Tuesday, July 28, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा- 9 (खालसी-हनुपट्टा-शिरशिरला)

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
13 जून 2015
नौ बजकर पचास मिनट हो गये थे जब हम खालसी से निकले। इससे पहले आठ बजे के आसपास हम उठ भी गये थे। कल 200 किलोमीटर बाइक चलाई थी, बहुत थकान हो गई थी। पहाडों में संकरे रास्तों पर 200 किलोमीटर भी बहुत ज्यादा हो जाते हैं। आज हमारे सामने दो विकल्प थे- एक, आज ही लेह जायें और चुशुल, हनले का परमिट लेकर खारदुंग-ला पार कर लें। दूसरा, आज फोतोकसर गोम्पा जायें और रात तक लेह पहुंच जायें। कल रविवार है, परमिट नहीं मिलेगा। इसलिये कल खारदुंग-ला पार जाकर नुब्रा घाटी देख लें और मंगलवार को वापसी में चुशुल, हनले का परमिट ले लें। पहले विकल्प में हमें फोतोकसर देखने को नहीं मिल रहा है लेकिन दूसरे में फोतोकसर भी मिल रहा है और बाकी सबकुछ भी। इसलिये दूसरा विकल्प चुना।
आलू के परांठे खाते समय होटल वाले ने पक्का कर दिया कि फोतोकसर तक बाइक चली जायेगी।
तो हम नौ बजकर पचास मिनट पर चल पडे। पहले बारह किलोमीटर तक लामायूरू की तरफ चलना होता है फिर लंगरू में पुल पार करके दूसरी घाटी में चल देना होता है। यहां एक बोर्ड भी लगा है- वनला-फोतोकसर-नेरक रोड। लेकिन अभी यह सडक नेरक तक नहीं पहुंची है। जांस्कर में इस समय सडक मार्ग केवल एक ही है- कारगिल-पदुम रोड। लेकिन इसके चारों तरफ से सडक बनाने का काम चल रहा है। एक सडक निम्मू से जांस्कर नदी के साथ साथ बन रही है और चिलिंग से आगे तक पहुंच गई है। दूसरी सडक यह है जो फोतोकसर गोम्पा से आगे तक बन गई है। ये दोनों सडकें नेरक में या लिंगशेड में एक दूसरे में मिलेंगी और फिर आगे पदुम जायेंगी। उधर पदुम से भी इधर की तरफ सडक बनाने का काम चल रहा है, बीच में थोडा सा हिस्सा बचा हुआ है। तीसरी सडक हिमाचल में दारचा से बनती हुई आ रही है और शिंगो-ला तक बन गई है। ये सडकें बन जायेंगी तो पदुम की कारगिल पर निर्भरता समाप्त हो जायेगी।
यहीं मोड के पास ही एक गोम्पा भी है जो वीराने में अच्छा लगता है।
यहां से छह किलोमीटर आगे वनला गांव है और चौदह किलोमीटर आगे फंजीला। ‘ला’ लगा होने के कारण ये दर्रे का आभास कराते हैं लेकिन ये दर्रे नहीं हैं। ये नदी किनारे बसे हुए दो अलग अलग गांव हैं। दस-ग्यारह किलोमीटर तक शानदार सडक है, फिर खराब हो जाती है। अच्छी बनाने का काम चल रहा है। लद्दाख की अन्य सडकों की तरह इसे भी सीमा सडक संगठन यानी बीआरओ बना रहा है लेकिन बीआरओ के काम करने की रफ्तार घोंघे से भी कम होती है। यह एक ऐसा संगठन है जो कई-कई सालों तक एक ही जगह मिट्टी कूट सकता है। यह हालत तो तब है जब इसके पास अकूत पैसा और अकूत ताकत है। इनकी इसी रफ्तार से तंग आकर हिमाचल की तरफ एक लामाजी ने अपने खर्चे से शिंगो-ला तक सडक बनवानी शुरू कर दी है। जैसे संसाधन बीआरओ के पास हैं, उनसे लद्दाख में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सडकें चुटकी बजाते ही बन सकती हैं।
वनला से लामायूरू पैदल भी ज्यादा दूर नहीं हैं, कुछ ही घण्टों का रास्ता है। इंटरनेट पर लामायूरू से वनला और आगे जांस्कर तक की ट्रैकिंग के वृत्तान्त भरे पडे हैं। लेकिन इधर बाइक वृत्तान्त मुझे कोई नहीं मिला। आशा है कि आप पहली बार इस सडक पर कोई बाइक वृत्तान्त पढ रहे हो।
