Monday, November 5, 2018

दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के साथ-साथ

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18 फरवरी 2018
हम दार्जिलिंग केवल इसलिए आए थे ताकि रेलवे लाइन के साथ-साथ न्यू जलपाईगुड़ी तक यात्रा कर सकें। वैसे तो मेरी इच्छा न्यू जलपाईगुड़ी से दार्जिलिंग तक इस ट्रेन में ही यात्रा करने की थी, लेकिन बहुत सारी योजनाओं को बनाने और बिगाड़ने के बाद तय किया कि दार्जिलिंग से न्यू जलपाईगुड़ी तक मोटरसाइकिल से ही यात्रा करेंगे, ट्रेन के साथ-साथ।
दार्जिलिंग से न्यू जलपाईगुड़ी की एकमात्र ट्रेन सुबह आठ बजे रवाना होती है। हम छह बजे ही उठ गए थे। यह देखकर अच्छा लगा कि होटल वालों ने हमारी मोटरसाइकिल बाहर सड़क किनारे से हटाकर होटल के अंदर खड़ी कर दी थी। वैसे तो उन्होंने कल वादा किया था कि रात दस-ग्यारह बजे जब रेस्टोरेंट बंद होने वाला होगा, तो वे मोटरसाइकिल अंदर खड़ी करने के लिए हमें जगा देंगे। पता नहीं उन्होंने आवाज लगाई या नहीं, लेकिन मोटरसाइकिल हमें भीतर ही खड़ी मिली।
हमें शहर अच्छे नहीं लगते, इसलिए दार्जिलिंग भी नहीं घूमना था। लेकिन जब छह बजे उठ गए तो क्या करते? बाजार में चले गए। कल भी इधर आए थे और मीट की बड़ी-बड़ी दुकानें देखकर नाक सिकोड़ते हुए लौट गए थे। अब सुबह-सुबह का समय था और सभी दुकानें बंद थीं। टैक्सी स्टैंड तक पहुँच गए। कलिम्पोंग, गंतोक और सिलीगुड़ी जाने वाली शेयर्ड टैक्सियाँ तैयार हो चुकी थीं। यहीं चाय की एक दुकान खुली थी और अच्छा इंटरनेट भी चल रहा था। चाय भी पी और इंटरनेट भी चलाया।
लेकिन ट्रेन के साथ-साथ चलने से पहले पॉलूशन सर्टिफिकेट बनवाना था। दार्जिलिंग स्टेशन के आगे से जब घूम की तरफ चले, तो दिमाग में यही बात थी। अभी आठ नहीं बजे थे और न्यू जलपाईगुड़ी जाने वाली ट्रेन डीजल इंजन के साथ तैयार खड़ी थी।
“आज रविवार है। सर्टिफिकेट बनाने वाला आज नहीं आएगा।”
सुनते ही लगा जैसे हम दार्जिलिंग में फँस गए हों। शहर से बाहर जरूर पुलिसवाले खड़े होंगे और आज तो निश्चित ही चालान कटेगा।
दार्जिलिंग वाकई हमारे लिए शुभ नहीं है। अब के बाद कभी भी यहाँ नहीं आएँगे। हे भगवान! आज बचा लेना, प्लीज!
बतासिया लूप को अच्छे पिकनिक स्पॉट के तौर पर विकसित किया गया है। यहीं बैठे पुलिसवालों से पूछकर मोटरसाइकिल सड़क किनारे खड़ी की और टिकट लेकर बतासिया लूप पर ट्रेन के आने की प्रतीक्षा करने लगे। बड़ी भीड़ थी - यात्रियों की भी और दुकानदारों की भी। रेल की पटरी पर ही दुकानें लगी हुई थीं। फिर जैसे ही दार्जिलिंग की तरफ से सीटी की आवाज सुनाई पड़ी, तो सभी दुकान वालों में हलचल होने लगी और ट्रेन के आते-आते पटरी एकदम खाली हो गई।
ट्रेन आई और बिना रुके चली गई। उसके जाते ही दुकानें फिर से सज गईं। कुछ लोगों ने पहियों वाली छोटी-छोटी गाड़ियाँ बना रखी थीं, जो रेल की पटरियों पर चलती हैं और जिनसे वे सामान लाते और ले जाते हैं। इसी तरह की गाड़ी ‘बर्फी’ फिल्म में भी खूब दिखाई गई है।
बतासिया लूप से कंचनजंघा भी दिखती है, लेकिन धुंध के कारण नहीं दिखी। यहाँ ट्रेन के एक-दो फोटो और लेना चाहता था, इसलिए कुछ देर और रुकना पड़ा। थोड़ी देर बाद जब कर्सियांग से दार्जिलिंग जाने वाली ट्रेन आई, तो वे फोटो भी ले लिए।
दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे कंपनी की स्थापना सन् 1879 में हुई थी और एक साल के भीतर ही सिलीगुड़ी से कर्सियांग तक की लाइन खुल चुकी थी। फिर कर्सियांग से सोनादा 1 फरवरी 1881 को, सोनादा से घूम 4 अप्रैल 1881 को और घूम से दार्जिलिंग 4 जुलाई 1881 को खुल गई। 1885 में दार्जिलिंग से दार्जिलिंग बाजार तक भी रेलवे लाइन बिछाई गई थी, जो वर्तमान में पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
अब जब इतना बता दिया तो एक रोचक बात और बता देता हूँ। 20 जनवरी 1913 को एक और कंपनी का गठन हुआ - दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे एक्सटेंशंस। इसने सिलीगुड़ी से नक्सलबाड़ी और इस्लामपुर होते हुए 1914 में किशनगंज तक 2 फीट गेज की नैरोगेज लाइन बिछा दी थी। 1947 के बाद जब असम को शेष भारत से रेलमार्ग से जोड़ने की आवश्यकता हुई, तो इस नैरोगेज की लाइन को थोड़े से एलाइनमेंट में बदलाव के साथ मीटरगेज बनाया गया और वर्तमान में यह लाइन ब्रॉडगेज है।
इसके अलावा इसी कंपनी ने एक और रेलवे लाइन बिछाई - सिलीगुड़ी से सेवक होते हुए कलिम्पोंग रोड़ तक नैरोगेज की लाइन। सेवक से यह लाइन तीस्ता नदी के साथ-साथ ऊपर चढ़ती थी और रियांग होते हुए कलिम्पोंग रोड़ नामक स्टेशन पर समाप्त होती थी। बाद में कलिम्पोंग रोड़ स्टेशन का नाम बदलकर गीली खोला कर दिया गया। तीस्ता बाजार से गीली खोला की दूरी चार किलोमीटर है। वर्तमान में तीस्ता बाजार से कलिम्पोंग के लिए सड़क जाती है, लेकिन उस समय गीली खोला से रोप-वे से कलिम्पोंग सामान पहुँचाया और लाया जाता था। दिन में एक ट्रेन सिलीगुड़ी से गीली खोला तक आती-जाती थी। फिर 1947 में जब पाकिस्तान बना और शेष भारत से असम जाने वाली मीटरगेज की मुख्य लाइन उधर चली गई, तो असम को शीघ से शीघ्र जोड़ने के लिए सिलीगुड़ी से सेवक, आलिपुरदूआर होते हुए मीटरगेज की नई रेलवे लाइन बिछाई गई। इस समय सेवक तक नैरोगेज और मीटरगेज की लाइनें एक साथ थीं। फिर 1950 में तीस्ता नदी में बाढ़ आई और सेवक से गीलीखोला की लाइन नेस्तनाबूद हो गई, जो बाद में कभी भी चालू नहीं हो सकी। वर्तमान में पुराने स्टेशनों और जंगलों में दबी पड़ी पुरानी पटरियों के अवशेष ढूँढने पर मिल भी सकते हैं।
फिलहाल सेवक से तीस्ता के साथ-साथ सिक्किम के रंगपो और गंतोक तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना भी सुनने में आ रही है।

