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तीसरा दिन: जैसलमेर में मस्ती तो है

13 दिसंबर 2019 कुछ साल पहले जब मैं साइकिल से जैसलमेर से तनोट और लोंगेवाला गया था, तो मुझे जैसलमेर में एक फेसबुक मित्र मिला। उसने कुछ ही मिनटों में मुझे पूरा जैसलमेर ‘करा’ दिया था। किले के गेट के सामने ले जाकर उसने कहा - “किले में कुछ नहीं है... आओ, आपको हवेलियाँ दिखाता हूँ।” फिर हवेलियों के सामने भी ऐसा ही कहा और इस प्रकार मैंने पूरा जैसलमेर कुछ ही मिनटों में देख लिया। मुझे यह सब बड़ा खराब लगा था और बाद में मैंने उसे फेसबुक पर ब्लॉक कर दिया। हमारा अपना एक फ्लो होता है, अपनी रुचि होती है, अपना समय होता है, तब हम कहीं घूमने या न घूमने का निर्णय लेते हैं। अक्सर जब हम किसी शहर में जाते हैं, तो उस शहर के मित्र हमारी रुचि, फ्लो और समय का ध्यान न रखते हुए अपनी मर्जी से शहर घुमाने लगते हैं... हम मना करने में संकोच कर जाते हैं और इस प्रकार हमारा वह समय भी बर्बाद हो जाता है और हमारे मन में उस शहर की भी छवि खराब होती है। ऐसा ही जैसलमेर के साथ था। फिर हमने परसों जोधपुर का किला देखा... वहाँ हमारा मन नहीं लगा, तो लग रहा था कि कहीं जैसलमेर के किले में भी ऐसा न हो। लेकिन जैसलमेर आए हैं...

दूसरा दिन: पोखरण फोर्ट और जैसलमेर वार मेमोरियल

पिछली पोस्ट: जोधपुर में मेरा मन नहीं लगा 12 दिसंबर 2019... अपने आप सुबह सुबह ही आँख खुल गई। और खुलती भी क्यों न? हमने खुद ही कल ऐलान किया था कि सुबह 8 बजे हर हाल में सबको गाड़ी में बैठ जाना है। रेस्टोरेंट में पहुँचे, तो देखा कि सबने नाश्ता कर लिया है... बस, हम ही बाकी थे। गाड़ी में चढ़ा, तो सामने गुप्ता जी दिखे, फिर भी मैंने आवाज लगाई... "गुप्ता जी आ गए क्या??" गुप्ता जी ने हँसते हुए कहा... "हाँ जी, आ गए।" असल में कल सभी लोग गाड़ी में बैठ जाते और गुप्ता जी को फोन करके बुलाना पड़ता। कई बार ऐसा हुआ। हो सकता है कि एकाध बार किसी को खराब लगा हो, लेकिन यह सबसे युवा जोड़ी थी और फिर गुप्ता जी को आवाज लगाना हमारा नियमित क्रियाकलाप बन गया। पहले तो ओसियाँ के रास्ते जाने का विचार था, लेकिन अब गाड़ी जैसलमेर वाले सीधे रास्ते पर दौड़ रही थी। बाहर धूप निकली थी, लेकिन रात बूँदाबाँदी हो जाने के कारण ठंडक बढ़ गई थी, इसलिए किसी ने भी खिड़की नहीं खोली। आधे घंटे के अंदर सब के सब सो चुके थे। मैं खुद गहरी नींद में था। दो-ढाई घंटे बाद आँख खुली। गाड़ी एक होटल के सामने र...