फंजीला से आगे एक पुल है और भू-दृश्य अचानक बदल जाता है। अभी तक कुछ खुली सी घाटी थी, अब अचानक बेहद संकरी घाटी आ जाती है। यहां बीआरओ वाले काम कर रहे थे और पतली सी सडक पर पत्थर पडे थे। संकरा पथरीला रास्ता था और जरा सा बायें बिल्कुल नीचे नदी बह रही थी। यहां मेरा मन लौट जाने को करने लगा था। आगे कैसा रास्ता होगा, मुझे नहीं पता था। लेकिन इतना निश्चित था कि जैसा रास्ता अब यहां है, उससे अच्छा तो कतई नहीं होगा। अगर बीआरओ वाले न होते तो शायद मैं वापस मुड जाता लेकिन मन में कहीं था कि अगर इनके सामने वापस मुडूंगा तो बेइज्जती हो जायेगी। इसलिये पहले गियर में बाइक के पूरे कान ऐंठते हुए बढता रहा।
अगर बीआरओ वालों में से कोई भी हमें रुकने को कह देता और वापस जाने को कहता तो शायद मैं उनकी बात मान लेता। सही बताऊं तो मैं इस इंतजार में था कि कोई तो बाइक रुकवाये। कोई तो पूछे कि भाई, दिल्ली से आये हो। कोई तो... और तब मैं वापस मुड जाऊंगा। लेकिन सब अपना काम-धाम छोडकर देखते रहे और किसी ने रुकने को नहीं कहा। एक जगह हमने खुद ही बाइक रोक दी कि भाई, कोई तो आकर कुछ बात करो... और हम वापस चले जायेंगे। लेकिन सब के सब ऐसे ही खडे रहे। ज्यादातर निशा को देखते रहे, कुछ बाइक को देखते रहे लेकिन किसी ने कहा कुछ नहीं। हमें आगे बढ जाना पडा।
यह दो किलोमीटर का रास्ता बेहद खतरनाक था। एक गाडी निकलने लायक ही रास्ता था। पूरे रास्ते में छोटे छोटे नुकीले और कहीं गोल-गोल पत्थर पडे थे, चढाई भी थी। जरा सी गलती और सीधे नीचे नदी में जा गिरते। मुझे यहां डर लग रहा था। इससे ज्यादा डर इस बात का था कि इसी रास्ते वापस भी लौटना पडेगा। निशा ने कहा कि हम इस रास्ते नहीं लौटेंगे, किसी दूसरे रास्ते से लौटेंगे लेकिन बेचारी को नहीं पता था कि इधर जाने का भी यही एक रास्ता है और लौटने का भी यही एक।
इसके बावजूद भी निशा ने एक बार भी नहीं कहा कि वापस चल।
इन्हीं सीधे खडे पहाडों में एक जगह एक संगम था। दो नदियां आकर मिल रही थीं। एक नदी के किनारे एक पगडण्डी थी और पगडण्डी भी कभी डायनामाइट फोडकर बनाई गई होगी। सुरंगनुमा पगडण्डी। दूसरी नदी के किनारे यह सडक है। वो पगडण्डी पहली नदी के साथ साथ कहीं चली गई है और सडक दूसरी नदी के साथ साथ गई है। असल में वो पगडण्डी लामायूरू-जांस्कर पैदल मार्ग है। उस मार्ग पर फोतोकसर भी पडता है। यानी फोतोकसर उस पगडण्डी वाली नदी के किनारे है, जबकि सडक जा रही है दूसरी नदी के साथ साथ। चूंकि सडक को भी फोतोकसर ही जाना है इसलिये आगे कहीं इस नदी घाटी से उस नदी घाटी में जाने के लिये एक दर्रा पार करना पडेगा। वो दर्रा है शिरशिर-ला।
फिर क्यों सडक उस पहली नदी के साथ साथ नहीं बनाई गई? इससे सीधे फोतोकसर जा पहुंचते, शिरशिर-ला चढने की जरुरत न रह जाती। कुछ ही दूर चले थे, इसका जवाब मिलना शुरू हो गया। घाटी चौडी होने लगी। चौडी घाटी में सडक बनाना आसान भी है और सुरक्षित भी। हो सकता है कि पहली नदी फोतोकसर तक संकरी ही हो। तब खूब डायनामाइट फोडने पडते, तब भी सुरक्षित सडक नहीं बनती। अब एक जेसीबी मशीन ही पत्थरों को हटाकर सडक की शक्ल दे सकती है।
हनुपट्टा पहुंचे। यह इस घाटी का आखिरी गांव है। छोटा सा गांव है। यहां एक बैरियर लगा था लेकिन मैं जानता था कि इसकी कोई अहमियत नहीं है। कोई आकर बैरियर हटाये, इसका इंतजार करने से पहले ही निशा से बैरियर हटाने को कह दिया। निशा ने बैरियर हटाया, बाइक पार हुई और फिर बैरियर ऐसा ही लगा दिया। यहां तक घाटी इतनी चौडी हो गई थी कि हमें लगने लगा था कि दर्रा कहीं पास ही है। एक से पूछा तो बताया कि बीस किलोमीटर आगे है। हम पिछले दो घण्टे में बीस किलोमीटर आये थे, इसलिये जवाब सुनकर कोई खुशी नहीं मिली। यानी दो घण्टे अभी भी केवल शिरशिर-ला पहुंचने में ही लगेंगे। उसके बाद पता नहीं फोतोकसर कितना आगे है। मैं इस सडक का कोई भी डाटा पहले से अपने साथ नहीं लाया था। बारह बज चुके थे।
