मेघालय यात्रा - नरतियंग दुर्गा मंदिर और मोनोलिथ

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8 फरवरी 2018
हम योजना बनाने में नहीं, बल्कि तैयारी करने में विश्वास करते हैं। इस यात्रा के लिए हमने खूब तैयारियाँ की थीं। चूँकि हमारी यह यात्रा मोटरसाइकिल से होने वाली थी, तो मेघालय में सड़कों की बहुत सारी जानकारियाँ हमने हासिल कर ली थीं। गूगल मैप हमारा प्रमुख हथियार था और मैं इसके प्रयोग में सिद्धहस्त था। भारत के प्रत्येक जिले की अपनी वेबसाइट है। इन वेबसाइटों पर उस जिले के कुछ उन स्थानों की जानकारी अवश्य होती है, जिन्हें पर्यटन स्थल कहा जा सकता है।
मेघालय में शिलोंग और चेरापूंजी ही प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हैं। इनके आसपास सौ-पचास किलोमीटर के दायरे में भी कुछ स्थान लोकप्रिय होने लगे हैं। लेकिन मेघालय 350 किलोमीटर लंबाई और 100 किलोमीटर चौड़ाई में फैला है। इसमें 11 जिले भी हैं। सबसे पूरब में जयंतिया पहाड़ियों में दो जिले, बीच में खासी पहाड़ियों में चार जिले और पश्चिम में गारो पहाड़ियों में पाँच जिले हैं।

आप अगर एक साधारण यात्री की तरह कुछ सीमित दिनों के लिए मेघालय या किसी भी राज्य में जा रहे हैं और लोकप्रिय पर्यटन स्थानों से हटकर कुछ देखना चाहते हैं, तो जिलों की वेबसाइटें आपको अपने-अपने जिलों के कुछ स्थानों के बारे में बता देंगी। कुछ थोड़ा-सा काम गूगल मैप कर देगा और बाकी काम आपको करना होगा। हमने भी ऐसा ही किया था।

