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गोवा में दो दिन - ओल्ड गोवा और कलंगूट, बागा बीच

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24 सितंबर 2018

आज हमारा गोवा में पहला दिन था और हम अपने एक परिचित के यहाँ थे। परिचित वैसे तो मूलरूप से यूपी में मुजफ्फरनगर के रहने वाले हैं, लेकिन कई सालों से गोवा में रहते-रहते अब गोवा निवासी ही हो गए हैं। हम इस यात्रा की कुछ भी तैयारी करके नहीं आए थे, तो उन्होंने हमारा कार्यक्रम इस प्रकार बनाया...
“सबसे पहले ऐसे-ऐसे जाओ, ऐसे-ऐसे जाओ और सबसे पहले पहुँचो बोम जीसस। वह ओल्ड गोवा में है और ओल्ड गोवा का अलग ही चार्म है। फिर उधर से कलंगूट बीच जाओ। गोवा में जो भी कुछ है, सब कलंगूट पर ही है। बार, क्लब, कैसीनो सभी वहीं हैं। फलां कैसीनो बड़ा जोरदार है और पूरे गोवा में तो छोड़िए, पूरी दुनिया में उसकी टक्कर का कैसीनो मिलना मुश्किल है।”

बाहर झाँककर देखा, तो घनी बसी कालोनी में नारियल के ही झुरमुट नजर आए। किसी शहर में कितनी हरियाली हो सकती है, आज हम देख रहे थे।






तो बोम जीसस चर्च की ओर चल दिए। हमारी ईसाई धर्म और चर्च में कोई दिलचस्पी नहीं है, लेकिन यह स्थान एक विश्व विरासत स्थल है, इसलिए प्रत्येक भारतीय को कम से कम एक बार तो जरूर ही जाना चाहिए।
मांडवी नदी के किनारे और करमाली रेलवे स्टेशन के पास का क्षेत्र ओल्ड गोवा कहलाता है। इसे ओल्ड क्यों कहते हैं, यह जानने के लिए सबसे पहले हमें विकीपीडिया देखना पड़ेगा। और विकीपीडिया कहता है कि 15वीं शताब्दी में बीजापुर के सुल्तान ने इस शहर का निर्माण कराया था और बाद में यह पुर्तगालियों की राजधानी भी रहा। फिलहाल के लिए इतना समझ लेना काफी है। बाद में कभी इतिहास में गहरे उतरना होगा, तो और ज्यादा पढ़ेंगे।

















यहाँ से चलकर सीधे पहुँचे समुद्र किनारे - गोवा के सबसे प्रसिद्ध बीच कलंगूट पर। फिर तो अंधेरा होने तक यहीं रहे और पैदल-पैदल बागा बीच तक हो आए। शाम को बीच पर दुकानें सज जाती हैं और खाने-पीने का दौर चलता है। सामने सूर्यास्त हो रहा होता है और हम रंग-बिरंगी छतरी के नीचे आराम कुर्सी पर बैठकर कोल्ड-ड्रिंक के साथ चिली पोटैटो खाते रहते हैं। उधर बगल वाले दो दुकानदारों में बड़ा भयानक झगड़ा हो गया। एक की कुर्सी दूसरे की ‘टैरीटरी’ में कैसे आ गई - इस बात को जानने के लिए नारियल फोड़ने वाली तलवारें चल गईं। इस झगड़े की वजह से जब आसपास की दुकानों पर भी यात्री आने बंद हो गए, तो आखिर में उन दुकानदारों ने एक रस्सा डालकर सीमा-रेखा बनाई गई और मामले का सुलटारा हुआ।

गोवा में सस्ता भोजन ढूँढ़ने वालों के लिए बेस्ट विकल्प - वडापाव

कलंगूट बीच...


गोवा की पहचान का एक मिनिएचर...

कमाल है जी... आदमी हवा में उड़ रहा है... तो चलो, हम बीच पर टहल आते हैं...






बागा बीच पर शाम होते ही दुकानें सजने लगीं...


चिली पोटैटो लो और सूर्यास्त का इंतजार करो...


उधर दो ग्रुपों में झगड़ा हो गया, तो रस्सी डालकर सीमा बनाई गई...

















गोवा और कर्नाटक में काजू बहुत होते हैं...


क ख ग घ लिख रही है... हिंदी या कोंकणी?... 


...

