Monday, October 1, 2018

मेघालय यात्रा - डौकी में भारत-बांग्लादेश सीमा पर रोचक अनुभव

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9 फरवरी 2018
सुबह-सुबह ही वो नाववाला आ गया, जो कल हमें यहाँ छोड़कर गया था। आज वह हमें उमगोट नदी में नौका विहार कराएगा। हमें वैसे तो नौका विहार में कोई दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन यह नदी इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि नौका विहार का मन करने लगा। जब भी आप कभी इंटरनेट पर ऐसा कोई फोटो देखें, जिसमें इतना पारदर्शी पानी हो कि नाव हवा में चलती दिखती हो, तो बहुत ज्यादा संभावना है कि वह यही नदी होगी। लेकिन ऐसा फोटो लेने की भी एक तकनीक है। वो यह कि धूप निकली हो और नाव की परछाई नाव से बिल्कुल अलग होकर नदी की तली में दिख रही हो। साथ ही हवा एकदम शांत हो और पानी पर लहरें न बन रही हों।
“बांग्लादेश चलेंगे सर?” अचानक नाववाले ने ऐसी बात कह दी, जो अप्रत्याशित थी।
“क्या? बांग्लादेश?”
“हाँ जी, उधर झाल-मूड़ी खाकर आएँगे।”

