Monday, October 29, 2018

उत्तर बंगाल - लावा और रिशप की यात्रा

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15 फरवरी 2018
हमने सोच रखा था कि अपनी इस यात्रा में 2000 मीटर से ऊपर नहीं जाएँगे। क्योंकि मुझे लग रहा था कि इतनी ऊँचाई पर कहीं न कहीं ब्लैक आइस मिलेगी और मुझे ब्लैक आइस से बड़ा डर लगता है। और आज जब हम माल बाजार में थे, तो लावा जाने और न जाने का मामला बराबर अधर में लटका हुआ था।
“लेकिन लावा क्यों? अभी हमारे पास कई दिन हैं और हम सिक्किम भी घूमकर आ सकते हैं।” दीप्ति ने पूछा।
“वो इसलिए कि अपनी मोटरसाइकिल से सिक्किम जाने में गुरदोंगमर झील भी जाना जरूर बनता है और फिलहाल या तो वहाँ का रास्ता बंद मिलेगा या खूब सारी ब्लैक आइस मिलेगी। मैं बिना गुरदोंगमर के सिक्किम नहीं घूमना चाहता।”
दूसरी बात, कोई भी उत्तर भारतीय यात्री लावा घूमने नहीं जाता। वे दार्जिलिंग जाते हैं, सिक्किम जाते हैं, लेकिन लावा नहीं जाते। उत्तर बंगाल में जहाँ से भी कंचनजंघा दिख जाए, वही स्थान घूमने योग्य है। इसीलिए दार्जिलिंग प्रसिद्ध है। लावा से भी कंचनजंघा दिखती है, लेकिन दार्जिलिंग के आगे यह प्रसिद्ध नहीं हो पाया। फिर यह 2000 मीटर से ऊपर है। एक अलग ही नशा होता है, इतनी ऊँचाई वाले किसी अप्रसिद्ध स्थान में।
माल बाजार में आलू के पराँठे खाते हुए कुल्हड़ की मिष्टी दोई मिल गई, तो समझ आ गया कि हमारी यात्रा सही दिशा में जा रही है। उस कुल्हड़ को हमने जितनी तल्लीनता से नहीं चाटा होगा, बाद में एक पिल्ले ने उसे उससे ज्यादा तल्लीनता से चाट लिया।

