Friday, October 26, 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - तीन बीघा कोरीडोर

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14 फरवरी 2018
हम इतिहास की गहराइयों में नहीं जाएँगे, लेकिन इतना जान लीजिए कि आजादी से पहले इधर दो प्रमुख रियासतें हुआ करती थीं – कूचबिहार रियासत और रंगपुर रियासत। बँटवारा हुआ तो कूचबिहार भारत में आ गया और रंगपुर पूर्वी पाकिस्तान में। लेकिन इन दोनों रियासतों की सीमाएँ बड़ी अजीबो-गरीब थीं। एक रियासत के अंदर दूसरी रियासत की जमीनें थीं, जिन्हें ‘एंकलेव’ कहते हैं। यहाँ तक कि एक एंकलेव के अंदर दूसरा एंकलेव भी था और एक जगह तो तिहरा एंकलेव भी। बँटवारे में एंकलेव भी बँट गए। 1971 में बांग्लादेश बना, तब तक भी मामला ऐसा ही था।
मुझे पता है कि ऊपर का पैरा आप बिल्कुल भी नहीं समझे होंगे। चलिए, आसान शब्दों में बताता हूँ। एंकलेव मतलब एक देश की मुख्यभूमि के अंदर दूसरे देश के आठ-दस गाँव, जो चारों ओर से पूरी तरह पहले देश से घिरे हुए हों। भारत के अंदर बांग्लादेश के गाँव भी थे और बांग्लादेश के अंदर भारत के गाँव भी। ऐसे एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 200 एंकलेव थे। यानी भारत के उस एंकलेव में स्थित आठ-दस गाँवों के लोगों को अगर कोलकाता या सिलीगुड़ी कहीं भी जाना होता था, तो बांग्लादेश से होकर ही निकलना पड़ता था। इसी तरह बांग्लादेश वालों को अपने ही देश में जाने के लिए भारत से होकर जाना होता था। और आप जानते ही हैं कि भारत और बांग्लादेश के बीच वीजा लेकर ही आवागमन किया जा सकता है। इन गाँवों में कोई वीजा अधिकारी नहीं बैठा होता था।
अब तो समझ गये ना आप? ठीक है, तो अब आपके दिमाग की और ज्यादा चक्कर-घिरनी बनाते हैं।
एंकलेव वाले इन आठ-दस गाँवों के बीच में एक-दो गाँव फिर से ‘उप-एंकलेव’ होते थे। यानी बांग्लादेश के अंदर भारत के जो आठ-दस गाँव थे, उनके बीच में एक-दो गाँव बांग्लादेश के भी होते थे, जो चारों ओर से भारत के उन आठ-दस गाँवों से घिरे होते थे। यानी एक गाँव बांग्लादेश का, उसके चारों ओर के आठ-दस गाँव भारत के और उनके चारों ओर बांग्लादेश की मुख्यभूमि। यानी बांग्लादेश के उस एक गाँव के लोगों को अपने ही देश में जाने के लिए भारत के उस हिस्से से होकर जाना पड़ेगा, जो स्वयं चारों ओर से बांग्लादेश से घिरा है।
दोनों देशों में एक-दूसरे के इस तरह के 40-50 ‘उप-एंकलेव’ थे।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। एक हेक्टेयर से भी कम का एक छोटा-सा खेत तो पूरी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा नमूना था। यह ‘उप-उप-एंकलेव’ था। इसे यूँ समझिए कि बांग्लादेश की मुख्यभूमि के अंदर भारत के आठ-दस गाँव थे, भारत के इन आठ-दस गाँवों के अंदर बांग्लादेश के एक-दो गाँव थे और बांग्लादेश के इन एक-दो गाँवों के अंदर भारत का एक हेक्टेयर से भी छोटा खेत था। इस छोटे-से खेत के चारों कोनों पर ‘बॉर्डर-पिलर’ तक लगे थे। इस खेत का मालिक खेत में नहीं रहता था, बल्कि भारत के उन आठ-दस गाँवों में से किसी एक में रहता था और उसे अपने घर से कुछ ही दूर स्थित अपने खेत में जाने के लिए बांग्लादेश से होकर जाना पड़ता था।
सोचकर भी हैरानी होती है कि उसके खेत की चारों सीमाएँ अंतर्राष्ट्रीय सीमाएँ थीं।
