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भारत प्रवेश के बाद: नेपाल बॉर्डर से दिल्ली

इस यात्रा की किताब ‘ हमसफ़र एवरेस्ट ’ हमारे भारत में प्रवेश करते ही समाप्त हो जाती है। इसके बाद क्या हुआ, आज आपको बताते हैं। इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 4 जून 2016 तो सीमा पार कर लेने के बाद फरेंदा की तरफ़ दौड़ लगा दी, जो यहाँ से 50 किलोमीटर दूर है। सड़क अच्छी बनी है। निकट भविष्य में और भी अच्छी बन जायेगी। लेकिन सामने से आते गाड़ी वाले अपनी हैड़लाइट डाउन नहीं करते। नेपाल में दूर से देखते ही हैड़लाइट डाउन कर लेते थे। यदि हम ऐसा करने में देर लगा देते तो सामने वाला लाइटें जला-बुझाकर तब तक इशारा करता रहता, जब तक हम डाउन न कर लें। वास्तव में नेपाल में भारत के मुकाबले ‘ट्रैफिक सेंस’ ज्यादा अच्छी है। लेकिन आज हमें कुछ भी ख़राब नहीं लग रहा था। जल्द ही मैंने भी हैड़लाइट डाउन करनी बंद कर दी और उसी ज़मात में शामिल हो गया, जिसकी अभी-अभी आलोचना कर रहा था। विमलेश जी के भाई का नाम कमलेश है। वे फरेंदा में मिल गये। बिजली विभाग में अच्छे पद पर हैं। अपने क्वार्टर पर अकेले ही थे और हमारे लिये रोटी व दाल चावल बना रखे थे। दीप्ति ने कहा - “आज भी दाल-भात।” मैंने कहा - “नहीं, ये दाल-भात...

फोटो-यात्रा-22: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से भारत

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 3 जून 2016 हम धीरे से नेपाल के द्वार से बाहर निकल गये। ‘नो मैंन्स लैंड़’ में पहुँचे और उतने ही धीरे से भारतीय द्वार में प्रवेश कर गये। किसी ने हमारी तरफ़ देखा तक नहीं। नेपाली बाइक भारत में और भारतीय बाइक नेपाल में दिनभर आती-जाती रहती हैं। अब हम भारत में थे। अपने देश में थे। चाहे यह जैसा भी हो, इसके नागरिक जैसे भी हों, लेकिन है तो हमारा अपना ही। चौबीस दिन नेपाल में रहकर हमें अपने देश की सख़्त ज़रूरत महसूस होने लगी थी। नेपाली सिम निकालकर भारतीय सिम डाल लिया। फेसबुक पर पहला संदेश भेजा - “भारत माता की जय।” एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट ’ का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:

फोटो-यात्रा-21: एवरेस्ट बेस कैंप - खारी-ला से ताकशिंदो-ला

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 1 जून 2016 “रास्ते में एक विदेशी और एक भारतीय ट्रैकर मिले। भारतीय का नाम शायद साहिल था और वह नोएड़ा का रहने वाला था। ये दोनों एवरेस्ट मैराथन में भाग लेकर लौट रहे थे। इन्हें वैसे तो लुकला से फ्लाइट से काठमांडू जाना था, लेकिन दो दिनों से मौसम ख़राब होने के कारण कोई भी वायुयान नहीं उड़ सका। विदेशी की काठमांडू से कल दोपहर की फ्लाइट थी, जिसे वह किसी भी हालत में नहीं छोड़ सकता था। इस समय उसके पास काठमांडू पहुँचने के लिये केवल चौबीस घंटे ही शेष थे। मौसम कब तक सामान्य होगा, कब उड़ानें नियमित होंगी, इसकी प्रतीक्षा न करते हुए उसने फाफलू पहुँचने का जो निर्णय लिया था, वो एकदम ठीक निर्णय था।” “ट्रैकिंग के पहले दिन जिन स्थानों पर हम रुके थे, जहाँ-जहाँ पानी पीया था, सभी को ‘रिमाइंड़’ करते गये। कोठारी जी भी अदृश्य रूप में साथ थे। यहाँ इस पुल के पास बैठकर हमने कोठारी जी की एक घंटे तक प्रतीक्षा की थी। यहाँ कोठारी जी ने ‘तातोपानी’ पीया था। यहाँ हमें पहली ‘खच्चर-ट्रेन’ मिली थी।”

