Wednesday, July 8, 2015

लद्दाख बाइक यात्रा-4 (बटोट-डोडा-किश्तवाड-पारना)

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें
9 जून 2015
हम बटोट में थे। बटोट से एक रास्ता तो सीधे रामबन, बनिहाल होते हुए श्रीनगर जाता ही है, एक दूसरा रास्ता डोडा, किश्तवाड भी जाता है। किश्तवाड से सिंथन टॉप होते हुए एक सडक श्रीनगर भी गई है। बटोट से मुख्य रास्ते से श्रीनगर डल गेट लगभग 170 किलोमीटर है जबकि किश्तवाड होते हुए यह दूरी 315 किलोमीटर है।
जम्मू क्षेत्र से कश्मीर जाने के लिये तीन रास्ते हैं- पहला तो यही मुख्य रास्ता जम्मू-श्रीनगर हाईवे, दूसरा है मुगल रोड और तीसरा है किश्तवाड-अनन्तनाग मार्ग। शुरू से ही मेरी इच्छा मुख्य राजमार्ग से जाने की नहीं थी। पहले योजना मुगल रोड से जाने की थी लेकिन कल हुए बुद्धि परिवर्तन से मुगल रोड का विकल्प समाप्त हो गया। कल हम बटोट आकर रुक गये। सोचने-विचारने के लिये पूरी रात थी। मुख्य राजमार्ग से जाने का फायदा यह था कि हम आज ही श्रीनगर पहुंच सकते हैं और उससे आगे सोनामार्ग तक भी जा सकते हैं। किश्तवाड वाले रास्ते से आज ही श्रीनगर नहीं पहुंचा जा सकता। अर्णव ने सुझाव दिया था कि बटोट से सुबह चार-पांच बजे निकल पडो ताकि ट्रैफिक बढने से पहले जवाहर सुरंग पार कर सको। अर्णव को भी हमने किश्तवाड के बारे में नहीं बताया था।
मैं निशा और कोठारी साहब से भी विचार-विमर्श करता रहता था लेकिन करता वही था जो मेरे मन में हो। सुबह जब हम नाश्ता कर रहे थे तो तय हो गया था कि बनिहाल वाले मुख्य रास्ते से ही चलते हैं ताकि आज श्रीनगर से आगे निकल जायें। लेकिन जब सवा नौ बजे बटोट से आगे बढने के लिये बाइक स्टार्ट की तो आदेशात्मक स्वर में कोठारी साहब से कहा- आगे तिराहे से दाहिने मुड जाना। अर्थात डोडा, किश्तवाड की तरफ। किसी ने कोई विरोध नहीं किया। दोनों मोटरसाइकिलें दाहिने मुड गईं। किश्तवाड यहां से 110 किलोमीटर है।
रास्ता चेनाब नदी के साथ साथ है। यहीं रामबन के पास चेनाब नदी पर एक बांध है- बगलिहार बांध। उसकी वजह से बडी दूर तक चेनाब का जलस्तर खूब बढा हुआ था और एक झील की तरह लग रहा था। ट्रैफिक तो हम पीछे छोड आये थे। बसें खूब चलती हैं यहां जो डोडा, भदरवाह और किश्तवाड, पद्दर तक जाती हैं। टू-लेन सडक है। सडक अच्छी बनी है, हालांकि कहीं-कहीं खराब भी है। खराब भी ऐसी कि एक जगह निशा को बाइक से उतरकर पैदल चलना पडा। वह सुरक्षित और सूखे स्थान पर जब चल रही थी, तो अचानक घुटनों तक धंस पडी। कुछ आगे चिकनी मिट्टी के कीचड से गुजरे तो एक मोड पर हम दोनों कीचड में गिर पडे। गनीमत थी कि किसी ने देखा नहीं, अन्यथा मजाक उडती।