यह सब पढ़ना बड़ा मजेदार लगता है। 2013 में जब मुझे पहली बार इस बात का पता चला तो मैं भी रोमांचित हो उठा था। सोच लिया था कि जाऊँगा किसी दिन वहाँ। इंटरनेट पर इसके बारे में पढ़ने लगा था। और तब पता चला कि लगभग 200 एंकलेवों के निवासी किसी भी देश के नागरिक नहीं हैं। इसलिए अपराध-दर बहुत ज्यादा है। पुलिस जैसी चीज नहीं। एक देश का गाँव दूसरे देश के गाँव पर आक्रमण कर देता है और कोई कुछ भी नहीं कर सकता। सेना को भी अपने ही इलाके में जाने के लिए दूसरे देश से होकर जाना पड़ता है और कोई दूसरे देश की सेना को ऐसी अनुमति कैसे दे सकता है?
बड़ा पेचीदा मामला था। दोनों तरफ से एंकलेवों के आदान-प्रदान की मांग बढ़ती जा रही थी। आखिरकार यह मांग 2015 में पूरी हुई। भारत के बहुत सारे एंकलेव बांग्लादेश में चले गए और बांग्लादेश के बहुत सारे एंकलेव भारत में आ गए। भारत के उस छोटे-से खेत का भी बांग्लादेश में विलय हो गया। वर्तमान में एक ही एंकलेव बाकी है – बांग्लादेश का दहग्राम; जो कि चारों ओर से भारत की मुख्यभूमि से घिरा है।
दहग्राम लगभग 9 किलोमीटर लंबा और 4 किलोमीटर चौड़ा क्षेत्र है, जो भारत से घिरा है। बांग्लादेश की मुख्यभूमि से इसकी न्यूनतम दूरी 200 मीटर है। 1974 में एक समझौता हुआ था जिसके तहत बांग्लादेश अपना कोई अन्य इलाका भारत को देगा और भारत यह 200 मीटर की पट्‍टी बांग्लादेश को सौंपेगा। ऐसा करने से दहग्राम सीधा बांग्लादेश की मुख्यभूमि से जुड़ जाता।
इसी 200 मीटर लंबी और 80 मीटर चौड़ी पट्‍टी को ‘तीन बीघा कोरीडोर’ कहते हैं।
लेकिन अगर तीन बीघा कोरीडोर बांग्लादेश में चला जाता, तो भारत का कूचलीबाड़ी क्षेत्र भारत की मुख्यभूमि से लगभग अलग हो जाता और एक एंकलेव-जैसा बन जाता। क्योंकि कूचलीबाड़ी के पश्‍चिम में तीस्ता नदी है और वे लोग जलमार्ग का प्रयोग करके भारत की मुख्यभूमि में जा सकते थे, लेकिन जब तीन बीघा कोरीडोर के माध्यम से थलमार्ग का विकल्प है, तो क्यों जलमार्ग के भरोसे रहें? तीन बीघा कोरीडोर को बांग्लादेश को सौंपने के विरोध में कूचलीबाड़ी वालों ने बड़ी मेहनत की, हिंसा भी हुई और आखिरकार 7 अक्टूबर 1982 को यह कोरीडोर बांग्लादेश के लिए भी खोल दिया गया, लेकिन इसका प्रभुत्व भारत के ही पास रहा। इससे कूचलीबाड़ी भी भारत की मुख्यभूमि से थलमार्ग से जुड़ा रहा और दहग्राम भी बांग्लादेश की मुख्यभूमि से जुड़ गया।
फिलहाल इस कोरीडोर में दो सड़कें एक-दूसरे को नब्बे डिग्री पर काटती हैं। एक उत्तर-दक्षिण सड़क जो कूचलीबाड़ी के लिए है और दूसरी पूर्व-पश्‍चिम सड़क जो दहग्राम के लिए है।
इतना लिखने का मतलब यह है कि अब हम जहाँ जा रहे हैं, आप वहाँ के बारे में परिचित हो सकें। बिना परिचय के कहीं भी जाना अच्छा नहीं लगता। लेकिन याद रखना कि अभी हम वहाँ पहुँचे नहीं हैं। अभी हम चांगराबांधा में ही हैं। चांगराबांधा में रेलवे स्टेशन है और कुछ ही दूर भारत-बांग्लादेश की सीमा भी है। बांग्लादेश जाने वाले ट्रकों की लंबी लाइन लगी थी। ज्यादातर ट्रक तो भारतीय ही थे, कुछ ट्रक भूटान के भी थे और बहुत सारे ट्रक बांग्लादेशी भी। मुख्यतः पत्थर की ढुलाई होती है यहाँ से।
चांगराबांधा से तीन बीघा कोरीडोर 21 किलोमीटर दूर है और अच्छी सड़क बनी है। हमें लगातार एहसास बना हुआ था कि हमारे बायीं तरफ बांग्लादेश की सीमा है और जब एक जगह तारबंदी दिखाई पड़ी तो हम रोमांचित हो उठे। लेकिन चूँकि यह शून्य पर्यटन वाला क्षेत्र है और कुछ ही समय पहले यहाँ सीमाओं का स्थायी बंदोबस्त हुआ है, इसलिए रुककर फोटो लेने की हिम्मत नहीं पड़ी।
