Wednesday, October 24, 2018

उत्तर बंगाल यात्रा - बक्सा टाइगर रिजर्व में

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13 फरवरी 2018
नौ बजे दुधनोई से चल दिए और लक्ष्य रखा राजा भात खावा। यानी बक्सा टाइगर रिजर्व के पास। दूरी चाहे जो भी हो, लेकिन हम दिन छिपने से पहले पहुँच जाएँगे।
लगभग ढाई किलोमीटर लंबा नरनारायण सेतु पार किया। यह रेल-सह-सड़क पुल है। नीचे रेल चलती है, ऊपर सड़क। यह पुल ज्यादा पुराना नहीं है। शायद 1998 में इसे खोला गया था। उसी के बाद इधर से रेल भी चलना शुरू हुई। उससे पहले केवल रंगिया के रास्ते ही रेल गुवाहाटी जाती थी।
पुल पार करते ही जोगीघोपा है। कोयला ही कोयला और ट्रक ही ट्रक। लेकिन हमें बजरंग जी के कार्यालय जाने की जरूरत नहीं पड़ी। उन्हें पता नहीं कैसे हमारी भनक लग गई थी और वे हमें सड़क पर ही हाथ हिलाते मिले। एक बार फिर से पुल पर आकर फोटोग्राफी का दौर चला।
यहाँ राजस्थानी भोजनालय भी है। राजस्थानी भोजनालय मतलब शुद्ध शाकाहारी। कोयले और ट्रकों के कारण माहौल तो ‘काला-काला’ ही था, लेकिन यहाँ अच्छा खाना खाने वालों की अच्छी भीड़ थी।
चलते समय हमें रास्ता भी समझा दिया गया कि आगे चलकर एक तिराहा आएगा और उधर से जाना, इधर से मत जाना। दो-चार स्थानों के नाम और बताए, लेकिन वे सब हमारे पल्ले नहीं पड़े।
बंगाईगाँव के पास नेशनल ईस्ट-वेस्ट हाइवे मिल गया। फोर-लेन का यह हाइवे है। उधर गुवाहाटी से भी आगे नगाँव तक है। इधर पता नहीं कहाँ तक है।
कोकराझार वाले मोड़ पर रुक गए। भूख लगने लगी थी, कुछ संतरे ले लिए और एक खाली यात्री प्रतीक्षालय में बैठकर खाने लगे। एक सड़क कोकराझार जा रही थी और एक सड़क भूटान।
कोकराझार प्रस्तावित बोडोलैंड राज्य का मुख्यालय भी है। बोडो जनजाति के लोग हिंसक तरीके से काफी समय से अलग राज्य की मांग करते आ रहे हैं। वैसे राष्ट्रीय परिदृश्य में कोकराझार ज्यादातर हिंसाओं के कारण ही चर्चा में रहता है। कुछ साल पहले यहीं सिलीगुड़ी से शिलोंग जा रही बस से हिंदी-भाषी यात्रियों को उतारकर गोली मार दी गई थी।
हम कल्पना करने लगे कि उधर सड़क किनारे उस बस को रोका गया होगा। कुछ लोग हथियार लहराते हुए बस में चढ़े होंगे। सभी यात्रियों को उतारा गया होगा। सभी से असमिया में बात की गई होगी। और जो असमिया नहीं बोल पाया होगा, उसे वहीं गोली मार दी गई होगी। बस को रवाना भी कर दिया होगा और वे बेचारे अभागे वहीं सड़क पर पड़े रह गए होंगे।
आज हम उसी कोकराझार में इत्मीनान से बैठकर संतरे खा रहे थे। दूर एक मंदिर में हिंदी भजन बज रहे थे। कल महाशिवरात्रि जो है।
भूटान की बहुत सारी गाड़ियाँ मिलीं। ट्रक और कारों के अलावा लोकल बसें भी। दो देशों के मध्य लोकल बसें अक्सर नहीं चलतीं, लेकिन यहाँ खूब बसें दिखाई पड़ीं। लाल रंग की नंबर प्लेट दूर से ही दिख जाती।
जैसे-जैसे असम-बंगाल की सीमा नजदीक आती गई, ट्रकों का जमावड़ा भी बढ़ता गया। राज्यों की सीमा पर ट्रकों का जमावड़ा हमेशा ही देखने को मिलता है।
एक छोटी-सी नदी दोनों राज्यों की सीमा बनाती है। जैसे ही हम असम में 70-80 की स्पीड़ से आखिरी कुछ मीटर पार कर रहे थे, तभी मधुमक्खियाँ आ गईं। पटर-पटर खूब मधुमक्खियाँ हमसे टकराईं, लेकिन हम ऊपर से नीचे तक पूरे पैक थे, इसलिए कोई नुकसान नहीं हुआ।
