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मालशेज घाट - पश्चिमी घाट की असली खूबसूरती

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17 सितंबर 2018
पश्चिमी घाट के पर्वत कहाँ से शुरू होते हैं, यह तो नक्शे में देखना पड़ेगा; लेकिन कन्याकुमारी में समाप्त होते हैं, यह नहीं देखना पड़ेगा। और महाराष्ट्र में ये पूरे वैभव के साथ विराजमान हैं, यह मैंने किताबों में भी पढ़ा था और नक्शे में भी देखा था। दो-तीन बार रेल से भी देखने का मौका मिला, जब मुंबई से भुसावल की यात्रा की, जब मडगाँव से हुबली की यात्रा की और जब हासन से मंगलूरू की यात्रा की। बस... इसके अलावा कभी भी पश्चिमी घाट में जाने का मौका नहीं मिला।
हम अपनी मोटरसाइकिल से कल्याण से मुरबाड की ओर बढ़ रहे थे। रास्ता अच्छा था। शहर की भीड़ पीछे छूट चुकी थी। हर दस-दस मिनट में अहमदनगर से कल्याण की बसें जाती मिल रही थीं। ज्यादातर बसों पर अहमदनगर की बजाय ‘नगर’ लिखा था। अहमदनगर को नगर भी कहते हैं। बसों की इतनी संख्या से पता चल रहा था कि यह सड़क अहमदनगर को मुंबई से जोड़ने वाली मुख्य सड़क है। लेकिन इन बसों के अलावा कोई ट्रैफिक नहीं था।
दोपहर बाद हो चुकी थी। तेज गर्मी थी। मुरबाड में पानी की एक बोतल लेनी पड़ी - केवल ठंडी होने के कारण। पहले गला तर किया, फिर सिर पर उड़ेल लिया। बड़ी राहत मिली।
धीरे-धीरे पश्चिमी घाट नजदीक आने लगे। ये पहाड़ एकदम ऊपर उठते हैं। एकदम मतलब नब्बे डिग्री पर। या तो उधर समुद्र है, या फिर एकदम पहाड़। बीच में कुछ किलोमीटर चौड़ी एक छोटी-सी मैदानी पट्टी है, जिसे समुद्रतटीय मैदान भी कहते हैं। मुंबई भी इसी मैदान में है और पूरा कोंकण भी इसी में है और गोवा भी इसी में है। फिर एकदम पहाड़ हैं। पश्चिमी घाट के पहाड़। कहीं-कहीं ये पहाड़ समुद्रतटीय मैदान में अतिक्रमण भी करते दिखते हैं, लेकिन सर्वमान्य रूप से यही प्रचलित है कि वो मैदान ही पहाड़ देखकर उठने लगा और समुद्र देखकर गिरने लगा, इसलिए ऊँचा-नीचा हो गया। फिर भी कुल मिलाकर मैदान मैदान है और पहाड़ पहाड़। यहाँ दोनों ही खूबसूरत हैं। कौन कहता है मैदानों में खूबसूरती नहीं होती? कभी कोंकण रेलवे में यात्रा करके आइए।
मुझे हैरानी इस बात पर होती है कि एकदम खड़े पहाड़ हैं। ये गिरते क्यों नहीं? इनमें भू-स्खलन क्यों नहीं होता?
क्योंकि ये ज्वालामुखी से बने हैं। करोड़ों साल पहले जब भारतभूमि अफ्रीका से मिली हुई थी या फिर समुद्र में तैर रही थी, तब इस क्षेत्र में ज्वालामुखी थे। लावा ही लावा उगलते रहते थे। उस लावे से पश्चिमी घाट के पहाड़ बने - एकदम कठोर। कालांतर में भारतभूमि एशियाभूमि से मिली, हिमालय का जन्म हुआ और ज्वालामुखी भी शांत हुए... लेकिन तब तक यहाँ पहाड़ बन चुके थे। लावे के पहाड़। एकदम खड़े। कठोर।