फोटो-यात्रा-20: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से खारी-ला

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 30 मई 2016 “‘मैं भी भारतीय हूँ, लद्दाख से’ यह सुनते ही जो खुशी हुई, उसे बयाँ नहीं कर सकता। एक ही साँस में मैंने उस पर कई प्रश्न उडेल डाले। वह भारतीय सेना के एवरेस्ट अभियान का एक हिस्सा था। उसने कल मैराथन में भाग भी लिया था। आठवाँ स्थान हासिल किया। इस दल में बाकी सभी उच्चाधिकारी थे, अकेला यही निचले दर्जे का था। नाम था मुरुप दोरज़े।” “लगातार चलते रहने से, चलते ही रहने से मानसिक और शारीरिक दोनों थकान होती है। एक सीमा के बाद पैर अपने ही आप कहने लगते - अब, बस और नहीं। रुकने के ठिकाने हर जगह मौजूद हों, तो यह भावना जल्दी होने लगती है। अगर रुकने का ठिकाना दस किलोमीटर आगे होता, तो थकान होने के बावज़ूद भी दस किलोमीटर और चलना पड़ता। आप जहाँ भी थक जायेंगे, वहीं एक होटल होगा और काफ़ी संभावना है कि आप वहीं रुक भी जायेंगे।”

फोटो-यात्रा-19: एवरेस्ट बेस कैंप - थुकला से नामचे बाज़ार

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 29 मई 2016 “यह ठीक है कि यहाँ सारा सामान खच्चरों पर या याकों पर या इंसानों की पीठ पर बड़ी दूर से ढोया जाता है। सामान पहुँचने में कई-कई दिन लग जाते हैं। लेकिन खाने की चीजें कई साल पहले एक्सपायर हो चुकी होती हैं। ज्यादातर विदेशी लोग यहाँ आते हैं, क्या किसी का ध्यान नहीं जाता इस बात पर? मुझे अपने देश का लद्दाख और कई दुर्गम इलाके याद आये। वहाँ इस तरह एक्सपायरी चीजें नहीं मिलतीं। और अगर मिलती भी हैं तो दुकानदार को इस बारे में पता रहता है और वह इसके लिये शर्मिंदा भी होता है। कई बार तो ऐसी चीजें फ्री में भी दे देते हैं, अन्यथा पैसे कम तो ज़रूर ही हो जाते हैं। नेपाल को इस मार्ग से प्रतिवर्ष अरबों रुपये मिलते हैं। यह नेपाल की सबसे महँगी जगह भी है। लेकिन खाने की गुणवत्ता इस महँगाई के अनुरूप नहीं है। बेतहाशा व्यावसायिकता है। अंधी व्यावसायिकता। किसी को अगर इस तरह का खाना खाने से कुछ हो भी जाता होगा, तो ये लोग बड़ी आसानी से उस व्यक्ति की ही गलती घोषित कर देते होंगे - हाई एल्टीट्यूड़ की वजह से ऐसा हुआ।”

फोटो-यात्रा-18: एवरेस्ट के चरणों में

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 28 मई 2016 “हम मानसिक और शारीरिक रूप से इतने थक चुके थे कि 5500 मीटर चढ़ने के लिये - अपना एक रिकार्ड़ बनाने के लिये - हम काला पत्थर नहीं जाने वाले थे। यदि मौसम साफ़ होता, तो एवरेस्ट देखने के लालच में जा भी सकते थे, लेकिन ऊँचाई के लालच में कभी नहीं जायेंगे।” “मेरी शिखर पर चढ़ने की कभी इच्छा नहीं होती। बेसकैंप तक आने की इच्छा थी और आज बेसकैंप मेरे सामने था।” “बेसकैंप से लौटते समय एक कसक भी थी कि एवरेस्ट के दर्शन नहीं हुए। लेकिन आभास भी हो रहा था कि वह हमें देख रही है और हम उसके साये में चल रहे हैं।” “सोने से पहले आज के दिन के बारे में सोचने लगे। निःसंदेह आज का दिन हमारी ज़िंदगी का एक अहम दिन था। जिस ट्रैक पर जाने की इच्छा सभी ट्रैकर्स करते हैं, आज हमने उसी ट्रैक को पूरा कर लिया था। एवरेस्ट बेस कैंप। हालाँकि प्रत्येक पर्वत का एक बेसकैंप होता है, लेकिन अगर कहीं दो ट्रैकर्स खड़े ‘बेसकैंप’ का ज़िक्र कर रहे हों, तो समझ लेना कि एवरेस्ट बेसकैंप की ही चर्चा चल रही होगी।”

