Skip to main content

चादर ट्रैक की चुनौतियाँ

All Information about Chadar Trekअब एक महीने तक चादर ट्रैक के अपडेट आते रहेंगे... इस ट्रैक का सीजन अच्छी तरह अभी शुरू भी नहीं हुआ है कि कैजुअल्टी की खबरें आने लगी हैं... बहुत सारे लोग इस ट्रैक का विरोध करते हैं और बहुत सारे लोग समर्थन करते हैं... लेकिन इस बात में कोई दो-राय नहीं कि आज के समय में यह भारत का सबसे ग्लैमरस ट्रैक है...

चादर है क्या?... सर्दियों में अत्यधिक ठंड में हिमालय में नदियाँ जम जाती हैं... असल में बहता पानी कभी पूरी तरह नहीं जमता, लेकिन इसकी ऊपरी परत जम जाती है... इसी परत को चादर कहा जाता है... यानी बर्फ की चादर... आइस की चादर... यह इतनी कठोर होती है कि इस पर चला भी जा सकता है... और यहाँ तक कि गाड़ियाँ तक चलाई जा सकती हैं... पेंगोंग झील पर गाड़ी चलाने के बहुत सारे फोटो और वीडियो मैंने देखे हैं...
लद्दाख में जांस्कर नदी ऐसी ही चादर के लिए विख्यात है... इसी पर 40-50 किलोमीटर का ट्रैक किया जाता है... यह कहीं पर पूरी तरह जमी होती है, इसे पैदल चलकर पार किया जा सकता है... और कई स्थानों पर केवल किनारों पर ही जमी होती है... और कई स्थानों पर बिल्कुल भी जमी नहीं होती... इसके दोनों तरफ सीधे खड़े पहाड़ हैं... जहाँ नदी जमी नहीं होती, वहाँ चट्टानों पर चढ़कर दूरी तय की जाती है... कई बार पानी में घुसकर भी... तो ऐसे स्थानों पर शून्य से 25-30 डिग्री नीचे के तापमान में चलना अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है...






लेकिन इस ट्रैक का गणित थोड़ा अलग है... जो हमेशा कन्फ्यूजन पैदा करता है... इस ट्रैक का डिफिकल्टी लेवल क्या है?... असल में किसी भी ट्रैक का एक ‘डिफिकल्टी लेवल’ होता है... और चूँकि ज्यादातर ट्रैक गर्मियों में किए जाते हैं, तो डिफिकल्टी लेवल की परिभाषा गर्मियों में ही काम की होती है... मुख्यतः तीन लेवल होते हैं...
1. आसान ट्रैक यानी इसे कोई भी कर सकता है... रास्ता स्पष्ट बना होता है... बहुत तेज चढ़ाई नहीं होती... बहुत ज्यादा एल्टीट्यूड भी नहीं होता... अक्सर 4000 मीटर से नीचे के ज्यादातर ट्रैक ‘आसान ट्रैक’ की श्रेणी में आते हैं...
2. मॉडरेट ट्रैक... यानी थोड़ा-सा कठिन... 4000 मीटर से ज्यादा की ऊँचाई... और कई बार रास्ता भी ढूँढ़ना पड़ जाता है... अक्सर अपना भोजन भी ले जाना पड़ता है...
3. कठिन ट्रैक... इसमें अक्सर ग्लेशियरों पर चलना होता है... क्रेवास आदि पार करने होते हैं... 5000 मीटर से ऊँचे दर्रे पार करने होते हैं... स्पष्ट रास्ता नहीं बना होता...

