Monday, December 3, 2018

चलो कोंकण: दिल्ली से इंदौर

11 सितंबर 2018
पता नहीं क्यों मुझे लगने लगा कि मोटरसाइकिल में कोई खराबी है। कभी हैंडल को देखता; कभी लाइट को देखता; कभी क्लच चेक करता; कभी ब्रेक चेक करता; तो कभी पहियों में हवा चेक करता; लेकिन कोई खराबी नहीं मिली। असल में कल-परसों जब इसकी सर्विस करा रहा था, तो मैकेनिक ने बताया था कि इसके इंजन में फलाँ खराबी है और उसे ठीक करने के दस हजार रुपये लगेंगे।
“और अगर ठीक न कराएँ, तो क्या समस्या होगी?”
“यह मोबिल ऑयल पीती रहेगी और आपको इस पर लगातार ध्यान देते रहना होगा।”
उसने कहा तो ठीक ही था। यह मोबिल ऑयल पीती तो है। हालाँकि एक लीटर मोबिल ऑयल 1200 किलोमीटर से ज्यादा चल जाता है। और अगर यह न पीती, तब भी इतनी दूरी के बाद मोबिल ऑयल बदलना तो पड़ता ही है। इसलिए हम चिंतित नहीं थे।

लेकिन आज ऐसा लग रहा था, जैसे यह कुछ असामान्य है। सत्तर की स्पीड तक पहुँचते-पहुँचते इंजन से कुछ घरघराहट जैसी आवाज भी आ रही थी। वैसे तो यह आवाज पहले भी आती थी, लेकिन आज ज्यादा लग रही थी। वाइब्रेशन भी ज्यादा लग रहे थे। इस बारे में दीप्ति से पूछा तो उसने कहा - “यह तुम्हारे मन का वहम है। बाइक में उतने ही वाइब्रेशन हैं, जितने पहले होते थे।”
लेकिन वहम यहीं खत्म नहीं हुआ।
नीमराना के पास डैशबोर्ड से धुआँ-सा उठता दिखाई पड़ा। इससे पहले कि ‘आग’ लगती, बाइक रोक ली। दिमाग में चल रहा था कि इसकी टंकी पर रखा मैग्‍नेटिक टैंक बैक सबसे पहले उतारूँगा और फिर पीछे बंधा मुख्य सामान।

“क्या हुआ?” दीप्ति ने पूछा।
“यहाँ से धुआँ-सा उठ रहा है और तार जलने की स्मैल भी आ रही है।”
“ओहो, मोटरसाइकिल में कोई समस्या नहीं है। उधर देखो, वहाँ वे लोग तार जला रहे हैं।”

थोड़ी दूर एक ट्रक गैराज था और कुछ जल भी रहा था। तार भी होंगे और तेल भी।
“अब तुम पीछे बैठो, मोटरसाइकिल मैं चलाऊँगी।”
और दीप्ति ने कोटपूतली कब पार करा दिए, पता ही नहीं चला।

जयपुर में विधान के यहाँ रात रुकना था। हालाँकि कई अन्य मित्र भी अपने यहाँ आने को कह रहे थे, लेकिन हमें विधान से मिले कई साल हो गए थे। इन कई सालों में एक बार उसका हाथ भी टूटा और एक लड़का भी हुआ। हमने एक-दूसरे का हालचाल भी पूछना बंद कर दिया था। और उसने अब फेसबुक चलाना बंद कर दिया है। कल उसकी घरवाली को फेसबुक पर ढूँढ़कर हालचाल पूछा और विधान का नंबर लेकर अपने आने की खबर दी।