लेकिन एक बात सोचने की है। गोवा पर पुर्तगाल का शासन था, यानी शेष भारत की तरह यहाँ अंग्रेज नहीं थे। 1947 में भारत से अंग्रेज तो चले गए, लेकिन गोवा से पुर्तगाली नहीं गए। उस समय दोनों अलग-अलग देश थे। हालाँकि दोनों देशों को मीटरगेज की एक रेलवे लाइन जोड़ती थी। वास्को-दा-गामा से मडगाँव होते हुए वर्तमान कर्नाटक के लोंडा स्टेशन तक। वर्तमान कर्नाटक के यानी भारत के कैसल रॉक स्टेशन पर इमीग्रेशन चेकिंग होती थी। एक देश से दूसरे देश में जाने की जो प्रक्रिया होती है, वह हुआ करती थी। 
तो 1947 में जब भारत आजाद हो गया, तो गोवा पुर्तगाल का ही हिस्सा बना रहा। फिर भारत सरकार ने पुर्तगाल के सामने गोवा की आजादी की बात उठाई, जिसे पुर्तगाल ने नकार दिया। गोवा के साथ-साथ दमन, दीव और दादरा नगर हवेली भी भारत के भाग नहीं थे। तो आखिरकार दिसंबर 1961 में भारत ने गोवा समेत सभी पुर्तगाली बस्तियों में सेना भेजी और इसे पुर्तगाली शासन से मुक्ति दिलाई। एक राष्ट्रवादी नागरिक होने के नाते मैं भारत के इस कदम से सहमत हूँ। हालाँकि उस समय यूरोप, अमरीका आदि ने भारत के इस कदम की आलोचना की थी क्योंकि सबके अपने-अपने हित थे और भारत नया ही संप्रभु राष्ट्र बना था। और इस बात से पुर्तगाल तो इतना आहत हुआ कि उसने 20-25 साल तक भारत को एक आजाद देश ही नहीं माना।

लेकिन यहाँ मैं एक बात सोचता हूँ। गोवा एक अलग देश बनने की कगार पर था। वह आसानी से अलग देश बन भी सकता था। क्योंकि पिछले कई सौ वर्षों से वह ब्रिटिश भारत में था ही नहीं। जिस तरह ब्रिटिश भारत में अंग्रेजी संस्कृति और भाषा लागू हो चुकी थी, उसी तरह गोवा में भी पुर्तगाली संस्कृति और भाषा हावी हो चुकी थी। या यूँ कहें कि गोवा पुर्तगाल का ही था, तो ज्यादा सही होगा। वह एक नया देश बन सकता था। लेकिन जो भी हुआ, अच्छा ही हुआ। आज गोवा भारत का अभिन्न भाग है और हम वीजा-पासपोर्ट की चिंता किए बगैर आराम से यहाँ घूम रहे थे।

और हाँ, कल गोवा के बारे में पढ़ते-पढ़ते पता चला कि ‘सात हिंदुस्तानी’ फिल्म गोवा की आजादी पर ही आधारित है। 1969 में बनी सवा दो घंटे की इस फिल्म को देखने लगा, तो दूधसागर जलप्रपात के दृश्य देखकर आनंद आ गया। उम्मीद थी कि दूधसागर के सामने से गुजरती मीटरगेज की ट्रेन दिखेगी, लेकिन ट्रेन नहीं दिखी। और आपको यह तो पता ही है कि यह फिल्म अभिताभ बच्चन की पहली फिल्म थी।

तो हम ओल्ड गोवा में बेसीलिका ऑफ बोम जीसस चर्च देखने गए। यह स्थान एक विश्व विरासत स्थल है। इसके अंदर संत फ्रांसिस जेवियर का ताबूत है। ये एक यूरोपीयन संत थे - शायद पुर्तगाली ही थे और इन्होंने भारत से चीन तक ईसाई धर्म को फैलाने में बहुत ज्यादा काम किया था। और गोवा के लोग सीधे-सादे थे कि उन्होंने संत जेवियर को स्वीकार किया और उनके धर्म को भी स्वीकार किया, अन्यथा लोग तो सेंटिनल द्वीप पर भी ईसाई धर्म का प्रचार करने जाते हैं।

...

“अबे, तुम बड़ी जल्दी आ गए। कैसीनो में क्यों नहीं गए?” हमारे परिचित ने पूछा।
“हमारी दिलचस्पी नहीं है इन सब मामलों में।”
“अरे, तो गोवा आए ही क्यों हो? कैसीनो रात में ही परवान चढ़ते हैं। तुम जाते तो पता चलता कि दुनिया कहाँ पहुँच गई। कल जरूर जाना। और जाते समय फलां क्रूज की बुकिंग भी करते जाना। बहुत लंबी लाइन लगती है उस क्रूज में। क्या शानदार क्रूज है... दुनिया में ऐसे सिर्फ दो ही क्रूज हैं... एक फलां देश में है और दूसरा यहाँ गोवा में है।”

“गुड नाइट।”






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Comments

  1. शानदार विवरण, शानदार तस्वीरें।

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  2. सुन्दर और मन भावन
    सादर

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  3. बहुत सुन्दर ! चर्च के फ़ोटोज़ शानदार हैं लेकिन सूर्यास्त के चित्र तो लाजवाब हैं. अगले भाग का इंतज़ार रहेगा.

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