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भीमाशंकर: मंजिल नहीं, रास्ता है खूबसूरत

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17 सितंबर 2018
भीमाशंकर भगवान शिव के पंद्रह-सोलह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यहाँ जाने के बहुत सारे रास्ते हैं, जिनमें दो पैदल रास्ते भी हैं। ये दोनों ही पैदल रास्ते नेरल के पास स्थित खांडस गाँव से हैं। इनमें से एक रास्ता आसान माना जाता है और दूसरा कठिन। हमारे पास मोटरसाइकिल थी और पहले हमारा इरादा खांडस में मोटरसाइकिल खड़ी करके कठिन रास्ते से ऊपर जाने और आसान रास्ते से नीचे आने का था, जो बाद में बदल गया। फिलहाल हम भीमाशंकर पैदल नहीं जा रहे हैं, बल्कि सड़क मार्ग से जा रहे हैं। भीमाशंकर मंदिर तक अच्छी सड़क बनी है।
मालशेज घाट पार करने के बाद हम दक्कन के पठार में थे। दक्कन का पठार मानसून में बहुत खूबसूरत हो जाता है। छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ, ऊँची-नीची और समतल जमीन, चारों ओर हरियाली, नदियों पर बने छोटे-बड़े बांध, ग्रामीण माहौल... और हम धीरे-धीरे चलते जा रहे थे।
गणेश खिंड से जो नजारा दिखाई देता है, वह अतुलनीय है। आप कुछ ऊँचाई पर होते हैं और दूर-दूर तक नीचे का विहंगम नजारा देखने को मिलता है। हम अचंभित थे यहाँ होकर। हमें ग्रामीण भारत के ये नजारे क्यों नहीं दिखाए जाते? ऐसी प्राकृतिक खूबसूरती देखने के लिए हमें विदेशों का सहारा क्यों लेना पड़ता है? सामने एक से बढ़कर एक चमत्कृत कर देने वाले पर्वत थे, इन पर्वतों के नीचे जोगा डैम का विस्तार था, हर तरफ फूल खिले थे और किसी की आवाजाही नहीं।
काश!, हमारे पास तंबू होता और हम आज यहीं रुकते।
लेकिन आगे तो बढ़ना ही था। यहाँ से आगे निकलते ही जुन्नार आ गया। अच्छा खासा कस्बा है।
और हमारा दुर्भाग्य कि यहाँ आकर हमें पता चला कि हमारे सामने वाली पहाड़ी पर शिवनेरी किला है। असल में हम यूँ ही मुँह उठाकर घूमने निकल पड़े थे। हमें कुछ भी नहीं पता था कि हम कहाँ से कहाँ जाएँगे और हमारे रास्ते में क्या-क्या आएगा और उसकी क्या गाथा होगी... लेकिन शिवनेरी की गाथा याद थी। यहाँ छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म हुआ था।
हालाँकि जुन्नार में ठहरने के कुछ विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन शाम के छह बजे जब हम यहाँ आए तो हमने सोच रखा था कि 70 किलोमीटर आगे भीमाशंकर ही रुकना है। फिर भी यहाँ रुकने और न रुकने के बारे में सोच विचार करने को दस मिनट जरूर लगाए और आगे बढ़ चले। आधे घंटे बाद दिन छिप जाएगा और हम किले को अच्छी तरह नहीं देख पाएँगे। अगली बार आएँगे, तो और स्टडी करके आएँगे।
और अच्छा हुआ कि हम आगे बढ़ गए। जब घोड़ेगाँव की ओर बढ़ रहे थे, तो हमारे दाहिने वाली पहाड़ी पर कुछ गुफाएँ दिखाई पड़ीं। बाहर से देखने पर अजंता गुफाओं जैसी। बहुत सारी गुफाएँ हैं। ये कैसी गुफाएँ हैं?... पता नहीं।... आसपास इंसान न इंसान का बच्चा। मोबाइल में नेटवर्क नहीं। आखिरकार एक फोटो लिया और बाद में इस क्षेत्र का अध्ययन करेंगे - ऐसा सोचकर घोड़ेगाँव की ओर बढ़ चले।
और आज ये लाइनें पढ़ते ही आपको पता चल जाएगा कि यहाँ पहली शताब्दी की बनी हुई 60 गुफाएँ हैं। ठीक अजंता और एलीफेंटा गुफाओं की तरह। मैंने एलोरा की गुफाएँ नहीं देखी हैं, इसलिए एलोरा के साथ तुलना नहीं करूँगा। यहाँ यवनों के भी कुछ शिलालेख हैं। ऐसा मुझे अभी-अभी विकीपीडिया ने बताया।
कहने का अर्थ है कि जुन्नार एक-दो घंटे में घूमकर चले जाने की जगह नहीं है। यहाँ तो दो दिन भी कम पड़ेंगे।

सवा सात बजे जब डिम्भा पहुँचे, तो अंधेरा हो चुका था। किसी गणेश पंडाल में गणेशजी के भजन बज रहे थे। कुछ होटल थे। हमने मिसलपाव ले लिया।
“आज यहीं रुक जाओ जी... भीमाशंकर से भी सस्ते कमरे मिल जाएँगे... बड़ी दूर है भीमाशंकर... बीच में घाट भी है... जंगल भी है...” - रेस्टोरेंट वाले ने हमें यहीं ठहरने की पेशकश की, जिसे हमने नकार दिया, क्योंकि यहाँ नेटवर्क नहीं था और हमें उम्मीद थी कि भीमाशंकर में नेटवर्क मिलेगा और हमारा फेसबुक-व्हाट्सएप चल जाएगा।

हम समुद्र तल से लगभग 1000 मीटर की ऊँचाई पर चल रहे थे। भीमाशंकर कुछ ही किलोमीटर बाकी रह गया था। मौसम एकदम साफ था और हवा नहीं चल रही थी। हमारे यात्रा-वृत्तांत पढ़ते-पढ़ते आपको पता चल गया होगा कि पश्चिमी घाट पर्वत श्रंखला के दोनों ओर ढलान है। पूर्व की तरफ बहुत कम और धीरे-धीरे ढलान मिलता है, जबकि पश्चिम की तरफ एकदम खड़ा ढाल है। अभी फिलहाल हम पूर्व की ओर थे और भीमाशंकर पश्चिम वाले तीखे ढलान पर करीब 100 मीटर नीचे है। यानी हमें आखिरी कुछ दूर नीचे उतरना पड़ेगा।
और जैसे ही वह स्थान आया, जहाँ से नीचे उतरने की शुरूआत हुई - एकदम तेज हवाएँ और घना कोहरा मिल गया। इतना घना कोहरा कि 20 की स्पीड से भी चलना मुश्किल होने लगा।
अचानक यह कैसे हुआ?
आप जानते ही हैं कि यहाँ से पश्चिम में खड़ा ढाल है और पश्चिम में ही समुद्र है। समुद्र से नमीयुक्त हवाएँ आती हैं और सीधे इस ढाल से टकराती हैं। ये हवाएँ इस ढाल से, इन पहाड़ों से टकराकर बड़ी तेजी से ऊपर उठती हैं। और ऊपर उठते-उठते जब पहाड़ समाप्त हो जाता है, तो ये अक्सर दूसरी तरफ यानी पूर्व की तरफ न जाकर अपने मोमेंटम के कारण ऊपर ही उठती चली जाती हैं। अभी हम इन हवाओं के उसी मार्ग में थे। अभी कुछ ही दूर पहले इन हवाओं और कोहरे का नामोनिशान भी नहीं था, जबकि अब तेज हवाएँ चल रही थीं और घना कोहरा भी था। ये वही मोमेंटम के कारण ऊपर उठती हवाएँ थीं।

लेकिन भीमाशंकर मंदिर और यहाँ की व्यवस्थाओं ने हमें बिल्कुल भी प्रभावित नहीं किया। आज फिर सिद्ध हो गया कि मंजिलों से ज्यादा खूबसूरत तो रास्ते होते हैं।


मालशेज घाट से आगे का रास्ता...



गणेश खिंड

गणेश खिंड से दिखता नजारा...

मुझे अच्छी एडिटिंग करनी नहीं आती... अन्यथा इस नजारे को देखकर कोई नहीं कहेगा कि हमारे भारत का है...














जुन्नार के पास स्थित प्राचीन बौद्ध गुफाएँ...

मिसलपाव

भीमाशंकर





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8 comments:

  1. बहुत बढिया नीरज जी!!! लगता है आप मेरे बगल में से गुजरे| मै चाकण में रहता हूँ| शायद अगले दिन १८ सितम्बर को आप यहीं से गए| आपके फेसबूक पोस्टस ठीक से देखे होते तो आपको जरूर मिलता| काश| फिर कभी|

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    1. नहीं, इस दिन तो हम चाकण से होकर नहीं गुजरे... लेकिन अगले दिन भीमाशंकर से पुणे जाते हुए चाकण से ही होकर गए थे...

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  2. शानदार!!! अद्भुत होता है आपका पोस्ट।भीमाशंकर मैं 15 अगस्त2017 को गया था।शिवनेरी भी घुमा।जुन्नार के जिस गुफाओं के बारे में आपने बताया,मुझे दूर दूर तक उसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी।यहीं खासियत होती है आपके ब्लॉग की ,जो जानकारी हमें वहाँ जाकर भी नहीं मिलती वो आपके ब्लॉग के जरिये हम जान पाते हैं।शुक्रिया..

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  3. मजा आ गया भाई मैं भी शिवनेरी किला जा चुका हूं

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  4. इतिहास और प्रकृति के बारे में आपका ज्ञान प्रशंसनीय है। चाहे गूगल से लाएं या विकीपीडिया से, हमें तो एक जगह रेडीमेड और सटीक जानकारी परोस ही देते हैं। धन्यवाद जी।

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  5. मुझे भी 2 महीने पहले भीमाशंकर का सौभाग्य प्राप्त हुआ... अद्भुत नज़ारा था।।।।

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  6. Aap jis gufa ki bat Kar rhe hai wo leyadri ke hai yaha kul 28 ke lagbhag gufanuma bana haijinme sabse bade wale me girijatam ganpati mandir hai astvinayak ka

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  7. जब घोड़ेगाँव की ओर बढ़ रहे थे,
    ....

    mera gav ghodegaon hi hai .... kash hamari mulakat hoti... aap muze pune mai message dete rahe aur mai to ghodegaon mai hi tha ... kash.....

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