12 सितंबर 2018
अगर आप गूगल मैप पर जयपुर और इंदौर के बीच का रास्ता देखेंगे, तो यह कोटा होते हुए जाने का सुझाव देगा। यह दूरी 570 किलोमीटर है और इसमें कोटा से उज्जैन यानी 250 किलोमीटर टू-लेन है, बाकी फोर-लेन।
इसी तरह अगर आप जयपुर से चित्तौड़गढ़, जावरा होते हुए इंदौर जाते हैं, तो यह दूरी 630 किलोमीटर है और इसमें जावरा से उज्जैन यानी 100 किलोमीटर टू-लेन है, बाकी फोर-लेन है।
और अगर जयपुर से रतलाम होते हुए इंदौर जाया जाए, तो यह दूरी 650 किलोमीटर है, लेकिन यह पूरा रास्ता फोर-लेन है।
हमने तीसरा विकल्प चुनने का निर्णय लिया। अगर आप नियमित मोटरसाइकिल यात्राएँ करते हैं, तो एक दिन में मैदानों में फोर-लेन सड़क पर 650 किलोमीटर चलना बहुत मुश्किल नहीं है। सुबह जयपुर से निकलकर रात तक आसानी से इंदौर पहुँच जाएँगे। हालाँकि अगर हम कोटा के रास्ते जाते, तो हमें 80 किलोमीटर कम चलना पड़ता; लेकिन हमने फोर-लेन वाला रास्ता चुना।
जब आप लंबी दूरी तक मोटरसाइकिल चलाते हैं या कार चलाते हैं, तो शारीरिक रूप से बिल्कुल भी नहीं थकते, लेकिन शाम होते-होते मानसिक रूप से बहुत थक जाते हैं। क्योंकि आपका मस्तिष्क लंबे समय तक लगातार कार्य करता रहता है। इसलिए अगर कुछ कार्य कम कर दिए जाएँ, तो इस थकान को भी कम किया जा सकता है। मेरे अनुभव में सबसे ज्यादा दिमागी कार्य ओवरटेक करते समय होता है। खाली सड़क पर 100 की स्पीड से चलने के मुकाबले भीड़-भरी सड़क पर 40 की स्पीड से चलने में ज्यादा कार्य करना होता है, इसलिए ज्यादा थकान भी होती है।
टू-लेन छोड़कर फोर-लेन पर 80 किलोमीटर ज्यादा चलने का यही कारण था।

सुबह सात बजे जयपुर से तो चल दिए, लेकिन हमें जयपुर में ही बारह बजे गए। कल ही तय हो गया था कि हम सुबह सात बजे रजत और आनंद से मिलते हुए चलेंगे। इसी मुलाकात में उवैस अहमद भी शामिल होने वाले थे, लेकिन साढ़े सात बजे तक भी किसी का फोन नहीं आया। किसी ने भी नहीं पूछा कि तय समय से आधा घंटा ऊपर हो गया, अभी तक क्यों नहीं आया। हम इनके ऑफिस पहुँचे तो ताला लगा था। आनंद को फोन किया, वह अभी-अभी सोकर उठा था। रजत अभी तक सोकर भी नहीं उठा था और उवैस दस मिनट पहले ही ऑफिस बंद देखकर वापस चला गया था।
नतीजा यह हुआ कि आधे घंटे बाद हमारे सामने तमाम तरह के समोसे और मिठाइयाँ रखी थीं। बातों का सिलसिला चलता रहा और दस बज गए। आनंद और रजत ने कानपुर आई.आई.टी. से पता नहीं कौन-सी डिग्री लेने के बाद नौकरी नहीं की और जयपुर में टूर ऑपरेटर का काम शुरू कर दिया। इसे ज्यादा दिन नहीं हुए, तीन-चार साल पहले की ही बात है। जल्दी ही काम इतना बढ़ गया कि आज आनंद पूरे सिक्किम को संभाल रहा है और रजत राजस्थान को। इनके पास चार साल से बंद पड़ी अपनी वेबसाइट को अपडेट करने का भी समय नहीं है। काफी बड़ा ऑफिस है और बहुत सारे लैपटॉप रखे हैं। कई लड़के नौ से पाँच की ड्यूटी करते हैं। ये लोग फेसबुक पर भी ज्यादा एक्टिव नहीं हैं। पता नहीं कस्टमर कहाँ से आते हैं इनके पास!

तो दस बजे के बाद यहाँ से निकले। निकलते ही स्पीडोमीटर बंद हो गया। मुझे लंबी बाइक यात्राओं में एकदम परफेक्ट बाइक चाहिए। किस समय कहाँ पहुँचना है, कितना लेट हैं, कितना जल्दी हैं, सब स्पीडोमीटर से ही पता चलता है। इसे ठीक करवाना बहुत जरूरी था।
ठीक करवाने में बज गए बारह। और अभी भी हम जयपुर में ही थे। रात तक इंदौर पहुँचना था।

