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कहानी ‘घुमक्कड़ी जिंदाबाद-2’ पुस्तक की

आखिरकार 8 महीने की देरी से यह किताब छप ही गई। चलिए, अब इस किताब की पूरी कहानी विस्तार से बताते हैं... ‘घुमक्कड़ी जिंदाबाद’ किताब प्रकाशित करने का आइडिया 2018 में आया था। इरादा था कि अपने सोशल मीडिया नेटवर्क में से अच्छा लिखने वाले कुछ मित्रों के यात्रा-वर्णन एकत्र करके उन्हें किताब के रूप में प्रकाशित करेंगे। इसकी शुरूआत 2018 में कर भी दी थी। ऐलान कर दिया कि जिन मित्रों को भी अपने यात्रा-लेख किताब में प्रकाशित कराने हैं, वे निर्धारित शब्द-सीमा में लिखकर मुझे भेज दें। उस समय लगभग 35 मित्रों ने अपने यात्रा-लेख भेजे। हमने पहले ही तय कर रखा था कि किताब में 240 से ज्यादा पेज नहीं रखेंगे। 200-240 पेज की किताब देखने में एकदम परफेक्ट लगती है। जबकि लेख इतने ज्यादा थे कि 500 पेज भी कम पड़ते। इनमें कुछ लेख तो ऐसे थे, जो पढ़ते ही मुझे पसंद आ गए; वहीं कुछ ऐसे भी लेख थे, जो बिल्कुल भी अच्छे नहीं लगे थे। कुल मिलाकर कुछ लेख तो छपने निश्चित थे और कुछ लेख नहीं छपने निश्चित थे। कुछ ऐसे भी लेख थे, जिनका छपना या न छपना किताब के पेजों पर निर्भर था। पेज सेटिंग और फाइनल एडिटिंग के समय अगर जगह बचेगी, तो लेख छपेंग...

पुस्तक चर्चा: दूर दुर्गम दुरुस्त (उमेश पंत)

पुस्तक: दूर दुर्गम दुरुस्त लेखक: उमेश पंत प्रकाशक: राजकमल ISBN: 978-93-89577-28-0 पृष्‍ठ: 224 मूल्य: 250 रुपये उमेश पंत जी की पहली किताब ‘ इनरलाइन पास ’ ने सफलता के झंडे गाड़े। इनकी वह किताब उत्तराखंड में आदि कैलाश ट्रैक पर आधारित है और प्रत्येक ट्रैक की तरह रोमांच से भरपूर है। अब जैसे ही इनकी दूसरी यात्रा किताब ‘दूर दुर्गम दुरुस्त’ आई, तो यह तो पक्का था कि यह भी रोमांच से भरपूर ही होगी। किताब पूर्वोत्तर की यात्राओं पर आधारित है। उमेश भाई ने इसके लिए दो बार पूर्वोत्तर की यात्राएँ कीं... फरवरी 2018 में और दिसंबर 2018 में। फरवरी में ये ट्रेन से गुवाहाटी पहुँचे और कुछ समय गुवाहाटी में रुककर मेघालय की ओर निकल गए। मेघालय में ये चेरापूंजी के पास डबल डेकर लिविंग रूट ब्रिज गए और डावकी भी गए। यहाँ मेरी एक शिकायत है कि इनके पास समय की कोई कमी नहीं थी, इसलिए इन्हें चेरापूंजी और डावकी में कम से कम एक-एक दिन रुकना चाहिए था। लेकिन खैर, कोई बात नहीं। सबकी अपनी-अपनी प्राथमिकताएँ और योजनाएँ होती हैं। मेघालय से वापस असम आए और सीधे पहुँचे तेजपुर। तेजपुर में इन्हें एक दिन अतिरिक्त ...