धुर से धुर तक ये ऐसे ही हैं। महाराष्ट्र से केरल तक ये करीब-करीब ऐसे ही हैं। इन पहाड़ों के इस तरफ तो खड़ा ढाल है, उस तरफ हल्का-हल्का ढलान है। जो नदी इन पहाड़ों के उस तरफ से निकलती है, वो 50 किलोमीटर दूर अरब सागर में नहीं गिरती, बल्कि 1000 किलोमीटर दूर बंगाल की खाड़ी की ओर चल देती है। इन पहाड़ों से जो नदियाँ अरब सागर में मिलती हैं, वे तो बहुत छोटी-छोटी नदियाँ होती हैं।
और आप ही बताइए कि कोई नदी या जलधारा जब पश्चिमी घाट में पैदा होकर अरब सागर में मिलने चलेगी, तो क्या चुपचाप बह लेगी? अजी नहीं बहेगी। ये खड़े पहाड़ उसे चुपचाप बहने ही नहीं देंगे। य्यै ऊँचे-ऊँचे जलप्रपात बनते हैं कि आप हैरान हो जाओगे। ऊँचे जलप्रपात हैं, इतना भी काफी था; लेकिन यहाँ तो ‘रिवर्स वाटरफाल’ भी हैं। मतलब पानी नीचे गिरने की बजाय ऊपर आसमान में उड़ जाता है। मेरी बातें गल्प लग रही होंगी। यूट्यूब पर सर्च कर लीजिए।
लेकिन इन पहाड़ों की असली बात तो अभी तक हमने लिखी ही नहीं है। ये वर्षारोधी पर्वत हैं। अरब सागर से जो भी हवा चलती है, उसमें स्वाभाविक रूप से नमी होती है। वे जब इन खड़े पहाड़ों से टकराती हैं, तो सारी नमी यहीं निकल जाती है और इन पर्वतों के पार पहुँचती है शुष्क हवा। इनके उस तरफ दक्कन का पठार है और आपको पता होना चाहिए कि दक्कन का पठार भारत के सबसे सूखे क्षेत्रों में से एक है। अधिकांश महाराष्ट्र, अधिकांश कर्नाटक, तेलंगना और अधिकांश आंध्र प्रदेश इसी पठार पर स्थित है और मई-जून में यहाँ का सूखा विश्व भर में बदनाम है।
इसके लिए सीधे तौर पर पश्चिमी घाट के पहाड़ जिम्मेवार हैं।
तो एक तरफ तो सूखा पड़ता है, लेकिन दूसरी तरफ बारिश भी तो होनी चाहिए। जी हाँ, पश्चिमी घाट में जोरदार बारिश होती है।
कितनी जोरदार???...
अगर इस खबर की मानें तो 2018 में पश्चिमी घाट में स्थित महाबलेश्वर में मेघालय के चेरापूंजी और मासिनराम से भी ज्यादा बारिश हुई। मुझे इस खबर पर कोई ताज्जुब नहीं। हुई होगी चेरापूंजी से भी ज्यादा बारिश। यहाँ की भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है। मुंबई की बारिश किसे याद नहीं? इसी बारिश के कारण कोंकण रेलवे से गुजरने वाली ट्रेनों का टाइम टेबल साल में दो बार बदलता है।
अब बारिश है तो जंगल भी होंगे।
पहाड़ है, जंगल है, समुद्र है... क्या नहीं है यहाँ!!!...

