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मेघालय यात्रा - चेरापूंजी के अनजाने स्थल

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11 फरवरी 2018
यहाँ से आगे बढ़े तो ‘सेवन सिस्टर्स फॉल’ पड़ा। बड़ी दूर तक खड़ी चट्‍टानें चली गई हैं और ऊपर से कई स्थानों से पानी गिरता होगा। इस समय एक बूंद भी पानी नहीं था।
इससे आगे थंगखरंग पार्क है। मेन रोड़ से डेढ़ किलोमीटर हटकर। लेकिन यह वन विभाग का पार्क है। पठार के उस हिस्से के एकदम ऊपर स्थित है, जहाँ से दक्षिण में खड़ा ढलान आरंभ हो जाता है और यह ढाल बांग्लादेश सीमा तक जाता है। वातावरण में धुंध-सी थी, अन्यथा यहाँ से बांग्लादेश के मैदान भी दिख जाते। इस पार्क के पश्‍चिम में किनरेम जलप्रपात भी दिखता है। लेकिन बाकी सभी जलप्रपातों की तरह इसमें भी एक-दो बूंद ही पानी था। लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति और इसका खुलापन बता रहा था कि बारिश के दिनों में यह मेघालय के सबसे खूबसूरत जलप्रपातों में से एक बन जाता होगा।
किनरेम प्रपात के नीचे से सड़क भी जाती है, जिससे थोड़ी देर बाद हम जाएँगे।




यह तो हुई सामान्य पर्यटन की बात। आज अभी तक जितना हम घूमे, उतना तो चेरापूंजी आने वाले सभी यात्री घूमते ही हैं। अब हम आपको ले चलते हैं, पर्यटन से दूर एक ऐसे स्थान की तरफ, जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी।
अब कोई मुझसे यह नहीं पूछेगा कि मुझे कैसे पता चला।
तो जब आप चेरापूंजी से मॉसमाई की ओर जाते हैं, तो जगह-जगह आपको शेला और भोलागंज की दूरियाँ लिखी दिखती हैं। चेरापूंजी से भोलागंज लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण में है। मॉसमाई गुफाएँ 1200 मीटर की ऊँचाई पर हैं। इसके बाद पठार से नीचे उतरने के लिए ढलान आरंभ हो जाता है और भू-दृश्य एकदम बदल जाता है। हमारे एक तरफ होती हैं, एकदम सीधी खड़ी कई सौ मीटर ऊँची चट्‍टानें और एक तरफ होती है, गहरी घाटी। लेकिन इधर भी कई गाँव हैं। आगे बढ़ते-बढ़ते जब हम किनरेम प्रपात के नीचे से गुजरते हैं, तो हम समुद्र तल से 500 मीटर ऊपर होते हैं।
मॉसमाई के बाद से ही यह सड़क खराब है, जो आगे बढ़ने पर और भी खराब होती चली जाती है। मावलोंग गाँव के पास एक तिराहा है। सीधी सड़क थोड़ा घूमकर भोलागंज जाती है और एक सड़क दाहिने मुड़कर भोलागंज जाती है, जो कुछ छोटी है। मैंने पहले ही सोच रखा था कि इस छोटी सड़क से जाना है। दिमाग में कई दिन पहले से ही बैठा हुआ था कि मावलोंग से दाहिने जाने वाली सड़क ही पकड़नी है।
लेकिन यहाँ मैंने एक भूल कर दी। इस छोटी सड़क का भूगोल देखना भूल गया। यह कितनी ऊँचाई से गुजरती है, यह देखना भी भूल गया।
लेकिन भूल का एहसास तो बाद में होता है। मेरे तो मन में पहले से ही था कि छोटी सड़क से ही जाना है, तो हम दाहिने मुड़ गए। इस समय हम समुद्र तल से लगभग 450 मीटर ऊपर थे। भोलागंज 100 मीटर से भी नीचे स्थित है।
अब बड़ी तेज चढ़ाई का सामना करना पड़ा और 3-4 किलोमीटर चलने के बाद हम 750 मीटर की ऊँचाई पर पहुँच गए। यहाँ एक चौराहा है। एक सड़क सीधे चेरापूंजी जाती है, एक तिरना जाती है जहाँ से डबल रूट ब्रिज का पैदल रास्ता आरंभ होता है, एक सड़क मॉसमाई की तरफ जाती है जिससे अभी हम आए थे और एक जाती है भोलागंज। हम भोलागंज की ओर मुड़ गए। मुझे उम्मीद थी कि इस स्थान के बाद उतराई मिलेगी और हम धीरे-धीरे उतरते-उतरते भोलागंज पहुँच जाएँगे।
लेकिन इसके बाद भी चढ़ाई जारी रही और हम 900 मीटर से भी ऊपर तक पहुँच गए। अब माहौल का अंदाजा हुआ, तो स्थिति की गंभीरता का एहसास होने लगा। अगर तिरना वाले उस मोड़ से उतराई शुरू हो जाती, तो अब तक हम 600 मीटर पर होते और समीकरण कुछ और होते। लेकिन अब समीकरण कुछ और थे। भोलागंज केवल 10 किलोमीटर दूर बाकी था और हम उससे 900 मीटर ऊपर खड़े थे। यानी 10 किलोमीटर में हमें 900 मीटर नीचे उतरना है। यह अनुपात पैदल ट्रैकिंग में भी अच्छा-खासा मुश्किल होता है। मोटरसाइकिल पर भी मुश्किल ही होगा।
अगर सड़क पक्की होती, तो धीरे-धीरे उतर जाते; लेकिन सड़क पर छोटे-छोटे पत्थर ही पत्थर थे। मैदान में कभी जब नई सड़क बनती है और उस पर पत्थर ही पत्थर पड़े होते हैं, तो आप उस पर मोटरसाइकिल चलाते हुए गिरेंगे या बचेंगे? लेकिन यहाँ तो बहुत तेज ढलान था। ऐसे ढलान पर जहाँ पत्थर या बजरी की बहुतायत हो, अगला ब्रेक कभी नहीं लगाना चाहिए। और पिछला ब्रेक तब लगेगा, जब एक पैर जमीन से उठकर ब्रेक तक पहुँचेगा। लगभग जीरो स्पीड़ में दोनों ही पैर जमीन पर टिकाने पड़ रहे थे। क्लच और गियर से भी ब्रेक लगाने चाहे, लेकिन इंजन स्टार्ट हो जाता था और बाइक संभालनी मुश्किल हो जाती थी।
आखिरकार हाथ खड़े कर दिए। हम लगभग 800 मीटर तक ही आए होंगे। आगे भी ऐसा ही ढलान है। बल्कि 500 मीटर के नीचे तो इससे भी तेज ढलान है।
“अब मुझसे नहीं होगा।” मोटरसाइकिल एक तरफ खड़ी कर दी और दम लेने लगा। ऐसा लग रहा था, जैसे मैं मोटरसाइकिल को नहीं बल्कि मोटरसाइकिल मुझे चला रही हो।
“हाँ, ठीक है। अगर पहुँच भी गए, तो चढ़ने में समस्या आएगी।” दीप्ति ने कहा।
“नहीं, चढ़ने में कोई समस्या नहीं आएगी। पहले गियर में डालकर आराम से बैठ जाना है। चढ़ाई में संतुलन बनाना नहीं पड़ता, अपने-आप बन जाता है।”
“लेकिन हम वहाँ जा क्यों रहे हैं? हमारे अलावा कोई भी नहीं जा रहा।”