पुस्तक-चर्चा: लद्दाख-यात्रा की डायरी

पिछले दिनों किसी ने एक फेसबुक ग्रुप में एक फोटो डाला, जो किसी किताब के एक पन्ने का फोटो था। उन्होंने इस किताब की जानकारी चाही थी। उस पन्ने पर सबसे ऊपर लिखा था - लद्दाख-यात्रा की डायरी। फिर साइबर एक्सपर्ट प्रकाश यादव जी ने पता नहीं कहाँ से ढूँढ़कर इस किताब को डाउनलोड करने का लिंक उपलब्ध करा दिया। मैंने भी यह किताब डाउनलोड कर ली। आप भी इसे डाउनलोड कर सकते हैं। लिंक इस लेख के आखिर में दिया गया है। किताब 1955 में सत्साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी। इसका मतलब यह हुआ कि यात्रा 1955 से पहले की गई थी। आजकल तो लद्दाख में यात्राओं का एक बँधा-बँधाया रूटीन होता है - लेह से खारदुंग-ला, नुब्रा वैली और पेंगोंग, शो-मोरीरी देखते हुए वापस। चार दिनों में यह रूटीन पूरा हो जाता है और आजकल की लद्दाख यात्रा कम्पलीट हो जाती है। इन यात्राओं को पढ़ने में रोमांच भी नहीं आता और न ही कोई नयापन लगता है। लेकिन 1955 से पहले की यात्राएँ हमेशा ही रोमांचक होती थीं। उस समय तक चीन ने भी अक्साई-चिन और तिब्बत पर कब्जा नहीं किया था और लद्दाख का लगभग समूचा क्षेत्र व्यापारियों, शिकारियों और पर्यटकों के लिए खुला था। ...

पुस्तक प्रकाशन: लेखक और प्रकाशक का द्वंद्व

पोस्ट लंबी है... आगे बढ़ने से पहले थोड़ा अपने बारे में बता दूँ... मेरी आज तक 4 किताबें प्रकाशित हुई हैं... एक किताब का संपादन भी किया है... वह भी मेरे ही नाम पर है... तो कुल 5 किताबें प्रकाशित हुई हैं... नवंबर 2017 में एक साथ 3 किताबें प्रकाशित हुईं... एक किताब हिंदयुग्म से और दो किताबें रेडग्रैब से... दोनों ने ही किताब प्रकाशन के लिए मुझसे एक भी पैसा नहीं लिया... यानी मैं उन खुशनसीब गिने-चुने लेखकों में से हूँ, जिनकी पहली किताब बिना खर्चे के प्रकाशित हुई है... यानी सारा खर्चा प्रकाशक ने किया है... ये जितनी भी किताबें बिकेंगी, उनकी MRP की 10% मुझे रॉयल्टी मिलेगी... एक प्रकाशक ने 31 मार्च 2018 तक बिकी किताबों की कुल रॉयल्टी मुझे दी भी है... उम्मीद है कि 31 मार्च 2019 के आसपास इस बार भी कुछ हजार रुपये मेरे खाते में आएँगे... दूसरा प्रकाशक रॉयल्टी तब देगा, जब नवंबर 2017 में छपी सारी प्रतियाँ समाप्त हो जाएँगी... किन-किन किताबों की कितनी-कितनी प्रतियाँ छपी थीं, ये बातें इस तरह पब्लिक में बताना ठीक नहीं माना जाता... और मुझे खुद भी ये किताबें प्रकाशकों से मार्केट रेट पर या थोड़े-बहुत कम रेट...

चौथी किताब: मेरा पूर्वोत्तर

साल 2017 के दसवें महीने में मन में आया कि चलो, अपनी मोटरसाइकिल से पूर्वोत्तर घूमने चलते हैं। पूर्वोत्तर में कहाँ? कहीं भी। कुछ भी नहीं देखा हमने पूर्वोत्तर में अभी तक। तो जहाँ भी निकल जाएँगे, सब नया ही होगा। यात्रा ठीकठाक हो जाएगी तो इस बहाने एक किताब भी तैयार हो जाएगी। जब लिखने का चस्का पड़ जाता है तो मन करता है कि और अच्छा लिखें; और रोचक लिखें; और नए तरीके से लिखें। ब्लॉग लेखक में भी ऐसी ही सोच थी और अब किताब लेखन में भी। उस समय तक मेरी तीन किताबें प्रेस में थीं - ‘ सुनो लद्दाख! ’ और ‘ पैडल पैडल ’ को अंजुमन प्रकाशन प्रकाशित कर रहा था और ‘ हमसफर एवरेस्ट ’ को हिंदयुग्म। तीनों किताबें लगभग एक साथ ही आने वाली थीं, इसलिए मेरा काम बहुत बढ़ा हुआ था। इस वजह से मैं पूर्वोत्तर की यात्रा के लिए कोई तैयारी नहीं कर पाया।