और आखिरकार घूम से ट्रेन निकलने के एक घंटे बाद यानी साढ़े नौ बजे हम बिना सर्टिफिकेट बनवाए ही सिलीगुड़ी की ओर चल दिए। लेकिन अब बहुत चौकस रहना पड़ रहा था। ट्रेन और रेलवे लाइन से ज्यादा ध्यान पुलिसवालों पर देना पड़ रहा था।
यह पूरी लाइन सड़क के किनारे-किनारे ही बनी है। जब 1880 में यहाँ रेलवे लाइन बननी शुरू हुई थी, तो यह कच्चा रास्ता था। इसी रास्ते पर रेलवे लाइन बिछाने के सारे अधिकार अंग्रेजी सरकार ने इस कंपनी को फ्री में दे दिए थे। कंपनी ने जमकर अपने इस अधिकार का प्रयोग किया और रेलवे लाइन व सड़क एक-दूसरे में लिपटे हुए दिखाई पड़ते हैं। बहुत सारी क्रॉसिंग हैं और सिलीगुड़ी शहर को छोड़कर कहीं भी फाटक नहीं है।
सोनादा में एक पेट्रोल पंप के पास लिखा दिखा - “यहाँ गाडीको धुवाँ जाँच गरिन्छ।”
गर्दन घुमाई और प्रदूषण जाँच केंद्र खुला दिख गया। कसम से, इतनी खुशी मिली कि बता नहीं सकता। अपना सिर उठता हुआ-सा महसूस हुआ। अब बेफिक्र चलेंगे।
टुंग में हम स्टेशन बिल्डिंग ढूँढते रहे और यह हमारे पीछे थी। यानी यह नेशनल हाइवे ही प्लेटफार्म है। स्टेशन से टिकट लो, फिर सड़क पर आओ और ट्रेन में चढ़ जाओ।
टुंग से अगला स्टेशन कर्सियांग है। यह स्टेशन कुछ अजीब ही तरह से बना है। रेलवे लाइन से अलग हटकर स्टेशन बना है। लाइन का एक टुकड़ा मेनलाइन और स्टेशन को जोड़ता है। ट्रेन दार्जिलिंग की तरफ से आई और स्टेशन के सामने से होती हुई आगे निकल गई। फिर रुक गई। पॉइंटमैन के द्वारा कर्सियांग स्टेशन का रूट बनाने के बाद यह बैक आने लगी और पीछे चलती हुई स्टेशन में दाखिल हुई। यहाँ काफी व्यस्त चौराहा है और दो सड़कें तो वन-वे हैं। जब तक ट्रेन आगे जाकर वापस आई, तब तक ट्रैफिक पुलिस ने यातायात रोककर रखा।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