हनुपट्टा समुद्र तल से लगभग 3750 मीटर ऊपर है जबकि शिरशिरला 4800 मीटर ऊपर है। दोनों के बीच की दूरी है 19 किलोमीटर। यानी प्रति किलोमीटर 55 मीटर की चढाई। कोई भी जानकार अगर इस तथ्य को देखे तो समझ जायेगा कि यह ढाल बहुत ज्यादा है। ऊपर से फिर खराब सडक। बाइक पहले ही गियर में फुल थ्रोटल पर चलती रही। इस वजह से हर दो-दो ढाई-ढाई किलोमीटर पर रुकना भी अनिवार्य था अन्यथा इंजन ओवरहीट हो सकता था।
जितना आगे बढते गये, उतनी ही खुली घाटी सामने आती गई। और जब एक जगह सामने तीन-चार हेयरपिन बैण्ड दिखे तो पक्का हो गया कि दर्रा अब ज्यादा दूर नहीं है। एक याक वाला अपने याक चरा रहा था। निशा ने गिने तो वे पचास से भी ज्यादा मिले। फिर बर्फ भी मिलने लगी लेकिन बर्फ ज्यादा नहीं थी, इसलिये इसकी वजह से ज्यादा परेशानी नहीं हुई।
लेकिन जिस स्थान को हम दर्रा समझ रहे थे, जब वहां पहुंचे तो सामने कुछ हेयरपिन बैण्ड और दिखे। यानी अभी और चढना पडेगा। दर्रों पर अक्सर यह धोखा हो जाता है। अब मैंने निशा को समझाया कि अगर ऊपर झण्डियां दिखे तो समझना कि दर्रा वही है अन्यथा उसके बाद फिर से चढाई मिलेगी। आखिरकार जब हम दर्रे से आधा किलोमीटर पहले थे, अचानक निशा को झण्डियां दिखीं। बडी राहत मिली। ठीक सवा दो बजे हम शिरशिर-ला पर पहुंच गये। तेज हवाएं चल रही थीं, जैसी कि दर्रों पर चलती ही हैं। बाइक यहीं खडी की और सडक पर ही पसर गये। धूप निकली थी, कभी बादल भी आ जाते लेकिन इतनी ऊंचाई पर हवा की कमी के कारण लेटे रहने में बडा आनन्द आता है।
दर्रे के दूसरी तरफ उतराई थी। फोतोकसर तो नहीं दिख रहा था लेकिन फोतोकसर से आगे सुदूर दूसरे दर्रे पर जाती सडक अवश्य दिख रही थी। यह सडक उस दूसरे दर्रे को भी पार करती है उधर नीचे उतरकर लिंगशेड के पास तक गई हुई है। यह जानकारी मुझे गूगल मैप के सैटेलाइट व्यू से मिली है। उस सामने वाले दर्रे पर काफी बर्फ थी। शायद सडक भी बर्फ में दबी हो। मेरी इच्छा उस दर्रे तक भी जाने की थी। लेकिन शायद नहीं जा पायेंगे।
अभी यहां केवल पहाड तोडकर सडक की शक्ल दी गई है। इसे इस लायक बना दिया गया है कि ज्यादा ग्राउण्ड क्लियरेंस वाली गाडियां इस पर चल सकें। इधर कोई बस नहीं चलती। ग्रामीणों को सैंकडों-हजारों सालों से पैदल ही आना-जाना पड रहा है, अभी भी पैदल ही आना-जाना पडता है। हां, इस बात की सुविधा हो गई है कि जहां जहां सडक पहुंचती जा रही है, वहां वहां राशन समेत जरुरत की सभी चीजें अब आसानी से पहुंचने लगी हैं। खच्चरों पर निर्भरता कम होने लगी है।
सडक भले ही खराब हो, लेकिन लद्दाख का यह इलाका बेहद खूबसूरत है। मुझे तो खूबसूरती की तारीफ भी करनी नहीं आती, अन्यथा बहुत कुछ लिखने का मन था। हम यहां दर्रे पर डेढ घण्टे बैठे रहे। इस दौरान एक जीप भी फोतोकसर की तरफ से लामायूरू की तरफ जाती मिली, बाकी कोई नहीं मिला। नीचे, बहुत नीचे चरवाहे अपने याकों को चरा रहे थे। याकों और चट्टानों में कोई फर्क नहीं दिख रहा था। दक्षिण की तरफ की पहाडियों पर खूब बर्फ थी। अगर उस बर्फ को पार कर लिया जाये तो पता है कहां पहुंचेंगे?
जब हम पिछले साल शिंगो-ला गये थे तो एक रात कारगिल और पदुम के बीच में रांगडुम में ही रुके थे।