माल बाजार से मोटरसाइकिल बाहर क्या निकली, सब हवा ही बदल गई। चारों ओर चाय के बागान, तराई के ढलान, घुमावदार सड़क और चाय से ढकी हुई छोटी-छोटी पहाड़ियाँ। मैं तीस सेकंड की वीडियो बनाने को कहता, दीप्ति तीस मिनट की बना देती। जितने खूबसूरत बागान यहाँ देखने को मिले, उतने कहीं और नहीं मिले। बंगाल के इस इलाके को दूआर कहते हैं। और दूआर अपने चाय-बागानों के लिए ही प्रसिद्ध है। कोई दूआर घूमने जा रहा है, तो समझ लीजिए कि वह चाय-बागानों में बैठकर चाय पीने जा रहा है।
गोरूबथान के बाद चढ़ाई शुरू हो गई। शुरू में अच्छी सड़क है, लेकिन जैसे-जैसे लावा नजदीक आने लगता है, यह खराब होने लगती है। इस पर रेशी और जुलुक तक की दूरियाँ लिखी आ रही थीं। गौरतलब है कि ये दोनों स्थान सिक्किम में हैं। जुलुक से आगे तो यह सड़क 4000 मीटर की ऊँचाई से भी गुजरती है। इससे नाथू-ला भी जाया जा सकता है।
“सड़क तो खुली ही होगी, चलें क्या जुलुक?” मैंने ब्लैक-आइस से डरते-डरते मजाक-मजाक में दीप्ति से पूछा। अगर इसने हाँ कर दिया, तो मना करना मुश्किल हो जाएगा।
“कितना दूर है यह?”
“सिक्किम में है, 4000 मीटर की ऊँचाई पर।” मैंने आखिरी पाँच शब्द जान-बूझकर जोड़े, ताकि वह एकदम मना कर दे।
और ऐसा ही हुआ - “नहीं जाना।”
लावा में प्रवेश करते ही हमारा स्वागत हुआ - वेलकम टू गोरखालैंड। गौरतलब है कि स्थानीय लोग पश्चिम बंगाल से अलग होकर अपना अलग राज्य गोरखालैंड बनाना चाहते हैं। इसके लिए भूतकाल में बड़े-बड़े प्रदर्शन भी हुए हैं - शांतिपूर्वक भी और हिंसक भी।
आज मैं पहली बार ‘गोरखालैंड’ में आया था। अभी तक मुझे नहीं पता कि यह बाकी बंगाल से कैसे अलग है। लोगों से बातचीत करके इस बारे में जानने का प्रयत्न करेंगे।
“हमारी भाषा, बोली, रहन-सहन कुछ भी बंगाली नहीं है। हमारी भाषा नेपाली से मिलती-जुलती है, बंगाली तो कतई नहीं है। यह बंगाली लिपि में भी नहीं लिखी जाती, बल्कि देवनागरी में लिखी जाती है। और हमें न चाहते हुए भी बंगाली पढ़नी पड़ती है।” एक दुकानदार ने बताया।
“तो क्या स्कूली पढ़ाई बंगाली भाषा में होती है?”
“नहीं, स्कूली पढ़ाई अंग्रेजी में होती है, लेकिन बंगाल का हिस्सा होने के कारण बंगाली का भी प्रेशर रहता है। यह हमारी भाषा नहीं है। हमारी भाषा हिंदी के ज्यादा नजदीक है।”
बाद में गौर किया तो पाया कि पश्चिम बंगाल के पहाड़ी हिस्सों में हर जगह देवनागरी का चलन है। देवनागरी में अखबार तक निकलते हैं। बंगाली अखबार हमें कहीं नहीं दिखा।
लावा नेवरा वैली नेशनल पार्क से लगता हुआ है। जाहिर है कि यह चारों ओर से जंगल से घिरा है। हिमालय के जंगलों में कौन-कौन-से जानवर होते हैं? तो काला भालू और तेंदुए को आप हमेशा जोड़ लीजिए। इसके बाद किसी अन्य जानवर का नाम लीजिए। नेवरा वैली में बाघ भी हैं। पार्क में जाने की अनुमति यहीं लावा से मिलती है। कल हम वहाँ जाएँगे।
यहाँ से कुछ ही आगे रिशप नामक स्थान है। यह 2200 मीटर से भी ऊपर है और यहाँ से कंचनजंघा दिखती है। कंचनजंघा ऐसी चोटी है, जिसे आप कहीं से भी देखो, हमेशा शानदार ही दिखेगी। रिशप के लिए चले तो रास्ते में फोरेस्ट ऑफिस पड़ा। सोचा कि कल नेवरा वैली जाने के बारे में जानकारी ले लेते हैं।
...
तो रिशप के लिए चल दिए। पर्याप्‍त चौड़ा रास्ता है, लेकिन बहुत खराब है। छह-सात किलोमीटर आगे चाय की कुछ दुकानें मिलीं। इनकी बगल में एक छोटा-सा ‘रिज’ था और हमने योजना बनाई थी कि इस रिज पर बैठकर कंचनजंघा और सूर्यास्त दोनों एक-साथ देखेंगे।
हवा बड़ी तेज चल रही थी और तापमान शून्य के आसपास था। ऐसे में चाय और मोमो खाकर और कुछ बिस्कुट आदि लेकर हम इस रिज पर चढ़ने लगे। एक कच्चा रास्ता रिशप के लिए जा रहा था। रिज पर पहुँच गए, लेकिन अत्यधिक घने जंगल के कारण दूसरी तरफ कुछ भी नहीं दिख रहा था। यह जंगल इतना घना था कि अंधेरा प्रतीत हो रहा था। आप कभी इधर आओ, तो भले ही लावा या रिशप मत रुकना, लेकिन कुछ देर यहाँ इस जंगल में अवश्य बैठना।
और कुछ दूर रिशप की ओर जाने पर थोड़ी-सी खुली जगह मिली और कंचनजंघा दिख गई। हमें कंचनजंघा की पहचान नहीं थी और यहाँ बताने वाला भी कोई नहीं था, लेकिन इसमें अलग ही आकर्षण था। हमारी नजरें अनायास ही एक चोटी पर जाकर टिक जातीं और हमने मान लिया कि वही कंचनजंघा है।
और वास्तव में वही कंचनजंघा थी।
एवरेस्ट की ‘खोज’ से पहले कंचनजंघा ही दुनिया की सबसे ऊँची चोटी थी।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘लावा और नेवरा वैली नेशनल पार्क’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




मोटरसाइकिल का भी ध्यान रखना होता है साब...



माल से लावा के बीच बहुत खूबसूरत बागान हैं...




गोरखालैंड में आपका स्वागत है...




रिशप के घने जंगल...




रिशप से दिखती कंचनजंघा...



















अगले भाग में जारी...

3 comments:

  1. बहुत धन्यवाद नीरज भाई सपनो की दुनिया मे घुमा दिया आपने....लावा रिशप lolegaon हसीमारा यह सब बहुत खूबसूरत है और ड्रीम बकेट लिस्ट में है...फोटो बहुत टेम्प्टिंग है खास तौर से वो जंगल वाले....अगर नाथू ला की हा हो जाती तो जेलेप ला पे जाने को मिलता क्या फरवरी मे...

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  2. बेहतरीन यात्रा वर्णन | रोमांचक होते हैं आपकी यात्रा | पढ़ने पढते हम भी साथ घूम लेते हैं नीरज भाई |

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