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Showing posts with the label South India

तमिलनाडु से दिल्ली वाया छत्तीसगढ़

8 मार्च 2019 हम ऊटी में थे और आज पूरे दिन ऊटी में ही रहने वाले थे। ऊटी के कुछ दर्शनीय स्थलों की लिस्ट दीप्ति ने बना रखी थी और मुझे भी उन स्थलों पर जाना ही था। मुझे पहली नजर में ऊटी पसंद नहीं आया था, पता नहीं क्यों। तो लिस्ट के अनुसार जहाँ-जहाँ भी गए, सभी जगहें दीप्ति को नापसंद होती चली गईं। और उसे ऊटी के भीड़-भरे टूरिस्ट स्पॉट्स भला पसंद भी क्यों आएँगे! पहले ‘रोज गार्डन’ गए, लेकिन वहाँ एक ही क्यारी में कुछ फूल खिले थे। कर्मचारी कह रहे थे कि सभी फूल देखने अप्रैल में आना। ऊटी लेक गए, तो यह देखकर हैरान रह गए कि अलग-अलग नाव ठेकेदारों ने झील के भी अपने-अपने हिस्से बाँट रखे हैं। मोटर बोट पैडल बोट के हिस्से में नहीं जा सकती और पैडल बोट चप्पू वाले हिस्से में नहीं जा सकती। यहाँ तक कि आप झील के किनारे पर भी तभी बैठ पाएँगे, जब आपने उस हिस्से वाली बोट का टिकट लिया हो। यहाँ से भी वापस भाग लिए। वापस होटल आए और “हाय गर्मी, हाय गर्मी” कहते सो गए। हालाँकि ऊटी में गर्मी नहीं थी।

दक्षिण के जंगलों में बाइक यात्रा

6 मार्च 2019 हम मैसूर में थे और इतना तो फाइनल हो ही गया था कि अब हम पूरा केरल नहीं घूमेंगे और कन्याकुमारी तक भी नहीं जाएँगे। यहाँ गर्मी बर्दाश्त से बाहर होने लगी थी और हिमालय से बर्फबारी की खबरें आ रही थीं। मुझे चेन्नई निवासी शंकर राजाराम जी की याद आई। आजकल वे हिमालय में थे और जनवरी में हिमालय जाते समय वे हमारे यहाँ भी होकर गए थे। और उस समय वे चेन्नई की गर्मी से परेशान थे और बार-बार कह रहे थे कि उन्हें भी साउथ की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती। अब जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे हैं, हमें शंकर सर भी याद आ रहे हैं और साउथ की गर्मी भी उतनी ही भयानक लगती जा रही है। लेकिन दीप्ति की इच्छा ऊटी देखने की थी। ऊटी समुद्र तल से 2000 मीटर से ज्यादा ऊँचाई पर है और इतनी ऊँचाई पर तापमान काफी कम रहता है। लेकिन हम कितने दिन ऊटी में बिता सकते हैं? ऊटी के चारों तरफ ढलान है और चारों ही तरफ नीचे उतरने पर भयानक गर्मी है। हम दो-चार दिन ऊटी में रुक सकते हैं, लेकिन आखिरकार कहीं भी जाने के लिए इस भयानक गर्मी में एंट्री मारनी ही पड़ेगी। इसलिए मुझे ऊटी भी आकर्षक नहीं लग रहा था। अब जब दीप्ति की इच्छा के कारण मैसूर...