जोधपुर में मेरा मन नहीं लगा

मैं अनगिनत बार जोधपुर जा चुका हूँ, लेकिन कभी भी यहाँ के दर्शनीय स्थल नहीं देखे। ज्यादातर बार अपनी ट्रेन-यात्राओं के सिलसिले में गया हूँ और एक बार दो साल पहले बाइक से। तब भी जोधपुर नहीं घूमे थे और एक रात रुककर आगे बाड़मेर की ओर निकल गए थे। इस बार भी हम जोधपुर नहीं घूमने वाले थे, लेकिन मित्रों के सुझाव पर जोधपुर लिस्ट में जोड़ा गया। यह यात्रा जैसलमेर और थार मरुस्थल की होने वाली थी, लेकिन सभी के लिए जोधपुर पहुँचना ज्यादा सरल है, इसलिए जोधपुर जोड़ना पड़ा - जोधपुर से शुरू और जोधपुर में खत्म। मैं भूल गया था कि हमारे सभी मित्र हमारे एक आग्रह पर कहीं भी पहुँच सकते हैं। मैंने सभी मित्रों को सुविधाभोगी समझ लिया था और मान लिया था कि अगर हम इस यात्रा को जोधपुर से जोधपुर तक रखेंगे, तो ज्यादा मित्र शामिल होंगे। हम आजकल दो तरह की यात्राएँ करते हैं - अपनी निजी यात्राएँ और कॉमर्शियल यात्राएँ। यह यात्रा एक कॉमर्शियल यात्रा थी - 11 से 15 दिसंबर 2019... सभी को 11 की सुबह जोधपुर में एकत्र होना था, पूरे दिन जोधपुर के दर्शनीय स्थल देखने थे और रात जोधपुर में रुककर अगले दिन टैक्सी से जैसलमेर के लिए निकल...

चलो कोंकण: दिल्ली से इंदौर वाया जयपुर

11 सितंबर 2018 पता नहीं क्यों मुझे लगने लगा कि मोटरसाइकिल में कोई खराबी है। कभी हैंडल को देखता; कभी लाइट को देखता; कभी क्लच चेक करता; कभी ब्रेक चेक करता; तो कभी पहियों में हवा चेक करता; लेकिन कोई खराबी नहीं मिली। असल में कल-परसों जब इसकी सर्विस करा रहा था, तो मैकेनिक ने बताया था कि इसके इंजन में फलाँ खराबी है और उसे ठीक करने के दस हजार रुपये लगेंगे। “और अगर ठीक न कराएँ, तो क्या समस्या होगी?” “यह मोबिल ऑयल पीती रहेगी और आपको इस पर लगातार ध्यान देते रहना होगा।” उसने कहा तो ठीक ही था। यह मोबिल ऑयल पीती तो है। हालाँकि एक लीटर मोबिल ऑयल 1200 किलोमीटर से ज्यादा चल जाता है। और अगर यह न पीती, तब भी इतनी दूरी के बाद मोबिल ऑयल बदलना तो पड़ता ही है। इसलिए हम चिंतित नहीं थे। लेकिन आज ऐसा लग रहा था, जैसे यह कुछ असामान्य है। सत्तर की स्पीड तक पहुँचते-पहुँचते इंजन से कुछ घरघराहट जैसी आवाज भी आ रही थी। वैसे तो यह आवाज पहले भी आती थी, लेकिन आज ज्यादा लग रही थी। वाइब्रेशन भी ज्यादा लग रहे थे। इस बारे में दीप्ति से पूछा तो उसने कहा - “यह तुम्हारे मन का वहम है। बाइक में उतने ही वाइब्रेशन हैं, जितने पहले ह...

आंबलियासन से विजापुर मीटरगेज रेलबस यात्रा

19 मार्च, 2017 मैं महेसाणा स्टेशन पर था - “विजापुर का टिकट देना।”  क्लर्क ने दो बार कन्फर्म किया - “बीजापुर? बीजापुर?”  नहीं विजापुर। वी जे एफ। तब उसे कम्प्यूटर में विजापुर स्टेशन मिला और 15 रुपये का टिकट दे दिया। अंदाज़ा हो गया कि इस मार्ग पर भीड़ नहीं मिलने वाली। प्लेटफार्म एक पर पहुँचा तो डी.एम.यू. कहीं भी नहीं दिखी। प्लेटफार्म एक खाली था, दो पर वीरमगाम पैसेंजर खड़ी थी। फिर एक मालगाड़ी खड़ी थी। क्या पता उसके उस तरफ डी.एम.यू. खड़ी हो। मैं सीढ़ियों की और बढ़ने लगा। बहुत सारे लोग पैदल पटरियाँ पार कर रहे थे, लेकिन जिस तरह हेलमेट ज़रूरी है, उसी तरह स्टेशन पर सीढियाँ।

