मेघालय यात्रा - चेरापूंजी में नोह-का-लिकाई प्रपात और डबल रूट ब्रिज

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10 फरवरी 2018
“एक महिला थी और नाम था का-लिकाई। उसने दूसरी शादी कर ली। पहले पति से उसे एक लड़की थी। तो उसका दूसरा पति उस लड़की से नफरत करता था। एक बार महिला बाहर से काम करके घर लौटी तो देखा कि पहली बार उसके पति ने उसके लिए मीट बनाया और परोसा भी। महिला बड़ी खुश हुई और साथ बैठकर भोजन कर लिया। बाद में उसे बाल्टी में कुछ उंगलियाँ मिलीं। उसे समझते देर नहीं लगी कि ये उंगलियाँ उसकी लड़की की हैं और उसके दूसरे पति ने लड़की को मार दिया है। इससे महिला बड़ी परेशान हुई और पास के झरने में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। बाद में उस झरने का नाम पड़ गया ‘नोह-का-लिकाई’, अर्थात का-लिकाई की छलांग।”
यह कहानी थी नोह-का-लिकाई जलप्रपात की, जो वहाँ लिखी हुई थी। इस जलप्रपात को भारत का सबसे ऊँचा जलप्रपात माना जाता है। शुष्क मौसम होने के बावजूद भी एक पतली-सी जलधारा नीचे गिर रही थी। जलप्रपात बारिश में ही दर्शनीय होते हैं। यह भी बारिश में ही देखने योग्य है, लेकिन अब भी चूँकि इसमें पानी था, तो अच्छा लग रहा था।
यहाँ ज्यादा देर नहीं रुके। वापस चेरापूंजी पहुँचे और ‘डबल रूट ब्रिज’ के लिए रवाना हो गए।

