Skip to main content

फॉसिल पार्क, कच्छ

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
17 जनवरी 2015
अब हमारा लक्ष्य था लखपत। खावडा से लखपत जाने के लिये भुज जाने की आवश्यकता नहीं है। उससे पहले ही एक ग्रामीण रास्ता सीधा नखत्राणा जाता है। भीरंडीयाला से 27 किलोमीटर भुज की तरफ चलने पर यह रास्ता दाहिने मुडता है। हम इसी पर हो लिये। इस रास्ते पर निरोना, बीबर आदि गांव आते हैं। देवीसर से कुछ पहले एक रास्ता दाहिने जाता है। यह आगे फॉसिल पार्क और थान मोनेस्ट्री चला जाता है। मेरी इच्छा इन दोनों स्थानों को देखने की थी।
आपको फॉसिल पार्क का पता भी नहीं चलेगा अगर आप सावधान न हुए। मैंने पहले ही गूगल मैप का अध्ययन कर रखा था इसलिये मालूम था कि उस मोड के पास यह पार्क है। जैसे ही वह मोड आया, हमारी रफ्तार कम हो गई। झाडियों में इसका एक सूचना-पट्ट लगा था, हमने तुरन्त बाइक उधर ही मोड दी।
एक दरवाजा था, खुला था। कोई नहीं दिखा तो हम इसमें घुस गये। कहीं कोई सूचना नहीं थी कि कौन सी इमारत संग्रहालय है। हम चलते ही रहे और एक जगह सब तरफ से रास्ता बन्द देखकर रुक गये। यहां एक आदमी खडा था। वह हमें देखता रहा और कुछ नहीं बोला। हम बाइक से उतरे, जैकेट उतारकर बाइक पर ही बांध दी, वह पट्ठा हमें देखता रहा। करीब पन्द्रह मिनट बाद हम जब एक इमारत की ओर चले तो उसने पूछा कि हां जी, कौन हो आप लोग? हमने कहा कि फॉसिल पार्क देखना है। बोला कि वह तो पीछे छूट गया। हमने पूछा कि आप कौन? बोला कि मैं यहां का मालिक हूं। और यह जगह एक होटल है। हमने अपनी गलती के लिये क्षमा मांगी और तुरन्त बाइक मोडकर वापस चलने लगे। बाद में पता चला कि वही आदमी फॉसिल पार्क का भी मालिक था। हमें एक बार तो गुस्सा भी आया कि यहीं हमारा करीब आधा घण्टा बर्बाद हो गया और वह बस देखता रहा। लेकिन उसकी शालीनता देखकर हम भी शालीन बने रहे।
यह एक संग्रहालय है। इसमें प्रवेश शुल्क पचास रुपये प्रति व्यक्ति है और आप फोटो भी खींच सकते हो। यह प्राइवेट संग्रहालय है और इसमें कच्छ में अलग-अलग स्थानों पर पाये गये जीवाश्म रखे गये हैं। मोहनसिंह सोढा ने स्वयं दूर-दूर जाकर जीवाश्म एकत्र किये और उन्हें संग्रहीत किया। यहां हजारों जीवाश्म रखे हुए हैं।
आप सोच रहे होंगे कि यह जीवाश्म क्या बला है? करोडों साल पहले के जीवों के अवशेष जो किसी कारण से चट्टानों के बीच रह गये या मिट्टी में दबकर कठोर हो जाते हैं, उन्हें जीवाश्म कहते हैं। यह कोई पत्ता भी हो सकता है और डायनोसोर के कंकाल भी। गौरतलब है कि करोडों साल पहले पृथ्वी ऐसी नहीं थी जैसी आज दिखाई देती है। जहां आज कच्छ है, वहां कभी समुद्र था, इसलिये कच्छ में पाये जाने वाले ज्यादातर जीवाश्म समुद्री जीवों के हैं। हालांकि डायनोसोर के जीवाश्म भी यहां मिले हैं। समय के साथ जीवों के अंग चट्टानों में दब जाते हैं और काफी समय बाद वे चट्टानें टूट जाती हैं तो ये अंग दिखाई पड जाते हैं। अनुभवी आंखें चाहिये और आपको एक जीवाश्म मिल जायेगा।