फोटो-यात्रा-17: एवरेस्ट बेस कैंप - ज़ोंगला से गोरकक्षेप

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 27 मई 2016 “या तो गंगोत्री के पास तपोवन के बराबर में शिवलिंग चोटी ने मुझे इतना सम्मोहित किया था, या फिर आज आमा डबलम ने किया। ये आगे-पीछे दो चोटियाँ हैं। आगे वाली कुछ छोटी है और पीछे वाली ज्यादा ऊँची है। ऐसा लगता कि आमा ने - अम्मा ने - अपनी बेटी को गोद में बैठा रखा हो। आमा डबलम का मतलब क्या होता है? किसी ने कहा - अम्मा का आभूषण, तो किसी ने कहा - डबल अम्मा यानी दो माताएँ। मतलब कुछ भी हो, आमा डबलम ही एवरेस्ट क्षेत्र का आभूषण है।” “आश्चर्यजनक रूप से गोरकक्षेप में हमें छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा दिखायी पड़ी। इसे पुणे की ‘गिरीप्रेमी’ संस्था ने 2012 में लगाया था। यहाँ इतनी दूर विदेश में, जहाँ से चीन की सीमा केवल चार हवाई किलोमीटर दूर थी, शिवाजी महाराज की प्रतिमा को देखकर लगा जैसे कोई अपना मिल गया हो। इसके लिये पुणे की यह संस्था वास्तव में बधाई की पात्र है। शायद ही कोई नेपाली या अन्य विदेशी ट्रैकर्स शिवाजी महाराज के बारे में जानते हों, लेकिन भारत का बच्चा-बच्चा इसी नाम से अपने लिखने-पढ़ने की शुरूआत करता है।”

फोटो-यात्रा-16: एवरेस्ट बेस कैंप - थंगनाग से ज़ोंगला

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 26 मई 2016 आज का दिन हमारी इस यात्रा का सबसे मुश्किल दिन रहा। बर्फ़बारी के बीच ख़राब मौसम में 5320 मीटर ऊँचा चो-ला दर्रा पार करना आसान नहीं रहा। रही-सही कसर इसके उस तरफ ग्लेशियर ने पूरी कर दी। “बर्फ़ होने के बावज़ूद भी हमें रास्ता मिल रहा था। कारण था कि ठीकठाक पगडंड़ी बनी थी। फिर हमसे एक-डेढ़ घंटे पहले पाँच लोग यहाँ से गुज़रे थे, तो उनके पैरों के निशान भी मिल रहे थे। ऐसा ही चलता रहा, तो उत्तम होगा। लेकिन यदि मामूली-सी बर्फ़ भी पड़ गयी, तो ये निशान मिट जायेंगे। क्या पता आगे दर्रे के पास कैसी पगडंड़ी हो? हो या न हो।” “थोड़ी देर के लिये थोड़े-से बादल इधर-उधर हो गये और हमें सामने बिल्कुल सिर के लगभग ऊपर तीन चोटियाँ दिखायी पड़ीं। इनके बीच में दो दर्रों जैसी आकृतियाँ भी दिखीं। इनमें से एक चो-ला है। इसे देखना भर ही सिहरन पैदा कर रहा था। यह एक ‘रॉक-फ़ाल जोन’ था, जहाँ खड़े ढाल पर आपको ढीले पत्थरों पर चढ़ना होगा और कभी भी कोई भी पत्थर आपके चलने से या अपने-आप भी नीचे गिर सकता था। अभी तक हम बादलों की उपस्थिति को कोस रहे थे। अब खुश हुए कि बादल रहें, तो अच्छ...