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘चेरापूंजी’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे क्लिक करें:





‘सेवन सिस्टर्स वाटरफाल’... फिलहाल इनमें एक बूंद भी पानी नहीं था...



थंगखरंग पार्क के अंदर





थंगखरंग पार्क से जो सड़क जाती दिख है, वह भोलागंज जाती है... हम भी कुछ देर में उसी पर जाने वाले हैं...

सामने जहाँ सड़क में हल्का-सा मोड़ है, वहाँ किनरेम जलप्रपात है... उसमें भी पानी नहीं था...

किनरेम जलप्रपात के नीचे से गुजरती सड़क... आप कल्पना कर सकते हैं, जब मानसून में यहाँ अथाह पानी होता होगा...




और हम पहुँच गए किनरेम प्रपात के एकदम नीचे... उसी सड़क पर...




भोलागंज की ओर जाती सड़क...

आखिरकार बहुत तेज ढलान और छोटे-छोटे पत्थरों के कारण वापस मुड़ गए और भोलागंज जाना रह गया...



इधर भी एक ‘लिविंग रूट ब्रिज’ है...





जब हम वापस लौट रहे थे, तो दूर.. बहुत दूर.. नोह-का-लिकाई की झलक दिखी थी...

इधर तेजपत्ते का बड़ा कारोबार है... गाड़ियाँ भर-भरकर तेजपत्ता बाहर जाता है... हमने भी बैग भर लिया...

यह है तिरना गाँव, जहाँ से डबल रूट ब्रिज के लिए रास्ता जाता है... पीछे सबसे दूर वाले पहाड़ पर नोह-का-लिकाई प्रपात है...





अगला भाग: मेघालय यात्रा - गार्डन ऑफ केव, चेरापूंजी का एक अनोखा स्थान






1. मेघालय यात्रा - गुवाहाटी से जोवाई
2. मेघालय यात्रा - नरतियंग दुर्गा मंदिर और मोनोलिथ
3. मेघालय यात्रा - जोवाई से डौकी की सड़क और क्रांग शुरी जलप्रपात
4. मेघालय यात्रा - डौकी में पारदर्शी पानी वाली नदी में नौकाविहार
5. मेघालय यात्रा - डौकी में भारत-बांग्लादेश सीमा पर रोचक अनुभव
6. मेघालय यात्रा - डौकी-चेरापूंजी सड़क और सुदूर मेघालय के गाँव
7. मेघालय यात्रा - चेरापूंजी में नोह-का-लिकाई प्रपात और डबल रूट ब्रिज
8. मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी
9. मेघालय यात्रा - चेरापूंजी के अनजाने स्थल
10. मेघालय यात्रा - गार्डन ऑफ केव, चेरापूंजी का एक अनोखा स्थान
11. अनजाने मेघालय में - चेरापूंजी-नोंगस्टोइन-रोंगजेंग-दुधनोई यात्रा
12. उत्तर बंगाल यात्रा - बक्सा टाइगर रिजर्व में
13. उत्तर बंगाल यात्रा - तीन बीघा कोरीडोर
14. उत्तर बंगाल - लावा और रिशप की यात्रा
15. उत्तर बंगाल यात्रा - नेवरा वैली नेशनल पार्क
16. उत्तर बंगाल यात्रा - लावा से लोलेगाँव, कलिम्पोंग और दार्जिलिंग
17. दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के साथ-साथ
18. सिलीगुड़ी से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा




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