प्राचीन मंदिरों के शहर: तालाकाडु और सोमनाथपुरा

5 मार्च 2019 कुछ दिन पहले जब हमारे एक दोस्त मधुर गौर मैसूर घूमने आए थे, तो उन्होंने अपनी वीडियो में तालाकाडु और सोमनाथपुरा का भी जिक्र किया था। इससे पहले इन दोनों ही स्थानों के बारे में हमने कभी नहीं सुना था। फिर जब हम विस्तार से कर्नाटक घूमने लगे और बादामी, हंपी, बेलूर, हालेबीडू जैसी जगहों पर घूमने लगे, तो बार-बार सोमनाथपुरा और तालाकाडु का नाम सामने आ ही जाता। तो इसी के मद्देनजर हम आज जा पहुँचे पहले तालाकाडु और फिर सोमनाथपुरा। तालाकाडु कावेरी नदी के किनारे स्थित है और मैसूर से लगभग 50 किलोमीटर दूर है। किसी जमाने में यह एक अच्छा धार्मिक स्थान हुआ करता था, लेकिन कालांतर में कावेरी में आई बाढ़ों के कारण यह पूरा शहर रेत के नीचे दब गया, जो आज भी दबा हुआ है। कुछ मंदिर रेत के नीचे से झाँकते दिखते हैं, जिनमें पातालेश्वर मंदिर, कीर्तिनारायण मंदिर, मरालेश्वर मंदिर और वैद्येश्वर मंदिर प्रमुख हैं। तालाकाडु से 25 किलोमीटर और मैसूर से 33 किलोमीटर दूर सोमनाथपुरा स्थित है। इसे होयसला राजाओं ने 13वीं शताब्दी में बनवाया था। मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और इसकी दीवारों व छतों पर...

मैसूर पैलेस: जो न जाए, पछताए

3 मार्च 2019 मैसूर रिंग रोड पर हमें एक मल्टी-स्टार होटल में 600 रुपये में अत्यधिक शानदार कमरा मिल गया। इसे हमने तीन दिनों के लिए ले लिया। ओयो की मेहरबानी थी, अन्यथा हम इसकी तरफ कभी न देखते। दूर से ही साष्टांग नमस्कार कर लेते। तो जिस समय हम धूप में जल-भुनकर कूर्ग से मैसूर आए तो शाम होने वाली थी और मेरी इच्छा एसी रूम में कम्पलीट रेस्ट करने की थी, जबकि दीप्ति को मैसूर पैलेस देखने की जल्दी थी। मैंने उसे टालने को तमाम तरह के बहाने बनाए, मसलन “बड़ी लंबी लाइन लगी मिलेगी टिकट की।” “मैं लेडीज लाइन में जाकर जल्दी टिकट ले लूँगी।” “शहर में भयानक जाम लगा मिलेगा।” “ज्यादा दूर नहीं है। पाँच-छह किलोमीटर ही दूर है। वैसे भी गूगल मैप सड़क खाली दिखा रहा है।” “शाम पाँच बजे तक ही एंट्री होती है। ये देख, गूगल मैप पर।”

कूर्ग में एक दिन

2 मार्च 2019 अब तक गर्मी इतनी ज्यादा होने लगी थी कि हमने यात्रा में बदलाव करने का पक्का मन बना लिया था। अब हम न केरल जाएँगे, न तमिलनाडु। लेकिन कूर्ग का लालच अभी भी हमें यात्रा जारी रखने को कह रहा था, अन्यथा उडुपि से दिल्ली चार-पाँच दिन की मोटरसाइकिल यात्रा पर स्थित है। उधर हिमालय से बर्फबारी की खबरें आ रही थीं और हम गर्मी में झुलस रहे थे, तो बड़े गंदे-गंदे विचार मन में आ रहे थे। क्या सोचकर गर्मी में साउथ का प्रोग्राम बनाया था? हम नहीं लिखेंगे इस यात्रा पर किताब। और अगर किताब लिख भी दी, तो उसमें गर्मी के अलावा और कुछ नहीं होगा। और फिर... भारत वास्तव में विचित्रताओं का देश है। इधर से उधर या उधर से इधर आने में ही कितना कुछ बदल जाता है! न इधर के लोगों को उधर के मौसम का अंदाजा होता है और न ही उधर के लोगों को इधर के मौसम का। सबकुछ जानते हुए भी हम एक जैकेट लिए घूम रहे थे, जिसका इस्तेमाल घर से केवल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुँचने में किया गया था। वातानुकूलित ट्रेन थी और हमने जैकेट निकालकर बैग में रख ली थी और ट्रेन में मिलने वाला कंबल ओढ़कर सो गए थे। गोवा उतरे तो सर्दी दूर की चीज थी...