अब सवाल यह आता है कि चादर ट्रैक इस परिभाषा के अनुसार किस श्रेणी में आता है... तो नो डाउट कि यह उपरोक्त परिभाषा के अनुसार ‘आसान ट्रैक’ की श्रेणी में आता है... लेकिन यह परिभाषा गर्मियों में होने वाले ट्रैकों के लिए है... सर्दियों में सारे समीकरण बदल जाते हैं... चादर ट्रैक में आपको हमेशा 4000 मीटर से नीचे ही रहना है... गाँव आदि भी मिलते हैं... भटकने का डर नहीं... और चढ़ाई बिल्कुल भी नहीं चढ़नी पड़ती... तो इस प्रकार यह ‘आसान ट्रैक’ है...
लेकिन माइनस 25-30 डिग्री टेम्परेचर और हवाई मार्ग से लद्दाख पहुँचना यानी समुद्र तल या 100-200 मीटर की मैदानी हाइट से एक घंटे के भीतर 3400 मीटर पर पहुँचना शरीर के लिए बहुत बड़ा झटका होता है... कई लोग इस बात को नहीं समझ पाते... और लेह उतरते ही अगले दिन चादर ट्रैक के लिए निकल जाते हैं... फिर बर्फ की चादर के टूटने का डर... फिसलने का डर... इस दृष्टि से देखें, तो यह एक ‘कठिन ट्रैक’ है...

लगभग सभी टूर ऑपरेटर इसे ‘आसान ट्रैक’ कहकर प्रचारित करते हैं... या कभी-कभी ‘ईजी मोडरेट’ भी बताते हैं... मैंने तो ‘ईजी मोडरेटिड हार्ड ट्रैक’ भी पढ़ा है इसे एक जगह... मतलब ‘आसान’ शब्द का प्रयोग जरूर किया जाता है... नतीजा?... जिसने कभी कोई ट्रैक नहीं किया... जिसने कभी हाई एल्टीट्यूड सिकनेस को महसूस नहीं किया... जो कभी भी पूरे साल एक किलोमीटर भी पैदल नहीं चला, वो भी इस ‘ईजी’ के चक्कर में चादर ट्रैक करने निकल पड़ता है...

आजकल इस ट्रैक का बहुत ज्यादा क्रेज है... सोशल मीडिया ने एडवेंचर पसंद युवाओं को यह ट्रैक करने के लिए मजबूर कर दिया है... मैंने ऐसी-ऐसी वीडियो देखी हैं, जब ट्रैकर्स वहाँ माइनस 25 डिग्री टेम्परेचर में कपड़े उतारकर जांस्कर नदी में डुबकी लगाते हैं... हो सकता है आपका शरीर ऐसा करने में सक्षम हो, लेकिन सभी का शरीर सक्षम नहीं होता... और आज का युवा इसे एक चैलेंज के तौर पर लेता है और सक्षम न होने के बावजूद भी वो चादर ट्रैक पर जाता है और कपड़े उतारकर डुबकी लगाने की कोशिश जरूर करता है...
नतीजा...??? कैजुअल्टी...





आपसे अगर रूपकुंड जाने को कहा जाए, तो शायद आप तैयार न हों... क्योंकि सभी जानते हैं कि रूपकुंड ‘आसान’ ट्रैक नहीं है... लेकिन रूपकुंड से कई गुना ज्यादा मुश्किल चादर ट्रैक पर जाने को तैयार हो जाएँगे, क्योंकि आपको बताया जाता है कि चादर एक ‘आसान’ ट्रैक है... आप कालिंदी खाल ट्रैक के लिए शायद ही तैयार हों, क्योंकि आपको पता है कि यह एक ‘कठिन’ ट्रैक है... लेकिन इसके बराबर कठिन चादर ट्रैक करने को तैयार हो जाते हैं...

