Skip to main content

धोलावीरा- 2

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
पिछली बार आपको धोलावीरा के पुरातात्विक और ऐतिहासिक महत्व के बारे में बताया था, आज वहां की यात्रा करते हैं। यात्रा वृत्तान्त लिखते हैं। खास बात यह है कि धोलावीरा जाने का रास्ता भी कच्छ के सुन्दरतम रास्तों में से एक है। इसी वजह से कच्छ जाने वाला हर आदमी धोलावीरा की भी योजना बनाता है।
भचाऊ में प्रभु आहिर ने बताया कि आप पहले एकल माता जाओ, वहां से दसेक किलोमीटर रन में चलना पडेगा और आप सीधे धोलावीरा पहुंच जाओगे। असल में धोलावीरा एक टापू पर स्थित है। इस टापू को खडीर बेट कहते हैं। इसके चारों तरफ समुद्र है जो बारिश के मौसम में भर जाता है और सर्दियां आते आते सूखने लगता है जैसा कि पूरे रन में होता है। गर्मियों में यह इतना सूख जाता है कि इस ‘समुद्र’ को आप गाडियों से भी पार कर सकते हैं। प्रभु ने कहा कि तुम एकल माता से सीधे रन में उतर जाना और सीधे चलते जाना। खडीर बेट आयेगा, तो वहां जल्दी ही आपको धोलावीरा वाली सडक मिल जायेगी जिससे आप धोलावीरा जा सकते हो।
मैं खुश हो गया कि रन में बिना किसी रास्ते के बाइक चलाऊंगा लेकिन प्रभु की अगली बात से सारे उत्साह पर पानी फिर गया- आप अकेले हो तो निकल जाओगे, एक बाइक पर दो होते तो बाइक दलदल में धंस जाती। यह सुनते ही रन में बाइक चलाने का विचार त्याग दिया। सडक से ही जाऊंगा हालांकि सडक बहुत लम्बा चक्कर लगाकर जाती है।
कल बहुत ज्यादा बाइक चलाई थी और रात में भी चला था, बहुत थकान हो गई थी इसलिये देर तक सोया। दोपहर ग्यारह बजे भचाऊ से चला। घण्टा भर भी नहीं लगा और मैं चित्रोड पहुंच गया। यहां से रापर के लिये रास्ता अलग होता है जो आगे धोलावीरा जाता है। साढे बारह बजे रापर और डेढ बजे बालासर। बालासर से 18 किलोमीटर आगे वो स्थान है जहां सडक पुल के द्वारा रन को पार करती है और खडीर बेट को मुख्य भूमि से जोडती है। यह वास्तव में एक पुल है लेकिन पुल जैसा कुछ दिखता नहीं। सीधी सडक ही दिखती है और दोनों तरफ दूर तक फैला सफेद रन। इस कई किलोमीटर की सीधी सडक पर बीच बीच में कई पुलियाएं हैं जो समुद्र के पानी को इधर से उधर जाने की सुविधा देती हैं।
यही भाग इस मार्ग का सुन्दरतम स्थान है। मैं यहां खूब देर तक रुका, रुक-रुक कर चला और जमकर फोटो लिये। इसी तरह वापसी में जब धोलावीरा से शाम पांच बजे चला तो पौन घण्टे में मैं फिर इस स्थान पर था। कुछ ही देर में सूर्यास्त होने वाला था तो कुछ देर के लिये यही रुक जाने का फैसला ले लिया। खैर, अपने समय पर सूर्यास्त हुआ और सफेद रन में सूर्यास्त न देख पाने का सारा मलाल खत्म हो गया। आनन्द आ गया रन में सूर्यास्त देखकर।
साढे छह बजे यहां से चला। इरादा था कम से कम सान्तलपुर पहुंच जाने का। बालासर से एक सीधा रास्ता सान्तलपुर जाता है। जब तक बालासर पहुंचा, अन्धेरा हो चुका था। बालासर में रुकने का कोई ठिकाना नहीं है, अन्यथा मैं यहीं रुक जाता। सान्तलपुर के रास्ते के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि रात में उस रास्ते पर चलना ठीक नहीं है क्योंकि एक तो वो रास्ता गांवों से होकर जाता है, बहुत मोड हैं, रात को कोई रास्ता बताने वाला भी नहीं मिलेगा। फिर वो रास्ता भी रन से होकर ही जाता है। कहीं पर अच्छा है, कहीं खराब। तय किया कि 35 किलोमीटर दूर रापर ही जाया जाये।
रात आठ बजे रापर पहुंचा। आसानी से कमरा मिल गया। नौ बजे तक सो गया। अब मेरे पास दो दिन हैं और अभी भी मुझे दिल्ली पहुंचने के लिये एक हजार किलोमीटर से ज्यादा सफर करना है।