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: बोटाद से गांधीग्राम

18 मार्च 2017 पहले तो योजना थी कि आज पूरे दिन भावनगर में रुकूँगा और विमलेश जी जहाँ ले जायेंगे, जाऊँगा। उन्होंने मेरे लिये बड़ी-बड़ी योजनाएँ बना रखी थीं और रेलवे के कारखाने में मेरे एक लेक्चर की भी प्लानिंग थी। लेकिन जब मुझे पता चला कि आंबलियासन से विजापुर वाली मीटरगेज की लाइन चालू है और उस पर रेलबस भी चलती है, तो मेरा मन बदल गया। अगर इस बार उस लाइन पर यात्रा नहीं की तो पता नहीं कब इधर आना हो और कौन जाने तब तक वो लाइन बंद भी हो जाये। विजापुर से आदरज मोटी, कलोल से महेसाणा और अहमदाबाद से खेड़ब्रह्म वाली लाइनें पहले ही बंद हो चुकी हैं। गेज परिवर्तन का कार्य जोरों पर चल रहा है। यही बात विमलेश जी को बतायी तो वे इसके लिये तुरंत राज़ी हो गये। तय हुआ कि आज बोटाद से अहमदाबाद तक यात्रा करूँगा और कल आंबलियासन से विजापुर। बोटाद से अहमदाबाद जाने के लिये दो बजे वाली ट्रेन पकडूँगा और यहाँ भावनगर से बोटाद के लिये साढ़े ग्यारह वाली। यानी आज साढ़े ग्यारह बजे तक हमारे पास समय रहेगा विमलेश जी के कारखाने में घूमने का। बाइक उठायी और निकल पड़े।

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: जूनागढ़ से देलवाड़ा

17 मार्च 2017 रात अच्छी नींद आयी। एक चूहे ने एक बार आसपास चहलकदमी की, एक दो डरावने सपने आये: फिर भी सब ठीक रहा। इतने बड़े रेस्ट हाउस में मैं अकेला ही था। भूतों के अस्तित्व को मैं मानता हूँ। रेलवे लाइन के किनारे बने इस सुनसान रेस्ट हाउस में भूत रहते होंगे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। धन्यवाद भूतों, मुझे शांति से सोने देने के लिए। जूनागढ़ से ट्रेन ठीक समय पर चल दी। भीड़ बिल्कुल नहीं थी। जैसे ही शहर से बाहर निकले, गिरनार पर्वत दिखायी पड़ने लगा। काफ़ी ऊँचा पर्वत है और जूनागढ़ के साथ-साथ गुजरात का भी बहुत बड़ा धार्मिक आस्था का केंद्र है। दूर से ही नमस्कार किया - भविष्य में दीप्ति के साथ आने का वादा करके। वीसावदर में हमारी ट्रेन पहुँचने के बाद खिजडिया-जूनागढ़ पैसेंजर आ गयी। लग रहा था कि अब हमारी ट्रेन खाली हो जाएगी, लेकिन खिजडिया ट्रेन के आधे से ज्यादा यात्री इसमें चढ़ गए। सभी सीटें भर गयीं और कुछ यात्री खड़े भी रहे। मैं कल इस मार्ग पर यात्रा कर चुका था, इसलिए मेरे काम पर इस भीड़ का उतना प्रभाव नहीं पड़ा।

गिर फोरेस्ट रेलवे: ढसा से वेरावल

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें । दो घंटे ढसा में खड़ी रहकर यही ट्रेन अब वेरावल के लिये चल दी। ढसा से ब्रॉड़गेज की एक लाइन भावनगर जाती है और एक महुवा। ट्रेन चली तो एक कंटेनर ट्रेन महुवा की ओर जाती दिखी। धीरे-धीरे मीटरगेज की ट्रेन सरक रही थी, थोड़ी ही दूरी पर य्यै लंबी कंटेनर ट्रेन। बड़ा शानदार दृश्य था यह। मैं इसमें इतना खो गया कि फोटो लेना भी याद नहीं रहा। हालाँकि एक-दो फोटो जाती-जाती के ले ज़रूर लिये। अमरेली स्टेशन पर एक सूचना-पट्ट लगा हुआ था, जिस पर पीली बैकग्राउंड में काले अक्षरों में ताज़ा ही लिखा हुआ था - आरक्षण चार्ट। मैं चौंक गया। अरे, यह क्या लिख दिया इन्होने? अमरेली में आरक्षण चार्ट? गिनी चुनी दो तीन पैसेंजर ट्रेनें आती हैं - जनरल डिब्बों वाली। जिसने भी यह काम करवाया है, उसने बीस रूपये का काम कराके हज़ार का बिल बनाया होगा। फेसबुक पेज पर एक लाइव वीडियो चला दी। यार लोग खुश हो गए। पूछने लगे कहाँ का है, कहाँ का है। उनसे अगर बता देता कि अमरेली का है तो कोई भी यह पता लगाने की ज़हमत नहीं उठाता कि अमरेली है कहाँ। उल्टा मुझसे ही पूछते।