मैं भी एक बार चादर ट्रैक गया हूँ... अकेले... बिना किसी ट्रैवल कंपनी के... लेकिन मुझे उससे पहले हाई एल्टीट्यूड ट्रैकिंग का अनुभव था... साथ ही नेरक तक जाने की बाध्यता भी नहीं थी... टैंट भी नहीं था और सबसे सस्ता स्लीपिंग बैग था... चिलिंग से 8-10 किलोमीटर आगे तिलत सुमडो नामक स्थान पर एक गुफा है... रात काटने के लिए मैं उस गुफा में रुक गया... वहाँ अच्छी कैंपिंग ग्राउंड भी है, लेकिन उस दिन वहाँ कोई भी नहीं था... गुफा में मैं अकेला था और जैसे-जैसे रात होती जा रही थी, ठंड भी बढ़ती जा रही थी और डर भी लगता जा रहा था... जितने कपड़े और जुराबें पहन सकता था, पहन रखे थे... जूतों के ऊपर भी जुराबें चढ़ा रखी थीं... इसके बावजूद भी पैरों की उंगलियाँ सुन्न हुई पड़ी थीं... बाहर चादर के बनने और चटकने की आवाजें आ रही थीं... मुझे बार-बार लगता कि कोई हिम तेंदुआ यह आवाज कर रहा है...जंगली कुत्तों और भेड़ियों के आने का डर भी लगता... लेकिन उंगलियाँ सुन्न हो जाने के बाद आधी रात तक मरने का सारा डर समाप्त हो गया और अब मुझे यह डर लगने लगा कि कहीं पैरों की उंगलियाँ ठंड से गल न जाएँ... मैं वास्तव में अपने मरने की कामना करने लगा था... क्योंकि कटे पैरों के साथ जीना नहीं चाहता था... नींद नहीं आ रही थी... और मैं सोना भी नहीं चाहता था... लगातार पैरों की उंगलियाँ हिलाता जा रहा था... मुझे लग रहा था कि जब भी उंगलियाँ हिलना बंद हो जाएँगी, तभी ये सुन्न होकर गलने लगेंगी... स्लीपिंग बैग में ‘सीलपैक’ होकर पूरी रात एक ही करवट लेटा रहा था... सुबह चार बजे तक मेरे नीचे की ठंडी जमीन थोड़ी गर्म हो गई थी और मुझे नींद आ गई थी...

नौ बजे आँख खुली... पैरों की उंगलियाँ हिलाने पर हिल रही थीं... कसम से, मैं खुशी से चिल्ला उठा था... आज मैं जिंदा था... और सही-समालत भी था... आज मुझे नेरक जाना था और मैं जा भी सकता था... लेकिन अगर आज मैं किसी वजह से नेरक न पहुँच सका तो...?? तो फिर एक रात मुझे इसी तरह एक गुफा में काटनी पड़ेगी... और मैं आज फिर से मरना नहीं चाहता था... आज वाकई मुझे जीवनदान मिला था... मुझे अभी जीना है...

और मैं वापस लेह की ओर चल दिया... कुल चार किलोमीटर चादर पर चला था... लेकिन तय कर लिया कि अपनी इस कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं लिखूँगा... अन्यथा मेरे बाद बहुत सारे लोग यहाँ अकेले आने लगेंगे... और सभी मेरी तरह भाग्यशाली नहीं होंगे... यह कहानी ब्लॉग पर भी आई... दैनिक जागरण में भी छपी और बाद में किताब भी बनी... लेकिन आज भी मैं यह लाइन लिखना नहीं भूलता...

“कभी भी इस ट्रैक को अकेले या देखा-देखी में मत करना... यह बहुत कठिन ट्रैक है...”

अवश्य पढ़ें: चादर ट्रैक - गुफा में एक रात






उस गुफा से लिया गया बाहर का फोटो

सामने पहाड़ के नीचे तिलत सुमडो है... जहाँ वह गुफा थी...

जमी हुई जांस्कर नदी...




Comments

Popular posts from this blog

लद्दाख बाइक यात्रा- 1 (तैयारी)

बुलेट निःसन्देह शानदार बाइक है। जहां दूसरी बाइक के पूरे जोर हो जाते हैं, वहां बुलेट भड-भड-भड-भड करती हुई निकल जाती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि लद्दाख जाने के लिये या लम्बी दूरी की यात्राओं के लिये बुलेट ही उत्तम है। बुलेट न हो तो हम यात्राएं ही नहीं करेंगे। बाइक अच्छी हालत में होनी चाहिये। बुलेट की भी अच्छी हालत नहीं होगी तो वह आपको ऐसी जगह ले जाकर धोखा देगी, जहां आपके पास सिर पकडकर बैठने के अलावा कोई और चारा नहीं रहेगा। अच्छी हालत वाली कोई भी बाइक आपको रोहतांग भी पार करायेगी, जोजी-ला भी पार करायेगी और खारदुंग-ला, चांग-ला भी। वास्तव में यह मशीन ही है जिसके भरोसे आप लद्दाख जाते हो। तो कम से कम अपनी मशीन की, इसके पुर्जों की थोडी सी जानकारी तो होनी ही चाहिये। सबसे पहले बात करते हैं टायर की। टायर बाइक का वो हिस्सा है जिस पर सबसे ज्यादा दबाव पडता है और जो सबसे ज्यादा नाजुक भी होता है। इसका कोई विकल्प भी नहीं है और आपको इसे हर हाल में पूरी तरह फिट रखना पडेगा।