चेनाब के दूसरी तरफ डोडा शहर बसा हुआ है। जहां चेनाब पार करने के लिये पुल बना है, वो जगह पुलडोडा है। पुलडोडा से एक सडक भदरवाह चली जाती है। चेनाब पार करके डोडा शहर में और सीधे चेनाब के इसी किनारे वाली सडक जाती है किश्तवाड। पुलडोडा पर बडी चहल-पहल थी। एक तरफ जम्मू, ऊधमपुर की बसें खडी थीं तो दूसरी तरफ भदरवाह की बसें। पुल पर डोडा शहर में जाने वाली बसें थीं। सभी सवारियों को आकर्षित करने के लिये चीख-पुकार मचा रहे थे। फलों की, सब्जियों की दुकानें भी थीं। हमें यहां तक आने में लगभग तीन घण्टे लगे थे। नमक-मिर्च लगाकर खीरे खाये।
भदरवाह यहां से तीस किलोमीटर है। भदरवाह से एक सडक हिमाचल में चम्बा चली जाती है जो आजकल बन्द है। डोडा-किश्तवाड जम्मू क्षेत्र में आते हैं। कश्मीर और पाक समर्थित आतंकी चाहते थे कि ये जिले कश्मीर में आयें। घाटी में जब आतंकवाद का चरम था, तो इन दोनों जिलों में भी आतंकियों ने खूब तांडव मचाया था। घाटी के विपरीत यहां ऊंचे-ऊंचे पहाड हैं और खूब घने जंगल भी। आतंकियों को आसानी से कुदरती छिपाव मिल जाता था। भदरवाह से थोडा ही आगे हिमाचाल आरम्भ हो जाता है। उधर भी पहाड और जंगल हैं। आतंकियों ने उधर भी पैर पसारने चाहे लेकिन हिमाचल ने ऐसा नहीं होने दिया। हालात यहां तक पहुंच गये कि कुछ सडकें आम यातायात के लिये बन्द कर देनी पडीं। उनमें यह भदरवाह-चम्बा सडक भी थी। हालांकि अब यहां आतंकवाद नहीं है, लेकिन कई सालों तक सडक पूर्ण बन्द रही तो कहीं भूस्खलन से और कहीं सडक पर जंगल उग आने से यह अब यह यातायात के योग्य नहीं रही। इधर जम्मू कश्मीर का तो पता नहीं लेकिन उधर हिमाचल में पहरेदार बैठे हैं जो किसी को इधर नहीं आने देते।
