Thursday, October 4, 2018

मेघालय यात्रा - डौकी-चेरापूंजी सड़क और सुदूर मेघालय के गाँव

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9 फरवरी 2018
रात तक हमारा इरादा चेरापूंजी पहुँचने का था। वैसे तो चेरापूंजी यहाँ से लगभग 80 किलोमीटर दूर है, लेकिन हमने एक लंबे रास्ते से जाने का इरादा किया। डौकी पुल पार करने के दो किलोमीटर बाद यह मुख्य सड़क तो सीधी चली जाती है और एक सड़क बाएँ जाती है, जो रिवाई होते हुए आगे इसी मुख्य सड़क में मिल जाती है। रिवाई के पास ही मावलिननोंग गाँव है, जो एशिया का सबसे साफ-सुथरा गाँव माना जाता है। इसके आसपास भी कुछ दर्शनीय स्थान हैं। उन्हें देखते हुए हम चेरापूंजी जाएँगे।
तो रिवाई का यह रास्ता बांग्लादेश सीमा के एकदम साथ-साथ चलता है। रास्ता तो पहाड़ पर है, लेकिन बीस-तीस मीटर नीचे ही पहाड़ समाप्‍त हो जाता है और मैदान शुरू हो जाता है। मैदान पूरी तरह बांग्लादेश में है और पहाड़ भारत में। अर्थात् हम अंतर्राष्ट्रीय सीमा से केवल बीस-तीस मीटर दूर ही चल रहे थे।
यहीं सड़क से जरा-सा नीचे सोंग्रामपुंजी जलप्रपात भी है। चूँकि जलप्रपात एकदम सीमा पर है, तो बांग्लादेशी खूब आते हैं यहाँ। इस जलप्रपात की गिनती बांग्लादेश के प्रमुख प्रपातों में होती है।
और थोड़ा आगे चलने पर बोरहिल प्रपात मिला। एकाध बूंद ही पानी टपक रहा था इस समय तो, लेकिन मानसून में जबरदस्त लगता होगा। इस प्रपात का भी निचला सिरा बांग्लादेश में है, तो अवश्य ही नीचे बांग्लादेशी यात्री भी खूब आते होंगे।
कैसा अद्‍भुत अनुभव होता होगा! प्रपात का ऊपरी सिरा भारत में और निचला सिरा बांग्लादेश में। हमें मानसून में आने का बहाना मिल गया।