यहीं से धोलावीरा का रास्ता अलग होता है।



























उस सडक की स्थिति दर्शाता नक्शा जहां से मैंने उपरोक्त सभी फोटो लिये।




अगला भाग: कच्छ से दिल्ली वापस


कच्छ मोटरसाइकिल यात्रा
1. कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा
2. कच्छ यात्रा- जयपुर से अहमदाबाद
3. कच्छ की ओर- अहमदाबाद से भुज
4. भुज शहर के दर्शनीय स्थल
5. सफेद रन
6. काला डोंगर
7. इण्डिया ब्रिज, कच्छ
8. फॉसिल पार्क, कच्छ
9. थान मठ, कच्छ
10. लखपत में सूर्यास्त और गुरुद्वारा
11. लखपत-2
12. कोटेश्वर महादेव और नारायण सरोवर
13. पिंगलेश्वर महादेव और समुद्र तट
14. माण्डवी बीच पर सूर्यास्त
15. धोलावीरा- सिन्धु घाटी सभ्यता का एक नगर
16. धोलावीरा-2
17. कच्छ से दिल्ली वापस
18. कच्छ यात्रा का कुल खर्च




Comments

  1. kamaal ke photo kya sunset hai bhai

    ReplyDelete
  2. सनसेट का एक और शानदार नज़ारा।

    सनसेट का एक और शानदार नज़ारा।
    कहीं भी घूमने जाना हो तो आपकी पोस्ट का प्रिंट निकाल लेना चाहिए फिर न किसी गाइड की ज़रुरत और न रास्ता भटकने का दर।
    नीरज जी, प्रिंट निकलने की तो इजाज़त है।

    ReplyDelete
  3. सुन्दर चित्रावली,उत्तम यात्रा वृत्तांत

    ReplyDelete
  4. ab himalya ki tyari bhi karo ustad

    ReplyDelete
  5. कमाल के चित्र हैं नीरज भाई. बढ़िया पोस्ट ! :)

    ReplyDelete
  6. रन में सूर्यास्त...
    इरादे हो सकते ध्वस्त ....
    यह नजारा है मस्त..मस्त..

    ReplyDelete
  7. चित्र व चित्रण दोनों ही अनुपम .

    ReplyDelete
  8. धौलावीरा का पुरातात्विक महत्व बहुत अधिक है। बढिया यात्रा।

    ReplyDelete
  9. शाबाश मेरे शेर , मंगलकामनाएं !