फिर भदरवाह से आगे एक सडक और बनी। यह सारथल, बनी होते हुए बशोली जाती है। बशोली रावी नदी के किनारे उस स्थान पर स्थित है जहां रावी हिमाचल से निकलकर जम्मू कश्मीर को स्पर्श करती है। बशोली से लखनपुर तक भी एक सडक है। इस तरह पुलडोडा से लखनपुर तक दो सडकें हैं- एक तो बटोट, ऊधमपुर होते हुए और दूसरी भदरवाह, बनी, बशोली होते हुए। दोनों ही मार्ग लगभग 250 किलोमीटर के हैं। लेकिन चूंकि मुख्य मार्ग ज्यादा अच्छा बना है इसलिये इस पर यात्रा करने में समय कम लगेगा। फिर भी बनी, बशोली वाले मार्ग पर एक बार यात्रा करना तो बनता ही है।
पुलडोडा से किश्तवाड लगभग 55 किलोमीटर है। रास्ता अच्छा है और ट्रैफिक बिल्कुल नगण्य। इसके बावजूद भी हमें इस दूरी को तय करने में ढाई घण्टे लग गये। थोडा सा चलते और रुक जाते। प्राकृतिक सौन्दर्य चलने ही नहीं देता। हमें थकान भी होने लगी थी। एक जगह लेटकर सो गया लेकिन जल्द ही बूंदाबांदी होने लगी और उठना पडा।
किश्तवाड पहुंचे ढाई बजे। भूख लगी थी। बस अड्डे के पास एक वैष्णों ढाबे में कढी-चावल खाये, तब पेट में शान्ति पडी। यहां श्रीनगर वाले रास्ते की बाबत बात की तो एकबारगी पैरों तले की जमीन हिल पडी। ढाबे वाले ने बताया कि वो रास्ता तो अभी खुला ही नहीं है। साथ ही यह भी सुझाव दिया कि आपको श्रीनगर जाना है तो बटोट के रास्ते जाओ।
गौरतलब है कि श्रीनगर के रास्ते में सिंथन टॉप दर्रा पडता है जो लगभग 3800 मीटर ऊंचा है। सिंथन टॉप रोहतांग का ‘सहोदर’ है। दोनों ही दर्रे पीर पंजाल की श्रंखला में स्थित हैं। दोनों की प्रकृति भी एक सी है। रोहतांग जो कि सिंथन टॉप से मात्र 100 मीटर ऊंचा है, अभी हाल ही में खुला है। रोहतांग को खोलने के लिये पूरी जी-जान लगाई जाती है जबकि सिंथन टॉप के साथ ऐसा नहीं है। तो जैसे ही ढाबे वाले ने कहा कि सिंथन टॉप बन्द है तो मुझे तुरन्त यकीन हो गया।
अब क्या करें? श्रीनगर जाने के लिये अब तो एक ही रास्ता है। वापस 110 किलोमीटर बटोट चलो। हम इसी रास्ते से वापस नहीं लौटना चाहते थे। किश्तवाड से आगे चेनाब के साथ साथ यही सडक पद्दर, पांगी होते हुए लाहौल भी जाती है लेकिन वहां फिर से वही बात होती। लाहौल से लद्दाख जाने के लिये बारालाचा-ला बन्द था जो अगले दस दिनों बाद खुलेगा। स्पीति जाने के लिये कुंजुम-ला है जो एक महीने बाद खुलेगा। रोहतांग खुल गया है लेकिन रोहतांग पार करने का अर्थ है कि लद्दाख न जाकर मनाली-कुल्लू लौटना। अगर हम किश्तवाड से पुलडोडा जायें और फिर भदरवाह; तो फिर या तो इसी रास्ते लौटकर बटोट जाना पडेगा या फिर बनी, बशोली होते हुए पुनः जम्मू। बडी विकट स्थिति थी।