सैंट मैरी आइलैंड की रहस्यमयी चट्टानें

1 मार्च 2019 जैसे ही प्रतीक ने सैंट मैरी आइलैंड का नाम लिया, तुरंत गूगल किया और मेरे सामने थे आइलैंड के बहुत सारे फोटो। जितना पढ़ सकता था, पढ़ा और फाइनली तय किया कि यहाँ जरूर जाएँगे। हम उडुपि में थे और हमें दक्षिण की ओर जाना था। लेकिन प्रतीक ने हमें उडुपि के उत्तर में 50 किलोमीटर दूर मरवंते बीच जाने का भी लालच दे दिया। गर्मी बहुत ज्यादा होने लगी थी और हम दक्षिण की इस यात्रा को विराम दे देना चाहते थे। उडुपि से मरवंते जाकर फिर से उडुपि लौटना पड़ता। हम जाना भी चाहते थे और नहीं भी जाना चाहते थे। लेकिन सैंट मैरी आइलैंड के बारे में कोई कन्फ्यूजन नहीं था। होटल से सीधी सड़क जाती थी, नाक की सीध में। पहले उडुपि शहर और उसके बाद मालपे। मालपे पार करने के बाद हमारे सामने समुद्र था और यहीं पर एक पार्किंगनुमा जगह पर कुछ गाड़ियाँ खड़ी थीं, जिनमें दो बसें भी थीं। इन बसों से अभी-अभी स्कूली छात्र उतरे थे, जो सैंट मैरी आइलैंड जाएँगे। 300 रुपये प्रति व्यक्ति टिकट था आने-जाने का। मैंने 1000 रुपये देकर दो टिकट लिए और बाकी 400 रुपये लेना भूल गया, लेकिन जल्द ही कन्नड, हिंदी और इंगलिश में आवाजें ...

कुद्रेमुख, श्रंगेरी और अगुंबे

27 फरवरी 2019 सुबह सज-धजकर और पूरी तरह तैयार होकर कलश से निकले। आज हम कर्नाटक में पहली बार ट्रैकिंग करने जा रहे थे - कुद्रेमुख की ट्रैकिंग। पहले स्टेट हाइवे, फिर अच्छी ग्रामीण सड़क, फिर खराब ग्रामीण सड़क, फिर कच्ची सड़क और आखिर में फर्स्ट गियर में भी मुश्किल से चढ़ती बाइक... और हम पहुँचे फोरेस्ट ऑफिस, जहाँ से कुद्रेमुख ट्रैक का परमिट मिलता है। मैंने कहा - कुद्रेमुख। उन्होंने हाथ हिला दिया। यहाँ कुछ देर तक तो हिंदी, अंग्रेजी और कन्नड का लोचा पड़ा और आखिर में फोरेस्ट वालों ने किसी को आवाज लगाई। उसे बाकियों के मुकाबले हिंदी के कुछ शब्द ज्यादा आते थे। “ये ड्राइ सीजन है, फोरेस्ट में फायर लग जाती है, इसलिए 1 फरवरी से 31 मई तक कुद्रेमुख ट्रैक बंद रहता है।” यह तो बहुत गलत हुआ। हम इसी ट्रैक के कारण यहाँ इस क्षेत्र में आए थे। अगर पहले से पता होता, तो कुछ और प्लान करते। खैर, कोई बात नहीं। वो स्टेट हाइवे कुद्रेमुख नेशनल पार्क से होकर जाता है। 10-15 किलोमीटर उसी पर घूम आए। आज पहली बार हमें लगा कि हम गलत समय पर यहाँ घूम रहे हैं। यह पश्चिमी घाट और साउथ में घूमने का सही समय नहीं ह...