यह सुनकर मेरे मन में उथल-पुथल मचना स्वाभाविक ही था। यह नदी कुछ ही आगे जाकर बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है। यानी बांग्लादेश की सीमा कहीं पर इस नदी को आर-पार काटती है। लेकिन पानी तो किसी सीमा को मानता नहीं है। और न ही पानी पर तारबंदी की जा सकती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उस सीमा के पार दो-चार मीटर जाकर वापस भारत में आ जाते हों। लेकिन यह तो झाल-मूड़ी भी खाकर आने को कह रहा है। यानी किनारे पर उतरना पड़ेगा।
“और अगर बांग्लादेश की पुलिस ने पकड़ लिए तो?”
“नहीं सर, कुछ नहीं होता।”
मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहूँ। नाववाला यहीं का रहने वाला है, वो हमारे साथ कुछ गलत थोड़े ही होने देगा?
लेकिन अगर गलत हो ही गया तो? बांग्लादेश में तो वह भी विदेशी ही कहलाएगा।
“हाँ, चलेंगे।” काफी सोच-विचार के बाद मैंने सहमति दे दी।
गूगल मैप खोल लिया और अपने व सीमा के बीच की दूरी को कम होते देखने लगा। एक स्थान ऐसा आएगा, जब हम नक्शे में दिख रही काली अंतर्राष्ट्रीय रेखा को पार कर जाएँगे।
नदी के इसी किनारे पर्यटकों की भीड़ थी। पास गए तो बी.एस.एफ. के जवान भी खड़े दिखे। इसका मतलब यह भारत ही है। नाववाले ने नाव भी यहीं किनारे पर लगा ली। नाव से उतरे, तो नक्शा बता रहा था कि केवल बीस मीटर आगे ही बांग्लादेश की सीमा नदी पार कर जाती है, अर्थात् नदी बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है और यही किनारा बांग्लादेशी किनारा बन जाता है। इसका अर्थ हुआ कि बीस मीटर के बाद जो लोग खड़े हैं, वे बांग्लादेश में खड़े हैं।
नाववाला हमें रुकने को कहकर बी.एस.एफ. वाले के पास चला गया और कुछ बातें करने लगा। हावभाव से लग रहा था कि बी.एस.एफ. वाले ने मना कर दिया। नाववाला मायूस लौट आया - “आज ये लोग मना कर रहे हैं। कोई साहब आने वाले हैं।”
लेकिन हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा। चंद कदम दूर ही बी.जी.बी. यानी बांग्लादेशी गार्ड खड़े थे। किसी तरह की कोई हड़बड़ी नहीं। कोई तारबंदी नहीं। मैंने गौर से नदी किनारे के पत्थरों को देखा, ताकि किसी सीमा-रेखा का एहसास हो सके, लेकिन ऐसा कुछ नहीं मिला।
फिर मैं बी.एस.एफ. के एक जवान के पास गया - “रामराम साब।”
“रामराम।”
“अच्छा, ये बताइए कि वास्तविक सीमा कहाँ है?”
“देखो, वो उधर पेड़ है। फिर उधर वो बड़ा-सा पत्थर है और वहाँ नदी पार करके वो चट्टान है, यही सीमा है।”
“तो यहाँ पर इधर से उधर जाना हो जाता है क्या? नाववाला बता रहा था कि उधर जाकर झालमूड़ी खा सकते हैं।”
“हाँ, नोर्मली चले जाते हैं और खा-पीकर लौट आते हैं। फ्रेंडली बॉर्डर है यह। लेकिन आज डी.आई.जी. साहब आ रहे हैं, तो थोड़ी सख्ती है।”
“उधर बड़ी भीड़ है और हमारे यहाँ एक-दो ही यात्री हैं। क्या बात है?”
“आज जुम्मा है। उनकी छुट्टी होती है आज, तो वे हिल स्टेशन देखने आते हैं। जबकि हमारे यहाँ रविवार को भीड़ होती है।”
अद्भुत नजारा था। केवल मान रखा है कि यह सीमा है। नदी के क्षेत्र में होने के कारण यहाँ ‘बॉर्डर पिलर’ भी नहीं हैं। केवल एक बड़ा पत्थर है, जिसे सीमा मान लिया है। उस पत्थर पर चढ़कर बांग्लादेशी यात्री फोटो खींच रहे हैं। बी.एस.एफ. और बी.जी.बी. वाले आपस में तमाखू रगड़ते हुए बातचीत कर रहे हैं। बांग्ला उधर भी, बांग्ला इधर भी। हिंदी वालों का आमार-तोमार करके काम चल जाता है। उधर कई दुकानें हैं, जो खाने-पीने से ही संबंधित हैं। वहाँ तक हम जा सकते थे।
उधर यात्रियों की भीड़ बढ़ती जा रही है। जानकारी और स्पष्ट सीमा-रेखा न होने के कारण कुछ यात्री भारत में आने लगते हैं। बी.एस.एफ. वाला उन्हें वापस भेज देता है - “ओए, उधर ही रहो।”
“मैं तो इंडियन ही हूँ, साब जी।” एक स्थानीय खसिया आदमी ने भारत में आते हुए कहा।
“तो उधर क्या कर रहा है? आओ इधर।”
फिर मैंने और बातचीत शुरू कर दी - “यहाँ तो ज्यादा सिरदर्दी नहीं रहती होगी?”
“हर जगह की अपनी सिरदर्दी है। लेकिन खुले बॉर्डर की अपनी अलग सिरदर्दी होती है। बांग्लादेश में पत्थर नहीं होते और सीमेंट बनाने के लिए उन्हें पत्थर चाहिए। तो वे लोग यहाँ से तस्करी करते हैं। रात के अंधेरे में नावें लेकर आते हैं और खूब भीतर तक जाकर पत्थर लाते हैं। गहरी घाटी होने के कारण उनका पता भी नहीं चलता। वहाँ पत्थर अठारह रुपये किलो तक बिकता है।”
“तो यहाँ तारबंदी नहीं है क्या?”
“काम चल रहा है, लेकिन नदी के पाट में तारबंदी नहीं होगी। अगर कर भी देंगे तो बारिश में नदी सब बहाकर ले जाएगी।”
मैं आज पहली बार बांग्लादेशी सीमा को देख रहा था। बहुत रोचक अनुभव था। यहाँ मैं पूरे दिन बैठ सकता था। दो-तीन बकरे बांग्लादेश से भारत में आ जाते। घूमते रहते। उन्हें क्या पता किसी सीमा का! यह तो हम इंसानों की बनाई हुई है, बकरों की बनाई थोड़े ही है? फिर उनका मालिक उन्हें बुलाने भारत आ जाता। जवान या तो मालिक को भारत आकर बकरा ले जाने देता या खुद ही बांग्लादेश में खदेड़ देता।
बांग्लादेश में एक-दो खच्चर सजे-धजे खड़े थे। उनके मालिक इस प्रतीक्षा में थे कि कोई यात्री इनकी सवारी करेगा और दो-चार टके का इंतजाम हो जाएगा।
एकदम सीमा पर बांग्लादेश के अंदर एक बड़ी आलीशान कुर्सी रखी थी। यात्री उस पर बैठकर और मेघालय के पहाड़ों व डौकी के झूले पुल को बैकग्राउंड में रखकर फोटो खिंचवाते। धक्कामुक्की में कई बार वो कुर्सी भारत में आ जाती। इससे यात्रियों को भला क्या फर्क पड़ता! लेकिन बी.जी.बी. वाले उसे फिर से अपने देश में खींच लेते।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘डौकी में भारत और बांग्लादेश’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




एकदम बीच में बड़ा-सा पत्थर देख रहे हैं ना आप? उसके उस तरफ बांग्लादेश है और इस तरफ भारत... यहाँ दोनों देशों की सीमा उमगोट नदी को पार करती है... और यह बकरी बांग्लादेशी है...