बतासिया लूप का सबसे बड़ा आकर्षण यह पुल है...

पूरी रेलवे लाइन सड़क के साथ-साथ ही बनी है...




बतासिया लूप पर शहीद स्मारक...


ट्रेनों का अच्छा ट्रैफिक होने के बावजूद भी यहाँ ये बहुतायत में प्रचलित हैं...


मौसम साफ होता, तो दूर कंचनजंघा दिखती...

यह आई एक ही डिब्बे की ट्रेन, घूम की तरफ से...



घूम भारत का सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित रेलवे स्टेशन है... जी.के. का सवाल है... याद कर लीजिए...



कर्सियांग में स्टीम इंजन शेड

कर्सियांग में बहुत से लोग इस तरह ट्रैक पर गाड़ी खड़ी कर देते हैं...


गिद्दापहाड़ व्यू पॉइंट से नजारा








जेड-रिवर्स... गाड़ी कम स्थान में ऊपर या नीचे जाने के लिए इसका प्रयोग होता है... गाड़ी आगे जाती है... फिर दूसरी लाइन पर पीछे आती है और फिर तीसरी लाइन पर आगे बढ़ जाती है...

यह गाड़ी पीछे आ रही है...

और फिर आगे बढ़ जाती है...









पहुँच गए सिलीगुड़ी...








अगला भाग: सिलीगुड़ी से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा

3 comments:

  1. वाह!! घूम जाकर घूमने का मन करने लगा है अब तो....

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  2. नीरज भाई घूम The Highest Heritage Railway station in the world at an altitude of 7407 feet हैं

    दार्जीलिंग से घूम और फिर घूम से दार्जीलिंग वापिस टॉय ट्रैन चलती है स्टीम इंजन और डीज़ल इंजन दोनों तौर पे

    स्टीम इंजन १९२८ का बना हुआ है; इसमें यात्रा करना पुराने दिनों की याद दिला देता है

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