मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी

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11 फरवरी 2018
मॉसमाई केव - सन्नाटा। हर तरफ सन्नाटा। रविवार होने के कारण लोगों की छुट्‍टी थी। दुकान, होटल सब बंद। फिर भी कुछ खुले हुए। जो भी खुले थे, उनमें चाय आदि ले लेने में समझदारी थी। हम साढ़े आठ बजे मॉसमाई पहुँच गए। टिकट काउंटर बंद था। झाँककर भी देखा, कोई नहीं। कहीं गुफा भी तो बंद नहीं है! पार्किंग में बाइक खड़ी कर दी। पार्किंग के चारों ओर रेस्टोरेंट हैं। एक-दो के सामने एक-दो जने बैठे थे। उन्हें हमारी उपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ा। यह सन्नाटा अजीब-सा लगा।
अरे भाई, कोई तो हमें टोक लो।
एक जगह लिखा था - वेलकम टू मॉसमाई केव। हम उसी तरफ चल दिए। एक रेस्टोरेंट के सामने दो बंगाली बैठे दिखे - धूप में इत्मीनान से। तभी बगल में एक स्थानीय बूढ़े ने हमें टोका। उसने क्या कहा, यह तो समझ नहीं आया, लेकिन बड़ी खुशी मिली। कोई और मौका होता, तो हम अनसुनी करके आगे बढ़ जाते, लेकिन अब रुक गए।
“क्या? व्हाट?” मैंने पूछा।
“टेन मिनट्स।”
“टेन मिनट्स क्या?”
“नाइन ओ क्लॉक।”
“केव ओपन नाइन ओ क्लॉक?”
“या।”
अभी आधा घंटा बाकी था। कुछ खा लेते हैं। रेस्टोरेंट की मालकिन दस मिनट प्रतीक्षा करने की शर्त पर वेज मोमोज बनाने लगी।
ठीक नौ बजे टिकट काउंटर खुल गया। 20-20 रुपये प्रति व्यक्ति और 20 रुपये कैमरे के और 10 रुपये पार्किंग शुल्क देकर गुफा में प्रवेश कर गए। लाइमस्टोन की गुफा है यह और अंदर बिजली की लाइटें जली रहती हैं।
यह गुफा जम्मू के शिवखोड़ी और कुमाऊँ के पाताल भुवनेश्‍वर की गुफाओं जैसी ही है, लेकिन यहाँ पंडे-पुजारियों का कब्जा नहीं है। मेरा बस चले तो मैं शिवखोड़ी और पाताल भुवनेश्‍वर की गुफाओं को भी पुजारियों से आजाद करा दूँ। यहाँ मॉसमाई में आप गुफा के अंदर खूब फोटो खींच सकते हैं और लाखों सालों से टपकते पानी के कारण बनी अनगिनत संरचनाओं को निहार सकते हैं। यहाँ आपको शेषनाग और करोड़ों देवताओं की उपस्थिति बताकर डराने वाला कोई नहीं है। कुछ संरचनाएँ तो वास्तव में मनुष्य जैसी ही हैं। लगता है जैसे वे अब उठकर चल देंगी।
काउंटर पर बैठा आदमी ठीक-ठाक हिंदी जानता था। मैंने बातचीत शुरू कर दी - “आप यहीं मॉसमाई के रहने वाले हो?”
“हाँ जी।”
“ये बताइये कि टिकट कलेक्शन का पैसा कहाँ जाता है? और कौन यह निर्धारित करता है कि कौन कलेक्ट करेगा?”
“यह सब गाँव का हैड़मैन डिसाइड करता है।”
“यानी सारा पैसा हैड़मैन के पास जाता है और वो ही आप लोगों को अलग-अलग जिम्मेदारियाँ बाँटता है?”
“हाँ जी।”
“अच्छा, एक बात और बताइए। इधर हर घर के दरवाजे पर तीन पत्थर गड़े हुए हैं। यहाँ पार्किंग में भी हैं। ये क्या हैं?”
“पुराने समय में लोग इन्हें लगाते थे और इन्हें लगाना अच्छा माना जाता था।”
“तो क्या अब अच्छा नहीं माना जाता?”
“अब भी अच्छा माना जाता है, लेकिन ये पुराने समय के हैं।”
“पुराने समय के, मतलब?”
और इसका उत्‍तर नहीं मिला। बाद में एक-दो और लोगों से भी इस बारे में बातचीत की, लेकिन स्पष्‍ट बात किसी ने नहीं की। असल बात यह है कि ईसाई बनने से पहले इनके अपने रीति-रिवाज थे। घर के दरवाजे पर, पवित्र जगहों पर तीन खड़े पत्थर लगाना और उनके पास एक मेजनुमा पत्थर रखना शुभ माना जाता था। और धर्म-परिवर्तन की पहली शर्त होती है, पुराने सभी रिवाज छोड़ने पड़ेंगे। लेकिन जो चीज शुभ मानी जाती थी, कम से कम वो चीज आसानी से नहीं छूटती। अभी तक भी बहुत सारे लोग इन्हें लगाते हैं। पार्कों में, खेतों में और खाली जगह पर भी ये लगे हुए दिख जाते हैं।
लेकिन बातचीत करते समय ईसाईयत आगे आ जाती है और इस बारे में खुलकर नहीं बोल पाते।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘चेरापूंजी’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




चेरापूंजी का मुख्य चौराहा... जहाँ से एक रास्ता मुख्य बाजार में जाता है, एक नोह-का-लिकाई की ओर जाता है, एक मॉसमाई जाता है और चौथा जाता है शिलोंग...



मॉसमाई गुफा



जिंदगी यहाँ भी... गुफा के अंदर एक जगह बल्ब की रोशनी थी, तो ‘फर्न’ उग गया... यहाँ तक सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुँचती...











पीछे लगे रेस्टॉरेंट के विज्ञापन को अगर छोड़ दें तो आपको तीन पत्थर गड़े हुए दिखाई देंगे... इन्हें बहुत पवित्र माना जाता था... फिलहाल इन्हें पवित्र तो नहीं माना जाता, लेकिन अभी भी ये सार्वजनिक स्थानों पर लगे हुए मिल जाएँगे...


मॉसमाई गाँव








अगला भाग: मेघालय यात्रा - चेरापूंजी के अनजाने स्थल

Comments

  1. Bike वाली फोटो में तो बिलकुल मॉडल लग रहे हैं, जैसे किसी Bike का ad हो. ऐसी ऐसी जगह बाइक चलते हैं आप, आपको तो किसी Motorcycle कंपनी वाले ने अपना ब्रांड एम्बेसडर बना देता चाहिए.

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