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तमिलनाडु से दिल्ली वाया छत्तीसगढ़

8 मार्च 2019
हम ऊटी में थे और आज पूरे दिन ऊटी में ही रहने वाले थे। ऊटी के कुछ दर्शनीय स्थलों की लिस्ट दीप्ति ने बना रखी थी और मुझे भी उन स्थलों पर जाना ही था। मुझे पहली नजर में ऊटी पसंद नहीं आया था, पता नहीं क्यों।
तो लिस्ट के अनुसार जहाँ-जहाँ भी गए, सभी जगहें दीप्ति को नापसंद होती चली गईं। और उसे ऊटी के भीड़-भरे टूरिस्ट स्पॉट्स भला पसंद भी क्यों आएँगे!
पहले ‘रोज गार्डन’ गए, लेकिन वहाँ एक ही क्यारी में कुछ फूल खिले थे। कर्मचारी कह रहे थे कि सभी फूल देखने अप्रैल में आना।
ऊटी लेक गए, तो यह देखकर हैरान रह गए कि अलग-अलग नाव ठेकेदारों ने झील के भी अपने-अपने हिस्से बाँट रखे हैं। मोटर बोट पैडल बोट के हिस्से में नहीं जा सकती और पैडल बोट चप्पू वाले हिस्से में नहीं जा सकती। यहाँ तक कि आप झील के किनारे पर भी तभी बैठ पाएँगे, जब आपने उस हिस्से वाली बोट का टिकट लिया हो। यहाँ से भी वापस भाग लिए।
वापस होटल आए और “हाय गर्मी, हाय गर्मी” कहते सो गए। हालाँकि ऊटी में गर्मी नहीं थी।




9 मार्च 2019
आज से हमें बाकायदा दिल्ली की ओर कूच कर जाना था। ऊटी से दिल्ली जाने का रास्ता जब गूगल मैप ने बंगलौर होते हुए दिखाया तो दीप्ति ने मना कर दिया - “नहीं, बंगलौर कतई नहीं जाना। चाहे हजार किलोमीटर एक्स्ट्रा चलना पड़े, लेकिन बंगलौर को एवोइड करो।”
तो सेलम का रास्ता चुना।
और हम सेलम की ओर चल दिए। आगे बढ़े, तो यह देखकर हैरान रह गए कि ऊटी की असली खूबसूरती ऊटी शहर में नहीं, बल्कि आउटर में है। यहाँ या तो जंगल हैं या चाय के दूर तक फैले बागान। हम खुद को कोसने लगे कि दो दिनों तक ऊटी शहर में क्यों रुके। यहाँ आउटर में क्यों नहीं रुके। खैर, इसके बावजूद भी यह स्थान केवल मानसून में ही आने लायक है।
ऊटी में जितनी शीतलता थी, मेट्टूपलैयम तक आते-आते सब समाप्त हो गई और दोपहर के एक बजे ऐसा लग रहा था जैसे सूरज पंद्रह करोड किलोमीटर दूर न होकर यहीं मेट्टूपलैयम में ही रहता हो।
फिर भी रात होते-होते 200 किलोमीटर की दूरी तय करके सेलम आ गए। यहाँ ओयो के कमरे महंगे थे, इसलिए स्टेशन के पास 500 रुपये में एक ठीकठाक लॉज में कमरा ले लिया।

