भारत प्रवेश के बाद: बॉर्डर से दिल्ली

April 26, 2018


इस यात्रा की किताब हमसफ़र एवरेस्ट हमारे भारत में प्रवेश करते ही समाप्त हो जाती है। इसके बाद क्या हुआ, आज आपको बताते हैं।
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4 जून 2016
तो सीमा पार कर लेने के बाद फरेंदा की तरफ़ दौड़ लगा दी, जो यहाँ से 50 किलोमीटर दूर है। सड़क अच्छी बनी है। निकट भविष्य में और भी अच्छी बन जायेगी।
लेकिन सामने से आते गाड़ी वाले अपनी हैड़लाइट डाउन नहीं करते। नेपाल में दूर से देखते ही हैड़लाइट डाउन कर लेते थे। यदि हम ऐसा करने में देर लगा देते तो सामने वाला लाइटें जला-बुझाकर तब तक इशारा करता रहता, जब तक हम डाउन न कर लें। वास्तव में नेपाल में भारत के मुकाबले ‘ट्रैफिक सेंस’ ज्यादा अच्छी है।
लेकिन आज हमें कुछ भी ख़राब नहीं लग रहा था। जल्द ही मैंने भी हैड़लाइट डाउन करनी बंद कर दी और उसी ज़मात में शामिल हो गया, जिसकी अभी-अभी आलोचना कर रहा था।
विमलेश जी के भाई का नाम कमलेश है। वे फरेंदा में मिल गये। बिजली विभाग में अच्छे पद पर हैं। अपने क्वार्टर पर अकेले ही थे और हमारे लिये रोटी व दाल चावल बना रखे थे। दीप्ति ने कहा - “आज भी दाल-भात।” मैंने कहा - “नहीं, ये दाल-भात नहीं हैं। ये दाल-चावल हैं और ये उन दाल-भात से बिल्कुल अलग हैं।”
रात बारह बजे तक सो गये। कल रात घुर्मी में अच्छी नींद नहीं आयी थी। फिर आज 530 किलोमीटर से ज्यादा बाइक चलायी, जिसके कारण इतनी ज्यादा थकान हो गयी थी कि रातभर मच्छर काटते रहे, न मच्छरदानी लगाने की सुध रही और न आँख खुली।