बेलूर से कलश बाइक यात्रा और कर्नाटक की सबसे ऊँची चोटी मुल्लायनगिरी

26 फरवरी 2019 कुद्रेमुख ट्रैक कर्नाटक के सबसे प्रसिद्ध ट्रैकों में से एक है। यह पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में है और हमारी इच्छा इस ट्रैक को करने की थी। हम अभी बेलूर में थे और कुद्रेमुख का ट्रैक मुल्लोडी नामक गाँव से शुरू होता है। बेलूर से इसकी दूरी तकरीबन 100 किलोमीटर है और इस दूरी को हम अधिकतम 3 घंटे में तय कर लेते। लेकिन तभी पता चला कि हम मुल्लायनगिरी चोटी के भी काफी नजदीक हैं। यह चोटी कर्नाटक की सबसे ऊँची चोटी है और इसकी ऊँचाई लगभग 1900 मीटर है। मुल्लायनगिरी तक पक्की सड़क बनी है। आखिर में 200-250 सीढियाँ चढ़नी होती हैं। यहाँ से चिकमगलूर शहर का शानदार विहंगम नजारा दिखता है। मुल्लायनगिरी से मुल्लोडी की ओर चलते हैं तो लगभग पूरा रास्ता कॉफी के बागानों से होकर जाता है। असल में चिकमगलूर जिला कॉफी के लिए जाना जाता है।

बेलूर और हालेबीडू: मूर्तिकला के महातीर्थ - 2

होयसलेश्वर मंदिर, हालेबीडू 24 फरवरी 2019 बेलूर से 15-16 किलोमीटर दूर हालेबीडू भी अपने मंदिरों और मूर्तिकला के लिए विख्यात है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका निर्माण सन 1221 में करवाया गया था। मंदिर के बारे में और अपने यात्रा-वृत्तांत के बारे में हम कभी बाद में डिसकस करेंगे, फिलहाल फोटो के माध्यम से यहाँ की यात्रा कीजिए। मंदिर के द्वारपाल

बेलूर और हालेबीडू: मूर्तिकला के महातीर्थ - 1

24 फरवरी 2019 अगर आप कर्नाटक घूमने जा रहे हैं, तो इन दो स्थानों को अपनी लिस्ट में जरूर शामिल करें। एक तो बेलूर और दूसरा हालेबीडू। दोनों ही स्थान एक-दूसरे से 16 किलोमीटर की दूरी पर हैं और हासन जिले में आते हैं। बंगलौर से इनकी दूरी लगभग 200 किलोमीटर है। 11वीं से 13वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र में होयसला राजवंश ने शासन किया और ये मंदिर उसी दौरान बने। पहले हम बात करेंगे बेलूर की। यहाँ चन्नाकेशव मंदिर है। चन्ना यानी सुंदर और केशव विष्णु को कहा जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। 300 रुपये तो जरूर खर्च होंगे, लेकिन मेरी सलाह है कि आप एक गाइड अवश्य ले लें। गाइड आपको वे-वे चीजें दिखाएँगे, जिन पर आपका ध्यान जाना मुश्किल होता।