जुम्मे की छुट्टी के कारण बांग्लादेश की तरफ बड़ी चहल-पहल थी...

भारतीय बी.एस.एफ. और बांग्लादेशी बी.जी.बी. के जवान

ये नावें भारत में हैं... और उधर जो दुकानें हैं, वे बांग्लादेश में हैं...

बांग्लादेशी झाल-मूडी वाले अपनी बिक्री के लिए भारतीय यात्रियों पर ही निर्भर रहते हैं... लेकिन आज उनकी बिक्री नहीं हो पाई...




बांग्लादेशी बड़े सज-धजकर आ रहे थे...





बांग्लादेशी खच्चर

मैं भारत में खड़ा हूँ और बाकी सभी लोग बांग्लादेश में... 


ऊपर सड़क से देखने पर... वो सारी भीड़ बांग्लादेश में है और इधर खड़ी नावें भारत में हैं...

जैसे ही पहाड़ समाप्त होता है, बांग्लादेश शुरू हो जाता है... सारा मैदानी इलाका बांग्लादेश है...

डौकी से एक किलोमीटर दूर तामाबिल सीमा... और यहीं पर सड़क भी बांग्लादेश जाती है... सभी गाड़ियाँ और यात्री यहीं से दोनों देशों में आवागमन करते हैं...





डौकी पुल के पास लगा एक पत्थर, जिसपर एक तरफ शिलोंग लिखा है और दूसरी तरफ सिलहट...







अगला भाग: मेघालय यात्रा - डौकी-चेरापूंजी सड़क और सुदूर मेघालय के गाँव


1. मेघालय यात्रा - गुवाहाटी से जोवाई
2. मेघालय यात्रा - नरतियंग दुर्गा मंदिर और मोनोलिथ
3. मेघालय यात्रा - जोवाई से डौकी की सड़क और क्रांग शुरी जलप्रपात
4. मेघालय यात्रा - डौकी में पारदर्शी पानी वाली नदी में नौकाविहार
5. मेघालय यात्रा - डौकी में भारत-बांग्लादेश सीमा पर रोचक अनुभव
6. मेघालय यात्रा - डौकी-चेरापूंजी सड़क और सुदूर मेघालय के गाँव
7. मेघालय यात्रा - चेरापूंजी में नोह-का-लिकाई प्रपात और डबल रूट ब्रिज
8. मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी
9. मेघालय यात्रा - चेरापूंजी के अनजाने स्थल
10. मेघालय यात्रा - गार्डन ऑफ केव, चेरापूंजी का एक अनोखा स्थान
11. अनजाने मेघालय में - चेरापूंजी-नोंगस्टोइन-रोंगजेंग-दुधनोई यात्रा
12. उत्तर बंगाल यात्रा - बक्सा टाइगर रिजर्व में
13. उत्तर बंगाल यात्रा - तीन बीघा कोरीडोर
14. उत्तर बंगाल - लावा और रिशप की यात्रा
15. उत्तर बंगाल यात्रा - नेवरा वैली नेशनल पार्क
16. उत्तर बंगाल यात्रा - लावा से लोलेगाँव, कलिम्पोंग और दार्जिलिंग
17. दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के साथ-साथ
18. सिलीगुड़ी से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा

5 comments:

  1. बांग्ला उधर भी, बांग्ला इधर भी। हिंदी वालों का आमार-तोमार करके काम चल जाता है। Interesting....

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  2. बढ़िया जानकारी । सोचकर ही अलग अहसास होता है ।

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  3. क्लासिक, हमेशा की तरह

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  4. बहुत बढ़िया जानकारी से परिपूर्ण पोस्ट

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  5. बढ़िया जानकारी नीरज जी

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