Skip to main content

मेघालय यात्रा - डौकी में पारदर्शी पानी वाली नदी में नौकाविहार

8 फरवरी 2018
सबसे पहले पहुँचे उमगोट नदी के पुल पर। उमगोट नदी अपने पारदर्शी पानी के लिए प्रसिद्ध है। हम भी इसी के लालच में यहाँ आए थे, ताकि पारदर्शी पानी पर चलती नावों के फोटो ले सकें और बाद में अपने मित्रों में प्रचारित करें कि यहाँ नावें हवा में चलती हैं।
“बोटिंग करनी है जी?” पुल के पास ही एक लड़के ने पूछा।
“नहीं, लेकिन यह बताओ कि यहाँ होटल कहाँ हैं?”
और कुछ ही देर में हम एक नाव में बैठे थे और उमगोट की धारा के विपरीत जा रहे थे। हमारा सारा सामान भी हमारे साथ ही था, सिवाय मोटरसाइकिल के। मोटरसाइकिल उस लड़के के घर पर खड़ी थी, जो यहाँ से थोड़ा ऊपर था। लड़के ने अपने घर से इशारा करके बताया था - “वो बांग्लादेश है।”
“वो मतलब? कहाँ?”
मुझे पता तो था कि सारा मैदानी इलाका बांग्लादेश है, लेकिन जमीन भारत से बांग्लादेश में कब बदल जाती है, यह देखने की उत्सुकता थी।




“वो सामने जितनी भी मशीनें चल रही हैं, सभी बांग्लादेश में है। और वो सूखी नदी भी बांग्लादेश में ही है। यह पहाड़ भारत में है और जैसे ही पहाड़ समाप्‍त होता है, एकदम बांग्लादेश शुरू हो जाता है।”
मैं बड़ी देर तक इस नजारे को देखता रहा। बहुत सारी मशीनें आवाज करती हुई और धूल उड़ाती हुई काम कर रही थीं। शायद पत्थर तोड़ रही थीं।
तो हम नाव में बैठकर नदी की विपरीत दिशा में जा रहे थे और एक ‘कैंप साइट’ पर पहुँच गए। उमगोट नदी के किनारे की रेत में कुछ टैंट लगे थे, एक हमें दे दिया गया। बहुत सारे खाली टैंट भी थे।
एक कुत्‍ता मुर्गे के साथ खेल रहा था। लेकिन मुर्गे के तोते उड़े पड़े थे। उसे लग रहा था कि कुत्‍ता उसे छोड़ेगा नहीं। वह बार-बार कुत्‍ते को चकमा देकर इधर-उधर बच जाता और इसी में कुत्‍ते को मजा आ रहा था। मुर्गा बड़ा शोर कर रहा था। अपनी जान बचाने के चक्कर में मुर्गा एक खाली टैंट में जा घुसा। एक-दो बार मुर्गा फड़फड़ाया भी, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता न देख आवाज भी बंद कर दी और फड़फड़ाना भी। कुत्‍ते ने उत्सुकतावश टैंट में झाँककर देखा, लेकिन उसे मुर्गा नहीं दिखाई पड़ा। फिर कुत्‍ता रेत में जाकर लेट गया। और दो-तीन घंटे बाद अंधेरा हो जाने पर जब कुछ यात्री आए और टैंट उन्हें दिया गया, तब उसमें से मुर्गे को बा-मशक्कत बाहर निकाला गया।
उत्‍तर में श्‍नोगप्डेंग गाँव की लाइटें दिख रही थीं। यह नदी उसी गाँव के पास से आती है।
शाम को नदी किनारे जा बैठे। मछलियाँ बहुत थीं और पैर डालते ही आकर गुदगुदी करने लगतीं। और साफ पानी इतना कि क्या कहने!
पूरी रात ट्रकों के ब्रेकों की चरमराहट सुनाई देती रही। नदी के उस पार कुछ ऊपर जोवाई वाली सड़क थी। ढलान है ही। बांग्लादेश जाने वाले ट्रक लाइन में खड़े थे। धीरे-धीरे बारी आती है, तो ट्रक धीरे-धीरे रुकते-रुकते चलते हैं और ब्रेकों की आवाजें अनवरत आती रहती हैं।

ये हाल ही में प्रकाशित हुई मेरी किताब ‘मेरा पूर्वोत्तर’ के ‘डौकी में भारत और बांग्लादेश’ चैप्‍टर के कुछ अंश हैं। किताब खरीदने के लिए नीचे क्लिक करें:





डौकी में बांग्लादेश जाने के लिए लगी ट्रकों की लाइन

मोटरसाइकिल को बांग्लादेश की ओर मुँह करके खड़ा कर दिया... पूरी रात और अगले आधे दिन इसने बांग्लादेश देखा...

उमगोट नदी में नौका विहार और सामने दिखता डौकी को शिलोंग से जोड़ने वाली सड़क पर बना पुल...





उमगोट नदी के किनारे हमारा आज का आशियाना




सामने जो भी लोग दिख रहे हैं, ज्यादातर बांग्लादेश के अंदर खड़े हैं...


और यह रहा वो फोटो जिसके कारण डौकी और उमगोट नदी प्रसिद्ध हैं...