फोटो-यात्रा-15: एवरेस्ट बेस कैंप - गोक्यो से थंगनाग

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 25 मई 2016 “आज पिज़्ज़ा खाने का मन किया। दो पनीर पिज़्ज़ा मँगा लिये। लेकिन इन्हें किस तरह हलक से नीचे उतारा, बस हम ही जानते हैं। इस पिज़्ज़ा का जो एक फोटो हमने खींचा था, उसे अब भी यदि देख लेते हैं तो दिनभर मन ख़राब रहता है। असल में सारी करामात याक के पनीर की थी। यह पनीर खट्टा भी था और थोड़ी-सी कड़वाहट भी लिये था। और ‘पिज़्ज़ा-बेस’ अभी हाथ के हाथ आटे से बनाया था, जो बासी रोटी जैसा स्वाद दे रहा था। जो थोड़ा-बहुत स्वाद था, वह सॉस के कारण था। शुरू में हमने ‘तहज़ीब’ दिखाते हुए छुरी और काँटे से खाना चाहा, लेकिन अभ्यास न होने के कारण और बेस्वाद होने के कारण जल्द ही अपने भारतीयपन पर आ गये। वे जो विदेशी कोने में बैठे हैं, जो सोचते हैं, सोचते रहें। नेपाली तो उँगलियों से खाने में हमारे भी उस्ताद होते हैं।”

फोटो-यात्रा-14: गोक्यो और गोक्यो-री

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 24 मई 2016 “आज हमारा इरादा गोक्यो-री जाने का था। ‘री’ का अर्थ होता है चोटी। गोक्यो के पास 5300 मीटर से ऊँची एक चोटी है, इसे ही गोक्यो-री कहा जाता है। इस पर चढ़ना आसान है, हालाँकि अत्यधिक ऊँचाई का असर तो पड़ता ही है। दीप्ति ने पहले तो ना-नुकूर की, लेकिन बाद में चलने को राज़ी हो गयी। हम लगभग 4700 मीटर पर थे। ऐसे इलाके में 600 मीटर चढ़ना भी बेहद मायने रखता है। मुझे दीप्ति पर लगातार निगाह रखनी पड़ेगी। वह अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। और ऊपर जाने पर उसकी तबियत और ज्यादा ख़राब हो सकती है।” “ख़ूब आवाजाही होते रहने के कारण स्पष्ट पगडंड़ी बनी थी और भटकने का कोई डर नहीं था। हमारे पीछे-पीछे दो विदेशी और आ रहे थे। लेकिन वे भी उच्च पर्वतीय बीमारी से पीड़ित प्रतीत हो रहे थे। दीप्ति को भी बार-बार बैठना पड़ रहा था। वह थोड़ी देर बैठती, फिर दो कदम चलती और फिर बैठ जाती। आख़िरकार जब हम लगभग 5100 मीटर पर थे, उसने हिम्मत छोड़ दी - “अब और आगे नहीं जा सकती।”

फोटो-यात्रा-13: एवरेस्ट बेस कैंप - फंगा से गोक्यो

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 23 मई 2016 आज हम धरती के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक पर थे - गोक्यो झील पर। “हिमालय में 4000 मीटर से ऊपर वाली सभी झीलें बेहद खूबसूरत होती हैं। मुझे ऐसी झीलें बहुत आकर्षित करती हैं। फिर गोक्यो में तो पाँच झीलें हैं।” “अपनी-अपनी रजाइयों में पड़े हुए यही महसूस करते रहे कि इतने दिनों बाद - आठ दिनों की ट्रैकिंग के बाद - हमने एक पड़ाव पा लिया है। गोक्यो झील इस यात्रा का एक अहम पड़ाव था। बेसकैंप केवल एवरेस्ट के कारण प्रसिद्ध है, लेकिन असली नैसर्गिक सुंदरता तो झीलों में ही होती है। वह यहाँ आकर पता भी चल रहा था।”

फोटो-यात्रा-12: एवरेस्ट बेस कैंप - डोले से फंगा

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 22 मई 2016 “याकों के बारे में मैंने कहीं पढ़ा था कि ये आक्रामक होते हैं और इन्हें कभी भी पूरा पालतू नहीं बनाया जा सकता। बस, तभी से इनसे डर लगने लगा था। लेकिन ये याक भी हमारी ही तरह थे। शायद इन्होंने भी कहीं भूलचूक से पढ़ लिया होगा - “दो पैरों पर चलने वाला, अपने शरीर को ढककर रखने वाला जानवर, जो हमेशा अपनी पीठ पर बोझा उठाये घूमता रहता है - पता नहीं कहाँ से आता है, कहाँ जाता है - बहुत ख़तरनाक होता है। अपने से कई गुने बड़े हम याकों को खूंटे से बाँधकर रखता है, पालतू बना लेता है, बोझा ढुलवाता है और दूध भी निकाल लेता है। इनसे जितना बच सको, बचना चाहिये।” इसी पढ़ाई-लिखाई का नतीज़ा था कि ये हमसे दूर ही दूर रहे। हम पगडंडी पर इनके नज़दीक पहुँचते, तो ये बछड़ों समेत दूर भाग जाते।”