सोढा साहब ने हजारों जीवाश्म एकत्र किये। एक बडे कमरे में उन्हें विषयानुसार रखकर एक संग्रहालय बना दिया है। हालांकि सोढा साहब अभी भी जीवित हैं लेकिन हमें वे मिले नहीं। जो मिले, उन्हें किसी भी पर्यटक को सन्तुष्ट करने लायक काफी जानकारी है। चूंकि मैं जीवाश्मों में रुचि लेता हूं, इसलिये मेरी कुछ ऐसी जिज्ञासाएं रह गईं जिन्हें वे पूरा नहीं कर सके।
पहली बात तो यह कि किसी भी जीवाश्म की डिटेल मौजूद नहीं है। मसलन वह जीवाश्म कब मिला, कहां से मिला, कैसे मिला आदि? कोई जीवाश्म मिल गया है तो कैसे उनका वर्गीकरण किया, यह भी नहीं पता। कहने लगे कि सोढा साहब को सब पता है, वे देखते ही पहचान जाते हैं कि यह किसका जीवाश्म है और कितना पुराना है। मैंने कहा कि जीवाश्म एक करोड साल पुराना हो या दस करोड साल पुराना, वह देखने में एक सा ही दिखेगा। वह पत्थर जैसा कठोर हो चुका होगा, इसलिये वह किसी डायनोसोर की हड्डी का टुकडा है या किसी और जानवर की हड्डी का टुकडा; यह भी आंखों से देखने पर कभी पता नहीं चलेगा। ऐसी चीजों की उम्र पता लगाने के लिये कार्बन डेटिंग मशीन आती है, वह भी उनके पास नहीं है। कहने लगे कि यह हमारा प्राइवेट संग्रहालय है, धन के अभाव में उसे नहीं खरीदा जा सका।
कुछ रंग बिरंगे गोल-गोल पत्थर रखे थे। हालांकि ये जीवाश्म नहीं थे, बस मनोरंजन के लिये रखे हुए थे। ऐसे पत्थर बहते पानी में बनते हैं। कच्छ में आज के समय में बहता पानी नहीं है। मैंने पूछा कि ये जो पत्थर हैं, ये आपको जहां से मिले, वहां सूखी जमीन थी या समुद्र था या कोई नदी तट। वही जवाब मिला कि पता नहीं। मैंने बताया कि ऐसे पत्थर हिमालय की हर नदी में भरपूर मिलते हैं। इनका गोल आकार और चिकनाहट बहते पानी से ही बनती हैं। अगर आपको पता होता तो कच्छ के भौगोलिक इतिहास की थोडी जानकारी मिल जाती कि कहां कब बहता पानी हुआ करता था।
कच्छ बडी ही अस्थिर जगह पर स्थित है। इसके नीचे टैक्टोनिक प्लेटें अभी भी गतिमान हैं और इसीलिये यहां भूकम्प आते हैं। यहां की जितनी भी पहाडियां हैं, सभी ज्वालामुखीय अवशेष हैं, हालांकि अब कोई भी सक्रिय ज्वालामुखी नहीं है। जहां भी ऐसी पहाडियां होती हैं, वहां की चट्टानें बडी कठोर होती हैं और जीवाश्म भी ज्यादा मिलते हैं। यह स्थान जहां संग्रहालय है, भी ऐसी ही पहाडियों से घिरा है। बहुत सारे जीवाश्म इन्हें अपने आसपास ही मिल गये होंगे।
सोढा साहब ने बडी मेहनत की है, बडे पागलपन का काम है यह और मैं उनके इस पागलपन को सलाम करता हूं। उनका एक-एक जीवाश्म लाखों का है। कई देशी-विदेशी संस्थानों ने उनसे कुछ जीवाश्म खरीदने की पेशकश की लेकिन सोढा साहब ने इन्हें नहीं बेचा। हालांकि रुडकी आईआईटी ने इनके कुछ जीवाश्मों का अध्ययन किया है। अगर कोई विदेशी या देशी संस्थान इनमें से कुछ को खरीद लेता है तो इसके बडे फायदे होंगे। पहला तो यही कि सोढा साहब को अच्छे पैसे मिलेंगे और दूसरी बात कि जीवाश्म को वो स्थान मिलेगा, जहां उन्हें होना चाहिये। आज इनके बहुत से जीवाश्म बोरियों में बन्द हैं और स्थानाभाव के कारण ऐसे ही पडे हुए हैं। तब इनका और उच्चतर तरीके से अध्ययन होगा और कच्छ के बारे में बहुत सी जानकारियां सामने आयेंगीं। यह सुझाव मैंने इन्हें दिया। पता नहीं मानेंगे या नहीं।