जिम कार्बेट की हिंदी किताबें

इन पुस्तकों का परिचय यह है कि इन्हें जिम कार्बेट ने लिखा है। और जिम कार्बेट का परिचय देने की अक्ल मुझमें नहीं। उनकी तारीफ करने में मैं असमर्थ हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि उनकी तारीफ करने में कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए। जो भी शब्द उनके लिये प्रयुक्त करूंगा, वे अपर्याप्त होंगे। बस, यह समझ लीजिए कि लिखते समय वे आपके सामने अपना कलेजा निकालकर रख देते हैं। आप उनका लेखन नहीं, सीधे हृदय पढ़ते हैं। लेखन में तो भूल-चूक हो जाती है, हृदय में कोई भूल-चूक नहीं हो सकती। आप उनकी किताबें पढ़िए। कोई भी किताब। वे बचपन से ही जंगलों में रहे हैं। आदमी से ज्यादा जानवरों को जानते थे। उनकी भाषा-बोली समझते थे। कोई जानवर या पक्षी बोल रहा है तो क्या कह रहा है, चल रहा है तो क्या कह रहा है; वे सब समझते थे। वे नरभक्षी तेंदुए से आतंकित जंगल में खुले में एक पेड़ के नीचे सो जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इस पेड़ पर लंगूर हैं और जब तक लंगूर चुप रहेंगे, इसका अर्थ होगा कि तेंदुआ आसपास कहीं नहीं है। कभी वे जंगल में भैंसों के एक खुले बाड़े में भैंसों के बीच में ही सो जाते, कि अगर नरभक्षी आएगा तो भैंसे अपने-आप जगा देंगी।

तीसरी किताब: पैडल पैडल

आज हम बतायेंगे कि मेरी तीसरी किताब ‘पैडल पैडल’ की क्या हिस्ट्री रही और यह कैसे अस्तित्व में आयी। पहली किताब छपी थी अप्रैल 2016 में, नाम था ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’। उसी समय सोच लिया था और बहुत सारे मित्रों की भी इच्छा थी कि लद्दाख साइकिल यात्रा को भी पुस्तकाकार बनाना चाहिये। लद्दाख में साइकिल चलाना वाकई एक विशिष्ट अनुभव होता है और इसकी किताब भी अवश्य प्रकाशित होनी चाहिये। लेकिन जून 2016 में एवरेस्ट बेसकैंप की ट्रैकिंग कर ली और वहाँ से लौटकर उसके अनुभवों को लिखने में लग गया। वह मार्च 2017 में पूरी हुई और हिंदयुग्म प्रकाशन को भेज दी। मैं चाहता था कि अप्रैल में ही एवरेस्ट वाली किताब आ जाये, लेकिन तय हुआ कि यह किताब जुलाई 2017 में आयेगी। अब मैं लगभग खाली था। ‘लद्दाख साइकिल यात्रा’ फिर से याद आयी। यह यात्रा पहले ब्लॉग पर प्रकाशित हो चुकी थी। इसके शब्द गिने - लगभग 30000 मिले। इतने शब्दों में 200 पृष्ठों की किताब नहीं बन सकती। इसका अर्थ है कि शब्द बढ़ाने पड़ेंगे। और ऐसे कहने से ही शब्द नहीं बढ़ते। वो वृत्तांत चार साल पहले लिखा था। अब तक मेरी लेखन शैली में भी कुछ परिवर्तन आ चुका था। यह परिवर्त...

