दक्षिण भारत यात्रा: बादामी भ्रमण



11 फरवरी 2019
कर्नाटक कर्क रेखा के पर्याप्त दक्षिण में है। कर्क रेखा के दक्षिण का समूचा भारत उष्ण कटिबंध में स्थित है। इस क्षेत्र की खासियत होती है कि यहाँ गर्मी बहुत ज्यादा पड़ती है। उधर कर्क रेखा के उत्तर में यानी उत्तर भारत में भयानक शीतलहर चल रही थी और हिमालय में तो बर्फबारी के कई वर्षों के रिकार्ड टूट रहे थे। और इधर हम गर्मी से परेशान थे।
और हम एक-दूसरे से पूछ भी रहे थे और इल्जाम भी लगा रहे थे - “इसी मौसम में साउथ आना था क्या?”

तो हमने तय किया था कि अभी चूँकि हमें साउथ में कम से कम एक महीना और रहना है, इसलिए गर्मी तो परेशान करेगी ही। और इससे बचने का सर्वोत्तम तरीका था कि केवल सुबह और शाम के समय ही घूमने के लिए बाहर निकलो। दोपहर को कमरे में रहो। यहाँ तक कि दोपहर को कभी बाइक भी नहीं चलानी।

इसी के मद्देनजर आज की योजना थी - सुबह छह बजे से दोपहर दस-ग्यारह बजे तक बादामी घूमना है, शाम चार बजे तक आराम करना है और चार बजे के बाद ऐहोल की तरफ निकल जाना है और साढ़े पाँच बजे तक पट्टडकल पहुँचना है। इन सभी की दूरियाँ बहुत ज्यादा नहीं हैं।

बादामी में एक तालाब है - अगस्त्य तालाब या अगस्त्य लेक। और जो भी यहाँ दर्शनीय है, बादामी जिस वजह से भी प्रसिद्ध है, वो सब इस तालाब के पास ही है। आपको बहुत दूर नहीं जाना होता। हम होटल में ही मोटरसाइकिल छोड़कर पैदल निकल पड़े। रास्ते में ‘क्लार्क्स इन’ नामक थ्री-स्टार होटल के सामने एक रेहड़ी पर दस-दस रुपये की भरपेट इडली मिल रही थी, सूतने में देर नहीं लगी।


20-20 रुपये का टिकट लेकर गुफाओं की ओर चल दिए। गुफाओं तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं। ज्यादा नहीं, शायद 20-25 ही। यहाँ चार गुफाएँ हैं। पहली गुफा भगवान शिव को समर्पित है, दूसरी और तीसरी विष्णु को और चौथी जैन धर्म को। चौथी गुफा बहुत बाद में बनी, पहली तीन गुफाओं से तीन सौ साल बाद। गुफाएँ एक-दूसरे से बहुत दूर नहीं है। बल्कि मिली हुई हैं - बैक टू बैक।
प्रत्येक गुफा के सामने पुरातत्व वालों के सूचना-पट्ट लगे हैं, जिनमें उस गुफा के बारे में सारी जानकारी अंग्रेजी, हिंदी और कन्नड़ में लिखी है। हमने हिंदी वाले भाग के फोटो खींचे और इसी पोस्ट में नीचे लगाए भी हैं। आप देख लेना। अगर आपको हिंदी नहीं आती, तो इंटरनेट पर अंग्रेजी और कन्नड़ वाले फोटो भी मिल जाएंगे।

और आपको पता ही है कि मैं पुरातत्व मामलों में डिब्बाबंद हूँ, इसलिए ज्यादा वर्णन नहीं कर पाऊँगा। लेकिन इतना जरूर है कि ठोस विशाल चट्टान को छैनियों से काटकर जिस तरह हमारे पूर्वजों ने इन गुफाओं का निर्माण किया और इसकी दीवारों, खंबों और छतों पर जो जीवंत मूर्तियाँ उकेरीं, वे आज के समय में कहीं नहीं बनती।