10 मार्च 2019
अगर हम सेलम से नेशनल हाइवे 44 पर चलते हैं, तो दिल्ली 2400 किलोमीटर दूर है। लेकिन मेरी इच्छा छत्तीसगढ़ के बस्तर में कुटुमसर केव देखने की थी, इसलिए छत्तीसगढ़ होते हुए जाने का भी मन था। ऐसा करने पर हमें 400 किलोमीटर अतिरिक्त चलना पड़ेगा। वैसे तो छत्तीसगढ़ भी मानसून का ही डेस्टिनेशन है, लेकिन मानसून में कुटुमसर गुफाएँ पानी भर जाने क कारण बंद हो जाती हैं। तो इन गुफाओं को या तो सर्दियों में देखा जा सकता है या गर्मियों में। कई वर्षों से मेरा यही प्लान था कि मानसून के अलावा जब भी छत्तीसगढ़ जाना होगा, कुटुमसर गुफाओं को अवश्य देखूँगा। और आपको याद होगा कि हम शुरू में गोवा से बाइक लेकर पूर्वोत्तर जाते और छत्तीसगढ़ के रास्ते ही जाते। तब से ही सोच रखा था कि इस यात्रा में छत्तीसगढ़ की उन गुफाओं को भी देखना है।
तो हमने मन बना लिया कि छत्तीसगढ़ होते हुए ही जाएँगे। वहाँ हमारे सबसे घनिष्ठ मित्रों में से एक सुनील और सुधीर पांडेय जी रहते हैं, उनके यहाँ होली मनाएँगे।
और आज रुकेंगे हम तिरुपति, जो सेलम से 300 किलोमीटर दूर है। वैसे तो हम एक दिन में 500-600 किलोमीटर आराम से बाइक चला लेते हैं, लेकिन फिर अगले दिन पूरा आराम भी करना पड़ता है। सेलम से विशाखापटनम होते हुए रायपुर लगभग 1700 किलोमीटर दूर है, इसलिए हम प्रतिदिन बहुत ज्यादा न चलकर उतना ही चलेंगे, जिससे दूरी भी तय होती रहे और हमें आराम भी मिलता रहे। तो डिसाइड किया कि प्रतिदिन 300 किलोमीटर चला करेंगे।
सेलम से वेल्लोर तक तो शानदार फोरलेन सड़क है, लेकिन वेल्लोर से तिरुपति तक 100 किलोमीटर का रास्ता टू-लेन है और इस पर काम भी चल रहा है। वेल्लोर पहुँचने में उतने नहीं थके, जितने वेल्लोर से तिरुपति पहुँचने में थक गए। ओयो से 600 रुपये में वातानुकूलित 2 बी.एच.के. फ्लैट बुक कर लिया, हालाँकि यह तिरुपति शहर से 4-5 किलोमीटर दूर था। ओयो की एक विशेष बात ये है कि उन्होंने गुणवत्ता मेनटेन कर रखी है।
और तिरुपति जैसी जगहों पर शुद्ध शाकाहारी पंजाबी भोजन क्यों नहीं मिलेगा भला?

11 मार्च 2019
तिरुपति से विजयवाडा लगभग 400 किलोमीटर दूर है। यह हमारी प्रतिदिन की लिमिट से 100 किलोमीटर ज्यादा था, लेकिन ओंगोल में ओयो पर कमरे नहीं मिले तो तय किया कि विजयवाडा ही रुकेंगे। फोरलेन के हाइवे पर एक दिन में 400 किलोमीटर चलना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं होता। 80 की स्पीड आराम से मिलती है। लेकिन यह रास्ता बंगाल की खाड़ी के समांतर है, इसलिए बड़े जोर की हवाएँ चल रही थीं। कई बार तो हवा का झौंका इतने जोर का होता कि लगता जैसे मोटरसाइकिल गिर पड़ेगी। इस वजह से 60 से ऊपर हम नहीं चले।
फिर भी रात 11 बजे तक विजयवाडा से 20 किलोमीटर आगे वातानुकूलित 2 बी.एच.के. फ्लैट में पहुँच गए, जो ओयो से 700 रुपये में बुक हुआ था। हमने शाम चार बजे बुकिंग की थी और उसी समय फ्लैट के रिसेप्शन में बात करके बुकिंग कन्फर्म भी कर ली थी। कई बार होटल और ओयो के बीच कुछ विवाद रहता है, जिसके कारण होटल वाले चेक-इन नहीं करने देते, जबकि ओयो बुकिंग कर देता है। ऐसे केस में ओयो आपको दूसरे होटल में कमरा दिला देगा, लेकिन 400 किलोमीटर मोटरसाइकिल चलाने के बाद आधी रात को कौन दूसरे होटल में जाना चाहेगा?