पुस्तक-चर्चा: पग पग सनीचर

एक व्हाट्सएप घुमक्कड़ी ग्रुप है। और जैसा कि व्हाट्सएप के सभी ग्रुपों में होता है, इसमें भी देशभर के कुछ घुमक्कड़ मिलकर एक-दूसरे की टांग-खिंचाई में तल्लीन रहते थे। किसी जमाने में मैं भी इस ग्रुप का सदस्य था और दूसरों की खूब टांग खींचा करता था और जब दूसरा कोई मेरी खिंचाई कर देता, तो मैं ग्रुप छोड़कर भाग जाता था। तो ऐसे ही यह ग्रुप चल रहा था। चूँकि इसके सदस्य देशभर में रहते हैं तो कोई कहीं भी घूमने जाता, कंपनी मिल ही जाती थी। फिर इस ग्रुप में प्रवेश हुआ ललित शर्मा जी का। और उन्होंने नारा दिया - “कुछ अलग-सा करते हैं।” और अलग-सा करते-करते यह किताब बन गयी - पग पग सनीचर। इसमें उस ग्रुप के तीस सदस्यों के यात्रा-वृत्तांत व यात्रा-लेख हैं। यह संग्रह इसलिये भी खास है, क्योंकि दो-तीन लेखक ही इससे पहले ब्लॉग या समाचार-पत्रों में नियमित लिखते थे। बाकी ज्यादातर ने कभी भी सीरियसली नहीं लिखा। और इस किताब में सभी ने वाकई सीरियसली लिखा है। उम्मीद है कि इसके सभी लेखक आगे भी इसी तरह लिखते रहेंगे और हमें भविष्य में बहुत सारे यात्रा-वृत्तांत पढ़ने को मिलेंगे।

मेरी दूसरी किताब: हमसफ़र एवरेस्ट

जून 2016 में एवरेस्ट बेसकैंप की यात्रा से लौटने के बाद बारी थी इसके अनुभवों को लिखने की। अमूमन मैं यात्रा से लौटने के बाद उस यात्रा के वृत्तांत को ब्लॉग पर लिख देता हूँ, लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया। इरादा था कि इसे पहले किताब के रूप में प्रकाशित करेंगे। लिखने का काम मार्च 2017 तक पूरा हुआ। अब बारी थी प्रकाशक ढूँढ़ने की। सबसे पहले याद आये हिंदयुग्म के संस्थापक शैलेश भारतवासी जी। पिछले साल जब मैं ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ लिख चुका था, तब भी शैलेश जी से ही संपर्क किया था। तब हिंदयुग्म नया-नया शुरू हुआ था और बुक पब्लिशिंग में ज्यादा आगे भी नहीं था। तब उन्होंने कहा था - “नीरज, अभी हमारा मार्केट बहुत छोटा-सा है। अच्छा होगा कि तुम किसी बड़े प्रकाशक से किताब प्रकाशित कराओ।” और ‘लद्दाख में पैदल यात्राएँ’ दस हज़ार रुपये देकर सेल्फ पब्लिश करानी पड़ी थी। तो इस बार भी शैलेश जी से ही सबसे पहले संपर्क किया। अब तक हिंदयुग्म एक बड़ा प्रकाशक बन चुका था और बाज़ार में अच्छी पकड़ भी हो चुकी थी। इनकी कई किताबें तो बिक्री के रिकार्ड तोड़ रही थीं।

पुस्तक-चर्चा: बादलों में बारूद

मज़ा आ गया। किताब का नाम देखने से ऐसा लग रहा है, जैसे कश्मीर का ज़िक्र हो। आप कवर पेज पलटोगे, लिखा मिलेगा - यात्रा-वृत्तांत। लेकिन अभी तक मुझे यही लग रहा था कि कश्मीर का यात्रा-वृत्तांत ही होगा। लेकिन जैसे ही ‘पुस्तक के बारे में’ पढ़ा, तो मज़ा आ गया। इसमें तो झारखंड़ के जंगलों से लेकर लद्दाख और सुंदरवन तक के नाम लिखे हैं। पहले सभी यात्राओं का थोड़ा-थोड़ा परिचय करा दूँ: 1. जंगलों की ओर झारखंड़ में छत्तीसगढ़ सीमा के एकदम पास गुमला जिले में बिशुनपुर के पास जंगलों की यात्रा का वर्णन है।