चेरापूंजी से 15 किलोमीटर दूर तिरना नामक स्थान है। यहीं से ‘डबल रूट ब्रिज’ का पैदल रास्ता आरंभ होता है। हम जैसे ही तिरना पहुँचे तो पार्किंग में बाइक रोकते ही पार्किंग की पर्ची पकड़ा दी गई और कई अन्य लड़के हिंदी और अंग्रेजी में गाइड बनने को कहने लगे। इस रास्ते में गाइड की कोई आवश्यकता नहीं है। वे चूँकि स्थानीय लड़के थे, इसलिए कुछ ऐसी बातें बता सकते थे, जो कहीं अन्यत्र पता नहीं चल सकतीं। लेकिन उनकी हिंदी बहुत खराब थी और हमारी अंग्रेजी। इसलिए हमारे हाथ कुछ भी नहीं लगने वाला था।
यहाँ मैं एक सुझाव देना चाहूँगा। तिरना से ही डंडा ले लेना चाहिए। किसी जंगली जानवर के लिए नहीं, बल्कि पैदल रास्ता बहुत ज्यादा ढलान वाला है। पूरा रास्ता पक्का बना है, लेकिन ढलान वाले रास्तों पर डंडे काम आ जाया करते हैं। हालाँकि हमने नहीं लिए।
यहाँ बहुत सारे होम-स्टे भी थे और बहुत सारी दुकानें भी। गाँव का हर आदमी, औरत, घर पर्यटन से जुड़ा है। ‘लिविंग रूट ब्रिज’ इस गाँव में नहीं है, लेकिन फिर भी पर्यटन से यहाँ सभी को अच्छी आमदनी हो जाती है।
जैसे ही गाँव से बाहर निकलते हैं, एकदम तेज ढलान मिलता है। पक्की सीढ़ियाँ हैं, इसलिए सुविधा रहती है। मैंने आपको थोड़ी देर पहले ही बताया था कि यहाँ खड़े ढाल वाले ‘कैन्योन’ हैं। यह भी एक कैन्योन ही है। ऊपर तिरना गाँव है और नीचे उतरकर ‘लिविंग रूट ब्रिज’। समुद्र तल से 700 मीटर ऊपर तिरना है और 400 मीटर ऊपर ‘रूट ब्रिज’। इसलिए आपको 300 मीटर नीचे उतरना पड़ता है। 300 मीटर ज्यादा नहीं होते, लेकिन खड़ा ढाल रोमांचित करता है। बीच में हल्के-फुल्के नाश्ते की एक दुकान भी है। इस दुकान की मालकिन तिरना की ही रहने वाली हैं। हिंदी समझ लेती हैं, लेकिन बोलते समय हँस पड़ती हैं।
नदी किनारे एक गाँव मिलता है। यहाँ ‘सिंगल रूट ब्रिज’ है। “वापसी में देखेंगे” कहकर हम आगे ही बढ़ते रहे। नीचे उतरकर एक झूला पुल से नदी पार करनी होती है। यह एक बेहद संकरा झूला पुल है और खूब हिलता है। साथ ही डर भी बना रहता है कि कहीं इसकी स्टील की रस्सियों के बीच में पैर न आ जाएँ।
नदी पार करके थोड़ी-सी चढ़ाई है और फिर दूसरी नदी मिलती है। नदी के उस ओर नोंगरियात गाँव बसा है। हैरानी होती है ‘कैन्योन’ की तीखी ढलानों पर बसे इन गाँवों को देखकर। इस नदी पर भी झूला पुल है, लेकिन अच्छी हालत में है।
नोंगरियात गाँव में प्रवेश करते ही एक नाले पर ‘रूट ब्रिज’ है। यह छोटा-सा पुल है, लेकिन इसी नाले पर थोड़ा ही ऊपर ‘डबल रूट ब्रिज’ दिख रहा था। रास्ता नोंगरियात गाँव से होकर जाता है।
एक जगह अंग्रेजी में लिखा था - “प्रिय यात्रियों, नोंगरियात में आपका स्वागत है। बात ये है कि हमारे यहाँ एक बड़ी समस्या है। उसके लिए हमें आपकी सहायता चाहिए। हम यहाँ जंगल में प्लास्टिक नहीं जला सकते, क्योंकि इससे हमारा पर्यावरण, पानी, हवा, मिट्टी सब खराब होते हैं। इसलिए प्लीज यहाँ प्लास्टिक न छोड़ें और सारा प्लास्टिक अपने साथ कम से कम ऊपर टैक्सी स्टैंड तक ले जाएँ।”
टिकट ले लिया। ‘डबल रूट ब्रिज’ के पास ही चाय की एक दुकान है। दो कप चाय ले ली। फोटो बाद में खींचेंगे, पहले इसके सामने बैठकर इसे निहारते हुए चाय पिएँगे।
एक ‘कैन्योन’ की गहराइयों में घने जंगलों में कौन आता होगा यहाँ, जो पुल की जरूरत पड़ गई? यह पुल एक छोटे-से नाले पर स्थित है। यह नाला थोड़ा ही आगे एक नदी में मिलता है। इस नदी में ‘नोह-का-लिकाई’ प्रपात का पानी आता है। उस नदी पर कोई भी ‘रूट ब्रिज’ नहीं है। इस नाले को पार करना तो बड़ा सरल है। उस नदी को कैसे पार करते होंगे?
क्या सोचा होगा उन लोगों ने कभी? कितनी उम्र मानें इसकी? सौ साल? डेढ़ सौ साल? मिशनरी तो शायद ही पहुँचे होंगे तब तक यहाँ? लोग ईसाई नहीं बने होंगे। पर्यटन तो कतई नहीं रहा होगा। सीधे-सादे वनवासी ही रहे होंगे। सीमित जरूरतें होती होंगी। यहाँ इस छोटे-से नाले पर पुल की जरूरत तो नहीं रही होगी।
या केवल खाली बैठे-बैठे पुल बना दिया? समय बिताने को।
या पुल बनाने की प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं?
खासी और जयंतिया क्षेत्रों के दक्षिणी भाग में बहुत सारे ‘लिविंग रूट ब्रिज’ हैं। कुछ प्रसिद्ध हैं, कुछ प्रसिद्ध नहीं हैं। हो सकता है कि कछार, नागालैंड और मणिपुर में भी इस तरह के पुल हों। अगर उधर भी हुए, तो निश्चित ही म्यांमार में ही होंगे। जो भी हो, इस तरह के पुल केवल नदी-नाले पार करने के लिए नहीं बनाए जाते थे। इस तरह के पुल बनाना किसी सामाजिक रिवाज का भी हिस्सा रहा होगा।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘चेरापूंजी’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:





नोह-का-लिकाई जलप्रपात... फरवरी में इतना ही पानी होता है...

काली मिर्च (शायद)

डबल रूट ब्रिज जाने का रास्ता




डबल रूट ब्रिज के रास्ते में एक सस्पेंशन पुल...




नोंगरियात गाँव में पर्यटकों का स्वागत और अपील

यहाँ तमाम तरह के शलभ भी मिलते हैं...

एक शलभ यह भी... जो चींटे से बातचीत कर रहा है... 

और यह रहा चेरापूंजी का प्रतीक डबल लिविंग रूट ब्रिज




पुल की बुनावट



इसी के रास्ते में दो पुल और भी हैं जो सिंगल हैं...



और अब वापसी का थकाऊ सफर

लेकिन पूरियों और आलू-गोभी की सब्जी से सारी थकान मिट गई...







अगला भाग: मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी

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