12 मार्च 2019
आज जब मैंने फेसबुक पर स्टेटस डाला कि आज हम विजयवाडा से पॉण्डिचेरी होते हुए विशाखापटनम जाएँगे, तो बहुत सारे मित्रों ने मजाक उड़ाई। कुछ ने तो नक्शा दिखाकर यह समझाया कि विजयवाडा से पॉण्डिचेरी जाकर विजयवाडा होते हुए ही विशाखापटनम जाना पड़ेगा। क्योंकि ज्यादातर को नहीं पता कि पॉण्डिचेरी चार भागों में बँटा हुआ है और इसका एक भाग विजयवाडा और विशाखापटनम के बीच में भी है। उसका नाम है यानम।
यानम बहुत छोटा-सा हिस्सा है। यहाँ का वेहिकल रजिस्ट्रेशन कोड PY04 है। यह भारत के उस हिस्से में है, जहाँ गोदावरी नदी समुद्र में मिलती है। यह पहले फ्रांसीसियों की बस्ती थी, जिसे 16 अगस्त 1962 को भारत में शामिल किया गया। लेकिन फ्रांस की रिक्वेस्ट पर आज भी यहाँ की एक आधिकारिक भाषा फ्रांसीसी है और यहाँ के लोग फ्रांस में होने वाले चुनावों में वोट भी डालते हैं।
तो आज यानम और काकीनाडा होते हुए आधी रात तक विशाखापटनम पहुँचे।

हमने पिछले 4 दिनों में लगभग 1500 किलोमीटर की दूरी तय की थी, इसलिए अब एक दिन आराम करना तो बनता ही था।

14 मार्च 2019
विशाखापटनम से जगदलपुर का रास्ता बेहद खूबसूरत है।
लेकिन...
यह रास्ता भी मानसून लायक ही है। मेरी इच्छा है कि जिस तरह बाइकर्स लोग लद्दाख जाते हैं, तनोट जाते हैं, कच्छ जाते हैं; उसी तरह इस रास्ते पर भी चला करें। खासकर रायपुर से बस्तर होते हुए विशाखापटनम। अगर आपने इस रास्ते पर राइडिंग कर ली, तो आपकी जिंदगी सफल हो जाएगी।
रास्ता अरकू वैली से होकर जाता है। यह आंध्र प्रदेश का एकमात्र हिल स्टेशन है। अरकू के बाद उडीसा शुरू हो जाता है, लेकिन रास्ते और आसपास की खूबसूरती में कोई कमी नहीं आती। और आप कब जगदलपुर पहुँच जाते हैं, आपको भी पता नहीं चलेगा।

15 मार्च 2019
आज हमें कांगेर वैली में स्थित कुटुमसर की गुफाएँ देखनी थीं। साथ ही कुछ और भी गुफाएँ वहाँ देखी जा सकती हैं, लेकिन जगदलपुर में कुछ लोगों ने एक काम की बात बताई - “कुटुमसर गुफा जमीन के अंदर है और यहाँ वेंटीलेशन का उतना अच्छा प्रबंध नहीं है। गुफा में कई स्थानों पर ऑक्सीजन की कमी रहती है और गर्मी भी बहुत ज्यादा लगेगी। आपको चक्कर आ सकते हैं।”
यह बात मैंने पहले भी कहीं पढ़ी थी। तो निष्कर्ष ये निकला कि कुटुमसर की गुफा गर्मियों में भी नहीं देखनी चाहिए। अगर हम दिल्ली से सीधे यहीं आए होते, तो इस बात को नजरअंदाज भी कर देते, लेकिन हम बेचारे गर्मी से परेशान होकर भागे-भागे फिर रहे थे, इसलिए इस बात को गंभीरता से लिया और गुफाएँ देखने का विचार छोड़ दिया।
इसके साथ ही दंतेवाडा में रहने वाले मित्र ओम सोनी से भी मिलना रह गया।