5 जून, 2016
सुबह अपनी रात्रिकालीन ड्यूटी समाप्त करके कमलेश जी आ गये और मना करते-करते भी हमारे लिये नाश्ता बना दिया। हमारे पास पैसे नहीं थे। नेपाल में कल इसलिये नहीं निकाले कि नेपाली मुद्रा को भारतीय मुद्रा में बदलने का झंझट नहीं उठाना चाहते थे। आज कमलेश जी की बाइक पर बैठकर पूरे फरेंदा का चक्कर लगा डाला, लेकिन किसी भी ए.टी.एम. में पैसे नहीं मिले। हमारे अलावा भी कई और लोग बाइकों और स्कूटरों पर पैसों के लिये इधर से उधर चक्कर लगा रहे थे।
आख़िरकार कमलेश जी स्टेट बैंक के एक ए.टी.एम. पर पहुँचे। शटर नीचे गिरा था, लेकिन ताला नहीं लगा था। चौकीदार जान-पहचान वाला था। वह शटर उठाने को राज़ी हो गया, लेकिन साथ ही हिदायत भी दी कि इसमें पैसे कम हैं, किसी और से मत बताना कि यहाँ से निकाले हैं। आधा शटर उठाया और मैंने पर्याप्त पैसे निकाल लिये। तब तक बाहर कई व्यक्ति और भी आ चुके थे। चौकीदार ने हाथ से मुझे इशारा किया और मैं यह कहते हुए निकल गया - “पैसे नहीं हैं।”
नौ बजे फरेंदा से चल दिये। रास्ता हमारा देखा हुआ था ही। कैंपियरगंज में बाइक की टंकी फुल कराकर सीधे बस्ती की ओर दौड़ लगा दी। इसमें सात किलोमीटर का रास्ता अत्यंत ख़राब है, लेकिन वाया गोरखपुर के मुकाबले यह बहुत छोटा भी है। ग्यारह बजे बस्ती बाईपास पर फ्लाईओवर के नीचे जाकर रुके। जून की जला देने वाली गर्मी पड़ रही थी और लू भी चल रही थी। यहाँ दस-दस रुपये का गन्ना-रस पीया, तो जान में जान आयी। रस वाले को दस रुपये देते समय लग रहा था कि हमने फ्री में रस पीया है। नेपाल में खासकर एवरेस्ट ट्रैक में दस-बीस रुपये का कुछ नहीं मिलता।
आगे भी कई बार गन्ना-रस पीया। गर्मी इतनी थी कि रस पीकर एक किलोमीटर भी आगे नहीं जाते कि फिर से रस पीने की तलब लगने लगती। एक बजे फ़ैज़ाबाद पहुँचे - सीधे अपर्णा जी के यहाँ। लेकिन उनके घर पर मरम्मत का कार्य चल रहा था और सबकुछ तितर-बितर पड़ा था, इसलिये उन्होंने हमारे लिये शाने-अवध होटल में एक ए.सी. कमरा बुक कर दिया। वैसे दोपहर में फ़ैज़ाबाद पहुँचने का अर्थ था कि थोड़ा खाना खाकर और थोड़ा आराम करके शाम को निकल पड़ेंगे, लेकिन भयानक गर्मी में वातानुकूलित कमरा देखकर यहीं रुकने का मन हो गया। पहले तो जमकर नहाये और फिर सो गये।
शाम को अपर्णा जी सपरिवार आ गयीं और खाने-पीने का दौर चला। समय था, अयोध्या भी जा सकते थे, लेकिन बातों में इतना मन लगा कि अयोध्या जाना भूल गये। वे एवरेस्ट यात्रा के फोटो देखती रहीं और आश्चर्य भी करती रहीं। आधी रात तक बातों का सिलसिला चलता रहा। सुबह हम जल्दी निकल जायेंगे और वे नहीं मिल सकेंगी, इसलिये अभी जी भरकर मिले। फ़ुरसत में कभी फ़ैज़ाबाद आने का वादा किया और उनके साथ यू.पी. के एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान दुधवा घूमने की प्रतिज्ञा भी। अपर्णा जी असल में दुधवा के पास की ही रहने वाली हैं। अभी तक दुधवा से फ़ैज़ाबाद तक की पट्टी में हमारी कोई जान-पहचान नहीं थी, अब अचानक सारी पट्टी अपनी हो गयी।
