Friday, January 11, 2019

महाबलेश्वर यात्रा

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

20 सितंबर 2018
मुंबई-गोवा राजमार्ग पर स्थित पोलादपुर से महाबलेश्वर का रास्ता अलग होता है। पोलादपुर में लंच करके और होटलवाले को हिदायत देकर हम आगे बढ़ चले। असल में उसने कोल्डड्रिंक पर 5 रुपये अतिरिक्त लिए थे और प्रिंटेड बिल में उसे दिखाया भी था।
“अबे, फँस जाओगे किसी दिन। 30 रुपये एम.आर.पी. की कोल्डड्रिंक को तुम लोग 35 की बेच रहे हो और 35 रुपये का ही प्रिंटेड बिल भी दे रहे हो!”
“नहीं, इसमें हमारा कोई रोल नहीं है। यह तो सब कम्प्यूटराइज्ड है। कम्प्यूटर से जो निकलता है, वही हम चार्ज करते हैं।”
“मालिक हो ना तुम यहाँ के?”
“हाँ जी।”
“फिर भी ऐसी बात करते हो? कम्प्यूटर अपने-आप कुछ नहीं निकालता। इसमें पहले सारा डाटा डालना पड़ता है। तुमने कोल्डड्रिंक के 35 रुपये डाल रखे हैं, जबकि एम.आर.पी. 30 है। फँस जाओगे। लाखों रुपये जुर्माना लग जाएगा।”
अब उसने हमसे 5 रुपये कम लिए और अपने सिस्टम को ठीक करने का वादा भी किया।

पोलादपुर से महाबलेश्वर की सड़क बहुत खूबसूरत है। घुमावदार सड़क और लगातार चढ़ाई। महाबलेश्वर घाट के ऊपर स्थित है और समुद्र तल से लगभग 1400 मीटर ऊपर है।
रास्ते में प्रतापगढ़ किले का बोर्ड लगा दिखा, तो उधर भी मुड़ गए। लेकिन वहाँ भयंकर धुंध थी और न किला अच्छी तरह देख पाए और न ही वहाँ से दिखने वाले नजारे। लौटने लगे तो बारिश होने लगी। साथ ही रात भी। यह बारिश बहुत देर तक नहीं रहेगी, लेकिन अगर आज बहुत देर तक हो ही गई, तो...? इसलिए अंधेरे में यहाँ ठहरकर इसके बंद होने की प्रतीक्षा करना ठीक नहीं। मोबाइल, कैमरे और पैसे वाटरप्रूफ पैकिंग में रखकर खुद रेनकोट पहनकर बारिश में ही चल दिए।


आपको भारत में बारिश का असली आनंद लेना है, तो दो ही स्थान हैं - पूर्वोत्तर और पश्चिमी घाट। आप मानसून में इन स्थानों पर जाकर भी बारिश में भीगे नहीं, तो कुछ नहीं किया। आपके कपड़े तर नहीं हुए, तो कुछ नहीं हुआ। मोटी-मोटी बूँदों के बीच बिना छाते के चहलकदमी नहीं की, तो आपकी यात्रा अधूरी है।
महाबलेश्वर ऐसा ही एक स्थान है।

शायद किसी ने हमें आवाज लगाई, शायद किसी ने रुकने को कहा हो। महाबलेश्वर में प्रवेश करने से पहले एक तिराहे पर कुछ लोग बैठे थे। शायद पर्ची काटने वाले हों, जो महाबलेश्वर आने वाले प्रत्येक वाहन की पर्ची काटते हों। लेकिन हम नहीं रुके। थोड़ी देर बाद एक आदमी मोटरसाइकिल पर आया - “कमरा चाहिए?”
“हाँ, लेकिन सस्ता।”
“मिल जाएगा। 500 में मिल जाएगा।”
और हम उसके पीछे लग लिए। बाद में पता चला कि तिराहे पर आवाज इसी ने लगाई थी।
बाजार में 500 रुपये में एक बेहतरीन कमरा मिल गया, जिसमें गीजर भी था और टी.वी. भी। इससे पहले हमें लग रहा था कि 1000 से ऊपर का ही कमरा मिलेगा इतनी प्रसिद्ध जगह पर। मेरे मन में महाबलेश्वर की छवि उत्तर भारत के शिमला और मसूरी जैसी ही बनी हुई थी। एक हिल स्टेशन, कुछ व्यू पॉइंट, टैक्सीवालों और गाइड लोगों का जमावड़ा, भीड़-भाड़... लेकिन यह ऐसा नहीं है। कम से कम हमारी यात्रा के दौरान तो ऐसा नहीं था। हम अक्सर ऐसी जगहों पर कभी दोबारा नहीं जाते, लेकिन महाबलेश्वर ने हमसे दोबारा आने का वादा ले ही लिया।

