Skip to main content

2012 की घुमक्कडी का लेखा जोखा

2012 चला गया। इस साल घुमक्कडी में एकाध नहीं बल्कि तीन महान उपलब्धियां हासिल हुईं। आगे बताया जायेगा तीनों महान उपलब्धियों के साथ साथ पिछले बारह महीनों में की गई हर छोटी बडी यात्रा के बारे में।
1. मावली- मारवाड मीटर गेज ट्रेन यात्रा- मावली से मारवाड तक चलने वाली 152 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली इस ट्रेन में 7 फरवरी को यात्रा की गई। इससे एक दिन पहले रेवाडी से रींगस होते हुए फुलेरा तक की यात्रा भी इसी ट्रिप का हिस्सा है।




2. रतलाम- अकोला मीटर गेज यात्रा और मुम्बई यात्रा- यह यात्रा 17 फरवरी से 22 फरवरी तक की गई। यह मुख्यतः एक ट्रेन यात्रा ही थी। इसमें रतलाम से अकोला तक चलने वाली भारत की वर्तमान सबसे लम्बी मीटर गेज की ट्रेन में यात्रा की गई। इसके बाद अकोला से मुम्बई जाना हुआ, एलीफेण्टा गुफाएं देखीं और अगले दिन मुम्बई से इटारसी तक पैसेंजर ट्रेन से यात्रा हुई।

3. आगरा से सात ताल- यह यात्रा 20 मार्च से 23 मार्च तक की गई। इसमें शुरूआत ताजमहल से हुई और फिर पैसेंजर ट्रेन पकड ली। आगरा से अछनेरा, मथुरा होते हुए कासगंज पहुंचा। उसके बाद मीटर गेज की ट्रेन से भोजीपुरा तक गया और फिर सातताल। इसी में कालाढूंगी में जिम कार्बेट का घर और कार्बेट फाल भी देखा गया।

4. जोशीमठ, औली, कल्पेश्वर यात्रा- यह यात्रा विधान के साथ 2 से 7 अप्रैल तक की गई। इसमें देवप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और नन्दप्रयाग से साथ साथ औली, गोरसों बुग्याल और पांचवें केदार कल्पेश्वर का भ्रमण हुआ।

5 गंगोत्री- गौमुख- तपोवन यात्रा- यह इस साल की तीन महान उपलब्धियों में पहली उपलब्धि थी। चौधरी साहब के साथ गंगोत्री जाना, फिर गौमुख और उससे भी आगे तपोवन तक जाना एक अविस्मरणीय क्षण था।

6. नेपाल यात्रा- यह मेरी पहली विदेश यात्रा थी। नरकटियागंज से रक्सौल तक मीटर गेज में यात्रा करने के बाद काठमाण्डू और पोखरा घूमना बेहतरीन अनुभव रहा। यात्रा 10 से 15 जुलाई तक की गई।

7. ट्रेन से भारत परिक्रमा- यह दूसरी महान उपलब्धि थी। 8 से 21 अगस्त तक की गई इस यात्रा में मैं हालांकि दो बार बीमार भी पडा लेकिन ट्रेन से सम्पूर्ण भारत को देखना एक उपलब्धि ही है।

8. लखनऊ बनारस यात्रा- यह यात्रा 26 से 30 अगस्त तक चली। एक सम्मान समारोह में भाग लेने लखनऊ जाना था, तो लगे हाथों वाराणसी, सारनाथ के अलावा भी बहुत कुछ देख लिया गया।

9. रूपकुण्ड यात्रा- यह थी वर्ष की तीसरी और महानतम उपलब्धि। 29 सितम्बर से 6 अक्टूबर तक यह यात्रा सम्पन्न हुई।

10. साइकिल से नीलकण्ठ तक- यह यात्रा 30 और 31 अक्टूबर को हुई। ऋषिकेश से नीलकण्ठ तक और वापस हरिद्वार तक साइकिल से, दिनभर में करीब 80 किलोमीटर पहाडी मार्गों पर साइकिल चलाना; यह मेरे साइकिल यात्राओं की पहली यात्रा थी।

11. जयपुर- चूरू मीटर गेज ट्रेन यात्रा- 7 नवम्बर को यह यात्रा की गई। इससे पहली दिल्ली से जयपुर तक डबल डेकर ट्रेन में भी यात्रा हुई।

12. साइकिल यात्रा- जयपुर से पुष्कर-साम्भर, भानगढ- नीलकण्ठ- 20 से 28 नवम्बर तक यह यात्रा चली। इसमें पहले तो साइकिल से जयपुर से पुष्कर जाया गया, फिर पुष्कर से साम्भर लेक होते हुए जयपुर वापस आया। उसके बाद विधान के साथ मोटरसाइकिल से भानगढ और नीलकण्ठ महादेव की यात्रा भी हुई। यह साल की आखिरी यात्रा थी।

इस साल कुल मिलाकर 98 छुट्टियां ली गईं जिनमें 52 साप्ताहिक अवकाश और 46 बाकी छुट्टियां हैं। पिछले साल 2011 में 72 छुट्टियां ली गई थीं (52 साप्ताहिक अवकाश, 20 बाकी छुट्टियां)।