और हाँ, अपने घनिष्ठ मित्र सुनील और सुधीर पांडेय जी के यहाँ हमें रुककर होली मनानी थी, दुर्भाग्य से उनके पिताजी परसों गुजर गए। अब हम उनके यहाँ होली पर नहीं रुक सकते थे और होली तक दिल्ली जाने के बारे में सोचने लगे थे। वैसे तो छत्तीसगढ़ में और भी घनिष्ठ मित्र थे, लेकिन उतने पारिवारिक लेवल के संबंध नहीं थे कि हम 5-7 दिन उनके यहाँ रुक सकते। बिलासपुर से दिल्ली पहुँचने में 3 दिन लगेंगे और हमने सोच लिया था दिल्ली ही जाने के बारे में।

हम लगातार कई दिनों से अपने छत्तीसगढ़ में होने के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करते आ रहे थे। तो छत्तीसगढ़ के लगभग हर शहर से मैसेज आते। यहाँ तक कि भानुप्रतापपुर और अंतागढ़ तक से भी मैसेज आए कि हम उनके यहाँ भी जाएँ। लेकिन हमें सभी अनजान मित्रों को नजरअंदाज करना पड़ता है। इसी दौरान दुर्ग से अभिषेक दुबे जी का फोन भी आया। उन्हें फोन नंबर कहाँ से मिला, यह आज भी एक रहस्य है। उन्होंने दुर्ग आने की बात कही, हमने झूठी ‘हाँ’ कह दी और बात आई-गई हो गई। अगर हम ‘ना’ करते, तो कुछ बहाने सोचने पड़ते। ‘हाँ’ कहने से हम बहाने बनाने से बच गए। जब दुर्ग जाएँगे, तब या तो वे भूल चुके होंगे या हम रायपुर से चुपचाप बिलासपुर की ओर निकल जाएँगे और दुर्ग साइड रह जाएगा।

लेकिन आज फिर उनका फोन आ गया - “नीरज भाई, दुर्ग आने के बारे में क्या विचार है?”
“हाँ जी सर, जरूर। दुर्ग तो जरूर आएँगे। आज रात तक पहुँचेंगे।”
जबकि उस समय दिमाग में चल रहा था कि आज रायपुर के पास अभनपुर में ललित शर्मा जी के यहाँ रुकेंगे और कल सुनील पांडेय जी के यहाँ कसडोल चले जाएँगे। दुर्ग साइड रह जाएगा। आज दोपहर को फोन करके अभिषेक जी से मना कर देंगे।
“नीरज जी, आपका स्वागत है। आप किसी भी समय आइए, कोई दिक्कत नहीं है। धमतरी से पाटन वाला रास्ता ले लेना, वो ज्यादा आसान है।”
“हाँ जी, हम ऐसा ही करेंगे।”
“और हमारे बच्चे आपकी किताबें पढ़ते हैं। वे भी बहुत उत्साहित हो रहे हैं कि आप आओगे।”
“हाँ जी सर, जरूर आएँगे।”
“ये लो, मेरी पत्नी आपसे बात करना चाहती है।”
जल्द ही दीप्ति और श्रीमति दुबे जी फोन पर बतिया रही थीं। फोन कटा तो दीप्ति का आदेश था - “दुर्ग चलो।”

रात नौ बजे तक दुर्ग पहुँचे। असल में अभिषेक जी का घर भिलाई के ज्यादा नजदीक है, लेकिन हम दुर्ग ही लिखेंगे। इनसे ऐसी ट्यूनिंग बनी कि हम अगले दिन भी इनके यहाँ ही रुक गए। लगे हाथों अपने फोटोग्राफर मित्र और दुर्ग में फोटोग्राफी की कई दुकानें चलाने वाले विकास जी के यहाँ भी हो आए। कैमरे के लेंस पर धूल जम गई थी, विकास जी ने बातों-बातों में सब धूल साफ कर दी, फ्री में।