गुजरात मीटरगेज रेल यात्रा: जेतलसर से ढसा

अंधा क्या माँगे? मुझे ट्रेन में जो बर्थ सबसे ज्यादा पसंद है, वो है अपर बर्थ। आप अपने बैग से कई सामान अपने इर्द गिर्द फैला सकते हैं और चोरी होने व गिरने का डर भी नहीं। मोबाइल को कान के पास रख रकते हैं, कोने में पानी की बोतल, मोबाइल के पास बैटरी बैंक, थोड़ा नीचे कैमरा, केले या अंगूर। यह उन्मुक्तता किसी दूसरी बर्थ पर नहीं मिलती। वरीयता क्रम में इसके बाद मिड़ल बर्थ, लोअर बर्थ, साइड़ अपर और साइड़ लोअर। साइड़ लोअर भले ही पाँचवे नंबर पर हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि यह मुझे पाँचवे नंबर पर पसंद है। बल्कि यह बर्थ मुझे सबसे ज्यादा नापसंद है। और आज जब चार्ट बना तो आर.ए.सी. क्लियर होने के बाद मुझे मिली 39 नंबर की बर्थ - साइड़ लोअर। मैं इस पर जाकर दो अन्य लोगों के बीच जगह बनाता हुआ बैठ गया और इंतज़ार करने लगा कि कोई आये और मुझसे किसी भी बर्थ के बदले बदली कर ले। ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी और आठ मुसलमानों के दल के एक सदस्य ने जैसे ही अपनी कहानी सुनानी शुरू की, मैंने तपाक से कहा - “हाँ, बदल लूँगा। कौन-सी बर्थ पर जाना है?” उन्होंने कहा - “22 नंबर पर।” सेकंड का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं लगा, गणना ...

गुजरात मीटरगेज रेल यात्रा: अहमदाबाद से रणुंज

14 मार्च 2017 जब से मेरठ-सहारनपुर रेलवे लाइन बिजली वाली हुई है और इस पर बिजली वाले इंजन, बिजली वाली ट्रेनें चलने लगी हैं, गोल्डन टेम्पल मेल में डीजल इंजन लगना बंद हो गया है। निजामुद्दीन में इंजनों की अदला-बदली होती थी, तो यहाँ इस ट्रेन के लिए तीस मिनट का ठहराव निर्धारित था, लेकिन अब इसे घटाकर पंद्रह मिनट कर दिया गया है। पहले यह सात बजकर पैंतीस पर निजामुद्दीन से चलती थी, जबकि अब सात बीस पर ही चल देती है। सात बजे मेरी नाईट ड्यूटी समाप्त होती है, तो इन बीस मिनटों में निजामुद्दीन कैसे पहुँचा, यह बात केवल मैं और धीरज ही जानते हैं। धीरज बाइक लेकर वापस चला गया, मैं निजामुद्दीन रह गया। जब फुट ओवर ब्रिज पर तेजी से प्लेटफार्म नंबर एक की और जा रहा था, तो एक गाड़ी की सीटी बजने लगी थी और वह गाड़ी थी - गोल्डन टेम्पल मेल।

बाइक यात्रा: रामदेवरा - बीकानेर - राजगढ़ - दिल्ली

21 दिसंबर 2016 हमारी आज की योजना थी कि पहले फलोदी के पास खींचण गाँव जायेंगे और वहाँ प्रवासी पक्षियों को देखेंगे। खींचण के निवासी इन पक्षियों को मेहमान की तरह मानते हैं और उसी तरह इनकी देखभाल करते हैं। उसके बाद रात होने तक बीकानेर पहुँचेंगे और कुलवंत जी के यहाँ रुकेंगे। कल देशनोक में करणी माता का मंदिर देखेंगे, जिसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। परसों यानी 23 तारीख़ को दिल्ली पहुँचकर ड्यूटी जॉइन कर लूँगा। लेकिन इस कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा। कारण था कि 24 और 25 दिसंबर को झाँसी के पास ओरछा में एक घुमक्कड़ सम्मेलन होना था। इनमें बहुत सारे मेरे मित्र थे और इनमें भी कई तो सपरिवार आने वाले थे। मेरा दिल्ली से झाँसी जाने का आरक्षण नहीं था, लेकिन झाँसी से दिल्ली वापस आने का आरक्षण था और झाँसी में रेलवे विश्राम गृह में एक कमरा भी बुक था। हालाँकि आयोजकों ने ओरछा में भी कमरों की व्यवस्था कर रखी थी, लेकिन ये हमारे बजट से बाहर थे। तो इस तरह मैं 23 की दोपहर तक दिल्ली पहुँचता, लगातार 16 घंटों की ड्यूटी करता और ओरछा के लिये निकल जाता। एक लंबी बाइक यात्रा के तुरंत बाद इतनी लंबी ड्यूटी करना, वो भी रा...

