Monday, October 22, 2018

अनजाने मेघालय में - चेरापूंजी-नोंगस्टोइन-रोंगजेंग-दुधनोई यात्रा

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12 फरवरी 2018
मैं पहले ही बता चुका हूँ कि हमने नोंगस्टोइन होते हुए रोंगजेंग तक जाने का फैसला किया था। अगर समय पर्याप्‍त होगा, तो सीजू जाएँगे अन्यथा दुधनोई की तरफ निकल लेंगे। और इसके लिए सुबह चार बजे चेरापूंजी से निकलना भी पक्का कर लिया।
लेकिन ऐसा भला कभी हुआ है?
आठ बजे चेरापूंजी से निकले। चार घंटों का नुकसान कह रहा था कि अब हम सीजू तो नहीं जा रहे।
चेरापूंजी से शिलोंग वाली सड़क पर चल दिए। जब दो दिन पहले हम चेरापूंजी आए थे, तो इस सड़क को अंधेरे में तय किया था, ठंड से ठिठुरते हुए। लेकिन इसकी खूबसूरती अब दिखनी शुरू हुई। सड़क तो वैसे पठार के ऊपर ही है, लेकिन पठार और गहरी घाटियों के किनारों से भी यह गुजरती है। दक्षिण में गहरी घाटियाँ दूर-दूर तक दिखती हैं। अगर मौसम एकदम साफ हो, तो धुर दक्षिण में बांग्लादेश का मैदानी इलाका भी देखा जा सकता है। इस समय मौसम तो वैसे साफ ही था, लेकिन दूर धुंध भी बनी हुई थी।
जब शिलोंग दस-बारह किलोमीटर रह गया, तो मासिनराम से आने वाली सड़क भी मिल गई। हम इसी सड़क पर मासिनराम की ओर चल दिए। अब तक तो हम पूरी तरह पठार पर आ गए थे और गहरी घाटियाँ पीछे कहीं छूट गई थीं। अब पूरे रास्ते हमें घाटियाँ नहीं मिलेंगी, हम पठार पर ही रहेंगे।