चित्रकोट जलप्रपात- अथाह जलराशि

इस यात्रा-वृत्तान्त को आरम्भ से पढने के लिये यहां क्लिक करें । चित्रधारा से निकले तो सीधे चित्रकोट जाकर ही रुके। जगदलपुर से ही हम इन्द्रावती नदी के लगभग समान्तर चले आ रहे थे। चित्रकोट से करीब दो तीन किलोमीटर पहले से यह नदी दिखने भी लगती है। मानसून का शुरूआती चरण होने के बावजूद भी इसमें खूब पानी था। इस जलप्रपात को भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। और वास्तव में है भी ऐसा ही। प्रामाणिक आंकडे तो मुझे नहीं पता लेकिन मानसून में इसकी चौडाई बहुत ज्यादा बढ जाती है। अभी मानसून ढंग से शुरू भी नहीं हुआ था और इसकी चौडाई और जलराशि देख-देखकर आंखें फटी जा रही थीं। हालांकि पानी बिल्कुल गन्दला था- बारिश के कारण। मोटरसाइकिल एक तरफ खडी की। सामने ही छत्तीसगढ पर्यटन का विश्रामगृह था। विश्रामगृह के ज्यादातर कमरों की खिडकियों से यह विशाल जलराशि करीब सौ फीट की ऊंचाई से नीचे गिरती दिखती है। मोटरसाइकिल खडी करके हम प्रपात के पास चले गये। जितना पास जाते, उतने ही रोंगटे खडे होने लगते। कभी नहीं सोचा था कि इतना पानी भी कहीं गिर सकता है। जहां हम खडे थे, कुछ दिन बाद पानी यहां तक भी आ जायेगा और प्रपात की चौडाई और भी बढ ...

लद्दाख बाइक यात्रा- 2 (दिल्ली से जम्मू)

यात्रा आरम्भ करने से पहले एक और बात कर लेते हैं। परभणी, महाराष्ट्र के रहने वाले निरंजन साहब पिछले दो सालों से साइकिल से लद्दाख जाने की तैयारियां कर रहे थे। लगातार मेरे सम्पर्क में रहते थे। उन्होंने खूब शारीरिक तैयारियां की। पश्चिमी घाट की पहाडियों पर फुर्र से कई-कई किलोमीटर साइकिल चढा देते थे। पिछले साल तो वे नहीं जा सके लेकिन इस बार निकल पडे। ट्रेन, बस और सूमो में यात्रा करते-करते श्रीनगर पहुंचे और अगले ही दिन कारगिल पहुंच गये। कहा कि कारगिल से साइकिल यात्रा शुरू करेंगे। खैर, निरंजन साहब आराम से तीन दिनों में लेह पहुंच गये। यह जून का पहला सप्ताह था। रोहतांग तभी खुला ही था, तंगलंग-ला और बाकी दर्रे तो खुले ही रहते हैं। बारालाचा-ला बन्द था। लिहाजा लेह-मनाली सडक भी बन्द थी। पन्द्रह जून के आसपास खुलने की सम्भावना थी। उनका मुम्बई वापसी का आरक्षण अम्बाला छावनी से 19 जून की शाम को था। इसका अर्थ था कि उनके पास 18 जून की शाम तक मनाली पहुंचने का समय था। मैंने मनाली से लेह साइकिल यात्रा चौदह दिनों में पूरी की थी। मुझे पहाडों पर साइकिल चलाने का अभ्यास नहीं था। फिर मनाली लगभग 2000 मीटर पर है, ले...