पुस्तक चर्चा: आख़िरी चट्टान तक

पता नहीं किस कक्षा में मोहन राकेश का एक यात्रा-वृत्तांत था - आख़िरी चट्टान। उस समय तो इसे पढ़ने और प्रश्नों के उत्तर देने के अंक मिलते थे, इसलिये कभी भी यह अच्छा नहीं लगा, लेकिन आज जब यह पूरी किताब पढ़ी तो आनंद आ गया। आनंददायक यात्रा-वृत्तांत वे होते हैं, जिनमें गतिशीलता भी होती है और रोचकता भी होती है। ‘आख़िरी चट्टान तक’ ठीक इसी तरह की एक किताब है। लेखक ज्यादा देर कहीं ठहरता नहीं है। फटाफट एक वाकया सुनाता है और आगे बढ़ जाता है। गतिशीलता बरकरार रहती है। यात्रा सन 1952 के आख़िरी सप्ताह और 1953 के पहले सप्ताह में की गयी है। भारत नया-नया आज़ाद हुआ और गोवा भी भारत का हिस्सा नहीं था। लेखक ने उस दौरान गोवा की भी यात्रा की। तब दूधसागर जलप्रपात के नीचे से होकर मीटरगेज की ट्रेन भारत से गोवा जाया करती थी। भारत का आख़िरी स्टेशन था केसलरॉक और गोवा का पहला स्टेशन था कुलेम। दोनों ही स्टेशनों पर गाड़ी दो-दो घंटे रुका करती थी - कस्टम जाँच के लिये।

पुस्तक-चर्चा: हिमाचल के शिखरों में रोमांचक सफर

इस पुस्तक की तारीफ़ कैसे करूँ, कुछ समझ नहीं पा रहा। यात्रा-वृत्तांत विधा का यह एक हीरा है। आपको यदि यात्रा-वृत्तांत पसंद हैं, तो यह पुस्तक आपके पास होनी ही चाहिये। लेखक कुल्लू-निवासी डॉ. सूरत ठाकुर आपको हिमाचल के अप्रचलित स्थानों पर ट्रैकिंग कराते हैं। ऐसे स्थान कि आज इंटरनेट के जमाने में भी ढूंढ़े से नहीं मिलेंगे। चलिये, प्रत्येक चैप्टर का आपको परिचय करा देते हैं: 1. भृगुतुंग से मलाणा यात्रा अगस्त 1983 में की। इन्होंने अपनी यात्रा मनाली से गुलाबा बस से और उसके बाद पैदल शुरू की। गुलाबा से दशौर झील, भृगु झील, वशिष्ठ, मनाली, नग्गर, चंद्रखणी जोत और मलाणा। रास्ते में पड़ने वाले सभी गाँवों, स्थानों का अच्छा वर्णन।

पुस्तक-चर्चा: पिघलेगी बर्फ

पुस्तक मेले में घूम रहे थे तो भारतीय ज्ञानपीठ के यहाँ एक कोने में पचास परसेंट वाली किताबों का ढेर लगा था। उनमें ‘पिघलेगी बर्फ’ को इसलिये उठा लिया क्योंकि एक तो यह 75 रुपये की मिल गयी और दूसरे इसका नाम कश्मीर से संबंधित लग रहा था। लेकिन चूँकि यह उपन्यास था, इसलिये सबसे पहले इसे नहीं पढ़ा। पहले यात्रा-वृत्तांत पढ़ता, फिर कभी इसे देखता - ऐसी योजना थी। उन्हीं दिनों दीप्ति ने इसे पढ़ लिया - “नीरज, तुझे भी यह किताब सबसे पहले पढ़नी चाहिये, क्योंकि यह दिखावे का ही उपन्यास है। यात्रा-वृत्तांत ही अधिक है।”  तो जब इसे पढ़ा तो बड़ी देर तक जड़वत हो गया। ये क्या पढ़ लिया मैंने! कबाड़ में हीरा मिल गया! बिना किसी भूमिका और बिना किसी चैप्टर के ही किताब आरंभ हो जाती है। या तो पहला पेज और पहला ही पैराग्राफ - या फिर आख़िरी पेज और आख़िरी पैराग्राफ।