लेकिन जल्दी ही समाधान हो गया। ढाबे वाले ने इस बात का जिक्र एक सूमो वाले से कर दिया। सूमो वाले ने कहा कि सिंथन टॉप खुल गया है, आज कुछ गाडियां श्रीनगर से आई भी हैं। सिंथन टॉप खुल गया है- यह बात पता नहीं सच है या नहीं, लेकिन इसे सुनते ही हमारे अन्दर फिर से ऊर्जा भर गई। हम सिंथन टॉप जाने को तैयार हो गये।
किश्तवाड में ही एक पुलिस वाले से सिंथन टॉप की जानकारी ली तो उसने कहा- वो रास्ता अभी बन्द है। कुछ सोचकर फिर बोला- आप एक काम करो। श्रीनगर जाना है ना आपको? तो बटोट के रास्ते चले जाओ, वो रास्ता खुला है। हमने बताया कि सिंथन टॉप खुल गया है, कुछ गाडियां आज श्रीनगर से आई भी हैं। बोला- फिर तो ठीक है।
किश्तवाड में बाइक की टंकी फुल करा ली। पेट्रोल पम्प के सामने बहुत बडा पार्क है, हरी घास अच्छी लग रही थी। यहीं एक तिराहा भी हैं जहां से सीधे सडक पद्दर, पांगी जाती है और बायें वाली सडक सिंथन टॉप। हम बायीं तरफ मुड गये।
12-13 किलोमीटर तक ढलान है और हम पहुंच जाते हैं चेनाब नदी के किनारे। पुल से नदी पार की। पार करते ही जंगल विभाग की एक चौकी है। यहां पूछा तो निश्चित हो गया कि सिंथन टॉप खुला है। इसके बाद कहीं कहीं रास्ता अच्छा है लेकिन ज्यादातर खराब है। यहीं से सिंथन टॉप की चढाई शुरू हो जाती है। यह पुल समुद्र तल से 1140 मीटर की ऊंचाई पर है।
चिनगाम पहुंचने में पौने छह बज गये। चिनगाम एक बडा गांव है। इसकी दूरियां हमें किश्तवाड से भी पहले से मिलती आ रही थीं, इसलिये पूरी उम्मीद थी कि यहां कुछ रुकने का ठिकाना मिल जायेगा। हो सकता है कि यहां रुकने का ठिकाना हो लेकिन सडक गांव के कुछ ऊपर से गुजर रही थी। सडक किनारे कुछ दुकानें थीं, होटल कोई नहीं था। हम चिनगाम में ही रुकने की योजना बनाते आ रहे थे। क्योंकि एक तो मौसम भी खराब था। फिर चिनगाम से आगे कोई गांव शायद सिंथन टॉप के बाद ही मिले। सिंथन टॉप अभी भी पचास किलोमीटर दूर है और बताते हैं कि रास्ता भी बहुत खराब है। मैं रात में इस दर्रे को पार नहीं करना चाहता।
चिनगाम से आगे निकल गये। दो किलोमीटर आगे पारना गांव है। यहां जम्मू-कश्मीर पुलिस का एक बैरियर है और प्रत्येक आने-जाने वाहन को यहां रजिस्टर में एण्ट्री करानी पडती है। बगल में ही एक मन्दिर भी है। कोठारी साहब ने पुलिस वाले से बात की तो उन्होंने सुझाव दिया कि अब आगे बढना तो ठीक नहीं है, आप यहीं मन्दिर में रुक जाओ। कोठारी साहब ने यह सुझाव हमसे बताया। हम तो रुकने को तैयार ही बैठे थे, तुरन्त हां हो गई।
छोटा ही मन्दिर था लेकिन समतल जमीन भी थी। टैंट लगाने की तय हो गई। फिर पुलिस वाले हमें मन्दिर के नीचे ले गये। पहाडों पर समतल जमीन कम होने के कारण इमारतें पिलर पर बनाई जाती हैं। यहां मन्दिर के पिलर थे। ऊपर मन्दिर था। मन्दिर कमेटी ने नीचे पिलर के आसपास भी पक्का फर्श बनवा दिया था जिसमें तीज-त्यौहारों पर भजन-कीर्तन होते हैं। टैंट लगाने के लिये यह जगह सर्वोत्तम थी। बारिश भी अगर होगी, तो ऊपर छत होने के कारण टैंट भी भीगने से बचे रहेंगे। बाइकों से सामान उतारकर यहीं ले आये। निशा ने फटाफट एक टैंट लगा दिया और उसे रेनकवर से भी ढक दिया। हालांकि काफी बडी छत होने के कारण रेनकवर की कोई आवश्यकता नहीं थी। कोठारी साहब का टैंट मैंने लगाया और उसे रेनकवर से नहीं ढका।