बंगलौर से बेलूर और श्रवणबेलगोला

23 फरवरी 2019 चार दिन बंगलौर में रुकने के बाद आज हम निकल ही पड़े। असल में हमने इस यात्रा के लिए तय कर रखा है कि यूट्यूब और ब्लॉग साथ-साथ अपडेट करते चलेंगे। तो गोवा से चलने के बाद बादामी और हम्पी आदि की वीडियो हम तैयार नहीं कर सके थे। इसलिए इन चार दिनों में हमने केवल यही काम किया। इस दौरान मनीष खमेसरा और जयश्री खमेसरा जी से भी मिल आए। ये दोनों एक नंबर के घुमक्कड़ हैं और पुरातत्व आदि के बारे में उत्तम जानकारी के भंडार हैं। इनसे मिलकर हमें भी दक्षिण के मंदिरों, उनकी संरचना आदि के बारे में काफी जानकारी प्राप्त हुई। अब दक्षिण के मंदिरों को देखने का एक अलग नजरिया विकसित हुआ। जहाँ हम रुके हुए थे, वहाँ से मनीष जी का घर 15 किलोमीटर दूर था और इस दूरी को दो बार तय करने में हमें अंदाजा हो गया कि बंगलौर का ट्रैफिक बहुत खराब है। तो आज बंगलौर से निकल पड़े। शहर से निकलते ही ट्रैफिक अचानक गायब हो गया और हमारे सामने थी खाली सड़क। हम शहर के खराब ट्रैफिक को भूल गए।

लेपाक्षी मंदिर

19 फरवरी 2019 लेपाक्षी मंदिर का नाम हमने एक खास वजह से सुना था। यहाँ एक ऐसा पिलर है जो हवा में लटका है। अब जब हमें आंध्र प्रदेश में गंडीकोटा से कर्नाटक में बंगलौर जाना था, तो लेपाक्षी जाने की भी योजना बन गई। इसके लिए कोई बहुत ज्यादा लंबा चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। गंडीकोटा से कदीरी जाने वाला रास्ता बहुत खूबसूरत है। ट्रैफिक तो है ही नहीं, साथ ही खेतों में काम करते ग्रामीण असली भारत की झलक दिखाते हैं। अगर आप मोटरसाइकिल यात्रा पर हैं, तो आपको ऐसे डी-टूर भी लगा देने चाहिए। कई बार तो लोग मुड़-मुड़कर आपको देखते हैं, क्योंकि इस तरह बहुत कम लोग ही उनकी सड़कों पर आते हैं। और अगर आप रुक गए तो इनका अपनापन आपको हैरान कर देगा। वैसे तो हम श्री सत्य साईं प्रशांति निलयम यानी पुट्टापार्थी होते हुए भी जा सकते थे, लेकिन हमारी दिलचस्पी इन बातों में नहीं है, इसलिए कदीरी से सीधे ग्रंथला का रास्ता पकड़ा और सीधे नेशनल हाइवे 44 पर आ गए। यह नेशनल हाइवे कश्मीर को कन्याकुमारी को जोड़ता है। कुछ दूर बंगलौर की ओर चलने पर लेपाक्षी का रास्ता अलग हो जाता है। लेपाक्षी इस हाइवे से 15-16 किलोमीटर दूर है। ...

गंडीकोटा: भारत का ग्रैंड कैन्योन

15 फरवरी 2019 जिस समय हम्पी का विजयनगर साम्राज्य अपने पूरे वैभव पर था, उसी समय हम्पी से कुछ ही दूर एक छोटा-सा साम्राज्य बना हुआ था, जिसकी राजधानी गंडीकोटा थी। फिर दिल्ली सल्तनत ने जब दक्कन पर आक्रमण करने शुरू किए तो न हम्पी टिक पाया और न ही गंडीकोटा। हाँ, इस सल्तनत के खिलाफ लड़ने को हम्पी और गंडीकोटा एक जरूर हुए, लेकिन खुद को नहीं बचा पाए। आज हम्पी भी खंडहर हो गया है और गंडीकोटा भी। गंडीकोटा आंध्र प्रदेश में है। लेकिन यह उन खंडहरों और किले के लिए उतना नहीं जाना जाता, जितना अपने अद्‍भुत प्राकृतिक नजारे के लिए। यहाँ पेना नदी बहुत गहरी बहती है - सीधी खड़ी चट्टानों के बीच। इसलिए इसे भारत का ग्रैंड कैन्योन भी कहा जाता है। नदी के दोनों किनारे 100-100 मीटर तक एकदम खड़े हैं। असल में ग्रांड कैन्योल अमरीका में है। वहाँ कोलोराडो नदी इसी तरह का कटान करती है और काफी प्रसिद्ध हो गई है। अब हम उतनी आसानी से अमरीका तो नहीं जा सकते, तो क्या हुआ? हमारे पास भी अपना ग्रांड कैन्योन है। दक्कन का पठार मुख्यतः मैदानी ही है, लेकिन कहीं-कहीं छोटी-छोटी पहाड़ियाँ भी हैं। यहाँ भी एक पहाड़ी श्रंखला...