और मालशेज घाट की चढ़ाई शुरू हो गई। अगर आपको बारिश के मौसम में हिमालय-भ्रमण से डर लगता है तो आपको यहाँ आना चाहिए। आपने पश्चिमी घाट की बारिश का आनंद नहीं लिया तो बेकार है...
दूर एक जलप्रपात दिखने लगा - कालू जलप्रपात। जैसा नाम, वैसी ही इसकी प्रसिद्धि। यह बिल्कुल भी प्रसिद्ध नहीं है। लेकिन अगर आपने इसे मानसून में देख लिया तो दूधसागर और जोग को भूल जाओगे। हमें लगा, ऊपर पहुँचकर इसके आसपास जाने का रास्ता मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं था। ऊपर महाराष्ट्र टूरिज्म डेवलपमेंट कारपोरेशन का रेस्ट हाउस है। रेस्ट हाउस से जलप्रपात की दूरी केवल दो किलोमीटर है, लेकिन न तो कोई रास्ता है और न ही इसके बारे में किसी को पता है। सड़क के किनारे ही मेंढ़क जितनी छलांग वाले ‘जलप्रपात’ के पास आमलेट और भुट्टे बेच रहे लोग इसी को मालशेज घाट का महान जलप्रपात बताते रहते हैं और मुंबई के थके हुए लोग वीकएंड में इसे देखकर ही थकान उतारकर चले जाते हैं।
अभी जिस समय मैं ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, उस समय गूगल मैप पर सड़क किनारे स्थित मालशेज घाट ‘वाटरफाल’ (मेंढ़क-कूद जितने ऊँचे) के 626 रिव्यू हैं और 300 मीटर की ऊँचाई से गिरते कालू वाटरफाल के केवल 6 रिव्यू हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि नीरज फेंक रहा है। असल में पानी तो 300 मीटर से भी ज्यादा नीचे गिरता है, लेकिन बैक-टू-बैक तीन-चार जलप्रपातों के रूप में। भुट्टे बेचने वालों को भी इसके बारे में कम ही पता था। अगर कोई झूठमूठ ही बोल देता कि कालू का रास्ता इधर से जाता है तो हम झाड़ियों में ही चल देते। लेकिन एक ने बताया कि पीछे जहाँ घाट की चढ़ाई शुरू होती है, कालू का पैदल रास्ता वहीं से है।
लेकिन जो जलप्रपात हमें कई किलोमीटर पीछे सड़क से ही दिख गया था और पहली ही नजर में हमें उससे प्यार हो गया, उसके बारे में किसी को पता क्यों नहीं है?
क्योंकि वह केवल मानसूनी जलप्रपात है। मानसून में भी यदाकदा ही गिरता होगा। मालशेज घाट के उस तरफ एक बहुत बड़ा बांध है। तो क्या इस जलप्रपात में आने वाला पानी बांध में रुका हुआ है?
जी नहीं। वह बांध पुष्पावती नदी पर बना है, जबकि जलप्रपात कालू नदी पर है। ये दोनों ही नदियाँ लगभग एक ही स्थान से निकलती हैं और विपरीत दिशाओं में बहती हैं। कालू नदी घाट से कूदकर पश्चिम में बहती है और कल्याण के पास उल्हास नदी में मिलकर वसई के पास अरब सागर में मिल जाती है। लेकिन पुष्पावती नदी पूरब दिशा की ओर चलती है और कुकाड़ी में मिलती है, कुकाड़ी दौंड के पास भीमा में मिलती है, भीमा कर्नाटक में रायचूर के पास कृष्णा में मिलती है और कृष्णा विजयवाडा से आगे बंगाल की खाड़ी में जा मिलती है।
कहने का मतलब यह है कि जलप्रपात से ऊपर कालू नदी के हिस्से लगभग दस वर्ग किलोमीटर का एरिया ही आता है। दस वर्ग किलोमीटर कुछ भी नहीं होता। इतने क्षेत्र में इतना पानी नहीं हो सकता कि जलप्रपात बन सके। ऐसा केवल तभी हो सकता है जब कुछ ही देर पहले वहाँ बारिश हुई हो। हो सकता है कि रात यहाँ बारिश हुई हो।
कुल मिलाकर हमें अनजाने में एक ऐसा शानदार जलप्रपात देखने को मिल गया, जो स्थानीयों को भी देखना नसीब नहीं होता।
लेकिन मालशेज घाट क्षेत्र बहुत बड़ा है और हर तरफ खूबसूरती बिखरी पड़ी है। मानसून में जाने लायक जगह है यह।

मालशेज घाट की ओर जाती सड़क और सामने दिखते पश्चिमी घाट के पर्वत...



पश्चिमी घाट एकदम सीधे खड़े हैं...


यहाँ आपको ग्रामीण महाराष्ट्र की झलक देखने को मिलेगी...


मानसून में जाओगे, तो फूलों का राज मिलेगा...




















दूर से दिखता कालू वाटरफाल...

दूर दिखता कालू वाटरफाल...


कालू वाटरफाल...





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4 comments:

  1. अत्यंत मनमोहक , मंत्रमुग्ध कर देने वाला यात्रा वृतांत

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  2. wah ....... aap ke photo mai HARSCHDRAGAD aur NANGHAT yah famous fort bhi dikhye de rahe hai....... mere gav se najdik se gure neerjbhai ..... mil nahi paye isaka malal rahega ..

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  3. नीरज जी पढ़कर आनंद आया।

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