फोटो-यात्रा-11: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से डोले

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 21 मई 2016 और अचानक निर्णय लिया कि हम पहले बेसकैंप नहीं जायेंगे, बल्कि गोक्यो झील जायेंगे। “अगर आपको पैसों की कुछ भी चिंता नहीं है, तो नामचे आपके लिये बेहद शानदार स्थान है। आलीशान होटल हैं, पूर्णरूप से घुमक्कड़ी वाला माहौल है, दुनियाभर से यात्री आते हैं और भीड़-भड़ाका होने के बावज़ूद भी यह खलता नहीं है। इस बात का एहसास हमें तब हुआ, जब हम सारा बिल भर चुके। जब हमें यहाँ और खर्चा करने की आवश्यकता नहीं रही, तब हमें नामचे की खूबसूरती दिखनी शुरू हुई।” ... “मैंने पूछा कि कमरा कितने का है? बोला - “फ्री है।” मुझे सुनायी पड़ा - “थ्री हं(ड्रेड)।” मैंने मोलभाव करना शुरू कर दिया - “सौ रुपये लगाओगे, तो हम आयेंगे।” हँसते हुए बोला - “सौ छोड़िये, एकदम फ्री में रुकना है आपको। केवल खाने के पैसे देने हैं।”

फोटो-यात्रा-10: एवरेस्ट बेस कैंप - फाकडिंग से नामचे बाज़ार

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 20 मई 2016 “आज हम इस ट्रैक पर पहली बार 3000 मीटर से ऊपर आये हैं। हालाँकि कुछ दिन पहले ताकशिंदो-ला से 3000 मीटर से ट्रैकिंग आरंभ की थी, लेकिन आज तक इससे नीचे ही रहे। 3000 मीटर का एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ता है - अब हम ‘हाई एल्टीट्यूड़’ में थे। नामचे बाज़ार में जब हम प्रवेश कर रहे थे, तो जगह-जगह इसके बारे में चेतावनियाँ और इससे बचने के तरीक़े लिखे थे। हालाँकि मैंने पहले भी काफ़ी ऊँचाईयों पर ट्रैकिंग कर रखी है, लेकिन जब आपके चारों तरफ़ ‘हाई एल्टीट्यूड़’ की चेतावनियाँ लिखी हों, तो इनका भी कुछ तो मानसिक असर पड़ता ही है। अब कहीं न कहीं लग भी रहा था कि कल जब हम नामचे से आगे बढ़ेंगे, तो पता नहीं क्या होगा? क्या हमें भी बाकी ज्यादातर ट्रैकरों की तरह एक दिन नामचे में बिताना चाहिये? नहीं, हम कल आगे बढ़ेंगे।” ... “डाइनिंग रूम में बैटरी चार्जिंग के रेट लिखे थे - डिजिटल कैमरा फुल चार्ज 300 रुपये, लैपटॉप 400 रुपये, मोबाइल 300 रुपये। हमने ‘चेक-इन’ करने से पहले ही तय कर लिया था कि कैमरा-मोबाइल-पावर बैंक सब चार्ज करेंगे और वो भी फ्री में। मालकिन ने ‘ध...

फोटो-यात्रा-9: एवरेस्ट बेस कैंप - सुरके से फाकडिंग

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 19 मई 2016 आज का दिन हमारे लिये भावनात्मक रूप से बड़ा मुश्किल रहा। हमारे साथी कोठारी जी ने वापस जाने का निर्णय लिया। एक बार तो हम भी उनके साथ ही वापस चल देने का मन बना चुके थे। “अक्सर वापस लौटने का भी कई बार मन कर जाता था, लेकिन हमें बेस कैंप भी जाना था। एक ही बात हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रही थी - ज़िंदगी में एवरेस्ट बेस कैंप जाने का इसके बाद कभी भी मौका नहीं मिलेगा। अपना पसंदीदा काम करने के मौके सबको मिलते हैं, लेकिन आप उन्हें पहचान नहीं पाते। हमें बड़ी मुश्किलों से यह मौका मिला था, इसे गँवा नहीं सकते थे।” “यह काफ़ी निराशाजनक समय था। हमारे भी मन में आया कि उनके साथ ही लौट चलते हैं। दुनिया में और भी अनदेखे स्थान हैं। क्या हासिल होगा एवरेस्ट बेस कैंप जाकर? लेकिन इस तरह का कोई भी त्वरित निर्णय लेने से पहले थोड़ा रुक जाना चाहिये। हम तात्कालिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर निर्णय लेते हैं और बाद में पछताते हैं। रुक जाने से, आराम करने से, शांत हो जाने से हमारे सोचने का दायरा बढ़ जाता है और हम तात्कालित परिस्थितियों के प्रभाव में नहीं आत...