तीसरे दिन जब कसडोल के लिए चलने लगे तो दुबे दंपत्ति हमारे पास आए। उन्होंने हमें एक अलग कमरा दे रखा था और वे परसों से उस कमरे में नहीं आए थे। तो जब हम चलने को तैयार हो रहे थे, तो वे आए - “नीरज भाई, आपको होली छत्तीसगढ़ में ही मनानी थी, लेकिन किसी कारण से मना नहीं रहे। तो हम चाहते हैं कि आप अपने उसी प्लान पर कायम रहें और होली छत्तीसगढ़ में ही मनाएँ - दुर्ग में। हमारे साथ।”

और हमने तुरंत हाँ कर दी। लेकिन इस बार झूठी हाँ नहीं, बल्कि सच्ची हाँ की।

तो आज पिथौरा होते हुए कसडोल गए। रास्ते में बारनवापारा अभयारण्य है, जंगल में कुछ बायसन मिले। बायसन यानी जंगली भैंसे। लेकिन हम उनके फोटो नहीं ले सके।

तभी बिलासपुर के कलेक्टर श्री संजय अलंग जी का मैसेज आया कि बिलासपुर आओ, तो मिलते हुए जाना। अब भले ही हम बिलासपुर न जा रहे होते, लेकिन अब जरूर जाएँगे। तो कसडोल से दुर्ग लौटते हुए बिलासपुर कलेक्टर से मिलकर, उनका आशीर्वाद लेकर और एक ग्रुप फोटो लेकर आए।

मुझे होली मनाना बिल्कुल भी पसंद नहीं है, लेकिन पकवान खाना पसंद है। अभिषेक जी मेरी ही तरह एकदम शांत स्वभाव के हैं। मुझे लग रहा था कि होली पर भी ऐसा ही होगा और हम घर में मुंदे रहकर पकवान खाते रहेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। खूब हुड़दंग हुआ, खूब रंग-गुलाल लगा और बताते हैं कि मुझे भांग की आइसक्रीम भी खिलाई गई थी, जिसका असर तीसरे दिन तक भी रहा। हालाँकि मुझे ऐसा महसूस नहीं हुआ।

यहीं बगल में ही हमारी ब्लॉगिंग के पितामह पाबला जी भी रहते हैं। उन्होंने एक दिन दुर्ग से शरद कोकास जी और संजीव तिवारी जी को भी बुला लिया। सब पुराने ब्लॉगर ठहरे और ब्लॉगिंग के उन दिनों की याद आ गई, जब हम ब्लॉग के प्रचार के लिए फेसबुक पर निर्भर नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे की पोस्टों और कमेंट्स पर निर्भर रहा करते थे।

होली बीत गई और अब हमें भी छत्तीसगढ़ छोड़ना था। इस दौरान ललित शर्मा जी से मिलना रह गया। दुर्ग से उनके ऑफिस रायपुर या घर अभनपुर ही जाना नहीं हो पाया। जिस दिन हम कसडोल गए थे, उस दिन ललित जी अपनी मित्र-मंडली के साथ सिरपुर गए हुए थे और वहीं जंगल कैंपिंग कर रहे थे।

लेकिन छत्तीसगढ़ के एक सर्वश्रेष्ठ मित्र से मिलना बाकी था। वे नौकरी के सिलसिले में महाराष्ट्र में गोंदिया के पास तिरोरा में रहते थे। उस दिन हम दिल्ली के लिए दुर्ग से निकले और 200 किलोमीटर की दूरी तय करके जब उनके आवास पर पहुँचे, तो वे ऑफिस से छुट्टी लेकर हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।