हमें आते देख कई बच्चे सड़क पर आ गए और रुकने का इशारा करने लगे। मेरी धड़कनें बढ़ गईं। पता नहीं क्या गड़बड़ है। लेकिन नजदीक पहुँचकर जब देखा कि बगल में मंदिर है और बच्चे महाशिवरात्रि के लिए चंदा मांग रहे हैं, तो सारा डर समाप्‍त हो गया।
एक जगह एक बोर्ड लगा था – एंकलेव सेटलमेंट कैंप। मैं बताना भूल गया था कि 2015 में जब एंकलेवों का आदान-प्रदान हुआ और देशों की सीमाएँ बदलीं, तो बांग्लादेश के बहुत सारे गाँव भारत में आ गए और भारत के बहुत सारे गाँव बांग्लादेश में। इनके निवासियों को किस देश में रहना है, वो सब इन्हीं के ऊपर छोड़ दिया गया। ज्यादातर लोगों ने अपने मूल गाँवों में ही रहना पसंद किया, भले ही अब देश बदल गए हों। लेकिन बहुत सारे लोगों ने भारत में रहने के लिए या बांग्लादेश में रहने के लिए अपने गाँव भी छोड़े। इन्हीं सारे कामों के लिए ‘एंकलेव सेटलमेंट कैंप’ बनाए गए थे।
मेखलीगंज के बाद सड़क के दाहिने किनारे बी.एस.एफ. के वाच-टावर दिखे, तो समझ गया कि इधर दहग्राम का क्षेत्र है। हालाँकि कहीं भी तारबंदी नहीं दिख रही थी, लेकिन एहसास बना हुआ था कि हमारे दोनों ओर बांग्लादेश है।
और जब तीन बीघा कोरीडोर से 200 मीटर पहले सड़क के एकदम नजदीक तारबंदी मिली तो रोमांच चरम पर पहुँच गया। धीरे से कोरीडोर में प्रवेश कर गए। एक तरफ एक कार खड़ी थी, हमारी मोटरसाइकिल भी वहीं खड़ी हो गई। सीधी सड़क कूचलीबाड़ी जा रही थी, दाहिने दहग्राम और बाएँ बांग्लादेश की मुख्यभूमि की ओर।
यहीं चौराहे पर बी.एस.एफ. का एक आदमी खड़ा था और उसके साथ एक बांग्लाभाषी भारतीय।
“यहाँ से बांग्लादेशियों का निरंतर आवागमन होता है। लेकिन बी.एस.एफ. हमेशा बांग्लाभाषी की ड्यूटी तो नहीं लगा सकती, इसलिए एक ‘सिविलियन’ की यहाँ ड्यूटी लगाई जाती है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर बांग्लादेशियों से बंगाली में बात की जा सके।” फौजी ने बताया, जो राजस्थान का रहने वाला था।
...
दहग्राम की तरफ गेट के उस तरफ बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड की चौकी है। चौकी के साथ ही चाय की एक दुकान भी। हम चाय पीने सीमा पार आसानी से जा सकते थे, लेकिन मेजर साहब ने हमें यहाँ गेट तक आने दिया, यही काफी था। एकदम गेट पर खड़े होने का अलग ही एहसास था। सड़क पर एक सफेद लाइन बनी है – इधर भारत, उधर बांग्लादेश।
चायवाला यहाँ तक आकर चाय पकड़ा जाता, इतनी अक्ल तब नहीं आई।
हम भारतीय लोग बांग्लादेश के बारे में अच्छी राय नहीं रखते, लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि बांग्लादेश हमारा बहुत अच्छा पड़ोसी है। अभी पिछले दिनों पाकिस्तान को अलग-थलग करने के मामले में बांग्लादेश ने भारत का साथ दिया था। पहले भी यह हर कदम पर भारत का ही साथ देता रहा है। बांग्लादेश और भारत का कोई सीमा विवाद भी नहीं है। हालाँकि बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण भारत को बहुत नुकसान हो रहा है। हमें उन घुसपैठियों को देश से निकाल देने का और उनकी आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन एक अच्छे पड़ोसी की आलोचना करने का नहीं। भारत इन घुसपैठियों से बचने के लिए ही बांग्लादेश से लगती सीमा पर तारबंदी कर रहा है, लेकिन इससे भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ा है।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘तीन बीघा कॉरीडोर’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