तभी मन्दिर के पुजारी जी आये। दुबले पतले और काफी उम्रदराज। अभी वे चिनगाम बाजार में गये थे कुछ सामान लेने। कहने लगे- अरे, यहां खुले में मत सोओ। हमारे पास एक बहुत बडा हॉल है और खूब सारे कम्बल भी। जहां हमने टैंट लगा रखा था, उसी के बगल में एक दरवाजा खोलकर दिखाया। यह एक हॉल था। इसमें दरियां और कम्बल रखे थे और राशन ईंधन भी। पुजारी जी ने खूब कहा कि यहां हॉल में सो जाओ, राशन रखा है, खाना बना लो। लेकिन चूंकि हम टैंट लगा चुके थे, इसलिये इसे उखाडना ठीक नहीं लगा। खाना स्वयं बनाना पडेगा, इसलिये हम खाना बनाने से भी बचे रहे। अन्यथा भूख तो लग ही रही थी। हां, एक काम किया कि कम्बल ले लिये। अभी तक हमने स्लीपिंग बैग नहीं खोले थे। स्लीपिंग बैग को पैक करना श्रमसाध्य कार्य है, कम्बल लेने से हम सुबह स्लीपिंग बैग पैक करने की मेहनत से बचे रहेंगे।
भूख लगी थी। मैं खाना लेने वापस चिनगाम गया लेकिन वहां ज्यादातर दुकानें बन्द हो चुकी थीं। परचून की एक दुकान खुली मिली। वहां से बिस्कुट, नमकीन, कोल्ड ड्रिंक लेते देखकर दुकानदार ने हमारे बारे में पूछा। हम आज बिस्कुट नमकीन खाकर गुजारा करेंगे, यह जानकर उसने हमें अपने घर चलने को कहा कि आप हमारे यहां आये हो। हम आपको भूखा नहीं रहने देंगे। उसे समझाया कि भाई, मन्दिर में राशन रखा है, हम वहां खाना बनायेंगे। ऐसा ही आपके घर बनेगा, ऐसा ही मन्दिर में बनेगा। तब जाकर वो माना।
मन्दिर में लाउडस्पीकर पर भजन बजने लगे। वैसे तो मैं लाउडस्पीकर पर भजन और अजान पसन्द नही करता लेकिन यहां मुझे ये अच्छे लगे। इसका एक कारण था:
डोडा और किश्तवाड जम्मू क्षेत्र के वे जिले हैं जो पाकिस्तान से सर्वाधिक दूर हैं और जिनकी सीमा हिमाचल से मिलती है। इसके बावजूद भी इन दोनों जिलों में आतंकवाद सर्वाधिक रहा है। अलगाववादियों ने खूब जोर लगा लिया कि डोडा और किश्तवाड के ये जिले कश्मीर में मिल जायें। खूब खून-खराबा यहां हुआ। खूब बम-बन्दूक यहां चलीं। आतंकवादियों और हथियारों का यहां पहुंचने का सर्वाधिक सुगम रास्ता यह सिंथन टॉप ही था। सिंथन टॉप से अगर किश्तवाड की तरफ चलें तो पारना पहला गांव है। पारना और चिनगाम निश्चित ही आतंकवादियों के ठिकाने रहे होंगे। निश्चित ही मन्दिर उजडा होगा। हथियारों की मण्डी रहे होंगे ये गांव।
मैंने इस बारे में पुलिसवालों से बात की। उन्होंने बताया कि सिंथन टॉप के रास्ते आतंकवादी जब पहली बार आये तो उन्हें यहां भारी संख्या में फौज दिखाई दी जबकि उस समय यहां फौज नहीं थी। यह सब इस देवी मां का चमत्कार था। फौज देखकर उनका हौंसला टूट गया और वे भाग गये। फिर कभी आतंकवादी यहां नहीं आये।