लंबी बाइक यात्राओं का पहला उसूल... अच्छा हाँ, उसूल तो बहुत सारे हैं, लेकिन सब के सब ‘पहले उसूल’ में ही आते हैं। जब भी हमें उसूल याद आते जाएँगे, हम हमेशा पहला उसूल कहकर ही उसे खास तवज्जो देंगे। दूसरा उसूल हमारी डिक्शनरी में नहीं है।
तो लंबी बाइक यात्राओं का पहला उसूल है - पेट नहीं भरना चाहिए। हर थोड़ी-थोड़ी देर में हल्का-फुल्का खाते रहो। ज्यादा खा लेने से नींद आती है। और यह भी सच है कि कम खाने से भी नींद आती है।

किशनगढ़ तक छह-लेन है, फिर फोर-लेन। किशनगढ़ से चित्तौड़गढ़ तक इसे भी छह-लेन करने का काम चल रहा है, इसलिए कुछ डायवर्जन भी हैं। फिर भी अच्छी रफ्तार मिली और हम सूर्यास्त के समय चित्तौड़गढ़ बाईपास पर रेलवे पुल पर खड़े थे। नीचे उदयपुर जाने वाली रेलवे लाइन थी और उसी दिशा में सूर्य भी डूबता जा रहा था। हमें हमेशा ही सूर्यास्त अच्छा लगता है। अगर सुबह जल्दी उठने का झंझट न होता, तो सूर्योदय भी अच्छा लगता।
यहाँ रेलवे लाइन इलेक्ट्रिफाइड थी और कैटनरी पर बैठा सफेद उल्लू हमें बहुत देर तक ‘परफेक्ट’ फोटो लेने को उकसाता रहा। दीप्ति ने बहुत कोशिश की, मैंने भी बहुत कोशिश की, लेकिन उल्लू के फोटो उल्लू जैसे ही आए। सबकुछ ब्लर। इसका क्या इलाज हो सकता है? निश्चित ही और अच्छा कैमरा होना चाहिए था। और अच्छा मतलब?
मतलब डी.एस.एल.आर.।
हुँह... एक उल्लू की वजह से हम डी.एस.एल.आर. लेंगे? उधर तोते बैठे हैं। उन पर ट्राइ मारते हैं।
चलो, अच्छे फोटो आए हैं। हरे पत्तों और हरी बैकग्राउंड होने के बावजूद भी पता चल रहा है कि ये तोते हैं।

यहाँ रेलवे पुल से सामने एक पहाड़ी दिख रही थी और पहाड़ी पर कुछ बना भी था।
“उधर देख, तुझे एक चीज दिखाता हूँ।” मैंने दीप्ति से उस पहाड़ी की ओर इशारा करके कहा।
“क्या है वह?”
“चित्तौड़ का किला।”
उन्नीसवीं शताब्दी के आखिर में जब यह रेलवे लाइन बनाई जा रही होगी, तब तो यह ‘मेवाड़’ देश ही था। इस किले ने और भी बहुत कुछ देखने के साथ-साथ इस रेल लाइन को भी बनते देखा है। चित्तौड़ से उदयपुर की रेल लाइन।

रामदेवरा मेले का असर यहाँ तक था। रामदेवरा पश्चिमी राजस्थान में जैसलमेर के पास है, लेकिन इसकी मान्यता पूरे राजस्थान समेत हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र तक है। भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। शायद मेला समाप्त हो गया था, इसीलिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु रामदेवरा से लौट रहे थे - मोटरसाइकिलों पर, ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर, कारों में, बसों में। किसी भी मोटरसाइकिल पर तीन से कम श्रद्धालु नहीं थे। कइयों पर तो छोटे-बड़े मिलाकर सात-सात जने तक बैठे थे। इन पर मोटरसाइकिल चलाने का कोई नियम लागू नहीं था। राजस्थान पुलिस वाले खुद रामदेवजी के भक्त होंगे, इसलिए इन लोगों के साथ कोई टोकाटाकी नहीं, कोई चालान नहीं।
हाँ, अगर हम बिना हेलमेट होते, तो अब तक चालीस बार चालान कट चुका होता।