पुस्तक-चर्चा: चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़

पुस्तक मेले में घूमते हुए एक पुस्तक दिखायी पड़ी - चुटकी भर नमक, मीलों लंबी बागड़। कवर पेज पर भारत का पुराना-सा नक्शा भी छपा था, तो जिज्ञासावश उठाकर देखने लगा। और खरीद भी ली। ब्रिटिश राज में नमक पर कर लगा करता था। बंगाल रेजीडेंसी में यह सर्वाधिक था - साल में आम जनता की लगभग दो महीने की आमदनी के बराबर। तो बंबई रेजीडेंसी व राजपूताना की तरफ से इसकी तस्करी होने लगी। इस तस्करी को रोकने के लिये अंग्रेजों ने 1500 मील अर्थात 2400 किलोमीटर लंबी एक बाड़ बनवायी। यह बाड़ इतनी जबरदस्त थी कि कोई इंसान, जानवर इसे पार नहीं कर सकता था। यह बाड़ मिट्टी और कँटीली झाड़ियों की बनायी गयी। बीच-बीच में द्वार बने थे। केवल द्वारों से होकर ही इसे पार करना होता था - वो भी सघन तलाशी के बाद।

पुस्तक चर्चा: पाकिस्तान में वक्त से मुलाकात

श्याम विमल द्वारा लिखित यह पुस्तक उनका एक यात्रा-संस्मरण है। लेखक का जन्म 1931 में मुलतान के शुजाबाद कस्बे में हुआ था। जब ये 16 बरस के थे, तब देश का बँटवारा हो गया और इन्हें सपरिवार अपनी जन्मभूमि छोड़कर भारत आना पड़ा। 75 साल की उम्र में ये अपनी जन्मभूमि देखने पाकिस्तान गये - 2005 में और अगले ही साल पुनः 2006 में। वहाँ जो इन्होंने देखा, महसूस किया; सब पुस्तक में लिख दिया। अपने बचपन को जीते रहे। एक-एक स्थान की, एक-एक गली की, एक-एक पडोसी की, एक-एक नाम की इन्हें याद थी और खुलकर सबके बारे में लिखा। और कमाल की बात यह थी कि इनके पुश्तैनी घर में अब मुहाज़िर लोग रह रहे थे। यानी भारत छोड़कर गये हुए मुसलमान। अधिकांश भिवानी व हाँसी के आसपास के मुसलमान। “ पूछने पर बताया गया कि जब वे मुहाजिर होकर इस घर में रहने आये थे तो यह घर लुटा-पिटा उन्हें मिला था। चौखटों के कपाट भी उखाड़ लिये गये थे। शायद वे स्थानीय या आसपास के गाँवों के मुसलमान रहे होंगे, जो बलवे के दिनों में लूटपाट करने आये होंगे। मुझे स्मरण है कि हम तो इस घर को भरा-पूरा छोड़ आये थे। इसी घर में बड़े भाई की शादी में मिले दहेज का सामान भी रखा गय...