लेकिन मुझे यह बात हजम नहीं हुई। हजम हो भी नहीं सकती। डोडा और किश्तवाड जो आज भी बदनाम हैं, कश्मीर से यहां आने और हथियार लाने का सबसे सुगम रास्ता यहीं सिंथन टॉप वाला है। मुख्य रास्ते पर तो खूब फौज रहती थी, वहां से हथियार लाना आसान नहीं था। फिर पुजारीजी से बात की। उन्होंने बताया- उन दिनों यहां चौबीस घण्टे बम फटा करते थे, गोलियां चला करती थी। चारों तरफ घोर जंगल है, इसमें चप्पे चप्पे पर आतंकवादी होते थे। मन्दिर को तो हालांकि कोई नुकसान नहीं पहुंचाया लेकिन यहां की मूर्तियां उखाडकर ले गये और नदी में फेंक दिया। बहुत दिनों तक यह मन्दिर जनशून्य और मूर्तिशून्य रहा। मैंने पूछा- हिन्दुओं का क्या हाल था? बताया- यहां हिन्दुओं का उतना बुरा हाल नहीं हुआ जितना कश्मीर में हुआ। हम बेखौफ अपनी जिन्दगी जी रहे थे। उनका मकसद किश्तवाड और डोडा पर कब्जा जमाने का था। ये छोटे छोटे गांव उनके लिये ज्यादा मायने नहीं रखते थे। बाद में फौज आई। खूब मारधाड हुई और आज यहां पूर्ण शान्ति है।
यह थी यहां की कहानी। इस घटना को ज्यादा दिन नहीं हुए। पांच साल पहले यहां बहुत गडबड थी। ऐसे में एक मन्दिर में लाउडस्पीकर पर भजन बजें तो अच्छे लगने ही थे।
एक पुलिसवाला भगतजी बना हुआ था। वह पिछले पांच साल से यहीं तैनात है। मन्दिर के बगल में उसका बिस्तर है। बिस्तर क्या, बस दो बडे बडे लकडी के लट्ठे रखे हैं। उन पर कम्बल बिछाकर वह सोता है। उसके एक तरफ तो दीवार है, बाकी तीन तरफ बिल्कुल खुला है। ऊपर घास की छत है। सर्दियों में भी वह यही सोता है, खुले में। बाकी पुलिस वालों के लिये मन्दिर प्रांगण में बैरक बनी है।
एक सरदारजी थे, पुलिसवाले। वे सबके लिये खाना बनाने में लगे थे। सब्जी तो पता नहीं क्या बनाई, जब मैंने देखा तो वे रोट बना रहे थे। रोट इतने बडे कि मैं एक में ही तन जाऊंगा। उन्होंने बिलांद भरकर रोट बनाये। तीन-चार पुलिसवाले सारे ही थे। पता नहीं कहां रखेंगे इतने रोट?
कोठारी साहब का तो पता नहीं लेकिन यह जगह हम दोनों को बहुत पसन्द आई। हम खाना भी बना लेते लेकिन हम आज 150 किलोमीटर से भी ज्यादा चले थे जिसमें ज्यादातर खराब था। बहुत ज्यादा थके थे। बाद में पुजारीजी ने उस हॉल में ताला भी नहीं लगाया और एक दूसरा भण्डारघर भी खोल दिया जिसमें बहुत सारे बर्तन रखे थे। सब हमें अच्छे से दिखा दिये। कह गये कि रात-बेरात को अगर किसी भी चीज की जरुरत पडे तो बेझिझक इस्तेमाल करना।
कोठारी साहब के पास लेमन टी का पावडर था। हमें गर्म पानी की जरुरत थी। हम आपस में ही फुसफुसा रहे थे कि थोडा सा गर्म पानी मिल जाये तो लेमन टी बन जायेगी। अन्धेरा था। सामने एक घर की छत थी, वो घर कुछ निचाई पर था। हमें फुसफुसाये हुए दो मिनट भी नहीं बीते कि उस घर से थर्मस भरकर गर्म पानी आ गया। इसके बाद तो हमारे फुसफुसाने पर भी बैन लग गया। डर था कि हम अपनी किसी आवश्यकता के लिये फुसफुसायें और वो चीज कोई ले आये। संकोच हम पर हावी था।