सात बजे जब चित्तौड़ पार करके आराम करने और कुछ खाने रुके तो सूरज ढल चुका था और जब पुनः चले तो आठ बज चुके थे। इंदौर अभी भी 350 किलोमीटर दूर था और हमारे सामने थी चार-लेन की सड़क व पूरी रात। इतनी दूरी को तय करने में आठ घंटे लगते हैं, यानी सुबह के चार-पाँच बजे हम इंदौर पहुँचेंगे। वैसे तो हम रात में नहीं चलना चाहते थे, लेकिन चित्तौड़, नीमच या मंदसौर में रुकना भी नहीं चाहते थे। चार-लेन की डिवाइडर वाली सड़क पर मुझे मोटरसाइकिल चलाने में कोई परेशानी नहीं होती, इसलिए निर्णय लिया कि हम चलेंगे। यहीं एक ढाबे पर आधे घंटे की नींद भी ले ली, जो मुझे पूरी रात जगाए रखेगी।
रामदेवरा के श्रद्धालुओं का रेला अभी भी जारी था और लग रहा था कि ये पूरी रात मिलते रहेंगे। इन श्रद्धालुओं में महिलाएँ और बच्चे भी बड़ी संख्या में थे। अब हम भी इस रेले का हिस्सा थे और नीमच, मंदसौर के इस बदनाम इलाके में निर्भय होकर पूरी रात चल सकते थे।

फोर-लेन पर रात में चलना भी एक अलग ही अनुभूति है। लोकल ट्रैफिक बिल्कुल नहीं होता और सड़क पर ट्रकों का राज रहता है। आपको यह जानकर शायद आश्चर्य होगा कि भारत में ट्रकवाले सबसे अच्छे ड्राइवर होते हैं। रात में ये लोग अमूमन होरन नहीं बजाते, बल्कि हैडलाइट से काम चलाते हैं। इसलिए एक अलग ही शांति का माहौल रहता है। मुझे और दीप्ति को ऐसा माहौल बड़ा पसंद है।

रात दस बजे दस मिनट के लिए मल्हारगढ़ रुके। शहर लगभग सो चुका था, लेकिन कुछ दुकानें खुली थीं और कुछ बंद हो रही थीं। रामदेवरा के यात्री सबसे सस्ते दिखने वाले ढाबों पर भोजन कर रहे थे और लग रहा था कि ये ढाबे इन्हीं यात्रियों के कारण इतनी रात तक खुले हैं। वैसे ट्रकवाले भी सस्ते दिखने वाले ढाबों पर ही ज्यादा रुकते हैं और ये ढाबे अमूमन पूरी रात खुले ही रहते हैं।

मल्हारगढ़ से जावरा 80 किलोमीटर है और बीच में मंदसौर है। मंदसौर मध्य प्रदेश का एक गुमनाम जिला है और इसका संबंध रावण-काल से लगाया जाता है। कहते हैं मंदोदरी यहीं की रहने वाली थीं। मंदोदरी से मंदसौर नाम पड़ा। जो भी हो, जोधपुर के पास मंडौर भी मंदोदरी से जुड़ा हुआ है और कहीं न कहीं मेरठ भी। लेकिन हम मंदसौर बाइपास से निकल गए और शहर को कहीं दूर अपने बाएँ छोड़ते हुए आगे चलते गए।

जावरा से एक रास्ता उज्जैन होते हुए इंदौर जाता है। लेकिन इसमें उज्जैन तक 100 किलोमीटर बिना डिवाइडर वाला टू-लेन है। रात के समय इतनी दूर तक हम टू-लेन पर नहीं चलने वाले थे। सामने से आने वाली गाड़ियों की हैडलाइट बहुत मुश्किल पैदा करती है। तो सीधे रतलाम की ओर बढ़ते रहे। यहाँ जावरा में अच्छी चहल-पहल थी, कई चमचमा रहे होटल भी थे, जिनमें रामदेवरा से आने वाले मध्यमवर्गीय श्रद्धालुओं की भीड़ थी। दीप्ति को नींद आने लगी थी और उसे आधे घंटे सो लेना बहुत जरूरी था। इन होटलों में बिछी खाटों पर सोना बहुत मुश्किल था - भीड़ और शोर-शराबे के कारण।
जावरा के बाद हम एक ऐसे ढाबे को ढूँढ़ने लगे, जहाँ कोई ट्रक न खड़ा हो और होटल मालिक ऊँघ रहा हो। कई किलोमीटर चलने के बाद और कई ढाबों को रिजेक्ट करने के बाद एक अत्यधिक गरीब-सा ढाबा मिला। रात के बारह बजे थे और यहाँ एक बल्ब टिमटिमा रहा था। होटल मालिक खाट पर लेटा हुआ मोबाइल चला रहा था और एक आदमी रसोई में खड़ा था, जो हमें देखते ही बाहर तक आ गया।
“हाँ जी, क्या लोगे?”
“अभी कुछ नहीं। नींद आ रही है। आधा घंटा सोना है।”
“ठीक है, सो जाइए, कोई दिक्कत नहीं।”
दीप्ति को तुरंत नींद आ गई। आधे घंटे की यह जोरदार नींद उसे बाकी पूरी रात जगाए रखेगी। मुझे नींद नहीं आ रही थी।