एक पत्ते का जीवाश्म


लकडी का जीवाश्म


कछुए का जीवाश्म









डायनोसोर के जीवाश्म


यही कमरा संग्रहालय है।






अगला भाग: थान मठ, कच्छ


कच्छ मोटरसाइकिल यात्रा
1. कच्छ नहीं देखा तो कुछ नहीं देखा
2. कच्छ यात्रा- जयपुर से अहमदाबाद
3. कच्छ की ओर- अहमदाबाद से भुज
4. भुज शहर के दर्शनीय स्थल
5. सफेद रन
6. काला डोंगर
7. इण्डिया ब्रिज, कच्छ
8. फॉसिल पार्क, कच्छ
9. थान मठ, कच्छ
10. लखपत में सूर्यास्त और गुरुद्वारा
11. लखपत-2
12. कोटेश्वर महादेव और नारायण सरोवर
13. पिंगलेश्वर महादेव और समुद्र तट
14. माण्डवी बीच पर सूर्यास्त
15. धोलावीरा- सिन्धु घाटी सभ्यता का एक नगर
16. धोलावीरा-2
17. कच्छ से दिल्ली वापस
18. कच्छ यात्रा का कुल खर्च




Comments

  1. कौतूहल से भरा अद्भुत , अद्वितीय । वाह नीरज , मज़ा आ गया ।

    ReplyDelete
  2. नीरज का आज नए रुप देखने मिला मुझे नहीँ मालूम था इतिहास मेँ इतनी दिलचस्पी हे अब नीरज एक लेखक यात्री से बढ़कर हो गया

    ReplyDelete
  3. आपकी पोस्ट के माध्यम से हमें भी काफी ज्ञान (G. K.) मिल जाता है।
    आपकी पोस्ट खाली घुमक्क्ड़ी ही नहीं हमेशा ज्ञानवर्धक भी होती है।
    आपको बहुत-बहुत बधाई।

    ReplyDelete
  4. बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी नीरज भाई....
    रीतेश गुप्ता....

    ReplyDelete
  5. प्रवाळाश्म का फोटो वाकई लाजबाब है ....... ध न्य वाद नीरज, तुम्हारे जीवाश्म के फोटो मेरे लिए बडे काम है ...
    मेरे विद्यार्थ्रीयों दिखाने के लिए ... लेकीन अनुमती है ना .. क्यों की तुम्हारे ये नीजी फोटो है ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी भवारी साहब, अनुमति है। लेकिन मुझे भी बताना कि आपने विद्यार्थियों को क्या बताया, मेरे फोटो आपके किस तरह काम आये? और प्रवालाश्म का फोटो कौन सा है?