बटोट में नाश्ता


बटोट से दूरियां

बगलिहार बांध के कारण चेनाब नदी झील की तरह दिख रही है।


बटोट-किश्तवाड सडक





चेनाब के उस पार डोडा शहर

पुलडोडा

पुलडोडा से भदरवाह की तरफ की दूरियां









संसारी में जम्मू-कश्मीर और हिमाचल की सीमा है। किलाड हिमाचल की पांगी घाटी में है।

किश्तवाड में लंच


किश्तवाड

किश्तवाड से श्रीनगर की तरफ



चेनाब पर बना पुल

इसी पुल से चेनाब पार की।








पारना में इसी मन्दिर में हम रुके थे।



सरदारजी पुलिसवाले खाना बनाते हुए
नीचे की वीडियो में बटोट-किश्तवाड सडक का एक खराब हिस्सा दिखाया गया है।



नीचे की वीडियो में पारना गांव में बज रहे भजन और गांव के आसपास के भूदृश्य को दिखाया है।



पुलिस वाले रोटी बना रहे हैं।






अगले भाग में जारी...


1. लद्दाख बाइक यात्रा-1 (तैयारी)
2. लद्दाख बाइक यात्रा-2 (दिल्ली से जम्मू)
3. लद्दाख बाइक यात्रा-3 (जम्मू से बटोट)
4. लद्दाख बाइक यात्रा-4 (बटोट-डोडा-किश्तवाड-पारना)
5. लद्दाख बाइक यात्रा-5 (पारना-सिंथन टॉप-श्रीनगर)
6. लद्दाख बाइक यात्रा-6 (श्रीनगर-सोनमर्ग-जोजीला-द्रास)
7. लद्दाख बाइक यात्रा-7 (द्रास-कारगिल-बटालिक)
8. लद्दाख बाइक यात्रा-8 (बटालिक-खालसी)
9. लद्दाख बाइक यात्रा-9 (खालसी-हनुपट्टा-शिरशिरला)
10. लद्दाख बाइक यात्रा-10 (शिरशिरला-खालसी)
11. लद्दाख बाइक यात्रा-11 (खालसी-लेह)
12. लद्दाख बाइक यात्रा-12 (लेह-खारदुंगला)
13. लद्दाख बाइक यात्रा-13 (लेह-चांगला)
14. लद्दाख बाइक यात्रा-14 (चांगला-पेंगोंग)
15. लद्दाख बाइक यात्रा-15 (पेंगोंग झील- लुकुंग से मेरक)
16. लद्दाख बाइक यात्रा-16 (मेरक-चुशुल-सागा ला-लोमा)
17. लद्दाख बाइक यात्रा-17 (लोमा-हनले-लोमा-माहे)
18. लद्दाख बाइक यात्रा-18 (माहे-शो मोरीरी-शो कार)
19. लद्दाख बाइक यात्रा-19 (शो कार-डेबरिंग-पांग-सरचू-भरतपुर)
20. लद्दाख बाइक यात्रा-20 (भरतपुर-केलांग)
21. लद्दाख बाइक यात्रा-21 (केलांग-मनाली-ऊना-दिल्ली)
22. लद्दाख बाइक यात्रा का कुल खर्च

40 comments:

  1. बहुत अच्छा वर्णन और फोटो। लास्ट विडयो में पोलिस वाले सरदार जी के सामने धूम्रपान '. बहुत बहुत धन्यवाद इतनी सुन्दर पोस्ट लिख्ने के लिए

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    1. देश के दूर-दराज के देहाती इलाकों में अभी भी धूम्रपान के प्रति उतनी जागरुकता नहीं है, जितनी शहरी क्षेत्रों में। धन्यवाद आपका।

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  2. बढ़िया पोस्ट
    ये विडियोज डाल के सही कर रहे हैं , एकदम फील आ जाती है

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    1. धन्यवाद पाण्डेय जी...

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  3. बहुत सुंदर वर्णन पोस्ट थोड़ी लम्बी अवश्य हो गयी है लेकिन शुरू से अंत तक बंधे रखती है.

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    1. हां जी, पोस्ट लम्बी हो गई है लेकिन छोटी-छोटी दो पोस्टों से ज्यादा बेहतर है। धन्यवाद आपका।

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  4. काफी जानकारीयुक्त पोस्ट है. फोटो भी अच्छे आ रहे है. कृपया दर्रा और घाटी क्या होती है बताने का कष्ट करे.

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    1. दर्रे और घाटी के बारे में अगली पोस्ट में बताऊंगा।

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  5. अच्छी पोस्ट, बढ़िया फोटोग्राफी, शानदार जानकारी के साथ।

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    1. धन्यवाद अहमद साहब...

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  6. nice article ......

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  7. वाह !! डोडा और किश्तवाड़ के बारे में बहुत ही सटीक जानकारी सर!

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    1. धन्यवाद निरंजन जी...

