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चलो कोंकण: इंदौर से नासिक

Indore Friends

14 सितंबर 2018
“अरे, जोगी भड़क जाएगा?” सुमित ने सुबह उठने से पहले ही पूछा।
“क्यों भड़केगा जोगी?”
“नहीं रे, इधर एक जलप्रपात है, बहुत ही शानदार। उसका नाम है जोगी भड़क। प्रसिद्ध भी नहीं है। तुम्हें जाना चाहिए।”
“हाँ, फिर तो जाएँगे। रास्ता कहाँ से है?”
“मानपुर के पास से। मानपुर से थोड़ा आगे निकलोगे ना? तो...”
“ठहर जा, गूगल मैप पर देख लेता हूँ।”

इंदौर की भौगोलिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। यह मालवा के पठार पर स्थित है और समुद्र तल से लगभग 600 मीटर ऊपर है। इसके दक्षिण में नर्मदा नदी बहती है, जो खलघाट में समुद्र तल से लगभग 150 मीटर पर है। तो यहाँ पठार की सीमा बड़ी तेजी से समाप्त होती है। एकदम खड़ी पहाड़ियाँ हैं, जो विन्ध्य पहाड़ों का हिस्सा है। यूँ तो इंदौर से खलघाट तक पूरा रास्ता लगभग समतल है, लेकिन जिस समय सड़क पठार से नीचे उतरती है, वो बड़ा ही रोमांचक समय होता है।
इसी वजह से विन्ध्य के इन पहाड़ों में बहुत सारे जलप्रपात भी हैं। पठार का सारा पानी अलग-अलग धाराओं के रूप में बहता है और विन्ध्य में ऊँचे जलप्रपात बनाता हुआ नीचे गिरता है। यहाँ कई ऊँचे जलप्रपात हैं - पातालपानी, शीतला माता आदि। और भी बहुत सारे हैं। जोगी भड़क भी इनमें से एक है। पिछले दिनों सुमित ने वहाँ की यात्रा की थी और अत्यधिक रोमांचक फोटो हमें दिखाए थे। आज हम मानपुर से ही होकर जाएँगे तो जोगी भड़क भी देखते हुए चलेंगे।





हम जहाँ-जहाँ भी जाते हैं, भारत के प्रधानमंत्री भी वहीं-वहीं पहुँच जाते हैं। कुछ साल पहले जब हम जांस्कर जा रहे थे तो प्रधानमंत्री साहब कारगिल जा पहुँचे। फिर एक जगह ऐसा और हुआ। और आज भी ऐसा ही हुआ। आज पी.एम. साहब इंदौर आने वाले थे। इंदौर वैसे भी भारत का सबसे साफ-सुथरा शहर है, आज तो इसकी सफाई देखते ही बनती थी। ‘स्वागतम’ के बहुत बड़े बैनर तले एक पुलिसवाला अपने डंडे से ‘कहीं’ खुजा रहा था। सुमित को अलविदा कह दिया और हम दक्षिण की ओर बढ़ चले।
महू बाईपास के पास एक बहुत बड़ा जलाशय दिखाई पड़ा, तो दो मिनट रुकने का मन होने लगा। मानसून का समय, नीला जलाशय और उसके चारों ओर फैली हरियाली, तरह-तरह के पक्षी, बगुले... दो मिनट से कब बीस मिनट हो गए, पता ही नहीं चला। साढ़े दस बज चुके थे और हमें आज रुकना था नासिक, जो यहाँ से लगभग 400 किलोमीटर दूर है। दीप्ति और भी बहुत देर तक जलाशय के किनारे बैठना चाहती थी, गुनगुनाना चाहती थी, लेकिन...

मानपुर में शीतला माता जलप्रपात जाने का रास्ता दिखाई पड़ा, तो जाने का मन होने लगा - “चलें क्या?”
“कहाँ?”
“शीतला माता जलप्रपात।”
“नहीं, पिछली बार गए थे, तो पुलिसवालों ने प्रपात तक नहीं जाने दिया था। क्या पता इस बार भी ऐसा ही हो। फिर बड़ी निराशा होती है।”
“क्या पता इस बार ऐसा न हो?”