और इस तरह पता चला हमें नरतियंग का। यहाँ एक शक्तिपीठ है और जयंतिया राजाओं का महल भी है। प्रारंभ में महल ने तो उतना आकर्षित नहीं किया, लेकिन शक्तिपीठ ने जरूर आकर्षित किया। जोवाई से नरतियंग 25 किलोमीटर दूर है और अच्छी सड़क बनी है। गूगल मैप देखते-देखते शक्तिपीठ पहुँचे, लेकिन आबादी के बीच स्थित मंदिर के सामने जाकर भी कोई सूचना-पट्ट न पाकर बच्चों से पूछना पड़ा - “मंदिर किधर है?”
बच्चे उत्सुकता से हमें देख रहे थे और खुसर-पुसर कर रहे थे। कोई उत्तर न आने का मतलब था कि इन्हें हिंदी नहीं आती। फिर अंग्रेजी में पूछा - “टेंपल?”
एक लड़के ने इशारा तो किया, लेकिन वह इशारा कम और अंगडाई ज्यादा लग रहा था। मुझे तसल्ली नहीं हुई। मोबाइल निकाला और इत्मीनान से गूगल मैप में सैटेलाइट व्यू देखा। सैटेलाइट में हमसे पचास मीटर दूर लाल छत की दो इमारतें दिखाई पड़ीं। उस दिशा में देखा, तो एक खुला दरवाजा दिखा। मोटरसाइकिल यहीं रास्ते में छोड़कर उस दरवाजे में प्रवेश किया, तो हमारे एकदम सामने था एक मंदिर।
नरतियंग दुर्गा मंदिर।
अंदर एक परिवार था। फैले बर्तनों, कपड़ों और उठने-बैठने के हावभाव से लग रहा था कि ये लोग यहीं रहते हैं। औपचारिक बातचीत हुई। ये मंदिर के पुजारी थे, जो सपरिवार यहीं रहते हैं। और कोई भी नहीं था मंदिर में। इन्होंने मंदिर के मुख्य द्वार का ताला खोला और इस तरह हमने एक और शक्तिपीठ के दर्शन किए।
हमेशा की तरह मैं इस मंदिर की भी पौराणिक कहानियाँ सुनाने के मूड़ में नहीं हूँ। लेकिन यहाँ मेरा मन लग रहा था। हमारे दर्शन कर लेने के बाद पुजारी ने फिर से ताला लगा दिया और मंदिर के पीछे कुर्सी डालकर धूप में जा बैठे। मैं भी उनके पास फर्श पर ही बैठ गया। पुजारी जी तुरंत उठे और हमारे लिए दो छोटे-छोटे मूढे ले आए।
तेज हवा चल रही थी और ठंड अच्छी-खासी थी। इसलिए धूप बड़ी प्यारी लग रही थी। फिर मैं कुछ बातचीत भी करना चाहता था।
गौरतलब है कि मेघालय एक ईसाई-बहुल राज्य है। हिंदू नगण्य हैं। लेकिन हमेशा से तो ऐसा नहीं था। आखिर नरतियंग में जयंतिया राजाओं का ग्रीष्मकालीन निवास था। फिर मेघालय तो बंगाल और असम के बीच में एक छोटी-सी पट्टी-भर है, तो नरतियंग के रास्ते खूब आवागमन हुआ करता होगा।
लेकिन अंग्रेजी काल में खूब धर्म-परिवर्तन हुआ। यह आज भी जारी है। और 1947 में इधर से बंगाल का आवागमन भी बंद हो गया। नरतियंग इतिहास में दफन हो गया। मंदिर को भी कोई पूछने वाला नहीं रहा।
“महाराज जी, नाम क्या है आपका?”
“उत्तम देशमुख।”
“देशमुख? महाराष्ट्र से हो?”
“हाँ जी, 29 पीढी पहले हमारे पूर्वज यहाँ आए थे।”
“29 पीढी… मतलब कम से कम 600 साल पहले?”
“हाँ जी।”
“तो इसका कोई लेखा-जोखा है आपके पास?”
“नहीं, लेखा-जोखा तो नहीं है। बस, सुनते आ रहे हैं हम भी।”
“और मंदिर के क्या हाल चल रहे हैं आजकल?”
“कुछ भी नहीं। यहाँ कोई भी नहीं आता। नवरात्रों में बंगाली लोग आ जाते हैं, बाकी पूरे साल कभी-कभार ही आता है कोई।”
“इस गाँव में हिंदू ज्यादा हैं या ईसाई?”
“सभी ईसाई हैं। हमारे अलावा यहाँ एक भी हिंदू नहीं।”
“तो इस वजह से समस्या नहीं होती आपको?”
“समस्या क्या होगी? रहते आ रहे हैं सभी लोग एक साथ।”
“बच्चों की पढ़ाई किस भाषा में होती है?”
“इंग्लिश।”
“लोकल भाषा में पढ़ाई नहीं होती क्या? जयंतिया या खसिया में?”
“नहीं।”
“लेकिन आपके बच्चे तो हिंदी भी बोल रहे हैं।”
“इन्हें हिंदी हम सिखाते हैं। असम से किताबें लाकर हिंदी पढ़ना सिखाते हैं और बोलना भी सिखाते हैं।”
“पूरे गाँव में केवल ये तीन बच्चे ही हिंदी जानते होंगे?”
“हाँ जी।”
“उधर रामकृष्ण मिशन का एक पत्थर लगा है।”
“उन्हीं के प्रयासों से यह मंदिर जीवित है अभी तक। अन्यथा न मंदिर होता, न हम होते।”
बस, बातें खत्म हो गईं। मुझे अब कुछ भी नहीं सूझ रहा था कि क्या बात करूँ। और पुजारी भी शांत स्वभाव के ही थे। उन्होंने भी अपनी तरफ से न कुछ बताया, न कुछ पूछा।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘नरतियंग’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे क्लिक करें:




नरतियंग दुर्गा मंदिर, जो कि एक शक्तिपीठ भी है।


मंदिर के पुजारी जी के साथ बतियाते हुए...

पुजारी के बच्चे



मंदिर प्रांगण का प्रवेश द्वार



मोनोलिथ पार्क के अंदर...

पत्थर के ये स्तंभ जैसे दिखने वाले टुकड़े ही ‘मोनोलिथ’ हैं, जिन्हें मेघालय के लोग ईसाई बनने से पहले बेहद पवित्र मानते थे...




मेघालय की आज की पीढ़ी इनके बारे में बात करने से हिचकती है...





जोवाई के पास एक जलप्रपात है... नाम है तिरची जलप्रपात... वहाँ जाने का रास्ता

फरवरी में मेघालय में बारिश नहीं होती... फिर भी इसमें पानी था...




यहाँ अच्छा नेटवर्क था, इसलिए फेसबुक पर ‘लाइव’ भी चला दिया...





अगला भाग: मेघालय यात्रा: जोवाई से डौकी की सड़क और क्रांग शुरी जलप्रपात

Comments

  1. मेरे दृष्टिकोण से हिन्दू धर्म की अहिंसा वादिता , अति सहिष्णुता , सर्वधर्म समभाव की नीति ही हिन्दू धर्म के ह्रास का कारण बना है आज हिन्दू सिमट रहे है ; विश्व का सबसे पुराना , वैज्ञानिक और विशाल धर्म केवल भारतीय उप महाद्वीप में ही सिमट गया है . मेघालय में भी यही हुआ और हिन्दू वहां बहुसंख्यक से नगण्य हो गए .

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  2. आपकी यह पोस्ट काफी कुछ सोचने पर विवश कर रही है

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  3. आज पूरा पूर्वोत्तर ही ईसाई हो गया । बढ़िया जानकारी दी ।

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