खालसी-लामायूरू के बीच में लंगरू मोड के पास एक गोम्पा

लंगरू मोड के पास श्रीनगर-लेह रोड

यही है लंगरू मोड। यहां से सीधे लामायूरू और बायें फोतोकसर सडक जाती है। हमें बायें मुडना है।

यह सडक फंजीला के पास तक बहुत अच्छी बनी है।

फिर ऐसी हो जाती है।


प्रार्थना लिखे पत्थर।

वैसे हैं तो ये बिल्कुल सूखे, बंजर, धूलयुक्त पहाड लेकिन हम जैसों को इनमें खूबसूरती भी दिखती है।


यह लगभग दो किलोमीटर का सेक्शन ऐसा था कि मुझे बहुत डर लगा। इससे भी ज्यादा डर इस बात से लग रहा था कि वापस भी इधर से ही आना है।


नदी किनारे पगडण्डी


हनुपट्टा में बैरियर


जगह जगह रुकने से बाइक को भी आराम मिलता था और वाइफ को भी। वैसे बाइक के नम्बर में बीवी (BV) भी है। बाइक भी बीवी और पीछे बैठने वाली भी बीवी- दो दो बीवियां। :D





सामने शिरशिरला पर चढती जिगजैग सडक दिख रही है।


शिरशिरला पर चढती सडक


पीछे मुडकर देखने पर



यही है शिरशिरला दर्रा।

दर्रों पर झण्डियां होना अनिवार्य है।

शिरशिरला पर



शिरशिरला से फोतोकसर की तरफ का भूदृश्य। बिल्कुल सामने एक दर्रा है जहां खूब बर्फ है। नीचे के फोटो में इसे जूम करके दिखाया है।

उस दर्रे का नाम तो नहीं मालूम मुझे लेकिन वहां जाती सडक स्पष्ट दिख रही है। वो दर्रा फोतोकसर से भी आगे है।

शिरशिरला कुछ दूर से




अगले भाग में जारी...