असल में हमें घूमना नहीं आता। घूमना भी एक कला है। सेल्फी और फेसबुक-व्हाट्सएप के इस दौर में आज तो हम इस कला को भूलते ही जा रहे हैं। हम भूल जाते हैं कि जलप्रपात मानसून में जितने खूबसूरत होते हैं, उतने ही खतरनाक भी। एक सेल्फी के लिए या बेहूदे ‘एंजॉय’ के लिए हम अपनी जान भी दे देते हैं। ज्यादा समय नहीं हुआ, जब पातालपानी जलप्रपात में कुछ लोग बह गए थे और सभी ऊपर से नीचे गिरने के कारण मारे गए थे। हम तीन साल पहले यहाँ आए थे और शीतला माता जलप्रपात भी गए थे, लेकिन पुलिस वालों ने नहीं जाने दिया। यह हमारी ही सुरक्षा के लिए था, लेकिन इसके लिए वे लोग जिम्मेदार हैं, जो फोटो खींचने के लिए ऊल-जलूल हथकंडे अपनाते हैं और मर भी जाते हैं।

हम यही सब सोचते रहे और जोगी भड़क दिमाग से निकल गया। याद आया धामनोद पहुँचकर, जब दीप्ति ने मोटरसाइकिल का हैंडल संभाल लिया था और मैं खाली बैठा था, लेकिन अब वापस मानपुर जाना सही नहीं था।

गूगल मैप पर धामनोद से नासिक के बीच पड़ने वाले स्थानों के नाम देख रहा था, तो एक नाम पर निगाह अटक गई - सेंधवा। याद आया कि सेंधवा में कोई मित्र रहता है। फिर फोन करके संजय कौशिक जी से पूछा - “भाई, सेंधवा में कौन रहता है?”
“मनोज धाड़से और आलोक जोशी।”
“उनका मोबाइल नंबर दो।”
कौशिक जी सबका हिसाब रखते हैं। उनके फेसबुक ग्रुप में बीस हजार सदस्य हैं। सभी का बायोडाटा कौशिक जी की जुबान पर रहता है।
और एक फोन करते ही धाड़से भाई मिलने की प्रतीक्षा करने लगे। आलोक जोशी कहीं बाहर थे, लेकिन हमारी खबर उन तक भी पहुँच गई।

प्रणाम करके नर्मदाजी को पार किया। कुछ ही दूर महेश्वर है। हम तीन साल पहले जा चुके थे। अगर आपकी नर्मदा में जरा भी आस्था है, तब महेश्वर आपके लिए बहुत बड़ा तीर्थ है। इसके घाट पर बैठना ही सारे पापों को धो डालता है। और अगर आस्था नहीं है, तब तो महेश्वर से बड़ा तीर्थ कोई है ही नहीं... वाकई!

नर्मदा पार करके सतपुडा की पहाड़ियाँ शुरू हो जाती हैं। यहाँ सतपुड़ा के पहाड़ उतने घने और विकट नहीं हैं, इसलिए पता नहीं चलता कि हम सतपुड़ा में हैं। सेंधवा तक पहुँचते-पहुँचते हम फिर से समुद्र तल से 500 मीटर ऊपर जा पहुँचते हैं।
मनोज भाई से ढेर सारी बातें हुईं। भोजन करने और पर्याप्त आराम करने के बाद जब यहाँ से विदा ली तो परिवार के छोटे-बड़े कम से कम एक दर्जन लोग हमें अलविदा कह रहे थे।