दारोजी भालू सेंचुरी में काले भालू के दर्शन

15 फरवरी 2019 उस दिन जब हम विट्ठल मंदिर से पैदल हम्पी लौट रहे थे, तो अंधेरा हो गया। हम तुंगभद्रा के किनारे-किनारे धीरे-धीरे चलते आ रहे थे। एक विदेशी महिला अपने दो बच्चों के साथ हम्पी से विट्ठल मंदिर की ओर जा रही थी। रास्ते में एक सिक्योरिटी गार्ड ने उन्हें टोका - “मैडम, गो बैक टू हम्पी। नॉट एलाऊड हियर आफ्टर दा इवनिंग। बीयर एंड चीता कम्स हीयर।” मेरे कान खड़े हो गए। चीते को तो मैंने सिरे से नकार दिया, क्योंकि भारत में चिड़ियाघरों के अलावा चीता है ही नहीं। हाँ, तेंदुआ हर जगह होता है। और बीयर? “क्या यहाँ भालू हैं?” मैंने पूछा। “हाँ जी, पास में बीयर सेंचुरी है, तो यहाँ तक भालू आ जाते हैं केले खाने।” और अगले ही दिन हम उस भालू सेंचुरी के गेट पर थे। दोपहर का डेढ़ बजा था। पता चला कि दो बजे के बाद ही एंट्री कर सकते हैं। तो दो बजे के बाद हमने एंट्री कर ली। प्रति व्यक्ति शुल्क है 25 रुपये और बाइक का कोई शुल्क नहीं। कार के 500 रुपये। चार किलोमीटर अंदर जंगल में जाने के बाद एक वाच टावर है। वहाँ बैठ जाना है और भालू के दिखने की प्रतीक्षा करनी है।

क्या आपने हम्पी देखा है?

जब हम बादामी से हम्पी जा रहे थे, तो मन में एक सवाल बार-बार आ रहा था। क्या हमें हम्पी पसंद आएगा? क्योंकि मैंने हम्पी की बहुत ज्यादा प्रशंसा सुनी थी। कभी भी आलोचना नहीं सुनी। जहाँ भी पढ़ी, हम्पी की प्रशंसा... जिससे भी सुनी, हम्पी की प्रशंसा। Top 100 Places to see before you die की लिस्ट हो या Top 10 Places to see before you die की लिस्ट हो... हम्पी जरूर होता। तो एक सवाल बार-बार मन में आता - कहीं हम्पी ओवररेटिड तो नहीं? इस सवाल का जवाब हम्पी पहुँचते ही मिल गया। हम यहाँ दो दिनों के लिए आए थे और पाँच दिनों तक रुके। छठें दिन जब प्रस्थान कर रहे थे, तो आठ-दस दिन और रुकने की इच्छा थी। वाकई हम्पी इस लायक है कि आप यहाँ कम से कम एक सप्ताह रुककर जाओ। जिस समय उत्तर में मुगल साम्राज्य का दौर था, यहाँ विजयनगर साम्राज्य था। इस साम्राज्य के सबसे प्रतापी राजा थे कृष्णदेवराय। और आपको शायद पता हो कि तेनालीराम भी इन्हीं के एक दरबारी थे। तो इस दौर में हम्पी का जमकर विकास हुआ। इनके साम्राज्य की सीमा पश्चिम में अरब सागर तक थी और विदेशों से समुद्र के रास्ते खूब व्यापार और आवागमन होता था।...