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  8. डोडा व किश्तवाड़ के बारे में सारगर्भित जानकारियाँ। धन्य हो प्रभु.....!!

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  9. वृतांत बहूत ही शानदार लिखा है नीरज आपने। सहयात्री होने के नाते मैं यह बख़ूबी समझ सकता हूँ।
    हर बात के पीछे कोई न कोई कारण होता है। यही बटोट में रात बिताने के पीछे हुआ और हम किश्तवाड़ की तरफ़ मुड़ गये व अद्भूत प्राकृतिक सौन्दर्य के दर्शन के साथ यात्रा को एक रोमांचक मोड़ मिला।

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    1. बिल्कुल सही कहा सर जी...

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  10. अति सुन्दर। यह थी यहां की कहानी। इस घटना को ज्यादा दिन नहीं हुए। पांच साल पहले यहां बहुत गडबड थी। ऐसे में एक मन्दिर में लाउडस्पीकर पर भजन बजें तो अच्छे लगने ही थे।

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    1. धन्यवाद सर्वेश जी...

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  11. बहुत शानदार पोस्ट नीरज जी. पढ़कर मजा आ गया.....

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    1. धन्यवाद मुकेश जी...

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  12. I am hungry now after watching those lovely food photos. Neeraj you are an inspiration for many service/business people who wish to travel or already traveling - I think so. Even with job in hand how to take time to travel - could be learn from you. You should write a post about it.

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    1. आपका बहुत बहुत धन्यवाद तुषार जी... समय प्रबन्धन के बारे में एक पोस्ट शीघ्र ही लिखूंगा...

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  13. बहुत ही बढ़िया और रोचक वृतांत... धन्यवाद नीरज जाट...

    मनोज कुमार
    देवरिया, उत्तर प्रदेश....

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    1. धन्यवाद मनोज जी...

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  14. नीरज जी राम राम, आपका यात्रा लेखन पढ़ कर खो सा गया. आपने कश्मीर के बारे में बिलकुल सच लिखा हैं. काश यह इंटीरियर के इलाके भी सरकारे अच्छी तरह से विकसित करती. सब नेहरु की गलतिया भुगत रहे हैं. कश्मीर समस्या, आबादी का पूरी तरह से बँटवारा ना होना..आपकी चित्रों के द्वारा इस क्षेत्र को पहली बार देखा, धन्यवाद ...वन्देमातरम...

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    1. राम राम गुप्ता जी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद...

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  15. बहुत अच्छा लगता है आपका यात्रा का वर्णन।

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    1. धन्यवाद चौधरी साहब...

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  16. बहुत अच्छा लगता है आपका यात्रा का वर्णन।

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  17. बहुत अच्छा लगता है आपका यात्रा का वर्णन।

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  18. डोडा और किश्तवाड़ के बारे में बहुत ही दुर्लभ जानकारियां आपके माध्‍यम से सब तक पहुंचेंगी। एक बार फिर से बहुत बढिया वर्णन एवं सुंदर फोटो।

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    1. धन्यवाद स्वाति जी...

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  19. डोडा ओर किश्तवाड के बारे में बडी महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने..
    ओर दूसरी अंजान जगह होती हुई भी वहां के लोगो ने भारत की परम्परा (अतीथी देवो भव:)को जीवित रखा, चाहे वो पुलिस वाले हो या मन्दिर का पुजारी या फिर कोई अन्य...

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    1. बिल्कुल ठीक कहा सचिन भाई... धन्यवाद आपका...

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  20. As usual fantastic post, and I agree with others, adding videos really make the post come alive.
    Thanks a lot for sharing so many small details.
    In my personal opinion, temples/mosques or any religious places should ban use of loudspeakers altogether, and in tourist places fines should be doubled :-)

    Looking forward to the next part :-)

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  21. शानदार यात्रा । मंदिर वाला वोडिओ और सरदारजी की रोटियाँ पसन्द आई। ये हमारे सैनिक सचमुच सलाम के हकदार है।

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