कमरे में एयरटेल का नेट नहीं चल रहा था, लेकिन बाहर चल रहा था। डिनर करके एक घंटे तक फुटपाथ पर बैठा और हमारी कल की योजना बन गई। कल घूमने वाले सभी स्थानों को गूगल मैप में सेव कर लिया और इसी नक्शे को देखकर फाइनल हुआ कि सबसे पहले ‘ऑर्थर सीट’ चलेंगे।

21 सितंबर 2018
सीधे पहुँचे ऑर्थर सीट और यहाँ भीड़ देखकर हैरान रह गए। जितने इंसान, उतने बंदर। जहाँ बंदर होते हैं, वहाँ कैमरा छिनने का हमेशा डर रहता है। लेकिन व्यू पॉइंट पर पहुँचते ही सारी निराशा समाप्त हो गई। यह स्थान एक ‘रिज’ है। पश्चिम में यहीं से सावित्री नदी का उद्‍गम होता है और पूर्व की ओर यहीं से कृष्णा नदी भी निकलती है। सुना होगा ना आपने कृष्णा नदी का नाम? दक्षिण भारत की एक मुख्य नदी है, जो विजयवाड़ा से आगे समुद्र में मिलती है। बहुत बड़ा डेल्टा भी बनाती है।
हमारे सामने दो नदियों का उद्‍गम है। हो सकता है कि जंगल में कोई छोटा-मोटा मंदिर भी बना हुआ हो, लेकिन यहाँ से घोर जंगल के अलावा कुछ भी नहीं दिख रहा था। सावित्री नदी अरब सागर में मिलती है और अरब सागर यहाँ से सीधे 60 किलोमीटर ही दूर है, इसलिए अरब सागर से चलती नम हवाएँ इन पहाड़ों से टकराकर बादलों का निर्माण कर रही थीं। उधर कृष्णा घाटी में शुष्क हवाओं का राज था। और हमारे सामने ‘रिज’ पर दोनों हवाओं का टकराव देखते ही बनता था। पूरी सावित्री घाटी बादलों से भरी थी जबकि कृष्णा घाटी साफ-सुथरी थी। बादल रिज पार करके कृष्णा घाटी पर कब्जा जमाना चाहते थे। दो-चार मेघ-सैनिक जाते, लेकिन शुष्क हवाएँ उन्हें तुरंत समाप्त कर देतीं। बड़ी देर तक यह संघर्ष चलता रहा, लेकिन आखिर में शुष्क सेना को हारना पड़ा। कृष्णा घाटी भी बादलमय हो गई और रिज कहाँ है, यह पता चलना मुश्किल हो गया।
चारों ओर बादल ही बादल हो जाने से पर्यटक निराश होने लगे। लेकिन हम निराश नहीं थे। हमें पता था कि पूरे दक्कन प्रायद्वीप में शुष्क सेना का ही राज है और उसकी मर्जी के बिना बादल न तो जा ही सकते हैं और न ही बरस सकते हैं। अभी बादलों ने भले ही उनके थोड़े-से भाग पर कब्जा कर लिया हो, लेकिन जल्द ही सभी बादल वहाँ से भगा दिए जाएँगे। हाँ, अगर कुछ बादलों को बरसने की अनुमति मिल गई, तो समूची कृष्णा घाटी और उसमें रहने वाले सभी निवासी बड़े खुश होंगे, क्योंकि यह प्रायद्वीप भारत के सबसे सूखे क्षेत्रों में से एक है।

ऑर्थर पॉइंट से चलकर हम रुके एलफिंस्टन पॉइंट पर। यहाँ से सावित्री घाटी और उसके इर्द-गिर्द का जंगल दिखाई देता है, लेकिन यह पूरी घाटी पहले से ही बादलों से ढकी थी, इसलिए यहाँ से भी कोई नजारा नहीं दिखा।