दक्षिण भारत यात्रा: पट्टडकल - विश्व विरासत स्थल

11 फरवरी 2019 पट्टडकल एक ऐसा विश्व विरासत स्थल है, जिसका नाम हम भारतीयों ने शायद सबसे कम सुना हो। मैंने भी पहले कभी सुना था, लेकिन आज जब हम पट्टडकल के इतना नजदीक बादामी में थे, तो हमें इसकी याद बिल्कुल भी नहीं थी। इसकी याद बाई चांस अचानक आई और हम पट्टडकल की तरफ दौड़ पड़े। सूर्यास्त होने वाला था और टिकट काउंटर से टिकट लेने वाले हम आखिरी यात्री थे। हालाँकि हम यहाँ की स्थापत्य कला को उतना गहराई से नहीं देख पाए, क्योंकि उसके लिए गहरी नजर भी चाहिए। हमें स्थापत्य कला में दिलचस्पी तो है, लेकिन उतनी ही दिलचस्पी है जितनी देर हम वहाँ होते हैं। वहाँ से हटते ही सारी दिलचस्पी भी हट जाती है और फिर दो-चार और भी स्थानों की खासियत मिक्स हो जाती है। “मैं स्थापत्य कला के क्षेत्र में एक दिन कोई बड़ा काम जरूर करूँगा” - यह वादा मैं पिछले दस सालों से करता आ रहा हूँ और तभी करता हूँ, जब ब्लॉग लिखना होता है और शब्द नहीं सूझते।

दक्षिण भारत यात्रा: बादामी भ्रमण

11 फरवरी 2019 कर्नाटक कर्क रेखा के पर्याप्त दक्षिण में है। कर्क रेखा के दक्षिण का समूचा भारत उष्ण कटिबंध में स्थित है। इस क्षेत्र की खासियत होती है कि यहाँ गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है। उधर कर्क रेखा के उत्तर में यानी उत्तर भारत में भयानक शीतलहर चल रही थी और हिमालय में तो बर्फबारी के कई वर्षों के रिकार्ड टूट रहे थे। और इधर हम गर्मी से परेशान थे। और हम एक-दूसरे से पूछ भी रहे थे और इल्जाम भी लगा रहे थे - “इसी मौसम में साउथ आना था क्या?” तो हमने तय किया था कि अभी चूँकि हमें साउथ में कम से कम एक महीना और रहना है, इसलिए गर्मी तो परेशान करेगी ही। और इससे बचने का सर्वोत्तम तरीका था कि केवल सुबह और शाम के समय ही घूमने के लिए बाहर निकलो। दोपहर को कमरे में रहो। यहाँ तक कि दोपहर को कभी बाइक भी नहीं चलानी। इसी के मद्देनजर आज की योजना थी - सुबह छह बजे से दोपहर दस-ग्यारह बजे तक बादामी घूमना है, शाम चार बजे तक आराम करना है और चार बजे के बाद ऐहोल की तरफ निकल जाना है और साढ़े पाँच बजे तक पट्टडकल पहुँचना है। इन सभी की दूरियाँ बहुत ज्यादा नहीं हैं। बादामी में एक तालाब है - अगस्त्य त...