इन गुफाओं के सामने खड़े होकर अगर आप बाहर की ओर देखेंगे तो आपको अगस्त्य लेक दिखाई देगी। इसके दूसरी तरफ भी छोटी पहाड़ी है और उसके ऊपर कुछ मंदिर बने दिखाई देते हैं। तालाब के ऊपर की ओर एक मंदिर परिसर है, वो भूतनाथ मंदिर है।
चलिए, आपको भी उधर ले चलते हैं।

पुरातत्व संग्रहालय में प्रवेश शुल्क 5 रुपये प्रति व्यक्ति है, लेकिन यहाँ फोटो खींचना मना है। बादामी, पट्टडकल और अन्य स्थानों से प्राप्त कुछ मूर्तियाँ यहाँ रखी हैं। अच्छा मैनटेन कर रखा है। जरूर जाना चाहिए। प्रोजेक्टर पर एक लघुफिल्म भी चल रही थी, जो पट्टडकल से संबंधित थी।

संग्रहालय के बगल से ही कुछ सीढ़ियाँ ऊपर जाती दिखती हैं। ये ऊपर पहाड़ी पर जाती हैं। ये पहाड़ियाँ किसी जमाने में ज्वालामुखी के लावे से निर्मित हुई हैं, इसलिए एकदम ठोस हैं और मिट्टी का अंश भी नहीं है। कालांतर में लावे के ये पहाड़ यानी ठोस विशाल चट्टानें टूट गईं और इनके बीच में दरारें बन गईं। इन्हीं दरारों के बीच से रास्ता है। आप एक पतली गली में चल रहे होते हैं और आपके दोनों तरफ सीधी खड़ी चट्टानें हैं। ऊपर देखने पर आसमान का 5 प्रतिशत हिस्सा ही दिखाई देता है, मानों यहाँ से आसमान पर भी जी.एस.टी. लगी हुई हो।

और ऊपर से बादामी शहर का जो विहंगम नजारा दिखाई देता है, वो वास्तव में शानदार है। यहाँ दो मंदिर हैं और एक किला भी।

और आखिर में एक-एक गिलास गन्ने का रस पीने के बाद जब हम भूतनाथ मंदिर पहुँचे तो बारह बज चुके थे और ठीक सिर के ऊपर सूरज मंडरा रहा था और कैमरे का 8 जीबी का मेमोरी कार्ड भी खत्म हो गया था। एक खड़ी पहाड़ी और उस पर पानी के निशान बता रहे थे कि बारिश के दिनों में यहाँ बड़ा ऊँचा जलप्रपात बनता होगा।

बादामी के ये सभी मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन हैं और मुझे यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई कि यहाँ पुरातत्व विभाग धार्मिक व्यापारियों के सामने लाचार नहीं है। इन मंदिरों में वो होता है, जो पुरातत्व विभाग चाहता है। हो सकता है यहाँ सुबह-सवेरे नाममात्र की पूजा होती हो, लेकिन इनके प्रत्येक कोने में जाना एलाऊ है और हर जगह के फोटो लेना भी। आप किसी भी मूर्ति को, किसी भी शिवलिंग को किसी भी कोने से, किसी भी एंगल से देख सकते हैं और इनके बनाए जाने की कहानी बुन सकते हैं।
क्योंकि प्रत्येक चीज की एक कहानी होती है।


ठेले पर इडली

बादामी गुफाओं का टिकट





बादामी में जो भी दर्शनीय है, सब इस तालाब के चारों ओर ही हैं...



















दूर दिखता भूतनाथ मंदिर


यह काम भी जरूरी है









ऊपर से नीचे झाँकने पर... इन्हीं दरारों से होकर हम यहाँ आए हैं...










आज की वीडियो







आगे पढ़िए: दक्षिण भारत यात्रा: पट्टडकल - विश्व विरासत स्थल

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About नीरज मुसाफ़िर

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