इस सड़क पर कुछ दूर चलते ही एक तिराहा मिला। सीधी सड़क मासिनराम और आगे बाघमारा जा रही थी और दाहिनी सड़क नोंगस्टोइन और तुरा। यहाँ से नोंगस्टोइन 72 किलोमीटर और तुरा 286 किलोमीटर था। नोंगस्टोइन तो खासी हिल्स में ही है, लेकिन तुरा गारो हिल्स में है। यहाँ से दाहिने मुड़ गए।
शिलोंग से चेरापूंजी और मासिनराम की सड़कें तो शानदार थीं ही। इन्हें शानदार बनाना भी पड़ेगा, क्योंकि मेघालय में दुनियाभर के यात्रियों की सबसे ज्यादा संख्या इन्हीं सड़कों से गुजरती है। कल हमने देखा था कि चेरापूंजी के बाद अत्यधिक खराब सड़क थी, क्योंकि उधर कोई नहीं जाता। इसी तरह शिलोंग से नोंगस्टोइन और तुरा भी लगभग न के बराबर बाहरी यात्री जाते हैं। आप इंटरनेट पर किसी भी ट्रैवल फोरम में देखेंगे, तो पाएँगे कि शिलोंग से तुरा जाने के लिए गुवाहाटी होकर जाने की सलाह दी जाती है। तो हमें लग रहा था कि अब यह सड़क खराब मिलेगी।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह सड़क मेघालय की किसी भी अन्य सड़क के मुकाबले शानदार है। हमें रोंगजेंग तक इस पूरी सड़क में एक भी कमी नहीं मिली। कोई गड्ढा तक नहीं और पूरी सड़क के दोनों किनारों पर सफेद लाइनें भी हैं। पठार होने के कारण भू-दृश्य भी ‘अमेजिंग’ है।
और हाँ, आगे बढ़ने से पहले यह भी बता दूँ कि दो महीने पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने इस सड़क का उद्‍घाटन किया था। पूर्वोत्‍तर में यातायात के साधनों का विस्तार मोदी जी की प्राथमिकता में है और इधर घूमते हुए यह दिखाई भी देता है।
लेकिन एक कमी है। रास्ते में खाने-पीने के विकल्प न के बराबर हैं। सड़क नई ही बनी है। इससे पहले यह बदहाल ही रही होगी। इंटरनेट पर गुवाहाटी होकर जाने की सलाह से यही निष्कर्ष निकलता है। ठेठ स्थानीय इक्का-दुक्का लोग ही आते-जाते होंगे। तो उन्हीं के हिसाब से कुछ छोटी-मोटी दुकानें हैं। ऐसी ही एक दुकान में हम भी रुक गए। लिखा था - फास्ट फूड़ केवल रविवार को मिलता है। गौरतलब है कि रविवार को मेघालय के लोग ‘आउटिंग’ करते हैं। लेकिन आज रविवार नहीं था, तो हमें यहाँ चाय से ही काम चलाना पड़ा।
इधर ही एक जगह का नाम है - मामाराम।
यह सड़क तो पी.डब्लू.डी की है, लेकिन स्थानों के नाम देवनागरी और रोमन दोनों में लिखे हैं। मेघालय में देवनागरी दुर्लभ है, इसलिए इस सड़क से चलते हुए अपनापन भी लग रहा था।
पठार पर राइडिंग करने का यही मजा है। सड़के घुमावदार होती हैं, लेकिन पहाड़ नहीं होते। मानसून में आते तो हरियाली भर-भर कर मिलती, लेकिन अभी भी कम हरियाली नहीं थी।
पश्‍चिमी खासी हिल्स जिले का मुख्यालय नोंगस्टोइन है। जाहिर है कि अच्छा-खासा शहर होगा। अन्यथा भीड़ भरा कस्बा तो होगा ही। पर्यटन से दूर मेघालय के ऐसे शहर कैसे लगते हैं, यह देखने की इच्छा थी। लेकिन जब यहाँ बाइपास मिला, तो शहर में जाने की सारी इच्छाएँ इधर-उधर हो गईं।
रास्ते में एक जगह बहुत सारे संतरे वाले बैठे थे। सभी स्थानीय ग्रामीण थे और इन्होंने सड़क किनारे ही बाँस-फूस की कामचलाऊ दुकानें बना ली थीं। हमें भी भूख लगी ही थी, तो रुक गए। उस दुकान की मालकिन ने एक हाथ में बीस का नोट और दूसरे हाथ में एक संतरा लेकर संकेतों से बताया कि एक संतरा बीस रुपये का है। यह था तो महंगा ही, लेकिन हमने बिना मोलभाव किए तुरंत पाँच संतरे ले लिए और यहीं बैठकर खाने लगे।
पता नहीं यह स्थान खासी हिल्स में है या गारो हिल्स में, लेकिन दोनों की सीमा के आसपास ही है।
हमें देखकर एक आदमी भागा-भागा आया और अपनी भाषा में कुछ कहने लगा। वह खुश भी नजर आ रहा था, लेकिन ऊँचा बोलने के कारण हमें नाराज-सा भी लग रहा था। हम बाहरी हैं, यह तो हमारे चेहरों पर ही लिखा है। और यहाँ कभी कोई बाहरी नहीं आता। ये जितने भी संतरे वाले हैं, ये हम जैसे लोगों के लिए नहीं बैठे हैं। यहाँ से गुजरने वाली इक्का-दुक्का गाड़ियों के लिए हैं। उधर गारो हिल्स अशांत इलाका भी है।