      Delete
  6. प्रवाळाश्म का फोटो,.... अगर अन्य फोटो जैसा सिधा ना होता ... तो बात बिगड जाती ... लाजबाब फोटोग्राफी !.. गजब की फोटोसेन्स !!.......

    ReplyDelete
  7. नीरज भाई
    हमेशा की तरह शानदार और जानकारी परख लेख और सुन्दर फ़ोटो।
    जीवाश्म पर आपका ब्लॉग पढ़ के 1 बिना माँगी छोटी सी जानकारी दे रहा हूँ कि mp के डिंडोरी जिले में घुघुआ नाम के fossil national park स्थान में कई करोड़ साल पुराने डायनासोर के अंडे, पेड़ और अनेक जीवाश्म है। मैंने कही पढ़ा है कि यह एशिया का सबसे बड़ा fossil national park है।
    अगर आप कभी वहा से निकलिए तो जरूर जाए।
    आप जरूर पसंद करोगे।
    धन्यवाद

    ReplyDelete
    Replies
    1. हां गुप्ता जी, मैंने भी इसके बारे में सुना है। इसके अलावा इसी तरह का एक पार्क हरियाणा में पंचकुला के पास शिवालिक की पहाडियों में भी कहीं है।

      Delete
  8. प्रवाळ वो जीव है, जो सागर में शंख, शिंपला में होता है... आप के एक फोटो में बहुत पुराने प्रवाळाश्म का फोटो दिख रहा है ... निश्चित ही वो फोटो गुजरात के अरबी सागर के तट में मिला प्रवाळाश्म है ... आज ह्म गोवा, दमन - दिव में प्रवाळाश्म अच्छी तरह से देख सकते है. .... लेकीन प्राचीन पुराणाश्म प्रवाळ तो गुजरात में ही देख ने को मिलेगे ना !.. जहाँ रण वहॉ कभी कभी ना हरीयाली हो ती है... सागर हो सकता है ...
    ****************************************************************************************************
    में 'इतिहास' का अध्यापक हु... प्राचीन काल बताने के लिए नीरज तुम्हारे प्रवाळाश्म के फोटो का प्रयोग करुगा,
    वैसे तो पुणे में ' डे़क्कन कॉलेज ' नाम का फॉसील का का संग्रहालय है...

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर जी...

      Delete
  9. एक छिपे हुए संग्रहालय को हम सभी के जानकारी मे लाये यह भी एक बहुत बड़ी तपस्या है।

    ReplyDelete
  10. बहुत जानकारी वाली पोस्ट

    ReplyDelete
  11. बहुत ही अच्छी जानकारी है आपको नीरज भाई यात्रा के साथ साथ आपकी जीवाश्म की

    ReplyDelete
  12. बहुत ज्ञानवर्धक पोस्ट..........

    ReplyDelete
  13. पिछले कुछ दिनों से मेरा ब्‍लाग्‍ा खुलते ही बंद हो जाता है और चिट्ठाजगत का पेज खुल कर मैसेज आता है कि यह डोमेन नेम एक्‍सपायर हो चुका है , उसे रिन्‍यू करने के लिए क्लिक करने पर ईमेल और पासवर्ड पूछा जाता है जो कि मैं सही दे रही हूं किंतु फिर यह मैसेज आता है कि यह ईमेल रजिस्‍टर्ड नहीं है। इस प्रकार इस समस्‍या के चलते मैं अपने ब्‍लाग तक नही पहुंच पा रही हूं । जिस पेज पर मेरा ब्‍लाग रिडायरेक्‍ट किया जा रहा है वहां कोई हेल्‍प का आप्‍शन भी नहीं है । क्‍या कोई मेरी मदद कर सकता है।