पुल पार करते ही पश्‍चिम बंगाल है। हम रुक गए। मोटरसाइकिल से उतरकर पीछे मुड़कर असम को देखा। एक तरह से पूरे पूर्वोत्‍तर को देखा। उस तरफ असम में प्रवेश करती गाड़ियों को देखा। इतने दिनों से यहाँ घूमते रहने के बाद लगाव हो गया था। महसूस ही नहीं हो रहा था कि यह वो पूर्वोत्‍तर है, जहाँ बाकी देश के लोग जाने से डरते हैं। बाल-बच्चे वाले यात्री जाने से कतराते हैं। अब तो सिक्किम भी पूर्वोत्‍तर में गिना जाने लगा है। तो सभी सिक्किम घूमकर चले जाते हैं और समझ लेते हैं कि पूर्वोत्‍तर घूम लिया।
दिल्ली में कोई मुझसे कहता है कि पूर्वोत्‍तर के लोग ‘चाइनीज’ लगते हैं। मैं तुरंत प्रतिकार करता हूँ - “नहीं, हमें तो चीनी ऐसे लगते हैं, जैसे मेरे पूर्वोत्‍तर के हों।”
पूर्वोत्‍तर में हम कहीं भी जा सकते हैं, बिना किसी डर के। महिलाओं का सम्मान होता है वहाँ। दीप्‍ति के साथ होने से मेरा भी सम्मान हुआ। अभी नागालैंड और मणिपुर डराते हैं, लेकिन जब हम वहाँ जाएँगे और उनकी टूटी-फूटी हिंदी में सुर मिलाते हुए अपनी भी हिंदी तोड़-फोड़कर बोलने लगेंगे तो सारा डर समाप्‍त हो जाएगा।
क्या एम. सेम आज हमारी प्रतीक्षा नहीं कर रहा होगा?
...
बक्सा टाइगर रिजर्व के मुख्य द्वार पर पहुँचे तो लोगों का, ऑटो वालों का जमावड़ा लगा मिला। चक्कर क्या है! जंगल में जाने के लिए इतनी भीड़!
“दादा, मामला क्या है?” फोरेस्ट वाले से पूछा।
“आज महाशिवरात्रि का मेला है उधर जयंती में।”
“कितना दूर है जयंती यहाँ से?”
“पंद्रह किलोमीटर।”
“ठहरने की सुविधा है क्या वहाँ पर?”
“बड़ी अच्छी सुविधा है। आराम से जाओ।”
“कोई परमिट?”
“आज कोई परमिट नहीं।”
टिकट-सूची पर निगाहें चली गईं - 60 रुपये प्रति व्यक्ति और मोटरसाइकिल का चार्ज 20 रुपये। यानी मेले के कारण हमारे 140 रुपये बचने जा रहे हैं। मेले में गोलगप्पे और चाट-पापड़ी मारेंगे जमकर।
भीड़ तो थी, लेकिन नेशनल पार्क के भीतर होना अलग ही अनुभव होता है। और अगर आप अपनी मोटरसाइकिल पर हों, तो क्या कहने!
जयंती में एक ‘होम-स्टे’ दिखाई पड़ा। दीप्‍ति चली गई बात करने। लौटकर बताने लगी - “आज इनके सारे कमरे बुक हैं।”
“तो हम कहाँ रुकेंगे?”
“बता रही हैं कि आगे बहुत सारे होम-स्टे हैं।”
“आगे कहाँ? यहाँ तो जंगल ही जंगल है और आगे तो नदी का पाट है।”
जहाँ सभी लोग जा रहे थे, हम भी उधर ही चलने लगे। रुकने का इंतजाम हो जाएगा, तो बल्ले-बल्ले; अन्यथा वापस राजा भात खावा लौट जाएँगे। और वहाँ भी बात नहीं बनी तो आलिपुरदूआर भी दूर नहीं।
चौड़ी नदी थी। लेकिन पानी की केवल एक पतली-सी जलधारा थी। इतने बड़े पाट में पड़े बड़े-बड़े पेड़ों के तने बता रहे थे कि बारिश में यह कितनी खतरनाक हो जाती होगी।
तभी बहुत सारे ‘होम-स्टे’ दिख गए। नदी के एकदम किनारे। उनके और नदी के बीच में केवल तटबंध ही था, अन्यथा नदी उन्हें बहा ले जाती। इस बार भी दीप्‍ति ही गई और 1000 रुपये में कमरा मिल गया।
“लेकिन खाना बाहर खाना पड़ेगा।”
“खा लेंगे। मेले में खाने की भला क्या समस्या!”