सेंधवा से निकलते ही मध्य प्रदेश समाप्त हो जाता है और महाराष्ट्र आरंभ हो जाता है। इसके साथ ही सतपुड़ा की पहाड़ियाँ भी समाप्त हो जाती हैं और दक्कन का पठार शुरू हो जाता है। यहाँ सतपुड़ा को समाप्त होते देखना एक अलौकिक अनुभव है। आप ऊपर खड़े होते हैं और आपके सामने दक्षिण में नीचे एक अंतहीन समतल मैदान चला जाता है, जिसमें यहाँ-वहाँ कहीं-कहीं पहाड़ियाँ भी दिखती हैं और दूर क्षितिज में धरती और आसमान मिलते दिखते हैं। ऐसा लगता है जैसे महान सतपुड़ा ने महान दक्कन पठार के लिए जगह खाली कर दी हो। सतपुड़ा से उतरते हुए सतपुड़ा को छोड़ने का दुख भी होता है, लेकिन दक्कन में प्रवेश करने की खुशी भी होती है। पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ। हमने अनगिनत बार हिमालय और उत्तर भारत के विशाल मैदान के बीच यात्राएँ की हैं। जाने कितनी बार वो महान मैदान छोड़ा है और जाने कितनी बार महान हिमालय छोड़ा है, लेकिन कभी भी ऐसी अनुभूति नहीं हुई।
वाकई कुछ बातें शब्दातीत होती हैं।
सतपुड़ा से नीचे उतरकर हम रुके। पीछे मुड़कर देखा। मस्तक उठाए सतपुड़ा खड़ा था। ऐसा लग रहा था जैसे उसने हम बच्चों को दक्कन पठार की गोद में सौंप दिया हो और स्वयं भी हमें जाते देख रहा हो।
और तापी पार करते-करते सतपुड़ा ने हमें पूरी तरह छोड़ दिया और अब हम पूरी तरह दक्कन में थे। दक्कन यानी दक्षिण। आगे की हमारी यात्रा इसी दक्कन पठार के इर्द-गिर्द होगी, खासकर पश्चिमी घाट और कोंकण में।

नासिक अभी भी बहुत दूर था और सूर्यास्त हो चुका था। हम चाहते थे कि जयपुर और इंदौर की तरह नासिक में भी हमें कोई मेजबान मिल जाए। फेसबुक पर इस बात को अपडेट करने की देर थी, नासिक में मेजबान मिल गए। कल इंदौर में चंद्रशेखर चौरसिया जी मिले थे, उनके साले नासिक में ही रहते हैं। कल वे हमसे इंदौर में मिले भी थे, इसलिए अपरिचित होने का भी झंझट नहीं था।
और रात-बेरात पहुँचने का झंझट भी नहीं था।
मालेगाँव तक तो अच्छा अंधेरा हो चुका था। और अच्छी बारिश भी। रात में बारिश में हम मोटरसाइकिल चलाने से परहेज करते हैं, लेकिन नासिक में कोई हमारी प्रतीक्षा कर रहा था और नासिक अभी भी 100 किलोमीटर दूर था और रास्ते में हमें भोजन भी करना था। यानी कम से कम तीन घंटे अभी भी लगने थे।
तो हम चलते रहे। स्पीड कम कर ली। हेलमेट का शीशा ऊपर कर लिया और बारिश की फुहारें सीधे चेहरे पर लगने दीं।
रात बारह बजे नासिक पहुँचे। वकील साहब ने अपनी जी.पी.एस. लोकेशन भेज दी थी। उस कालोनी में उस लोकेशन पर जाकर फोन करने की देर थी, बगल में एक दरवाजा खुला और वकील साहब सामने।

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4 comments:

  1. रोचक यात्रा चालू आहे।

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  2. पढ़ना शुरु करने के बाद कब अंत तक पहुँचे पता ही न चला
    अगले भाग की प्रतीक्षा है नीरज जी

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  3. Beautifully narrated & captured....

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  4. नीरज जी आपसे मिलने का मौका छूट गया था मैं शिरपुर के पास ही रहता हूं आपसे बात भी हुई थी लेकिन,
    मामा के लड़के की कैंसर की वजह से डेथ हो गई थी इसलिए मुम्बई चले गए थे,

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