(प्रार्थना: कृपया ‘बहुत ही ज्ञानवर्द्धक’, ‘रोमांचक’ जैसी औपचारिक टिप्पणी न करें। आपकी कोई जिज्ञासा हो, कुछ और जानकारी बांटना चाहते हो या अपना कोई अनुभव हो, उसे ही टिप्पणी के रूप में लिखिये। धन्यवाद।)



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22. लद्दाख बाइक यात्रा का कुल खर्च

21 comments:

  1. नीरज जी, आप अविश्वसनीय रूप से कईयों के लिए अज्ञात या कम ज्ञात लदाख़ पर प्रकाश डाल रहे हैं| रात को कहाँ रूके थे? आपके आगे के मार्ग के बारे में‌ बहुत उत्सुकता है| निशाजी को भी प्रणाम| बाईक में पीछे बैठते हुए इतनी यात्रा करना और 'नीरज जाट' के साथ यात्रा करना कठिनतम है! :) :)

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    1. धन्यवाद निरंजन जी, रात में कहां रुके थे, यह बात अगली पोस्ट में पता चलेगी।

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  2. I have seen red-billed blue magpie but today via your post I have seen black billed magpie if I am correct.
    The roads at some points looks dangerous as you also wrote - you were afraid for 2 km. I agree.

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    1. मुझे पता ही नहीं था कि आप यह ‘रेड-बिल्ड ब्लू मैगपाई’ और ‘ब्लैक बिल्ड मैगपाई’ क्या कह रहे हैं? गूगल में देखा, तब पता चला कि उस पक्षी की बात हो रही है। धन्यवाद आपका इस बारे में ज्ञानवर्द्धक करने के लिये।

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  3. adhbhut nazara aapk chitro me dekhne ko milaaa.kash abhi uthe aur yahi chale jaye

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  4. जी उस दूसरे दर्रे का नाम sengge la है ....

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    1. धन्यवाद अजिताभ जी... मैंने किसी नक्शे में सेंगे-ला पढा है और किसी में कुछ और। इस वजह से कन्फ्यूजन था।

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  5. नीरज जी,
    इन दुर्गम, निर्जन और संकरे पहाडी रास्तों पर डर लगना तो स्वाभाविक है, लेकिन आप दोनों " डर के आगे जीत है" वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हो.
    1. आपके पहले की यात्राओं में भी पढा था कि दर्रों पर झण्डियां अवश्य होती है. क्या बौद्धों के लिए इनका कोइ धार्मिक महत्व होता है या यूं ही चोटी पर निशानी के लिए लगाइ जाती है ?
    2. छोटे- छोटे सुदूर पहाडी गांवों बिजली कहां से आती है , शायद सौर उर्जा ?

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    1. 1. दर्रों पर हमेशा तूफानी हवाएं चलती हैं और मौसम भी घाटियों के मुकाबले ठण्डा होता है, बर्फ भी मिल जाती है। इसलिये स्थानीय लोगों के लिये इन्हें पार करना हमेशा ही चुनौती भरा रहा है। तो जब वे दर्रे पर चढ जाते हैं तो धन्यवाद स्वरूप वहां पवित्र झण्डियां लगा देते हैं। इन झण्डियों पर बौद्ध मन्त्र- ॐ मणि पद्मे हुं लिखा होता है या अन्य प्रार्थनाएं लिखी होती हैं। इसके अलावा कोई धार्मिक महत्व नहीं होता।
      2. ज्यादातर तो सोलर पैनल होते हैं। लेकिन लद्दाख के ज्यादातर गांवों में सरकारी बिजली है जो कहीं जल-विद्युत से बनाकर तारों द्वारा भेजी जाती है।

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    2. बौद्ध लोग मानते हैं कि तेज हवाएं इन प्रार्थनाओं को लेजाकर इनकार विस्‍तार करती हैं अत: तेज हवाओं के स्‍थानों पर, गांपाओं पर ये झंडिया दिखती हैं।

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  6. Neeraj ji your blog is awosome. Next month i am going to leh and ladakh region n making itinanary. I disagree with your comments on BRO. BRO is goverment agency and they have to follow certain rules. Further they have budget constraint and they work in harse condition where nobody is like to work.