कहीं हम गारो हिल्स में ही तो नहीं हैं?
कहीं यह आदमी भी उन ‘अशांत’ लोगों में से ही तो नहीं है?
“फटाफट संतरे खाओ और निकलो यहाँ से। और अगर एकाध आदमी और भी आ गया, तब तो बिना संतरे खाए ही निकलने में भलाई है।” मैंने दीप्‍ति से कहा।
लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि यह इस दुकान का मालिक है और हमसे नाराज नहीं है। बल्कि बहुत खुश है। उसे हिंदी और अंग्रेजी नहीं आती थी, लेकिन बंगाली-असमिया के एक-दो शब्दों और हिंदी-अंग्रेजी के भी एक-दो शब्दों के इस्तेमाल से वह संवाद करने की कोशिश करता रहा। जब हम समझ गए कि यह खुश है, फिर हमें भी आनंद आने लगा।
“क्यमरा... क्यमरा...” उसने उंगली से मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा।
“यह क्या कह रहा है?”
“शायद बता रहा होगा कि इनके गाँव में होटल भी है और रुकने को कमरे भी। कमरा, कमरा कह रहा है।”
फिर उसने कैमरे की ओर इशारा किया और हम समझ गए कि यह ‘कमरा’ नहीं, बल्कि ‘कैमरा’ कह रहा है। उसके कुछ फोटो खींचे। उसने फोटो मांगे, तो हमें समझाना पड़ा कि इससे फोटो नहीं निकल सकते। उसके पास नोकिया-1100 फोन था, तो वह इसी फोन में फोटो ट्रांसफर करने को कहने लगा। फिर हमने आखिरकार उसका नाम अपनी डायरी में लिख लिया। उसने रोमन में लिखा - एम. सेम।
“खसिया लोग... अच्चा होता।” वह बोला।
यानी हम अभी खासी हिल्स में हैं। चलते समय उसने कहा कि वापसी में उनके यहाँ ही रुकें। हमने चारों ओर देखा। जंगल था और जंगल में कहीं-कहीं घर भी थे। इन्हीं में से एक घर इनका भी होगा। हमारी यह मुलाकात और बातचीत एकदम अप्रत्याशित थी। अचानक ही इतनी बातचीत हो गई। शुरू-शुरू में तो हमने यहाँ से भाग जाने का भी सोच लिया था। अगर हमें ऐसी मुलाकत का जरा-सा भी अंदाजा होता या शाम का समय होता, तो हम इनके यहाँ रुक जाने के बारे में सोच सकते थे। अब हमें किसी भी तरह की लूटपाट का कोई डर नहीं था।
लेकिन इनके यहाँ रुकने में एक बात का डर था। वो यह कि ये लोग हमारी बहुत शानदार आवभगत करेंगे।
अब आप सोचेंगे कि शानदार आवभगत में कैसा डर?
तो जी, अगर आप शाकाहारी हैं और मद्यपान से भी दूर रहते हैं, तो आपको पूर्वोत्‍तर के जंगलों में ‘शानदार आवभगत’ से डरना ही चाहिए। ज्यादातर लोग नहीं जानते कि बाहर की दुनिया में शाकाहार जैसा भी कुछ होता है। और अगर आप उनके द्वारा जी-जान से बनाया भोजन खाने से इंकार कर देंगे, तो यह निश्‍चित ही अच्छा तो नहीं माना जाएगा।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘मेघालय से उत्तर बंगाल’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




चेरापूंजी ऐसे ही नजारों के बीच स्थित है


शिलोंग-तुरा सड़क... इस शानदार्सड़क पर हम रोंगजेंग तक जाएँगे...




सीधे सड़क मासिनराम जाती है और दाहिने रोंगजेंग


पठार के ऊपर शानदार सड़क






यही है एम. सेम की दुकान



एम. सेम का परिवार



रोंगजेंग में हमने यह नई बनी शानदार सड़क छोड़ दी और दुधनोई की तरफ हो लिए...



बाय बाय मेघालय... अब पता नहीं कब मिलेंगे...







अगला भाग: उत्तर बंगा यात्रा: बक्सा टाइगर रिजर्व में

1 comment:

  1. मेघालय के अंदर के हिस्सों को घर बैठे जितनी आसानी से में समझ या रहा हु और घूम पा रहा हु वो अपने आप मे आपकी विशेष लेखनी का कमाल है...इससे पहले मेने कभी ऐसी जानकारियां नही पढ़ी थी और न ही ऐसी घुमक्कडी देखी थी....बहुत ही शानदार जानकारी से भरपूर पोस्ट....

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