गोवा से बादामी की बाइक यात्रा

चोरला घाट फरवरी के दूसरे सप्ताह का पहला दिन था यानी आज आठ तारीख थी। हम गोवा में अपने एक मित्र के यहाँ थे। इनके पिताजी किसी जमाने में आर्मी में थे और रिटायरमेंट के बाद गोवा में ही बस गए तो इन्होंने गोवा में ही कारोबार बढ़ाया और आज दाबोलिम में अपने आलीशान घर में रहते हैं। दाबोलिम में ही चूँकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, इसलिए कुछ कुछ मिनट बाद घर के ऊपर से हवाई जहाज गुजरते रहते हैं और उन पर लिखा नाम व नंबर आसानी से पढ़ा जा सकता है। और उससे भी कमाल की बात यह है कि ये यूपी में मुजफ्फरनगर के मूल निवासी हैं और गोवा में कई दशक रहने के बाद भी मुजफ्फरनगर की ठेठ खड़ी बोली का प्रभाव एक डिग्री भी कम नहीं हुआ है। ‘तझै’, ‘मझै’, ‘इंगै’, ‘उंगै’ आदि शब्दों से सराबोर होने के बाद एक पल को भी हमें नहीं लगा कि हम अपने गाँव से ढाई हजार किलोमीटर दूर हैं। हमें लग रहा था कि इनके भोजन में थोड़ा-बहुत कोंकणी प्रभाव देखने को मिलेगा, लेकिन हमारा अंदाजा गलत साबित हुआ। यहाँ इतनी दूर और इतने दशक बाद भी इनके भोजन में घी, दूध, दही और मट्‍ठे की ही प्रधानता थी। वैसे तो गोवा मुझे कभी पसंद नहीं आया, क्योंकि मुझे लगता था...

दक्षिण भारत यात्रा के बारे में

कई बार हम जो चाहते हैं, वैसा नहीं होता। इस बार हमारे साथ भी वैसा ही हुआ। हम असल में दक्षिण भारत की यात्रा नहीं करना चाहते थे, बल्कि पूर्वोत्तर में पूरी सर्दियाँ बिता देना चाहते थे। लेकिन दूसरी तरफ हम दक्षिण से भी बंधे हुए थे। सितंबर 2018 में जब हम कोंकण यात्रा पर थे, तो अपनी मोटरसाइकिल गोवा में ही छोड़कर दिल्ली लौट आए थे। अब चाहे हमारी आगामी यात्रा पूर्वोत्तर की हो या कहीं की भी हो, हमें गोवा जरूर जाना पड़ता - अपनी मोटरसाइकिल लेने। दक्षिण तो मानसून में भी घूमा जा सकता है, लेकिन पूर्वोत्तर घूमने का सर्वोत्तम समय होता है सर्दियाँ। सिक्किम और अरुणाचल के ऊँचे क्षेत्रों को छोड़ दें, तो पूरा पूर्वोत्तर सर्दियों में ही घूमना सर्वोत्तम होता है। पिछले साल से ही हमारी योजना इस फरवरी में अरुणाचल में विजयनगर जाने की थी और हम इसके लिए तैयार भी थे। एक साल की छुट्टियाँ भी इसीलिए ली गई थीं, ताकि पूर्वोत्तर को अधिक से अधिक समय दे सकें और भारत के इस गुमनाम क्षेत्र को हर मौसम में हर कोण से देख सकें और आपको दिखा भी सकें। लेकिन हम बंधे हुए थे गोवा से। भले ही विजयनगर जाने में मोटरसाइकिल का बह...

गोवा में दो दिन - पलोलम बीच

25 सितंबर 2018 सुबह जब चले थे, तो परिचित ने पूछा - “आज कहाँ जाओगे?” “देखते हैं। कल नॉर्थ गोवा घूम लिया, आज शायद साउथ गोवा जाएँगे।” “अरे कुछ नहीं है साउथ गोवा में। वहाँ कुछ भी नहीं है। सबकुछ नॉर्थ गोवा में ही है। तुम भी अजीब लोग हो। साउथ गोवा जा रहे हो? जो बात नॉर्थ में है, वो साउथ में थोड़े ही है?” “इसका मतलब हमें साउथ गोवा ही जाना चाहिए।” मैंने दीप्ति से कहा और उसने एकदम हाँ कर दी।