इस रास्ते में कुछ यात्री भी आते-जाते मिले, जो निश्‍चित ही मावलिननोंग से आ रहे होंगे। उन्हें देखकर हमारा भी उत्साह बढ़ गया। अन्यथा लग रहा था कि गुमसुम-सा गाँव होगा और गाँव के कुत्‍ते हमें खदेड़ देंगे।
मावलिननोंग से दो किलोमीटर पहले एक पार्किंग थी और लिखा था - लिविंग रूट ब्रिज। अर्थात् जीवित पेड़ों की जड़ों का पुल। इसे देखने का मन हो गया। और भी गाड़ियाँ खड़ी थीं। कई दुकानें भी थीं। गौरतलब है कि यह स्थान पर्यटन नक्शे में नहीं है, हालाँकि अब कुछ यात्री जाने लगे हैं। ज्यादातर यात्री मेघालय के ही थे। हमें हर जगह मेघालय के यात्री मिले। खूब घूमते हैं। दो-तीन बंगाली भी मिले। कुछ विदेशी भी मिले। आपको शायद इस स्थान की जानकारी न हो। हमें भी नहीं थी, अचानक सामने आ गया तो रुक गए। हम तो बस मेघालय के इस अनजान इलाके में यूँ ही घूम रहे थे।
यह नोहवेट गाँव का हिस्सा है। घर एकदम साफ-सुथरे और उनसे भी साफ-सुथरी गलियाँ। हर घर के सामने बाँस के बने कूड़ेदान। न कोई कूड़ा, न कोई प्लास्टिक। कई घर होम-स्टे की सुविधा भी प्रदान करते हैं। हमारा यहीं रुकने का भी मन करने लगा।
पक्की गलियों से होते हुए ‘लिविंग रूट ब्रिज’ की ओर बढ़े तो ढलान मिलने लगा। पार्किंग से दूरी करीब आधा किलोमीटर है। पुल के पास दस-दस रुपये की पर्ची कटी। चेतावनी लिखी थी कि पुल पर रुकना मना है। इसके लिए दो लड़के बैठे थे, जिनका काम किसी को रुकते देखते ही सीटी बजा देना था।
लिखा था कि रबड़ के ये दो पेड़ 1840 में लगाए गए थे और फिर इनकी जड़ों को सुनियोजित तरीके से इस तरह बुना गया कि उस पेड़ की जड़ें इधर तक आ गईं और इस पेड़ की जड़ें उधर तक चली गईं। हालाँकि यह पुल कमजोर तो नहीं था, लेकिन फिर भी किसी को रुकने नहीं दिया जा रहा था। नदी में पानी बहुत कम था, इसलिए नीचे नदी में भी उतरा जा सकता था।
उस समय उन लोगों ने क्या सोचकर ऐसे पुल बनाए होंगे? पर्यटन के बारे में निश्‍चित ही नहीं सोचा होगा। मेघालय में ऐसे बहुत सारे पुल हैं।
ढाई बज चुके थे और दिन छिपने में अभी डेढ़ घंटा बाकी था। मैं इस स्थान से बड़ा प्रभावित हुआ। रुकना भी चाहता था और आगे भी बढ़ना चाहता था। हालाँकि मैं इस तरह की दुविधा में कम ही पड़ता हूँ, लेकिन आज दुविधा में था। यहाँ रुकें या चेरापूंजी चलें। फिर सबकुछ समय पर ही छोड़ दिया। जो हो रहा है, होने दो।
मोटरसाइकिल स्टार्ट की और मावलिननोंग की ओर चल दिए। गाँव में प्रवेश करते ही दो लड़कों ने रुकने को कहा और एक पर्ची आगे बढ़ा दी।
“यह क्या है?”
“एंट्री फीस।”
“गाँव में आने की एंट्री फीस लगती है क्या?”
“हाँ जी।”
“नहीं, हम वापस जा रहे हैं।”
और इस तरह एशिया के सबसे सुथरे गाँव में जाना भी रह गया और अभी तक जो दुविधा मन में चल रही थी, वो भी समाप्‍त हो गई। मुझे इन पर्चियों से कोई समस्या नहीं है। आगे चलकर हम और भी बहुत सारी पर्चियाँ कटवाने वाले थे, तो बाद में इनकी अहमियत पता चली। लेकिन फिलहाल भी बुरा नहीं लगा। गाँव में यात्री आ रहे हैं, तो उनसे दस-दस, बीस-बीस रुपये इकट्‍ठा करना स्वरोजगार के लिहाज से उचित भी है। और हम इस पैसे का सदुपयोग होते देख भी रहे थे। अभी नोहवेट गाँव ने बड़ा प्रभावित किया था। जनप्रतिनिधि आपकी सड़कें ठीक कर देंगे, कूड़ा निस्तारण का उपाय कर देंगे, बिजली की व्यवस्था कर देंगे; लेकिन जब तक एक-एक आदमी साफ-सफाई की महिमा नहीं समझेगा, तब तक सफाई नहीं हो सकती।
यहीं बगल में सड़क किनारे एक ‘बैलेंसिंग रॉक’ है। सड़क से यह नहीं दिखती। बाड़ लगा रखी है। काउंटर बना है। दस-दस रुपये। एक बहुत बड़ी चट्‍टान एक छोटी-सी चट्‍टान के ऊपर अद्‍भुत तरीके से संतुलित होकर रखी हुई है।
और अब तक पक्का हो गया था कि चेरापूंजी चलना है। समय हुआ था ढाई से पाँच मिनट ऊपर।


ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘एक अनजाने गाँव में’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




एक सूखा हुआ जलप्रपात... मानसून में इसमें अथाह जलराशि आती होगी...

डौकी से रिवाई की सड़क...

एक और शुष्क जलप्रपात...

नोहवेट गाँव के दर्शनीय स्थल...

लकड़ी के ‘अंडे’


नोहवेट में लिविंग रूट ब्रिज...







साफ-सुथरा नोहवेट गाँव...

साफ-सुथरा नोहवेट गाँव...


नोहवेट के पास ‘बैलेंसिंग रॉक’

चेरापूंजी के रास्ते में चाऊमीन-भोग...

अगर आप कभी डौकी जाओ, तो मेरा सुझाव है कि यहाँ कुछ समय जरूर बैठें... पिनुर्सला कस्बे से डौकी की तरफ है यह रेस्टॉरेंट...














अगला भाग: मेघालय यात्रा - चेरापूंजी में नोह-का-लिकाई प्रपात और डबल रूट ब्रिज

2 comments:

  1. वाह एक नए रास्ते की जानकारी....बढ़िया पोस्ट...

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