अगले दिन सुबह छह बजे ही फ़ैज़ाबाद से चल दिये। सुबह का समय था और धूप में तीखापन भी नहीं आया था। लगातार साढ़े तीन घंटे तक चलने और 200 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद उन्नाव के पास कहीं रुके। दही के साथ आलू-पराँठे का नाश्ता किया और दस बजे फिर चल दिये। मन में उत्कंठा थी कि आज ही दिल्ली पहुँचना है। रास्ता बहुत अच्छा है। हम रात होने तक दिल्ली पहुँच जायेंगे।
लेकिन बारह बजते-बजते जब गर्मी चरम पर होने लगी, तो दिल्ली पहुँचने की इच्छाएँ दबने लगीं। अगर आज इटावा में कपिल चौबे जी होते तो हम दोपहरी उनके यहाँ काट देते। ऐसी गर्मी में बाइक चलाने की बिल्कुल भी इच्छा नहीं हो रही थी। न मेरा मन लग रहा था और न ही दीप्ति का।
औरैया के पास एक जगह कोल्ड़ ड्रिंक पीने रुक गये। काफ़ी बड़ी जगह थी। छायादार भी और हवादार भी। लेकिन ठंड़ी कोल्ड़ ड्रिंक नहीं मिली। यहाँ एक घंटा रुके रहे। मैं नहा भी लिया। नहाने के बाद बड़ी राहत मिली। जून में हमारे उत्तर भारत में गर्मी चरम पर पड़ती है। ‘जेठ की तपती दुपहरिया’ इसे ही कहते हैं। आसमान में पक्षी तक नहीं दिखते। लेकिन हमारी मज़बूरी थी। दिल्ली भी पहुँचना था और बाइक से ही पहुँचना था।
ताकशिंदो-ला पर बाइक चलाने से भी ज्यादा मुश्किल अब हो रही थी। मन बना लिया कि आगरा में राहुल अवस्थी जी के यहाँ रुकेंगे। इस बारे में उन्हें भी बता दिया और वे हमारी प्रतीक्षा करने लगे।
टूंड़ला पहुँचते-पहुँचते चार बज गये और सामने यानी पश्चिम दिशा में धूल का बवंड़र उठता दिखायी दिया। हवा तेज चलने लगी और जल्दी ही यह तूफ़ान में बदल गयी। बारिश तो नहीं हुई, लेकिन गर्मी गायब हो गयी। हवा इतनी तेज थी कि हम पचास की स्पीड़ से चलने में भी ठीक संतुलन नहीं बना पा रहे थे।
दीप्ति खुश थी कि आज वह ताज-नगरी में थी, आगरा में थी। उसने अपने-आप ही वादा कर लिया था कि कल हम ताजमहल देखेंगे। यमुना पार करते समय हमने दक्षिण में देखा, लेकिन ताजमहल नहीं दिखा। हाँ, थोड़ा आगे चलकर आगरा का किला अवश्य दिख गया था।
राहुल जी हमें लेने कैंट स्टेशन पर आये। स्टेशन के पास ही उनका घर है।
अगले दिन यानी 7 जून को दीप्ति को यह कहकर ताजमहल देखने से मना करना पड़ा कि संगमरमर का बना ताज परिसर धूप में अत्यंत गर्म हो जायेगा और हमारे पैरों में छाले भी पड़ सकते हैं। फिर टिकट व सुरक्षा-जाँच के लिये लाइन में भी लगना पड़ता है। कभी मानसून में आयेंगे या फिर सर्दियों में। वह मान गयी, लेकिन आग्रह किया कि ऐसे मार्ग से चलो, जहाँ से ताजमहल दिख सके। उसका आग्रह मैंने मान लिया। पता नहीं उसे ताज दिखा या नहीं, लेकिन वह खुश थी।
यमुना एक्सप्रेसवे पर चल पड़े। मथुरा वाले मोड़ पर नरेश चौधरी जी मिल गये। एक महीने पहले जब हम इधर से नेपाल की ओर जा रहे थे, तब भी वे मिलते-मिलते रह गये थे। और इस बार तो अपने घर ले गये। दोपहरी होने से पहले ही धूप झुलसाने लगी थी। गाँव में नरेश जी के घर पर हमारी जो खातिरदारी हुई, अपने खास रिश्तेदार की भी क्या होती होगी! खाना-पीना तो हुआ ही, यमुना की रेत के खरबूजे बोरी भरकर लाद लिये। इनके अपने खेत के खरबूजे थे। कम से कम आधा मन खरबूजे लादकर शाम चार बजे दिल्ली की ओर चल दिये।
फिर दिल्ली पहुँचने में समय ही कितना लगता है!
कई दिनों तक हम गर्मी से बड़े परेशान रहे। अभी दो-तीन दिन पहले ही तो हम नेपाल में रजाइयाँ ओढ़कर सो रहे थे।