यह जयंती गाँव जंगल के भीतर बसा हुआ है। ज्यादा खोजबीन तो मैंने नहीं की, लेकिन नेशनल पार्क ने इसे हटाने के प्रयत्न अवश्य किए होंगे। फिलहाल यहाँ कई होम-स्टे हैं और मोबाइल का अच्छा नेटवर्क भी; पक्की सड़क भी और बिजली भी।
सामने जो नदी थी, इसके उस पार भूटान की पहाड़ियाँ दिख रही थीं। नदी के साथ-साथ यात्री ऊपर की ओर जा रहे थे। कुछ वन विभाग की जीपों में, तो ज्यादातर पैदल।
हम इस नेशनल पार्क में अचानक इस तरह आ जाने से बड़े खुश थे। भले ही हम कहीं न जाएँ, लेकिन इस बात का एहसास बराबर बना हुआ था कि हम घने जंगल के बीचोंबीच हैं - टाइगर रिजर्व के बीचोंबीच।
जयंती बाजार में टहलने निकल पड़े। यह केवल मेले के दिनों में ही बाजार रहता है, बाकी पूरे साल तो यहाँ सन्नाटा पसरा रहता होगा। खाने-पीने की कोई कमी नहीं। और केवल विशुद्ध शाकाहारी भोजन। मेले और भीड़ के कारण भले ही खाने की गुणवत्‍ता उतनी अच्छी न हो, लेकिन हम आँख मीचकर खा सकते थे, बिना मांसाहार की चिंता किए। अन्यथा बंगाल में मांसाहार बड़ा सुलभ है।
“ये सभी लोग कहाँ जा रहे हैं?”
“महाकाल।”
“कितना दूर है?”
“यहाँ से तीन किलोमीटर आगे तक गाड़ियाँ जा सकती हैं और उसके बाद तीन किलोमीटर आगे पैदल जाना होता है, तब महाकाल पहुँचते हैं।”
“मेला कल भी रहेगा क्या?”
“तीन दिनों तक मेला चलता है। आज पहला दिन है।”
“यानी जो लोग आज जा रहे हैं, वे कल तक लौटेंगे?”
“नहीं, भीड़ बहुत है। वे आज लाइन में लगेंगे और परसों तक उनका नंबर आएगा दर्शन करने का।”
यह सुनते ही हमारी आँखें फटी रह गईं। बिना कुछ बोले ही दोनों ने तय कर लिया कि हम महाकाल के दर्शन करने नहीं जा रहे। यहीं से प्रणाम कर लेंगे।
यह होम-स्टे बड़ा आलीशान बना था। बाँस के कमरे थे और शानदार सजावट थी। कमरों के एकदम सामने नदी का तटबंध था और तटबंध के उस पार थी विशाल चौड़ी नदी। गूगल मैप में इसे गदाधर नदी लिखा है, लेकिन कहीं पर मैंने इसे जयंती नदी भी लिखा देखा है।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘मेघालय से उत्तर बंगाल’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे बटन पर क्लिक करें:




नरनारायण सेतु पर बजरंग लाल पारीक जी के साथ


ब्रह्मपुत्र पर बना नरनारायण सेतु... ऊपर सड़क है, नीचे रेल...



कोकराझार के पास भूटान की एक लोकल बस...

बक्सा टाइगर रिजर्व में प्रवेश की दरें... लेकिन आज मेले के कारण सब फ्री था...

टाइगर रिजर्व के अंदर सड़क

जयंती से दिखता नजारा... जयंती नदी और उसके परे भूटान की पहाड़ियाँ... महाकाल जाते श्रद्धालु...







नदी के एकदम किनारे होम-स्टे...




बक्सा टाइगर रिजर्व के अंदर कुछ और दर्शनीय स्थान...









अगले भाग में जारी...

7 comments:

  1. कलम से कतल करने लगे नीरज भाई , ब्लॉग का लेआउट बार -बार क्यों चेंज कर रहे हो

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  2. राजा भात खावा - मजा आ गया।

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  3. कोकराझार और बक्सा के अंदर के होम स्टे और मेले की बाते पढ़कर बहुत कुछ पता चला....राज भात खावा नाम ही अलग है....बहुत कुछ नया पता चल रहा है यह सब पढ़ कर....

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