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    1. धन्यवाद रवि जी। आपकी बात से सहमत हूं कि उन्हें कठिनतम परिस्थितियों में काम करना होता है। लेकिन अगर आपने श्रीनगर-लेह सडक पर यात्रा की है और उसके शानदार होने के कारण बीआरओ को शाबाशी देते हैं, तो जांस्कर की अत्यधिक खराब सडकों के कारण उनकी आलोचना करना भी बनता है। आप एक बार जांस्कर जाइये। वैसे तो वहां चारों ओर से सडक निर्माण का काम चल रहा है लेकिन फिर भी जांस्कर त्राहि-त्राहि कर रहा है। बीआरओ के काम की गति अगर जाननी है तो जांस्कर जाकर स्थानीयों से बात कीजिये। हालात ये हैं कि दारचा की तरफ से एक लामाजी अपने खर्चे से जेसीबी मशीन खरीदकर पहाड तुडवा रहे हैं ताकि सडक बन सके। मैं बीआरओ के इंजीनियरों से भी मिलता रहता हूं। वे खूब कहते हैं कि पैसे की कोई कमी नहीं है।
      मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं लिखा। जो कुछ देखा, जो कुछ सुना, वही लिख दिया।

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  7. Bhai ham kya anubhav bate ge ham to aap se anubhav le te hai

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    1. हा हा हा... धन्यवाद गुप्ता जी...

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  8. Aisi jagaho pe petrol pump , dukan wagerah milna asaan nahi hota hoga???..........ANURAG

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  9. बिल्कुल हॉलीवुड फिल्मों की लोकेशन लग रही है। बजंर,कुल,सडक भी संकरी डर लगना स्वाभाविक है जब साथ में लेडिज हो।

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  10. बेहद खतरनाक यात्रा। गज़ब के फोटो है जो देखने मे भी डरावने लग रहे है ।

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  11. ये पूरी श्रृं,खला ही बची रह गई थी आज का दिन इसी के नाम है।

    मेरे लिए ये जानना सुखद है कि निशा ने इन यात्राओं का आनंद लेना शुरू कर दिया है। संभव हो तो कुछ पोस्‍ट निशा के पर्सपेक्टिव से भी लिखो या उनसे ही लिखने को कहो... इन यात्राओं में स्‍त्री अनुभव हिन्‍दी के लिए अहम रहेंगे... हिन्‍दी में कायदे का एक भी स्‍त्री यात्रा वृत्‍तांत नहीं है।

    युगल छवि ,खींचने का काम किसने किया ? सेल्‍फी मोड की तस्‍वीरें एकदम गायब हैं कोई असूलन असहमति है या बस ऐसे ही।
    भाषा और आब्‍जर्वेशन में शानदार निखार आ रहा है।

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    1. धन्यवाद सर जी...
      निशा को लिखना पसन्द नहीं है। हालांकि मैंने कहा था उससे कुछ लिखने को।
      सेल्फी... यानी चेहरा दिखाना। मुझे यह पसन्द नहीं है। मैं चाहता हूं कि यदि मेरा भी फोटो आये तो पूरा आये। यदि हम दोनों का फोटो आये तो पूरा आये... खडे हुए या बैठे हुए या लेटे हुए... पूरा। सेल्फी से ऐसा नहीं होता। कैमरे को ट्राइपॉड या ज्यादातर जमीन पर रखकर हम युगल फोटो ले लेते थे। हर कैमरे में विकल्प होता है शटर दबाने के दस सेकण्ड बाद फोटो खींचने का।

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  12. बड़ा ही खोपनाक मंजर है । डर लगना तो सही है । कहते है पहाड़ पर अनुभवी और वही के बन्दे चल सकते है पर तुमने वहां बाईक चलकर बहुत ही हिम्मत का काम किया है। और साथ ही निशा का जोरदार समर्थन । हमेशा की तरह लद्धाख के जीवित फोटु।

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