यहाँ से मुड़े तो जानकारी के अभाव में पुराना महाबलेश्वर छूट गया। इसे अगले दिन आकर देखा। यहाँ एक पुराना मंदिर है, जिसके कारण इस स्थान का नाम ‘महाबलेश्वर’ पड़ा।

और आखिर में पहुँचे इको पॉइंट। यहाँ से कृष्णा घाटी दिखती है और कृष्णा नदी पर बना पहला बाँध भी। अभी तक यहाँ वो बादल-सेना नहीं आई थी, इसलिए अच्छा नजारा दिख रहा था। यहीं पर एक चट्टान इस तरह से टिकी है कि उसके आरपार निकला जा सकता है। इसे ‘नीडल होल’ भी कहते हैं, क्योंकि यह बहुत बड़ी सुई के सिर जैसी भी दिखती है और ‘एलीफेंट हैड’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह हाथी की सूंड जैसी भी दिखती है। यह स्थान भी बड़ी देर तक तफरीह करने के लिए उत्तम है। लेकिन यहाँ भी बंदर बहुत हैं, जो निश्चिंत होकर तफरीह नहीं करने देते। और बंदरों से भी ज्यादा ‘भविष्यवक्ता’ हैं, जो आपका हाथ देखकर आपकी भविष्यवाणी करते हैं। एक ने तो हमें लंदन पहुँचा दिया था। नहीं, हमने हाथ नहीं दिखाया। यह उनका तरीका होता है। वे आपके आगे-पीछे लगे रहेंगे और तमाम तरह की भविष्यवाणियाँ बोलते रहेंगे। अगर आपने इन पर जरा भी ध्यान दे दिया, तो आप गए काम से...

तो यह यात्रा थी महाबलेश्वर की। गणेश पंडालों की तो धूम थी ही, आज मुहर्रम भी था। गणेश वंदना भी हो रही थी और ताजिये भी निकाले जा रहे थे।

और भरपेट डिनर के बाद वडापाव भी खाया जा रहा था...


पोलादपुर से महाबलेश्वर की ओर...







प्रतापगढ़ किले का प्रवेश-द्वार...



महाबलेश्वर में 500 रुपये का कमरा...

ऑर्थर पॉइंट... और बादल बाएँ से दाहिने जाने की कोशिश करते हुए...





मक्के के उबले दाने...



इको पॉइंट से दिखता कृष्णा नदी पर बना पहला बाँध...



और वो रहा दूसरे बाँध का कुछ हिस्सा...



नीडल हैड... या एलीफेंट हैड...?



स्ट्राबेरी फार्म...

पुराना महाबलेश्वर





अगले भाग में जारी...

5 comments:

  1. अति सुन्दर , एक नंबर

    ReplyDelete
  2. प्रतापगढ़ किले की एक खासियत ये है की इस किले का गेट जब तक आप इसके सामने ना पहुँच जाओ तब तक नहीं दीखता है और इसके पास ही अफजाल खान का मकबरा भी बना है जिसे शिवाजी महाराज ने बाघनख से पेट चीर कर मार डाला था

    प्रतापगढ़ का किला एक सैनिक छावनी के तौर पे काम करता था इसलिए जो लोग राजस्थान के महलों नुमा किलों जैसा सोच कर जाते है उन्हें निराशा ही हाथ लगती है

    किले में शिवाजी महाराज की मूर्ति स्थापित है और तुलजा भवानी का मंदिर भी है जिसमे शिवाजी महाराज की तलवार रखी हुई है

    ReplyDelete
  3. करीब दो ढाई साल पहले इसी सावित्री नदी पर मुम्बई गोवा हाइवे पर पोलादपुर के पास बना पुल तेज़ बारिश के चलते ढह गया था दो राज्य परिवहन की बसे दो चार अन्य कारों को जलसमाधि मिल गई थी। वैसे श्रीवर्धन और हरिहरेश्वर के बीच फेरी सर्विस नहीं है क्या ?

    ReplyDelete
    Replies
    1. नहीं, श्रीवर्धन और हरिहरेश्वर के बीच फेरी सर्विस नहीं है...

      Delete