होटल मालिक पड़े-पड़े ही लगातार किसी से बातें किए जा रहा था। कभी उसे कोई निर्देश देता, कभी उसे डाँटता, कभी उसकी सुनता, कभी उसका कहा मानता। साथ ही मोबाइल भी चलाता रहा। मुझे उत्सुकता हुई। मैं उसके पास जा पहुँचा।
‘पबजी’ खेल रहा था।

“तो सर, आप कहाँ जा रहे हैं?” रसोइए ने पूछा।
“इंदौर।”
“रामदेवरा से आ रहे हैं क्या?”
“हाँ, रामदेवरा ही समझ लो।”
तभी दूर पड़े होटल मालिक ने जोर से कहा - “अबे, चाय बना ले।”
“सर, आप चाय पिएँगे क्या? रसोइए ने मुझसे पूछा।
“आधे घंटे बाद पिएँगे।”
“आधे घंटे बाद बनाऊँगा।” रसोइए ने मालिक को उतनी ही जोर से उत्तर दिया।

इंदौर से सुमित का फोन आ गया - “कहाँ पहुँचे?”
“ओये, तू जगा हुआ है अभी तक?”
“मैं तुम्हारे आने के बाद ही सोऊँगा। ये बताओ, कहाँ पहुँचे?”
“जावरा।”
“कोई नी... आराम से आओ।”
“तू सो जा। हम इंदौर पहुँचकर फोन करेंगे।”
“नहीं, मोबाइल चला रहा हूँ। तुम्हारे आने पर ही सोऊँगा।”
“तुझे भी पबजी की लत लग गई क्या?”

कुछ देर बाद चाय बन गई। दीप्ति को जगाया। वह जगी तो बमुश्किल ही, लेकिन चाय पीते-पीते जो नींद गायब हुई, वह इंदौर तक गायब ही रही। फिर तो वह लेबड़ तक गाने ही गुनगुनाते रही, जब तक कि मैंने एक गेट के सामने बाइक न रोक दी।
“याद आया कुछ?”
“नहीं।”
“इधर-उधर देख, शायद कुछ याद आ जाए।”
चारों ओर देखकर - “नहीं, कुछ याद नहीं आ रहा। क्या हम यहाँ पहले कभी आए हैं?”
“वो नेशनल स्टील का गेट है और उसके अंदर वो पहला ही क्‍वार्टर मुकेश भालसे जी का है।”
हम दो साल पहले यहाँ आ चुके थे और भालसे जी के यहाँ एक दिन रुके भी थे। अभी रात के तीन बजे थे, इसलिए चुपचाप बाइक स्टार्ट की और आगे बढ़ चले। साथ ही अपनी लाइव लोकेशन व्हाट्सएप पर सुमित को शेयर कर दी।

साढ़े चार बजे इंदौर पहुँचे। इतनी सुबह-सुबह भी बड़ी चहल-पहल थी। गणेश चतुर्थी नजदीक थी और जगह-जगह गणेश जी की स्थापना हो रही थी। उधर सुमित हमारी लाइव लोकेशन देखकर अपने घर से चल दिया था और एक चौराहे पर हम मिल भी गए।
“भाई, हम घर पर पहुँच जाते। तू बेवजह ही रात-भर जगा रहा।”
असल में सुमित के यहाँ भी गणपति की स्थापना हुई थी और आज रात्रि जागरण था। वह सो नहीं सकता था और मुझे अपराधबोध होता रहा कि वह हमारी वजह से जगा हुआ है।