पुस्तक चर्चा: “तिब्बत तिब्बत” और “एक रोमांचक सोवियत रूस यात्रा”

पिछले दिनों दो पुस्तकें पढ़ने को मिलीं। इन दोनों के बारे में मैं अलग-अलग लिखने वाला था, लेकिन एक कारण से एक साथ लिख रहा हूँ। पहले चर्चा करते हैं ‘तिब्बत तिब्बत’ की। इसके लेखक पैट्रिक फ्रैंच हैं, जो कि मूल रूप से ब्रिटिश हैं। हिंदी अनुवाद भारत पाण्डेय ने किया है - बेहतरीन उच्च कोटि का अनुवाद। लेखक की तिब्बत और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में गहरी रुचि साफ़ झलकती है। वे भारत में मैक्लोड़गंज में तिब्बतियों से काफ़ी हद तक जुड़े हुए भी हैं और उनके साथ काफ़ी समय व्यतीत किया है। 1986 में उन्होंने पर्यटक बनकर तिब्बत की यात्रा की थी। तो यह पुस्तक मूलतः एक यात्रा-वृत्तांत ही है, लेकिन इसमें तिब्बत और चीन के साथ संबंधों पर सबकुछ लिखा गया है। कहीं भी लेखक भटकता हुआ महसूस नहीं हुआ। उन्होंने तिब्बत की यात्रा अकेले की और दूर-दराज़ में तिब्बतियों के साथ भी काफ़ी समय बिताया, जो तिब्बत में एक बहुत बड़ी बात थी। ऐसा होना आज भी बड़ी बात है। कुल चौबीस अध्याय हैं। शुरूआती अध्यायों में तिब्बत और निर्वासित तिब्बतियों से परिचय कराया गया है। लेखक चीन पहुँच जाता है और अपनी यात्रा भी आरंभ करता है। हम छठें अध्याय से चर्चा ...

यात्रा पुस्तक चर्चा

पिछले दिनों कुछ यात्रा पुस्तकें पढने को मिलीं। इनके बारे में संक्षेप में लिख रहा हूं: 1. कर विजय हर शिखर (प्रथम संस्करण, 2016) लेखिका: प्रेमलता अग्रवाल प्रकाशक: प्रभात पेपरबैक्स ISBN: 978-93-5186-574-2 दार्जीलिंग में मारवाडी परिवार में जन्मीं प्रेमलता अग्रवाल का विवाह जमशेदपुर में हुआ। संयुक्त परिवार था और उन्हें पारिवारिक दायित्वों का कडाई से पालन करना होता था। कभी घुमक्कडी या पर्वतारोहण जैसी इच्छा मन में पनपी ही नहीं। समय का चक्र चलता रहा और दो बेटियां भी हो गईं। इसके आगे प्रेमलता जी लिखती हैं:

जाटराम की पहली पुस्तक: लद्दाख में पैदल यात्राएं

पुस्तक प्रकाशन की योजना तो काफी पहले से बनती आ रही थी लेकिन कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती थी। सबसे बडी समस्या आती थी पैसों की। मैंने कई लेखकों से सुना था कि पुस्तक प्रकाशन में लगभग 25000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं और अगर कोई नया-नवेला है यानी पहली पुस्तक प्रकाशित करा रहा है तो प्रकाशक उसे कुछ भी रॉयल्टी नहीं देते। मैंने कईयों से पूछा कि अगर ऐसा है तो आपने क्यों छपवाई? तो उत्तर मिलता कि केवल इस तसल्ली के लिये कि हमारी भी एक पुस्तक है। फिर दिसम्बर 2015 में इस बारे में नई चीज पता चली- सेल्फ पब्लिकेशन। इसके बारे में और खोजबीन की तो पता चला कि यहां पुस्तक प्रकाशित हो सकती है। इसमें पुस्तक प्रकाशन का सारा नियन्त्रण लेखक का होता है। कई कम्पनियों के बारे में पता चला। सभी के अलग-अलग रेट थे। सबसे सस्ते रेट थे एजूक्रियेशन के- 10000 रुपये। दो चैप्टर सैम्पल भेज दिये और अगले ही दिन उन्होंने एप्रूव कर दिया कि आप अच्छा लिखते हो, अब पूरी पुस्तक भेजो। मैंने इनका सबसे सस्ता प्लान लिया था। इसमें एडिटिंग शामिल नहीं थी।