फोटो-यात्रा-8: एवरेस्ट बेस कैंप - बुपसा से सुरके

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 18 मई 2016 “हम नकारात्मक ऊर्जा से भरे थे। कभी-कभार मन में आता कि वापस चलो। क्या करेंगे बेस कैंप जाकर? हर चोटी का एक बेस कैंप होता है। हमारे यहाँ कंचनजंघा का भी बेस कैंप है, नंदादेवी का भी है, बाकियों का भी है, जहाँ नियमित ट्रैकर्स जाते हैं। इसके साथ ‘एवरेस्ट’ शब्द जुड़ा है तो क्या हुआ? हम वहाँ पहुँच भी जायेंगे तो क्या होगा? यार-दोस्तों में नाम ही तो होगा। यहाँ की महंगाई और घोर व्यावसायिकता से भी बड़ी परेशानी हो रही थी। मुझे ट्रैकिंग में चाय बहुत पसंद है। भारतीय हिमालय में दस रुपये की चाय आपको स्थानीय लोगों से जोड़े रखती है। यहाँ 70 रुपये का चाय जैसा दिखने वाला गर्म पानी किसी से भी जुड़ाव नहीं होने दे रहा।” ... “अपने हिमालय को याद कर रहे थे। हमारे हिमालय में ट्रैकिंग की बात ही अलग है। आपको रास्ते में कहीं गद्दियों के, कहीं गड़रियों के झौंपड़े मिलेंगे। आपको दूध मिलेगा, खाना मिलेगा। पैसे भी नाममात्र के ही लगेंगे। चूल्हे के सामने बैठकर गर्मागरम फुल्के खाओगे, अपने हाथ से कुकर में से सब्जी लोगे, टोकरे में से प्याज उठाकर सलाद बनाओगे। वहीं सो...

फोटो-यात्रा-7: एवरेस्ट बेस कैंप - जुभिंग से बुपसा

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 17 मई 2016 “पता नहीं बंदा किस मिट्टी का बना था, आपे से बाहर हो गया - “आपको यहाँ कोई दिक्कत है, तो दूसरे होटल में चले जाईये।” इसके बाद कोठारी जी और उसमें बहस होने लगी। मैंने बीच-बचाव किया - “भाई देख, हम ग्राहक हैं। हमें कोई असुविधा हो रही है, तो हम किससे शिकायत करें? तुम शांत रहो और एक-एक शिकायत पर ध्यान दो। यह कहना बिल्कुल भी ठीक नहीं है कि होटल छोड़ दो।” मन तो खट्टा हो ही चुका था। मैंने फिर कोठारी जी से कहा - “सर, होटल छोड़ देते हैं।” ... “लॉज में हम आलू के पराँठे का ऑर्डर देने वाले थे, इसलिये यहाँ भी इसी के बारे में पूछा। होटल मालिक व मालकिन ने एक-दूसरे को देखा, फिर हमसे पूछा - “यह क्या होता है?” इसके बाद बारी थी मेरी और दीप्ति को एक-दूसरे को देखने की - “हम बनायेंगे।” कुकर में आलू उबाले। भर-भरकर पाँच पराँठे बनाये। दो कोठारी जी ने, एक-एक हमने और एक होटल मालिक ने खाया। शानदार अनुभव था। दीप्ति पराँठे बना रही थी, मैं परोस रहा था और होटल मालिक बैठकर खा रहे थे। बाद में जब हमने पूछा कि पराँठे कैसे लगे, तो उत्तर मिला - “बहुत शानदार, ल...