ये थे प्रकाश यादव जी।

यहाँ भी हमारा एक दिन रुकने का मन था, लेकिन जाटपन आड़े आ गया। सुबह जब हम तैयार होकर अलविदा कहने लगे, तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि हम अगले ही दिन अलविदा कह देंगे। उन्होंने रुकने का जितना अधिक दबाव बनाया, हम भी उतने ही अधिक जाने पर अड़ गए। और जब उन्होंने हमारी जिद के आगे हार मान ली, तब हमें एहसास हुआ कि इतनी जिद नहीं दिखानी थी। एक दिन रुक ही जाना चाहिए था।

आज हम 600 किलोमीटर चलकर आधी रात तक ओरछा आ गए - मुकेश पांडेय जी के घर पर। 600 किलोमीटर चलने का एक ही मतलब है कि हमें अगले दिन भी ओरछा रुकना होगा। तो अगले दिन भी ओरछा रुके और रामराजा के वी.आई.पी. दर्शन किए। उधर यू.पी. पुलिस में कार्यरत नयन सिंह जी भी दौड़े चले आए। हमारी जानकारी में वे आजकल झाँसी में थे, लेकिन हाल ही में उनकी पोस्टिंग उरई हो गई थी। अगर वे ओरछा न आते, तो हम झाँसी में उनसे मिलने का प्लान बना रहे थे।

ओरछा से दिल्ली तो एक दिन की दूरी पर ही स्थित है। झाँसी, दतिया, ग्वालियर, मुरैना, धौलपुर सभी शहरों के कुछ जाने-अनजाने मित्रों ने फोन नंबर दिए, मिलने को कहा, रुकने को कहा, लेकिन हम उनके मैसेज का जवाब तब देते, जब उनके शहर से सौ किलोमीटर आगे निकल जाते।

लेकिन आगरा में भारत भूषण जी और मनीष गोयल जी ने हमारी नीयत समझ ली और रास्ते में ही खड़े मिले। और तो और, उन्होंने हमें 70 की स्पीड से बाइक चलाते हुए पहचान भी लिया और हाथ हिलाकर व हूलूलूलू का शोर मचाकर हमें रुकने को बाध्य कर दिया। चाय-पानी हुआ और कई किलो पेठे की मिठाई हमारे हवाले कर दी गई। कहीं भी जगह नहीं थी, लेकिन मिठाई की जगह तो बन ही जाती है।

उधर मथुरा के एक मित्र रास्ते में कहीं हमारा माल्यार्पण करना चाह रहे थे। हम अभी माल्यार्पण से बचकर ही रहते हैं, इसलिए यमुना एक्सप्रेसवे पर 210 रुपये का टोल कटवाया और सीधे दिल्ली आकर ही दम लिया।

...
यह बाइक यात्रा हमने 10 फरवरी 2019 को गोवा से शुरू की थी और 28 मार्च 2019 को दिल्ली में समाप्त की। यानी कुल 46 दिन की यात्रा रही। इस दौरान बाइक कुल 5786 किलोमीटर चली और 10370 रुपये का 142 लीटर पेट्रोल इस्तेमाल हुआ। कुल औसत निकला लगभग 40 किलोमीटर प्रति लीटर का।



ऊटी

ऊटी गुलाब उद्यान







ऊटी लेक


ऊटी के चारों ओर चाय के बागान हैं...




तिरुपति में...

विजयवाडा से विशाखापटनम की सड़क रेलवे लाइन के साथ-साथ है...


विजयवाडा और राजमुंद्री के बीच में इस नारियल वाले ने हमें फोटो खींचते देख एक नारियल फ्री दिया...




यानम पॉण्डिचेरी का हिस्सा है...

यानम


काकीनाडा बीच

विशाखापटनम से जगदलपुर तक हम रेलवे लाइन के साथ-साथ रहे...

अरकू वैली




जगदलपुर रायपुर रोड


बारनवापारा अभयारण्य




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2 comments:

  1. भाई फोटो अब छोटे छोटे साइज़ के लगाने लगे हो

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