हासीमारा में नई रिलीज हुई फिल्म के पोस्टर...

हासीमारा में गाजियाबाद की मोटरसाइकिल...

चांगराबांधा में रेल का पुल...

चांगराबांधा में भारत के अंदर बांग्लादेश का ट्रक...


सामने गेट के इधर भारत है, उधर बांग्लादेश है... यह सड़क दहग्राम को बांग्लादेश से जोड़ती है... यह बस अभी-अभी दहग्राम से आई थी यानी भारत से होकर गुजरी थी...

यही है तीन बीघा कोरीडोर का चौराहा...

ज्यादातर बांग्लादेशी यात्री इस कोरीडोर को पैदल पार करते हैं, ताकि विदेश में होने का एहसास ज्यादा देर तक लिया जा सके...

दहग्राम की तरफ वाला गेट...

गेट के एकदम पीछे बांग्लादेश है... फोटो में बांग्लादेशी झंडा भी दिख रहा है और चाय की दुकान भी...



एक बांग्लादेशी ट्रैक्टर दहग्राम में ईंटें ले जा रहा है... हम खड़े हैं उस सड़क पर जो कूचलीबाड़ी को भारत की मुख्यभूमि से जोड़ती है...

बांग्लादेशी जुगाड़...

सीमा पर तारबंदी


चांगराबांधा में चाय की खेती भी खूब होती है...

बांग्लादेश जाने के लिए ट्रकों की लाइन...






किताब फिलहाल अमेजन पर उपलब्ध नहीं है... आप नीचे बटन पर क्लिक करके सीधे हमसे मंगा सकते हैं...



अगले भाग में जारी...

3 comments:

  1. दुबारा पढ़ा। अब जाने की इच्छा जाग रही है।

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  2. बेहद रोचक जानकारी थी ये। किटने कुछ है इस देश में जानने और देखने के लिए। धन्यवाद इसे इतने रचनात्मक तरीके से हम तक पहुंचाने के लिए।

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  3. इतनी जबरदस्त जानकारी कि दिल खुश हो गया...एन्क्लेव फिर उप एन्क्लेव और उप उप एन्क्लेव....निशब्द हु इस ब्लॉग पोस्ट की तीन बीघा कॉरिडोर की जानकारी से

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