश्वर के कुछ अत्यावश्यक स्थान देखने से रह गये हों।