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

कोटेश्वर और नारायण सरोवर

इस यात्रा वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 18 जनवरी 2015 लखपत से नारायण सरोवर की दूरी करीब 35 किलोमीटर है। किले से निकलते ही एक सडक तो बायें हाथ भुज चली जाती है और एक दाहिने वाली जाती है नारायण सरोवर। नारायण सरोवर से दो किलोमीटर आगे कोटेश्वर है। जैसा कि कई अन्य स्थानों पर भी कथा प्रचलित है कि रावण ने तपस्या करी, शिवजी प्रसन्न हुए और शिवलिंग के रूप में रावण के साथ लंका जाने लगे। लेकिन शर्त लगा दी कि अगर शिवलिंग को जमीन पर रख दिया तो फिर उठाये नहीं उठूंगा। ऐसा ही कोटेश्वर में हुआ। रावण को लघुशंका लगी और शिवजी यहीं पर विराजमान हो गये। अब वर्तमान में मानचित्र देखें तो सन्देह होता है कि रावण शिवजी को कैलाश से ला रहा था या पुरुषपुर से। कैलाश-लंका के बीच में कोटेश्वर दूर-दूर तक भी नहीं आता।

ओशो चर्चा

हमारे यहां एक त्यागी जी हैं। वैसे तो बडे बुद्धिमान, ज्ञानी हैं; उम्र भी काफी है लेकिन सब दिखावटी। एक दिन ओशो की चर्चा चल पडी। बाकी कोई बोले इससे पहले ही त्यागी जी बोल पडे- ओशो जैसा मादर... आदमी नहीं हुआ कभी। एक नम्बर का अय्याश आदमी। उसके लिये रोज दुनियाभर से कुंवाई लडकियां मंगाई जाती थीं। मैंने पूछा- त्यागी जी, आपने कहां पढा ये सब? कभी पढा है ओशो साहित्य या सुने हैं कभी उसके प्रवचन? तुरन्त एक गाली निकली मुंह से- मैं क्यों पढूंगा ऐसे आदमी को? तो फिर आपको कैसे पता कि वो अय्याश था? या बस अपने जैसों से ही सुनी-सुनाई बातें नमक-मिर्च लगाकर बता रहे हो? चर्चा आगे बढे, इससे पहले बता दूं कि मैं ओशो का अनुयायी नहीं हूं। न मैं उसकी पूजा करता हूं और न ही किसी ओशो आश्रम में जाता हूं। जाने की इच्छा भी नहीं है। लेकिन जब उसे पढता हूं तो लगता है कि उसने जो भी प्रवचन दिये, सब खास मेरे ही लिये दिये हैं।

जोशीमठ यात्रा- कर्णप्रयाग और नंदप्रयाग

इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें । 3 अप्रैल 2012 की सुबह मैं और विधान रुद्रप्रयाग में थे। यहां से बस पकडी और घण्टे भर में कर्णप्रयाग जा पहुंचे। आज रुद्रप्रयाग से आगे अलकनन्दा घाटी में मैं पहली बार आया था। नहीं तो मंदाकिनी घाटी में दो बार जा चुका था- एक बार मदमहेश्वर और दूसरी बार केदारनाथ और तुंगनाथ । रुद्रप्रयाग से कर्णप्रयाग जाते समय रास्ते में गौचर पडता है जहां हवाई पट्टी भी है। मेरे ध्यान कुछ कुछ ऐसा है कि कुछ दिन पहले सोनिया गांधी ने गौचर में ही ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन की नींव रखी है। कर्णप्रयाग में अलकनन्दा में पिण्डर नदी आकर मिल जाती है। पिण्डर नदी पिण्डारी ग्लेशियर से निकलती है। मैं पिछले साल अक्टूबर में पिण्डारी ग्लेशियर गया था। तो इस प्रकार पिण्डर नदी पहली ऐसी नदी बन गई जिसका आदि और अन्त मैंने देखा है। आदि और अन्त यानी उद्गम और समागम। यह पिण्डारी ग्लेशियर से यहां कर्णप्रयाग तक आने में सौ किलोमीटर से भी ज्यादा का सफर तय करती है।