फोटो-यात्रा-6: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से जुभिंग

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 16 मई 2016 “140 रुपये की दो कप चाय और 250 रुपये का एक आमलेट मिला। यह इस ट्रैक की शुरूआत है। अभी इतनी महंगाई है, तो आगे और भी ज्यादा महंगाई मिलने वाली है। वैसे तो हमारे पास पर्याप्त पैसे थे, लेकिन फिर भी हम रोज के ख़र्चे और बाकी बचे पैसों व बाकी बचे दिनों का हिसाब एक कागज पर नोट करते जाते थे। कहीं ऐसा न हो कि किसी दिन हमें पता चले कि केवल दो दिन के पैसे ही बचे हैं। यहाँ आपके पास पैसे नहीं हैं, तो आपकी कोई पूछ नहीं।” “नहाने का बड़ा मन था। यहाँ हम अपने इस ट्रैक की न्यूनतम ऊँचाई पर थे। यहाँ नहा लिये तो ठीक, अन्यथा आगे शायद नहाना न हो। गर्म पानी बहुत महँगा मिलेगा, जबकि यहाँ ठंड़े पानी से फ्री में नहाया जा सकता था। लेकिन इतने थके हुए थे कि कमरे में जाते ही पसर गये। एक घंटे तक बेसुध पड़े रहे, यहाँ तक कि दरवाजा भी बंद नहीं किया। एक घंटे बाद जब उठे तो पैर अकड़ गये थे और हम तीनों चलने में असमर्थ थे। किसी तरह कमरे से बाहर निकले और कदम-कदम पर ‘आई-उई’ चिल्लाते हुए थोड़ा टहले। बाहर बारिश हो रही थी, मौसम में ठंड़क हो गयी थी। अब नहाने का मन बदल चुका ...

फोटो-यात्रा-5: एवरेस्ट बेस कैंप - फाफलू से ताकशिंदो-ला

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 15 मई 2016 “समय देखा - चार बजे थे। हम फाफलू से ग्यारह बजे चले थे। दूरी तय की केवल 17 किलोमीटर। डेढ घंटा रिंगमो में खड़ा रहा। इस तरह इस 17 किलोमीटर की दूरी को तय करने में साढ़े तीन घंटे लग गये। इसी से इस रास्ते की कठिनाईयों का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पता होता, तो हम बाइक फाफलू में ही छोड़कर यहाँ तक पैदल आते। लेकिन एक सुकून अवश्य मिला। अब हमें कई दिनों तक बाइक नहीं चलानी है। अब यहाँ से एवरेस्ट बेस कैंप की ट्रैकिंग आरंभ होगी। अब वो समय शुरू हुआ है, जिसके लिये हम इतने उत्साहित थे, जिसके लिये इतनी दूर आये थे।” एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट ’ का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये:

फोटो-यात्रा-4: एवरेस्ट बेस कैंप - दुम्जा से फाफलू

इस यात्रा के फोटो आरंभ से देखने के लिये यहाँ क्लिक करें । 14 मई 2016 “जब भात के साथ दाल और आलू आये तो कोठारी जी ने पूछ लिया - ‘‘वेज?” अर्थात इसमें मांस तो नहीं है? लड़की रसोई में गयी और सरसों का भगोना उठा लाई और परोसते हुए बोली - “वेज।” यहाँ हमें संदेह हुआ कि कहीं ये लोग इसे ही ‘वेज’ तो नहीं कहते? हम ‘वेज’ कहते तो हमारा आशय शाकाहारी से होता, लेकिन यहाँ उबली हुई बे-स्वाद सरसों परोस दी जाती। इसके बाद भी कई बार ऐसा ही हुआ, तब हमें पक्का पता चल गया कि यही ‘वेज’ है। हमें यह सब्जी निहायत नापसंद थी और हम इसे बिल्कुल भी नहीं खाना चाहते थे। अब हम बड़ी दुविधा में पड़ गये थे। हम ‘वेज खाना’ ही लेना चाहते थे, लेकिन ‘वेज’ नहीं। कमाल यह हुआ कि सरसों बर्बाद न हो, इसलिये हमने दाल-भात माँगते समय यह कहना शुरू कर दिया था - “‘वेज’ मत देना।" एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक पर आधारित मेरी किताब ‘हमसफ़र एवरेस्ट ’ का एक अंश। किताब तो आपने पढ़ ही ली होगी, अब आज की यात्रा के फोटो देखिये: