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गोवा में दो दिन - पलोलम बीच

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25 सितंबर 2018

सुबह जब चले थे, तो परिचित ने पूछा - “आज कहाँ जाओगे?”
“देखते हैं। कल नॉर्थ गोवा घूम लिया, आज शायद साउथ गोवा जाएँगे।”
“अरे कुछ नहीं है साउथ गोवा में। वहाँ कुछ भी नहीं है। सबकुछ नॉर्थ गोवा में ही है। तुम भी अजीब लोग हो। साउथ गोवा जा रहे हो? जो बात नॉर्थ में है, वो साउथ में थोड़े ही है?”

“इसका मतलब हमें साउथ गोवा ही जाना चाहिए।” मैंने दीप्ति से कहा और उसने एकदम हाँ कर दी।






तो दूधसागर की ओर चल दिए, लेकिन नहीं जा पाए। फिर बबलिंग पोंड होते हुए पहुँचे साउथ गोवा के पलोलम बीच पर। पार्किंग में मोटरसाइकिल खड़ी करते ही बीस रुपये की पर्ची कट गई। दीप्ति ने पता नहीं क्या पढ़ लिया, बोली - “बीस रुपये प्रति घंटे के रेट हैं पार्किंग के।”
“क्यों भाई? यह बीस रुपये की पर्ची कितनी देर तक वैलिड रहेगी?”
“जब तक आप चाहो।”
“चार घंटे बाद तक भी?”
“हाँ जी।”
और इसी पार्किंग में एक स्कूटर पर वडापाव व चाय बेचने वाला भी था। पार्किंगवाला उसे यहाँ से हट जाने को कहा था और वह ‘नहीं हटूँगा’ वाले अंदाज में डटा खड़ा रहा। वडापाव हमारी कमजोरी है। खड़े होकर खाने लगे तो दो ‘दादा टाइप’ के लोग आए और वडापाव वाले से बात करने लगे।
“क्या नाम है तेरा?”
“फलां नाम है।”
“हमें जानता है?”
“नहीं।”
“उधर आ जाना चुपचाप।”
और वे उसे धमकी-सी देकर चले गए।
अब मैंने पूछा - “कौन थे ये लोग?”
“साले ऐसे ही वसूली करते रहते हैं।”
“तो क्या तू जाएगा उधर?”
“अजी, दस साल से काम कर रहा हूँ यहाँ। ऐसी की तैसी इनकी।”

इस तरह हम साउथ गोवा के पलोलम बीच पर आए। इसके बारे में पहले ही शब्द मुँह से निकले - अच्छा है। भूख लगी थी। यहीं एक रेस्टोरेंट में समुद्र की ओर मुँह करके बैठ गए और पनीर-वनीर खाने लगे। कल भी हम इसी तरह बैठकर कुछ खा रहे थे और आज भी। वाकई बहुत अच्छा लगा एक सुंदर बीच पर समुद्र की लहरों को देखते हुए भोजन करना।
सामने सूरज धीरे-धीरे नीचे उतरता जा रहा था। पश्चिम में एक छोटा-सा द्वीप दिख रहा था। हम और अच्छा सूर्यास्त देखने उधर चल दिए। कसम से, ऐसा सुंदर बीच मैंने कभी नहीं देखा था। आज इस यात्रा के आखिरी दिन पता चला कि बीच भी वाकई अत्यधिक सुंदर होते हैं। भीड़ बिल्कुल भी नहीं थी। क्यों नहीं थी?
“क्योंकि साउथ गोवा में कुछ नहीं है।” मुझे अपने परिचित के शब्द याद आ गए। ये शब्द शायद ज्यादातर लोगों के होते होंगे, तभी यहाँ तक कम ही लोग आ पाते हैं। लेकिन यहाँ जितने भी यात्री थे, सभी शायद हमारी तरह ही थे। एकदम शांत और एक-एक पल का आनंद लेते हुए। कोई शोर नहीं, कोई शराबा नहीं।
पैदल पैदल उस द्वीप की ओर बढ़ते रहे। लहरें आकर पाँवों को भिगो जातीं। एक छोटी-सी नदी भी पैदल ही पार की। समुद्र में नदी कैसे मिलती है, यह हम अपने सामने देख रहे थे।
आगे चलते रहे, और आगे, और आगे... और अब आखिरकार आखिर में आ गए। यहाँ हमसे पहले भी कुछ लोग बैठे थे - अपने कैमरों को ट्राइपॉड पर लगाए, ताकि सूर्यास्त के यादगार फोटो ले सकें। हमें भी ट्राइपॉड की याद आई, लेकिन हम लाना भूल गए थे। तो जूते उतारे और उसमें कैमरा लगाकर काम चल गया। जूते केवल पैरों में पहनने की ही चीज नहीं होते, बल्कि उन्हें ‘ट्राइपॉड’ की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इनमें किसी भी एंगल पर कैमरे को सेट किया जा सकता है।

अंधेरा हुआ और हमारी गोवा यात्रा भी समाप्त हुई। अगले दिन मोटरसाइकिल यहीं परिचित के यहाँ छोड़ दी और दिल्ली की ट्रेन पकड़ ली। दो महीने बाद या तीन-चार महीने बाद फिर से आएँगे और मोटरसाइकिल से ही बाकी देश घूमेंगे।
















नदी समुद्र में ऐसे मिलती है... एक छोटी-सी नदी...








और मोटरसाइकिल यहीं छोड़ दी...

खूबसूरत सीढ़ियों वाला मड़गाँव स्टेशन

KR   SWR ... यानी यह ट्रेन कोंकण रेलवे ने साउथ वेस्टर्न रेलवे से किराये पर ले रखी है... और इसे मुंबई व गोवा के बीच चलाते हैं...















गोवा आने से पहले हमारे मन में यहाँ के बारे में तमाम तरह की धारणाएँ होती हैं। असल में गोवा है ही ऐसी जगह कि प्रत्येक यात्री के मन में गलत धारणाएँ बन ही जाती हैं। किसी के मन में सकारात्मक गलत धारणाएँ और किसी के मन में नकारात्मक गलत धारणाएँ। हम नकारात्मक वाली श्रेणी में थे। असल में हम गोवा को केवल ‘टच’ करना चाहते थे, ताकि भविष्य में किसी से यह न कह सकें कि हम गोवा नहीं घूमे। हम यहाँ घूमना ही नहीं चाहते थे। हम बिना घूमे ही गोवा घूम लेना चाहते थे। कई साल पहले जब मैं यहाँ आया था, तब भी दो दिन रुका था। पहले दिन होटल में पड़ा रहा था और दूसरे दिन दूधसागर देखने चला गया था। मुझे बीच और ‘बीच कल्चर’ पसंद ही नहीं थे। मुझे शराब के अड्डे और जुएघर पसंद नहीं थे। आज भी नहीं हैं।

लेकिन गोवा पसंद आ गया। यह इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि है। हमें वाकई गोवा पसंद आया। हम फिर से यहाँ आएँगे और गोवा के प्रत्येक बीच को इत्मीनान से देखेंगे... कम से कम साउथ गोवा के बीचों को तो जरूर।


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3 comments:

  1. Bhut acha laga apka yatra bratantra
    Bo jute Bali jugad bhi achi lagi

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  2. अगली बार आओ तो एक जगह और देखना । रीस मगोस किला और उसके अंदर गोआ की आजादी के फोटो। किस तरह से गोआ के लोगों ने शहादतें देकर पुर्तगालियों से आजादी ली। बिरले ही इस जगह की महत्वता को समझ पाते हैं।

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  3. Bahut hi badhiya blog me chahta tha ki aap goa ke beach jarur ghume kyunki goa hai hi aisa jo man me ek adbhut chap chod deta hai....pehle goa yatra vratant me aap ne likha tha jahan paison ke khel wahan mera kya kaam...lekin ab me khush hun jo aapki goa ko leke soch badal gayi kyunki jaruri nahi ki bina jyada paisa kharch kiye goa ka ananand na liya ja sake...

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