और अब रेलयात्राएं
2012 में कुल 69 रेलयात्राएं की गईं और 22610 किलोमीटर दूरी तय हुई। इनमें 33 बार में 3477 किलोमीटर पैसेंजर ट्रेन से, 21 बार में 10152 किलोमीटर मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों में और 15 बार में 8981 किलोमीटर दूरी सुपरफास्ट ट्रेनों से तय की गई। सबसे लम्बी रेलयात्रा डिब्रुगढ से कन्याकुमारी के बीच 4273 किलोमीटर की रही, जबकि सबसे छोटी रेलयात्रा मुम्बई लोकल में तिलक नगर से वडाला रोड तक रही मात्र 7 किलोमीटर की।

2013 के लक्ष्य
2012 में हिमालय के नाम पर सारी यात्राएं उत्तराखण्ड में ही हुई हैं, एक यात्रा नेपाल की है। अगले साल हिमाचल और जम्मू कश्मीर के हिमालय पार वाले क्षेत्रों का इरादा है- किन्नौर, स्पीति, लाहौल और लद्दाख। देखते हैं कि कहां तक पहुंच पाता हूं।


Comments

  1. नीरज जी अब तो भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय को आपको अपना ब्रांड अम्बेसडर बना लेना चाहिए..वन्देमातरम...

    ReplyDelete
  2. वाह ! शानदार चित्रों के साथ शानदार लेखा जोखा |

    ReplyDelete
  3. waaah praveen ji kya baat kahi hai aapne............

    ReplyDelete
  4. 2012 की एक यात्रा का लेखा इसमें आपने नहीं लिखा
    दिल्ली से सांपला 29 दिसम्बर को

    प्रणाम

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

कोटेश्वर और नारायण सरोवर

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 18 जनवरी 2015 लखपत से नारायण सरोवर की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। किले से निकलते ही एक सडक तो बायें हाथ भुज चली जाती है और एक दाहिने वाली जाती है नारायण सरोवर। नारायण सरोवर से दो किलोमीटर आगे कोटेश्वर है। जैसा कि कई अन्य स्थानों पर भी कथा प्रचलित है कि रावण ने तपस्या करी, शिवजी प्रसन्न हुए और शिवलिंग के रूप में रावण के साथ लंका जाने लगे। लेकिन शर्त लगा दी कि अगर शिवलिंग को जमीन पर रख दिया तो फिर उठाये नहीं उठूंगा। ऐसा ही कोटेश्वर में हुआ। रावण को लघुशंका लगी और शिवजी यहीं पर विराजमान हो गये। अब वर्तमान में मानचित्र देखें तो सन्देह होता है कि रावण शिवजी को कैलाश से ला रहा था या पुरुषपुर से। कैलाश-लंका के बीच में कोटेश्वर दूर-दूर तक भी नहीं आता।

जोशीमठ यात्रा- कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 3 अप्रैल 2012 की सुबह मैं और विधान रुद्रप्रयाग में थे। यहां से बस पकडी और घण्टे भर में कर्णप्रयाग जा पहुंचे। आज रुद्रप्रयाग से आगे अलकनन्दा घाटी में मैं पहली बार आया था। नहीं तो मंदाकिनी घाटी में दो बार जा चुका था- एक बार मदमहेश्वर और दूसरी बार केदारनाथ और तुंगनाथ । रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग जाते समय रास्ते में गौचर पडता है जहां हवाई पट्टी भी है। मेरे ध्यान कुछ कुछ ऐसा है कि कुछ दिन पहले सोनिया गांधी ने गौचर में ही ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन की नींव रखी है। कर्णप्रयाग में अलकनन्दा में पिण्डर नदी आकर मिल जाती है। पिण्डर नदी पिण्डारी ग्लेशियर से निकलती है। मैं पिछले साल अक्टूबर में पिण्डारी ग्लेशियर गया था। तो इस प्रकार पिण्डर नदी पहली ऐसी नदी बन गई जिसका आदि और अन्त मैंने देखा है। आदि और अन्त यानी उद्गम और समागम। यह पिण्डारी ग्लेशियर से यहां कर्णप्रयाग तक आने में सौ किलोमीटर से भी ज्यादा का सफर तय करती है।

ओशो चर्चा

हमारे यहां एक त्यागी जी हैं। वैसे तो बडे बुद्धिमान, ज्ञानी हैं; उम्र भी काफी है लेकिन सब दिखावटी। एक दिन ओशो की चर्चा चल पडी। बाकी कोई बोले इससे पहले ही त्यागी जी बोल पडे- ओशो जैसा मादर... आदमी नहीं हुआ कभी। एक नम्बर का अय्याश आदमी। उसके लिये रोज दुनियाभर से कुंवाई लडकियां मंगाई जाती थीं। मैंने पूछा- त्यागी जी, आपने कहां पढा ये सब? कभी पढा है ओशो साहित्य या सुने हैं कभी उसके प्रवचन? तुरन्त एक गाली निकली मुंह से- मैं क्यों पढूंगा ऐसे आदमी को? तो फिर आपको कैसे पता कि वो अय्याश था? या बस अपने जैसों से ही सुनी-सुनाई बातें नमक-मिर्च लगाकर बता रहे हो? चर्चा आगे बढे, इससे पहले बता दूं कि मैं ओशो का अनुयायी नहीं हूं। न मैं उसकी पूजा करता हूं और न ही किसी ओशो आश्रम में जाता हूं। जाने की इच्छा भी नहीं है। लेकिन जब उसे पढता हूं तो लगता है कि उसने जो भी प्रवचन दिये, सब खास मेरे ही लिये दिये हैं।