13 सितंबर 2018
आज की कहानी ये है कि हम पूरे दिन इंदौर में रहेंगे। रात को सर्राफा जाएँगे और इसीलिए मैंने घोषणा कर दी कि आज पूरे दिन कुछ भी नहीं खाना।
“ऐसे कैसे नहीं खाएगा? हमारे यहाँ आकर कुछ भी नहीं खाएगा?”
“नहीं, कुछ भी नहीं। रात को सर्राफा में ही व्रत का उद्यापन करूँगा।”
मासूम शक्ल बनाकर - “चल, ठीक है। जैसी तेरी मर्जी। लेकिन हमने आलू के पराँठे बनाए हैं... खीर भी हैं... तू मत खा... हम खा लेंगे।”
“अरे अभी तो दो घंटे बाकी हैं रात होने में। लाओ, ले आओ।”
तो इस तरह हमारा पेट सर्राफा जाने से पहले ही इतना भर गया कि वहाँ हम एकाध गोलगप्पे के अलावा कुछ नहीं खा सके। लेकिन यह गलती आप मत करना। इंदौर का सर्राफा बाजार और उससे लगता एक और बाजार आधी रात को परवान चढ़ते हैं और ये खाने-पीने के शौकीनों के स्वर्ग हैं। जिस तरह दिल्ली लालकिले के बिना, कश्मीर डलझील के बिना, अमृतसर स्वर्ण मंदिर के बिना अधूरे हैं; उसी तरह इंदौर आधी रात को लगने वाले इन बाजारों के बिना अधूरा है। आप केवल खाने के लिए भी इंदौर आ सकते हैं।

धरा पांडेय जी से मुलाकात हुई; चंद्रशेखर चौरसिया जी से मुलाकात हुई व एक-दो और मित्रों से मुलाकात हुई। धरा जी मीडिया से जुड़ी हुई हैं। मुझसे भी नियमित कुछ लेख भेजने का आग्रह किया। सोच लिया कि इस यात्रा से लौटकर भेजा करूँगा। लेकिन एक ही लेख भेज पाया और फिर भूल गया।
चौरसिया जी शाजापुर से आए थे, अपने साले के साथ।
आज की कहानी बस इतनी ही है। हमारे साथ हमेशा ही समय की कमी रहती है, लेकिन आज सभी के साथ गप्पें लड़ाते-लड़ाते महसूस हुआ कि गप्पें लड़ाना भी जरूरी होता है। जो मित्र अपना काम-धंधा छोड़कर आपसे मिलने आते हैं, सौ-सौ किलोमीटर दूर से सिर्फ आपके लिए आते हैं; उनके साथ तो ‘अनलिमिटिड वैलिडिटी’ वाला पैक जरूरी होता है। बातों के साथ-साथ चाय का दौर चलता रहे, नमकीन का दौर चलता रहे, समोसों का दौर चलता रहे... तो सेहत भी अच्छी होती है।


दिल्ली से चलने के बाद रास्ते में कहीं भोजन...

और यह रहा हमारा दोस्त विधान...

जयपुर


किशनगढ़ के आसपास हल्का-फुल्का कुछ...




लटूर जी तलवार वाले...

चित्तौड़ से उदयपुर जाने वाली रेलवे लाइन...



चित्तौड़गढ़ में डिनर

इंदौर में चौरसिया जी के साथ...


इंदौर में बहुत सारे मित्रों से मिलना हुआ... इनमें से केवल सुमित को पहचान पा रहा हूँ... शायद मैं भी खड़ा हूँ...

सारे भारत का जायका एक तरफ और इंदौर का जायका एक तरफ...

छोटा सुमित...




8 comments:

  1. Good. We are going to GOA with you. Hurrey.

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  2. अपराध बोध तो मुझे हो रहा था...
    तीज के जागरण के कारण तुम्हारे सोने की व्यवस्था ठीक से कर नही पाया...
    खैर...

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  3. सभी फोटोज मे छोटे सुमित का पोज बहुत ही सुंदर हैं।

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  4. अति सुंदर लेख शब्दो को पढ़ते हुए मानो खुद ही मैं भी आपके साथ यात्रा कर रहा हूँ।। कभी हमसे भी मिलिए गुरुजी।।

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  5. किसी भी मोटरसाइकिल पर तीन से कम श्रद्धालु नहीं थे। ये वाक्य पढ़कर तो मजे आ गयी :D

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