Boating in Dawki Meghalaya












अगला भाग: मेघालय यात्रा - डौकी में भारत-बांग्लादेश सीमा पर रोचक अनुभव






1. मेघालय यात्रा - गुवाहाटी से जोवाई
2. मेघालय यात्रा - नरतियंग दुर्गा मंदिर और मोनोलिथ
3. मेघालय यात्रा - जोवाई से डौकी की सड़क और क्रांग शुरी जलप्रपात
4. मेघालय यात्रा - डौकी में पारदर्शी पानी वाली नदी में नौकाविहार
5. मेघालय यात्रा - डौकी में भारत-बांग्लादेश सीमा पर रोचक अनुभव
6. मेघालय यात्रा - डौकी-चेरापूंजी सड़क और सुदूर मेघालय के गाँव
7. मेघालय यात्रा - चेरापूंजी में नोह-का-लिकाई प्रपात और डबल रूट ब्रिज
8. मेघालय यात्रा - मॉसमाई गुफा, चेरापूंजी
9. मेघालय यात्रा - चेरापूंजी के अनजाने स्थल
10. मेघालय यात्रा - गार्डन ऑफ केव, चेरापूंजी का एक अनोखा स्थान
11. अनजाने मेघालय में - चेरापूंजी-नोंगस्टोइन-रोंगजेंग-दुधनोई यात्रा
12. उत्तर बंगाल यात्रा - बक्सा टाइगर रिजर्व में
13. उत्तर बंगाल यात्रा - तीन बीघा कोरीडोर
14. उत्तर बंगाल - लावा और रिशप की यात्रा
15. उत्तर बंगाल यात्रा - नेवरा वैली नेशनल पार्क
16. उत्तर बंगाल यात्रा - लावा से लोलेगाँव, कलिम्पोंग और दार्जिलिंग
17. दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के साथ-साथ
18. सिलीगुड़ी से दिल्ली मोटरसाइकिल यात्रा




Comments

  1. एक नंबर गुरु :)

    ReplyDelete
  2. इस नदी के बारे में जो जानकारी आपने दी वो बहुत ही अच्छी है....बहुत बढ़िया फोटोस...

    ReplyDelete
  3. Its an awesome, appropriate, customized information one seeks for. You have mentioned everything in a proper way.

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

डायरी के पन्ने- 12

[डायरी के पन्ने हर महीने की पहली व सोलह तारीख को छपते हैं।] 18 अगस्त 2013, रविवार 1. पिछले दो तीन दिनों से अमित का परिवार आया हुआ है। साथ में दो सालियां भी हैं। जमकर मन लग रहा था कि आज उनके जाने का फरमान आ गया। हर एक से पूछा कि अगली बार कब आओगी, किसी ने ढंग का उत्तर नहीं दिया। साढे दस वाली ट्रेन से वे चले गये। 2. अमन साहब का फोन आया कि वे दिल्ली आ चुके हैं और कल हमारे यहां आयेंगे। अमन बोकारो के रहने वाले हैं और हमारी फोन पर हर दूसरे तीसरे दिन हालचाल पूछने के बहाने बातचीत होती रहती है। आज मेरी नाइट ड्यूटी है, तो कल पूरे दिन खाली रहूंगा। कह दिया कि पूरे दिन किसी भी समय आ धमको।

भीमबैठका- मानव का आरंभिक विकास स्थल

आज एक ऐसी जगह पर चलते हैं जो बिलकुल गुमनाम सी है और अनजान सी भी लेकिन यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल है- एक दो साल से नहीं बल्कि बारह सालों से। इस जगह का नाम है- भीमबैठका (BHIMBETKA), भीमबेटका, भीमबैठिका। कहते हैं कि वनवास के समय भीम यहाँ पर बैठते थे इसलिए यह नाम पड़ गया। ये तो सिर्फ किंवदंती है क्योंकि भीम ने अपने बैठने का कोई निशान नहीं छोडा। ... निशान छोडे हैं हमारे उन आदिमानव पूर्वजों ने जो लाखों साल पहले यहाँ स्थित गुफाओं में गुजर-बसर करते थे। जानवरों का शिकार करके अपना पेट भरते थे। उन्ही दिनों उन्होंने चित्रकारी भी शुरू कर दी। यहाँ स्थित सैंकडों गुफाओं में अनगिनत चित्र बना रखे हैं। इन चित्रों में शिकार, नाच-गाना, घोडे व हाथी की सवारी, लड़ते हुए जानवर, श्रृंगार, मुखौटे और घरेलु जीवन का बड़ा ही शानदार चित्रण किया गया है।

जिम कार्बेट की हिंदी किताबें

इन पुस्तकों का परिचय यह है कि इन्हें जिम कार्बेट ने लिखा है। और जिम कार्बेट का परिचय देने की अक्ल मुझमें नहीं। उनकी तारीफ करने में मैं असमर्थ हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि उनकी तारीफ करने में कहीं कोई भूल-चूक न हो जाए। जो भी शब्द उनके लिये प्रयुक्त करूंगा, वे अपर्याप्त होंगे। बस, यह समझ लीजिए कि लिखते समय वे आपके सामने अपना कलेजा निकालकर रख देते हैं। आप उनका लेखन नहीं, सीधे हृदय पढ़ते हैं। लेखन में तो भूल-चूक हो जाती है, हृदय में कोई भूल-चूक नहीं हो सकती। आप उनकी किताबें पढ़िए। कोई भी किताब। वे बचपन से ही जंगलों में रहे हैं। आदमी से ज्यादा जानवरों को जानते थे। उनकी भाषा-बोली समझते थे। कोई जानवर या पक्षी बोल रहा है तो क्या कह रहा है, चल रहा है तो क्या कह रहा है; वे सब समझते थे। वे नरभक्षी तेंदुए से आतंकित जंगल में खुले में एक पेड़ के नीचे सो जाते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि इस पेड़ पर लंगूर हैं और जब तक लंगूर चुप रहेंगे, इसका अर्थ होगा कि तेंदुआ आसपास कहीं नहीं है। कभी वे जंगल में भैंसों के एक खुले बाड़े में भैंसों के बीच में ही सो जाते, कि अगर नरभक्षी आएगा तो भैंसे अपने-आप जगा देंगी।