वुड़ फॉसिल पार्क, आकल, जैसलमेर

20 दिसंबर 2012 हम तनोट में थे। सुबह उठे तो मंदिर में आरती समाप्त होने वाली थी। जाकर एक बार फिर दर्शन किये और प्रसाद लिया। कैंटीन में चाय पी और निकल पड़े - अपने दिल्ली वापसी के सफ़र पर। तनोट से निकलते ही घंटियाली माता का मंदिर है। रेत का ऊँचा धोरा भी है। अच्छी लोकेशन पर है यह मंदिर। इसकी भी देखरेख बी.एस.एफ. ही करती है। इसलिये फोटो लेने पर कोई रोक नहीं। सड़क दो-लेन की है, बेहद शानदार बनी है। पिछली बार जब मैं साइकिल से आया था, तो यह सिंगल थी और इसे दोहरा बनाने का काम चल रहा था। रास्ते में रणाऊ गाँव आता है। यह भी रेत के टीलों से घिरा है और इसकी स्थिति भी फोटोग्राफी के लिये शानदार है। कहते हैं कि यहाँ कुछ फिल्मों की भी शूटिंग हो चुकी है।

जैसलमेर से तनोट - एक नये रास्ते से

19 दिसंबर 2016 आज हम यात्रा करेंगे जैसलमेर से तनोट तक, लेकिन परंपरागत रास्ते से नहीं बल्कि निहायत नये और अनछुए रास्ते से। जैसलमेर-सम रोड़ पर जहाँ से लोद्रवा की सड़क अलग होती है, वहाँ कुछ दूरियाँ लिखी थीं। इनमें प्रमुख था आसूतार 94 किलोमीटर। हमारी योजना इसी सड़क पर आसूतार, घोटारू, लोंगेवाला होते हुए तनोट जाने की थी। मैं सैटेलाइट से पहले ही इस सड़क की स्थिति देख चुका था। यह पूरी सड़क पक्की बनी है। इंटरनेट पर इसका कोई भी यात्रा-वृत्तांत नहीं मिलता। लोद्रवा से आगे छत्रैल है और फिर कुछड़ी है। कुछड़ी में एक टी-पॉइंट है - बाये सड़क सम जाती है और दाहिने आसूतार। अगर कल हम सम रुकते, तो शायद सीधे इधर ही आते। हम दाहिने मुड़ गये। थोड़ा आगे हाबुर गाँव है। यहाँ से सीधी सड़क जैसलमेर-तनोट रोड़ में मोकल के पास जाकर मिल जाती है और बायें जाने वाली सड़क आसूतार जाती है। यहाँ से हम भी आसूतार का पीछा करते-करते बायें मुड़ गये। दो-लेन की यह सड़क सीमा सड़क संगठन ने बनायी है और बेहद शानदार बनी है। राजस्थान के इस सुदूर इलाके में जरा भी यातायात नहीं है। कभी-कभार कोई जीप आ जाती, जिससे स्थानीय निवासी आना-जाना करते हैं। बस कोई नहीं द...

लोद्रवा - थार में एक जैन तीर्थ

19 दिसंबर 2016 आज ज्यादा कुछ नहीं लिखेंगे। कुछ फोटो हैं, वे देख लेना और थोड़ा-सा लिख भी देता हूँ, इसे पढ़ लेना। काफ़ी रहेगा। याद तो आपको होगा ही कि कल सुमित सम चला गया था और अपना टैंट लगाकर सोया था। हम दोनों जैसलमेर आ गये थे और एक गंदे-से होटल में अच्छी नींद ली। सुबह सुमित से व्हाट्स-एप पर बातचीत हुई, हमने अपनी लोकेशन उसे शेयर कर दी और कुछ ही देर में दरवाजे पर खटखटाहट हुई। सुमित आ गया था।