मथुरा में नरेश जी के घर पर

एक महीने पहले फ्रिज में नींबू रखकर स्विच-ऑफ करके चले गये थे। और नींबू सड़ गये।
यह इस शानदार यात्रा का आख़िरी फोटो है।





समाप्त।


1. फोटो-यात्रा-1: एवरेस्ट बेस कैंप - दिल्ली से नेपाल
2. फोटो-यात्रा-2: एवरेस्ट बेस कैंप - काठमांडू आगमन
3. फोटो-यात्रा-3: एवरेस्ट बेस कैंप - पशुपति दर्शन और आगे प्रस्थान
4. फोटो-यात्रा-4: एवरेस्ट बेस कैंप - दुम्जा से फाफलू
5. फोटो-यात्रा-5: एवरेस्ट बेस कैंप - फाफलू से ताकशिंदो-ला
6. फोटो-यात्रा-6: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से जुभिंग
7. फोटो-यात्रा-7: एवरेस्ट बेस कैंप - जुभिंग से बुपसा
8. फोटो-यात्रा-8: एवरेस्ट बेस कैंप - बुपसा से सुरके
9. फोटो-यात्रा-9: एवरेस्ट बेस कैंप - सुरके से फाकडिंग
10. फोटो-यात्रा-10: एवरेस्ट बेस कैंप - फाकडिंग से नामचे बाज़ार
11. फोटो-यात्रा-11: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से डोले
12. फोटो-यात्रा-12: एवरेस्ट बेस कैंप - डोले से फंगा
13. फोटो-यात्रा-13: एवरेस्ट बेस कैंप - फंगा से गोक्यो
14. फोटो-यात्रा-14: गोक्यो और गोक्यो-री
15. फोटो-यात्रा-15: एवरेस्ट बेस कैंप - गोक्यो से थंगनाग
16. फोटो-यात्रा-16: एवरेस्ट बेस कैंप - थंगनाग से ज़ोंगला
17. फोटो-यात्रा-17: एवरेस्ट बेस कैंप - ज़ोंगला से गोरकक्षेप
18. फोटो-यात्रा-18: एवरेस्ट के चरणों में
19. फोटो-यात्रा-19: एवरेस्ट बेस कैंप - थुकला से नामचे बाज़ार
20. फोटो-यात्रा-20: एवरेस्ट बेस कैंप - नामचे बाज़ार से खारी-ला
21. फोटो-यात्रा-21: एवरेस्ट बेस कैंप - खारी-ला से ताकशिंदो-ला
22. फोटो-यात्रा-22: एवरेस्ट बेस कैंप - ताकशिंदो-ला से भारत
23. भारत प्रवेश के बाद: बॉर्डर से दिल्ली

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9 Comments

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April 26, 2018 at 10:32 AM delete

ज्योरदार गुरु ! :D

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April 26, 2018 at 11:00 AM delete

शानदार फोटो पूरी यात्रा के, साधुवाद।
मई में होने वाली नेपाल यात्रा के लिए पुस्तक दुबारा पढ रहा हूँ। हमें सिलीगुङी के लिए पूरब में ही जाना होगा,संभवतः घुर्मी हो कर। समय की तो सीमा नहीं है मगर खर्चा नियंत्रित ही होगा। थौङी बहुत ट्रेकिंग करके माउंट एवरेस्ट के दर्शन कहाँ से अच्छे से हो सकते हैं। राय दीजिएगा।
हम गोरखपुर से सुनौली, पोखरा,काठमाण्डौ जाऐंगे। यात्रा पब्लिक ट्रांसपोर्ट (बस) से ही होगी

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April 26, 2018 at 3:56 PM delete

कास हमे पता होता कि आप कैम्पियरगंज बस्ती मेहदावल रोड से आएंगे तो हम भी आप की सेवा में होते क्यों कि जिस सात किलोमीटर सड़क की बात आपने ने बताई उसी से 2 किलोमीटर पहले हमारा घर है बाघनगर बाजार शायद आप को याद हो

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April 26, 2018 at 4:07 PM delete

सर, इस रूट में एवरेस्ट के दर्शन तो नहीं हो सकेंगे... उसके लिए कम से कम नामचे बाजार तो जाना ही होगा... या फिर काठमांडू के लुकला की फ्लाइट से भी एवरेस्ट दर्शन हो सकते हैं...
किसी भी स्थान से सिलीगुड़ी जाने के लिए घुर्मी होकर जाना ठीक नहीं है... मेरी सलाह है कि आप काठमांडू से सिंधुली होते हुए सिलीगुड़ी जाइए...

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April 26, 2018 at 4:26 PM delete

अंत भला तो सब भला। सचमुच में इस अंतिम अध्याय में संतोष और कुशलता के साथ साथ बहुत कुछ छिपा है। अपना नाम पढ़ कर अच्छा लगा। अंत में बन्दर का फोटो भी अच्छा लग रहा है। कुल मिला कर इस अंतिम अध्याय से चैन की साँस लिए होंगे।

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April 26, 2018 at 5:32 PM delete

मजेदार यात्रा ......अरे वाह कैलाशी भी मिल गए with खरबूजे

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April 26, 2018 at 7:18 PM delete

पुस्तक पड़ने के बाद ऐसा लग रहा था कि कुछ छूट गया है इस पोस्ट को पढ़कर आज ओ कमी पूरी हो गयी,
पुस्तक विवरण और ब्लॉग पे चित्र विवरण दोनो ही शानदार

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April 27, 2018 at 10:29 PM delete

मतलब एक शानदार यात्रा का समापन गर्मियों के फल खरबूजे से होगा ऐसा मैं तो क्या आप भी सोंच भी नहीं सकते 👌👌

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