    ReplyDelete
  10. सूर्यास्त और छोटे सी पक्छी का फोटो शानदार है ।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

चूडधार की जानकारी व नक्शा

चूडधार की यात्रा कथा तो पढ ही ली होगी। ट्रेकिंग पर जाते हुए मैं जीपीएस से कुछ डाटा अपने पास नोट करता हुआ चलता हूं। यह अक्षांस, देशान्तर व ऊंचाई होती है ताकि बाद में इससे दूरी-ऊंचाई नक्शा बनाया जा सके। आज ज्यादा कुछ नहीं है, बस यही डाटा है। अक्षांस व देशान्तर पृथ्वी पर हमारी सटीक स्थिति बताते हैं। मैं हर दस-दस पन्द्रह-पन्द्रह मिनट बाद अपनी स्थिति नोट कर लेता था। अपने पास जीपीएस युक्त साधारण सा मोबाइल है जिसमें मैं अपना यात्रा-पथ रिकार्ड नहीं कर सकता। हर बार रुककर एक कागज पर यह सब नोट करना होता था। इससे पता नहीं चलता कि दो बिन्दुओं के बीच में कितनी दूरी तय की। बाद में गूगल मैप पर देखा तो उसने भी बताने से मना कर दिया। कहने लगा कि जहां सडक बनी है, केवल वहीं की दूरी बताऊंगा। अब गूगल मैप को कैसे समझाऊं कि सडक तो चूडधार के आसपास भी नहीं फटकती। हां, गूगल अर्थ बता सकता है लेकिन अपने नन्हे से लैपटॉप में यह कभी इंस्टाल नहीं हो पाया।

पराशर झील ट्रेकिंग- झील से कुल्लू तक

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 7 दिसम्बर, 2011 की दोपहर करीब बारह बजे हम पराशर झील से वापस चल पडे। हमें बताया गया कि यहां से छह किलोमीटर नीचे उतरकर बागी नामक गांव है जहां से मण्डी जाने वाली बस मिल जायेगी और यह भी पता चला कि बस का टाइम ढाई बजे है। उसके बाद साढे चार बजे अगली बस मिलेगी। अभी बारह सवा बारह का टाइम था और हम अगले दो घण्टे में छह किलोमीटर का फासला तय करके बागी पहुंच सकते थे। लेकिन आज की सबसे बडी दिक्कत थी भरत जो चल नहीं पा रहा था।  पराशर झील एक ऐसी जगह पर स्थित है जहां से लौटकर वापस आने के लिये कम से कम चार रास्ते हैं और चारों नीचे ही उतरते हैं। एक तो वही है जिससे हम आये थे यानी पण्डोह की तरफ, दूसरा तुंगा माता से होकर ज्वालापुर की तरफ, तीसरा कच्चा रास्ता बागी-कटौला की तरफ और चौथा यानी पक्की सडक बागी-कटौला की तरफ। सडक से बागी 18 किलोमीटर दूर है जबकि पैदल रास्ते से सीधे नीचे उतरते जाओ तो छह किलोमीटर में ही मामला सुलट जाता है।

चूडधार यात्रा- 2

इस यात्रा-वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 9 मई 2014, शुक्रवार आलू के परांठे खाने की इच्छा थी लेकिन इस समय यहां आलू न होने के कारण यह पूरी न हो सकी। इसलिये सादे परांठों से ही काम चलाना पडा। अभी हवा नहीं चल रही थी और मौसम भी साफ था लेकिन हो सकता है कि कुछ समय बाद हवा भी चलने लगे और मौसम भी बिगडने लगे। निकलने से पहले चेहरे पर थोडी सी क्रीम लगा ली। ट्रैकिंग पोल जो अभी तक बैग में ही था, अब बाहर निकाल लिया। आज मुझे बर्फ में एक लम्बा सफर तय करना है। साढे आठ बजे चल पडा। तीसरी से चूडधार की दूरी छह किलोमीटर है लेकिन खतरनाक रास्ता होने के कारण मैं इसे चार घण्टे में पार कर लेने की सोच रहा था। तीन घण्टे वापस आने में लगेंगे। यानी शाम चार बजे तक यहां लौट आऊंगा। नोहराधार से कल यहां तक आने में पांच घण्टे लगे थे, तीन घण्टे में यहां से नोहराधार जा सकता हूं। इसलिये आज रात को नोहराधार में ही रुकने की कोशिश करूंगा।