कुलधरा: एक वीरान भुतहा गाँव

18 दिसंबर 2016 कुलधरा - पता नहीं आपने इस स्थान का नाम सुना है या नहीं, लेकिन मैं मानता हूँ कि सुना भी होगा और देखा भी होगा। जैसलमेर से ज्यादा दूर नहीं है और सम जाने के रास्ते से थोड़ा-सा ही हटकर है। जब हम वहाँ पहुँचे तो पाँच बज चुके थे और जल्दी ही सूरज छिपने वाला था। यह मरुभूमि को देखते हुए काफ़ी बड़ा गाँव था और इसे योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया था। गाँव के अंदर सीधी सड़कें इसकी पुष्टि करती हैं। फिर किसी कारण से यह उजड़ गया और अब यहाँ कोई नहीं रहता। कोई कहता है कि इसका कारण पानी की तंगी था, कोई कहता है कि जैसलमेर के किसी वज़ीर के कारण उजड़ा और ज्यादा मान्यता है कि यह शापित और भुतहा है।

धनाना में ऊँट-सवारी

18 दिसंबर 2016 जब हम धनाना से लौट रहे थे और दो-तीन किलोमीटर ही चले थे, देखा कि सामने से एक ऊँटवाला अपने ऊँट पर बैठा आ रहा था। सुमित हमेशा की तरह हमसे आगे था। सुमित ने बाइक रोक ली और उसके फोटो लेने लगा। ऊँटवाला और ऊँट दोनों मँजे हुए खिलाड़ी की तरह ‘पोज़’ दे रहे थे। कभी सड़क के दाहिनी तरफ़ आ जाते, कभी बायीं तरफ़ और कभी सड़क घेरकर खड़े हो जाते तो कभी सड़क से नीचे उतर जाते। वे जानते थे कि किस तरह खड़े होना है ताकि अच्छे फोटो आयें। ऊँटवाले का नाम मुबारक अली था और ये धनाना के रहने वाले थे। इनके पास कई ऊँट हैं और सभी ऊँट और बेटे सम में काम करते हैं - पर्यटकों को ऊँट-सवारी कराने का काम। इनके बाकी सभी ऊँट सम जा चुके हैं। दो ऊँटों को इनका एक बेटा थोड़ी देर पहले ही यहाँ से सम लेकर गया है। कल यह भी सम जायेगा।

धनाना: सम से आगे की दुनिया

18 दिसंबर 2016 जब हम गूगल मैप में जैसलमेर से सम की सड़क देखते हैं, तो इस पर लिखा आता है - जैसलमेर-सम-धनाना रोड़। ज़ाहिर है कि इसी सड़क पर सम से भी आगे कहीं धनाना है। गौर से देखें तो यह सड़क आगे भारत-पाक सीमा तक जाती है। मतलब कहीं न कहीं बी.एस.एफ. वाले बैठे होंगे ताकि आम नागरिक सीमा तक न जा सकें। मेरी इच्छा उस बैरियर तक जाने की थी। पता नहीं वो बैरियर कहाँ होगा। इंटरनेट पर भी इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी। इसके बाद ज्यादा ध्यान देकर सैटेलाइट इमेज देखीं तो पता चला कि हरनाऊ तक और उससे भी आगे तक पक्की सड़क बनी हुई है। यह सड़क पश्चिम में होती हुई उत्तर में मुड़ जाती है और आगे लोंगेवाला जा पहुँचती है और 150 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी है। लेकिन बीच में 14 किलोमीटर का छोटा-सा टुकड़ा कच्चा दिख गया। शायद यह सैटेलाइट इमेज दो साल पुरानी हो, शायद अब उस 14 किलोमीटर में पक्की सड़क बन गयी हो, लेकिन यह तय कर लिया कि भले ही सम से आगे 100 किलोमीटर निकलकर वापस सम लौटना पड़े, लेकिन किसी भी हालत में उस कच्चे रास्ते पर बाइक नहीं चलायेंगे।

राष्ट्रीय मरु उद्यान - डेजर्ट नेशनल पार्क

18 दिसंबर 2016 इस नेशनल पार्क से हमारा सामना अचानक अपने आप ही हो गया। असल में हमारी योजना थी - मुनाबाव से तनोट जाना। सीधा रास्ता है जैसलमेर के रास्ते जाओ। लेकिन मैं चाहता था कि सीमा के नज़दीक-नज़दीक ही रहें। एक सड़क म्याजलार से पश्चिम में जाती है और आगे सम के पास कहीं जाकर निकलती है। इसका और अन्य कई सड़कों का मैंने सैटेलाइट से अच्छी तरह अध्ययन किया। चूँकि इंटरनेट पर इस इलाके के बारे में, इसकी सड़कों के बारे में कुछ भी जानकारी उपलब्ध नहीं थी, सैटेलाइट इमेज पर भरोसा करके तय कर लिया था कि इस सड़क से पश्चिम में जायेंगे। यह कच्ची सड़क नहीं थी और सैटेलाइट से देखने पर काली लकीर स्पष्ट दिख रही थी, जिससे इतना तो पक्का हो गया कि एक साल पहले तक या दो साल पहले तक यहाँ पक्की सड़क थी। गूगल में सैटेलाइट इमेज एक-दो साल पुरानी होती हैं। ट्रैफिक नहीं होता और बारिश नहीं होती, इसलिये सड़क ख़राब होने की कोई संभावना नहीं।

खुड़ी - जैसलमेर का उभरता पर्यटक स्थल

17 दिसंबर 2016 एक घंटे में ही म्याजलार से 56 किलोमीटर दूर खुड़ी आ गये। यहाँ से जैसलमेर लगभग 50 किलोमीटर है। खुड़ी अपने रेत के टीलों के लिये प्रसिद्ध है। चारों तरफ़ टैंट कालोनियाँ ही थीं। अब हम फिर से ‘सभ्यता’ में आ गये थे। अगर हम यहाँ अपने टैंट लगाते, तो किसी भी तरह की परेशानी की बात नहीं थी। यहाँ खूब पर्यटक आते हैं और खुड़ी वालों के लिये हमारे टैंट असामान्य नहीं होते। लेकिन मैं इरादा कर चुका था कि अपना टैंट नहीं लगाना। थोड़े-बहुत पैसे खर्च होंगे, लेकिन नर्म बिस्तर पर पैर फैलाकर सोने की सुविधा होगी, हगने-मूतने की सुविधा होगी और ‘प्राइवेसी’ होगी। टैंट तो आपातकाल के लिये होते हैं। सुमित के लिये टैंट नयी चीज थी, इसलिये वह टैंट ही लगाना चाहता था, लेकिन उसने भी हमारा साथ दिया। एक रिसॉर्ट वाले के यहाँ बात की। जानते थे कि ये बहुत महँगे होते हैं, फिर भी बात कर ली।

थार के सुदूर इलाकों में : किराडू - मुनाबाव - म्याजलार

17 दिसंबर 2016 किराडू से साढ़े ग्यारह बजे चले। अगला लक्ष्य था मुनाबाव में भारत-पाक सीमा देखना। सड़क सिंगल है, लेकिन ट्रैफिक न होने के कारण कोई दिक्कत नहीं होती। कभी-कभार कोई ट्रक या कोई जीप सामने से आ जाती। रामसर एक बड़ा गाँव है। अच्छी चहल-पहल थी। गड़रा रोड़ से दो किलोमीटर पहले सड़क किनारे लगे एक सूचना-पट्ट पर निगाह गयी - “शहीद स्मारक लोको पायलट, 1965 भारत पाक युद्ध।” तुरंत बाइक रोकी और मुख्य सड़क से लगभग 100 मीटर दूर रेलवे लाइन के किनारे ले गये। यहाँ एक स्मारक बना है। गौरतलब है कि 1965 के भारत-पाक युद्ध में कश्मीर से लेकर गुजरात तक लड़ाई छिड़ी हुई थी। इतनी लंबी सीमा में कभी भारतीय सेना पाकिस्तान के अंदर जाकर कब्जा कर लेती, तो कभी पाकिस्तानी सेना भारत के अंदर। मुनाबाव रेलवे स्टेशन पाकिस्तान के कब्जे में आ गया था। उसी दौरान बाड़मेर से मुनाबाव जाती एक ट्रेन पर 10 सितंबर की रात साढ़े दस बजे गड़रा रोड़ के पास पाकिस्तान ने निशाना साधा। इसके गार्ड़ और फायरमैन समेत कई कर्मचारी शहीद हो गये। थोड़ा आगे इंजीनियरिंग स्टाफ का शहीद स्मारक भी है।